Agni Purana· Agni Purāṇa
347
अध्याय 347 / 381

Adhyaya 348

3 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय ३४७

श्लोक 1

व्याकरणं स्कन्द+उवाच वक्ष्ये व्याकरणं सारं सिद्धशब्दस्वरूपकम् ।कात्यायनविबोधाय बालानां बोधनाय च

vyākaraṇaṃ skanda+uvāca vakṣye vyākaraṇaṃ sāraṃ siddhaśabdasvarūpakam / kātyāyanavibodhāya bālānāṃ bodhanāya ca

हिन्दी अर्थ

यथा-'ब्रजं नेतव्या गावः कृष्णेन।' यहाँ ' कृत्यानां कर्तरि वा।'--इस सूत्र (२।३।७१) के अभिप्रायका उपजीव्यभाव लक्षित होता है। सम्प्रदानमें चतुर्थी” विभक्ति होती है। जिसको

English

See W. P. IV. 2 40.

अध्याय ३४७

श्लोक 2

प्रत्याहारादिकाः संज्ञाः शास्त्रसंव्यवहारगाः ।अ इ उ ण ऋ ऌ क ए ङ ऐ औ च ह य व र ट ण न ञ म ङ ण नम झ भ ञ घ ध ष ज व ग ड द श ख फ छ ठ थ च ट त क प य श ष स र ह ल इति प्रत्याहारः उपदेश इद्धलन्तं भवेदजनुनासिकः

pratyāhārādikāḥ saṃjñāḥ śāstrasaṃvyavahāragāḥ / a i u ṇa ṛ ḷ ka e ṅa ai au ca ha ya va ra ṭa ṇa na ña ma ṅa ṇa nama jha bha ña gha dha ṣa ja va ga ḍa da śa kha pha cha ṭha tha ca ṭa ta ka pa ya śa ṣa sa ra ha la iti pratyāhāraḥ upadeśa iddhalantaṃ bhavedajanunāsikaḥ

हिन्दी अर्थ

कुछ देनेकी इच्छा हो, उसे 'सम्प्रदान' कहा गया है। जिससे कोई पृथक् होता हो, जिससे कुछ लेता या ग्रहण करता हो तथा जिससे भयकी प्राप्ति होती हो, उसकी ' अपादान' संज्ञा होती है। अपादानमें पञ्चमी" विभक्ति होती है। जहाँ स्व- स्वामिभाव या जन्य-जनकभाव आदि सम्बन्धका बोध होता हो, वहाँ षष्ठी विभक्तिका प्रयोग होता है। जो आधार हो, उसकी 'अधिकरण'

English

See W. P. IV. 2 40.

अध्याय ३४७

श्लोक 3

आदिवर्णो गृह्यमाणो ऽप्यन्त्येनेता सहैव तु ।तयोर्मध्यगतानां स्याद्ग्राहकः स्वस्य तद्यथा

ādivarṇo gṛhyamāṇo 'pyantyenetā sahaiva tu / tayormadhyagatānāṃ syādgrāhakaḥ svasya tadyathā

हिन्दी अर्थ

संज्ञा होती है। ' अधिकरण'में सप्तमी” विभक्तिका प्रयोग होता है। जहाँ एकार्थ विवक्षित हो, वहाँ

English

See W. P. IV. 2 40.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 347
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.