Agni Purana· Agni Purāṇa
348
अध्याय 348 / 381

Adhyaya 349

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अध्याय ३४८

श्लोक 1

सन्धिसिद्धरूपं स्कन्द+उवाच वक्ष्ये सन्धिसिद्धरूपं स्वरसन्धिमथादितः ।दण्डाग्रमं सागता दधीदं नदीहते मधूदकं

sandhisiddharūpaṃ skanda+uvāca vakṣye sandhisiddharūpaṃ svarasandhimathāditaḥ / daṇḍāgramaṃ sāgatā dadhīdaṃ nadīhate madhūdakaṃ

हिन्दी अर्थ

एकवचन और जहाँ द्वित्व विवक्षित हो, वहाँ द्विवचनका प्रयोग करना चाहिए। बहुत्वकी विवक्षा होनेपर बहुबचनका प्रयोग होता है । अब शब्दोंके अर्कः, है रवे! है द्विजातयः! ॥ २४ २९॥

English

Nikumbha (was born) from Haryalva and Saihhatasva from Nikumbha. Akrava and Rari&lva were the two sons of Samhatva.

अध्याय ३४८

श्लोक 2

पितृषभः ॡकारश् च तवेदं सकलोदकं ।अर्धर्चो ऽयं तवल्कारः सैषा सैन्द्री तवौदनम्

pitṛṣabhaḥ ḹkāraś ca tavedaṃ sakalodakaṃ / ardharco 'yaṃ tavalkāraḥ saiṣā saindrī tavaudanam

हिन्दी अर्थ

(राम+च० एक०), मुनिवर्याभ्याम् (मुनिवर्य+च० द्वि०), केभ्यः (किम्+च० बहु०), धर्मात् ( धर्म+पं०

English

Yuvanaiva (was the son) of Rankiva. Mandhktr (was born) from Yuvanaiva. Purukutsawas (born) fromMandhatr. Mucukunda (was his) second (son).

अध्याय ३४८

श्लोक 3

खट्टौघो ऽभवदित्येवं व्यसुधीर्वस्वलङ्कृतं ।पित्रर्थोपवनं दात्री नायको लावको नयः

khaṭṭaugho 'bhavadityevaṃ vyasudhīrvasvalaṅkṛtaṃ / pitrarthopavanaṃ dātrī nāyako lāvako nayaḥ

हिन्दी अर्थ

एक०), शराभ्याम् (शर+पञ्च० द्वि०), पुस्तकेभ्यः बहु०), बालकोंकी सज्जनमें प्रीति होती है और हंसके जोडेको कमलोंमें-यह इकतीसवें श्लोकके उत्तरार्धका वाक्यार्थ है?

English

Trasadasyu and Sambhuta (were born) from Purukutsa through Narmada. Sudhanva was (bom) from Sambhuta. Then Tridhanva (was born) from Sudhanva.

अध्याय ३४८

श्लोक 4

त+इह तयिहेत्यादि ते ऽत्र यो ऽत्र जले ऽकजं ।प्रकृतिर्नो अहो एहि अ अवेहि इ इन्द्रकं

ta+iha tayihetyādi te 'tra yo 'tra jale 'kajaṃ / prakṛtirno aho ehi a avehi i indrakaṃ

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार 'काम', 'महेश' आदि शब्द

English

Taruna (was born) from Tridhanva and Satyavrata (was) his son. Satyaratha (was bom) from Satyavrata. Hariscandra (was) his son.

अध्याय ३४८

श्लोक 5

उ उत्तिष्ठ कवी एतौ वायु एतौ वने इमे ।अमी एते यज्ञभूते एहि देव इमन्नय

u uttiṣṭha kavī etau vāyu etau vane ime / amī ete yajñabhūte ehi deva imannaya

हिन्दी अर्थ

१. सम्बोधनमें प्रथमाका उदाहरण-- है राम! है रामौ!' इत्यादि। २. द्वितीयाका उदाहरण--हरिं भजति। ३. उदा०-रामेण बाणेन हतो वाली । यहाँ 'राम' शब्द ' तिङ्' प्रत्ययद्वारा अनुक्त कर्ता है। अतः उसमें तृतीया हुई है। 'बाण' करण है, इससे उसमें तृतीया हुई है। ४. उदा०- ब्राह्मणाय गां ददाति। ५. उदा०--ग्रामाद् अपैति, आयाति वा। शिष्यो गुरोविद्यामादत्ते गृह्णाति वा। चोराद् बिभेति। जो भयका हेतु हो, उसीमें पञ्चमी होती है। अतः ' अरण्ये बिभेति' इसमें पञ्चमी नहीं हुई; क्योंकि भयका हेतु ' अरण्य' नहीं, व्याघ्र आदि हैं। ६. उदा०--राज्ञः पुरुषः, देवदत्तस्य पुत्र: इत्यादि। ७. उदा०--'कटे आस्ते' इत्यादि।

English

"U" — "uttishtha"; "kavi etau"; "vayu etau"; "vane ime"; "ami ete"; "yajnabhute"; "ehi deva"; "iman naya" (examples of vowel sandhi and non-combination).

अध्याय ३४८

श्लोक 6

वक्ष्ये सन्धिं व्यञ्जनाणां वाग्यतो ऽजेकमातृकः ।षडेते तदिमे वादिवाङ्नीतिः षण्मुखादिकम्

vakṣye sandhiṃ vyañjanāṇāṃ vāgyato 'jekamātṛkaḥ / ṣaḍete tadime vādivāṅnītiḥ ṣaṇmukhādikam

हिन्दी अर्थ

८. एकार्थमें एकवचन “राम: ' इत्यादि। द्वित्वविवक्षामें ' रामौ' इत्यादि। बहुत्वविवक्षामें बहुवचन ' रामाः ' इत्यादि। ' वृक्ष’ शब्दका प्रथमा विभक्तिके एकवचनमें ' वृक्ष: '--यह रूप सिद्ध होता है। इसके शेष रूप 'राम' शब्दकी तरह जानने चाहिए। इसी तरह सूर्यः, अम्बुवाहः और अर्कः इनको क्रमशः सूर्य, अम्बुवाह और अर्क शब्दका प्रथमान्त एकवचन रूप समझना चाहिए। ' वृक्ष' और 'सूर्य' शब्दका अर्थ सर्वविदित है। ' अम्बुवाह? और ' अर्क' शब्द-ये क्रमशः मेघ और सूर्यके वाचक हैं। है रवे!- यह रवि' शब्दका

English

I shall tell the sandhi of consonants, speech controlled, with one mora: these six; "tad ime" and "vadi" — Vagniti, Shanmukha and the rest.

अध्याय ३४८

श्लोक 7

वाङ्मनसं वग्भावादिर्वाक् श्लक्ष्णं तच्छरीरकं ।तल्लु नाति तच्चरेच्च क्रुङ्ङास्ते च सुगणिह

vāṅmanasaṃ vagbhāvādirvāk ślakṣṇaṃ taccharīrakaṃ / tallu nāti taccarecca kruṅṅāste ca sugaṇiha

हिन्दी अर्थ

सम्बोधनमें प्रथमान्त एकवचन रूप है। है द्विजातय: !--यह 'द्विजाति' शब्दका सम्बोधनमें प्रथमान्त बहुवचनरूप है। 'रवि' शब्द सूर्यका एवं द्विजाति’ शब्द ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य--इन तीनोंका वाचक है। ९. इन दो श्लोकोंमें जो शब्द आये हैं, उनका पृथक्-पृथक् अर्थ इस प्रकार जानना चाहिए। विप्रौ-दो ब्राह्मण । गजान्=हाथियोंको । महेन्द्रेण=महेनद्रसे । यमाभ्याम्=दो यमोँसे । अनिलैः=हवाओंसे। कृतम्=किया गया। रामाय=रामके लिये। मुनिवर्य्याभ्याम्=दो मुनिवरोंके लिये। केभ्यः=किनके लिये । धर्मात्=धर्मसे । हरौ=हरिमें। रतिः=अनुराग। शराभ्याम्=दो बाणोंसे। पुस्तकेभ्यः =पुस्तकोंसे। अर्थस्य=अर्थका । ईश्वरयोः=दो ईश्वरोंको । गतिः=प्राप्ति। बालानाम्=बालकोंकी सजने=सत्पुरुषमें । प्रीतिः =प्रेम। हंसयोः=दो हंसोंकी । कमलेषु=कमलोंमें ।

English

"Vanmanasam," "vagbhava" and the rest; "vak shlakshnam", "tacchariraka"; "tallunati", "taccharet", "krunnaste", "sugannih" (examples of consonant sandhi).

अध्याय ३४८

श्लोक 8

भवांश् चरन् भवांश्छात्रो भवांष्टीकाभवांष्ठकः ।भवांस्तीर्थं भवांस्थेयात् भवांल्लेखा भवाञ्जयः

bhavāṃś caran bhavāṃśchātro bhavāṃṣṭīkābhavāṃṣṭhakaḥ / bhavāṃstīrthaṃ bhavāṃstheyāt bhavāṃllekhā bhavāñjayaḥ

हिन्दी अर्थ

“वृक्ष' शब्दके समान जानने चाहिए। 'सर्वे', “विश्वे--इन दोनोंका अर्थ है--सब। ये प्रथमा विभक्तिके बहुवचनान्तरूप हैं । सर्वस्मै, सर्वस्मात्-- ये 'सर्व' शब्दके क्रमश: चतुर्थी और पञ्चमी

English

"Bhavamscharan," "bhavamschhatrah," "bhavamstikah," "bhavamsthakah," "bhavamstirtham," "bhavamstheyat," "bhavamllekha," "bhavanjayah" (examples).

अध्याय ३४८

श्लोक 9

भवाञ्छेते भवाञ्चशेते भवाञ्शेते भवाण्डीनः ।स्वम्भर्ता त्वङ्करोष्यादिः सन्धिर्ज्ञेयो विसर्गजः

bhavāñchete bhavāñcaśete bhavāñśete bhavāṇḍīnaḥ / svambhartā tvaṅkaroṣyādiḥ sandhirjñeyo visargajaḥ

हिन्दी अर्थ

विभक्तिके एकवचनान्त रूप हैं। कतरो मत:= दोमेंसें कौन अभिमत है ? यहाँ 'कतर' शब्दका प्रथमामें एकवचनान्त सिद्ध रूप दिया गया है। “कतर' शब्द सर्वनाम है और “सर्व” शब्दकी भाँति उसका रूप चलता है। सर्वेषाम् (सर्व+षष्ठी० बहु०), स्वं च (“स्व' शब्द भी सर्वनाम है। अतः इसका रूप भी सर्ववत् समझना चाहिए।) विश्वस्मिन् (विश्व+सप्त0 एक०)-इन शब्दोंके

English

"Bhavanchhete," "bhavanchashete," "bhavanshete," "bhavandinah," "svambharta," "tvankaroshi" and the like — sandhi arising from visarga is to be known.

अध्याय ३४८

श्लोक 10

कश्छिन्द्यात् कश् चरेत् कष्टः कष्ठः कस्थश् च कश् चलेत् ।क ॥ खनेत् क ॥ करोति स्म क ,, पठेत् क ,, वा

kaśchindyāt kaś caret kaṣṭaḥ kaṣṭhaḥ kasthaś ca kaś calet / ka .. khanet ka .. karoti sma ka ,, paṭhet ka ,, vā

हिन्दी अर्थ

शेष रूप 'सर्व' शब्दके समान हैं। इसी प्रकार उभय, कतर, कतम और अन्यतर आदि शब्दोंके रूप होते हैं। पूर्वे, पूर्वाः-ये 'पूर्व” शब्दके प्रथमान्त बहुवचन रूप हैं। प्रथमान्त बहुवचनमें

English

"Kashchhindyat," "kashcharet," "kashtah," "kashthah," "kasthash cha," "kashchalet," "kah khanet," "kah karoti sma," "kah pathet" (visarga sandhi examples).

अध्याय ३४८

श्लोक 11

कश्श्वशुरः कःश्वशुरः कस्सावरः कःसावरः ।कः फलेत कः शयिता को ऽत्र योधः क उत्तमः

kaśśvaśuraḥ kaḥśvaśuraḥ kassāvaraḥ kaḥsāvaraḥ / kaḥ phaleta kaḥ śayitā ko 'tra yodhaḥ ka uttamaḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वादि शब्दोंको विकल्पसे सर्वनाम माना जाता है। सर्वनाम-पक्षमें 'पूर्वे' और सर्वनामाभव- पक्षमें “पूर्वाः? रूपकी सिद्धि होती है। पूर्वस्मै पूर्वसे आया। यहाँ पूर्व’ शब्दका पञ्चमी विभक्तिमें एकवचनान्त रूप प्रयुक्त हुआ है। 'पूर्वे बुद्धिश्व पूर्वस्मिन्'-पूर्वमें बुद्धि। यहाँ “पूर्व” शब्दका सप्तमीके एक वचनमें रूपद्दय प्रयुक्त हुआ है।

English

"Kashshvashurah," "kahshvashurah," "kassavarah," "kahsavarah," "kah phalet," "kah shayita," "ko 'tra yodhah," "ka uttamah" (examples).

अध्याय ३४८

श्लोक 12

देवा एते भो इह सोदरा यान्ति भगो व्रज ।सुपूः सुदूरात्रिरत्र वायुर्याति पुनर्न हि

devā ete bho iha sodarā yānti bhago vraja / supūḥ sudūrātriratra vāyuryāti punarna hi

हिन्दी अर्थ

“पूर्व? आदि नौ शब्दोंसे पञ्चमी और सप्तमीके एकवचनमें “ङसि और ङि' के स्थानोंमें ' स्मात्' और 'स्मिन्' आदेश विकल्पसे होते हैं। उनके होनेपर पूर्वस्मात् और पूर्वस्मिन् रूप बनते हैं

English

"Deva ete bho iha," "sodara yanti bhago vraja," "supuh sudurat," "ratrir atra," "vayur yati punar na hi" (examples).

अध्याय ३४८

श्लोक 13

पुनरेति स यातीह एष याति क ईश्वरः ।ज्योतीरूपं तवच्छत्रं म्लेच्छधीश्छिद्रमच्छिदत्

punareti sa yātīha eṣa yāti ka īśvaraḥ / jyotīrūpaṃ tavacchatraṃ mlecchadhīśchidramacchidat

हिन्दी अर्थ

और न होनेपर 'राम' शब्दकी भाँति 'पूर्वात्' और (पूर्वे' रूप होते हैं। शेष रूप सर्ववत् जानने चाहिए। इसी प्रकार पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अन्तर, अपर, अधर और नेम शब्दोंके भी रूप जानने चाहिए। प्रथमे, प्रथमाः-ये 'प्रथम' शब्दके बहुवचनान्त रूप हैं। इनके शेष रूप

English

"Punareti sa yatiha eshah yati ka ishvarah," "jyotirupam tavachchhatram," "mlechchhadhis chhidram achchhidat" (examples).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 348
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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