Agni Purana· Agni Purāṇa
353
अध्याय 353 / 381

Adhyaya 354

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अध्याय ३५३

श्लोक 1

समासः स्कन्द उवाच षोढा समासं वक्ष्यामि अष्टाविंशतिधा पुनः ।नित्यानित्यविभागेन लुग्लोपेन च द्विधा

samāsaḥ skanda uvāca ṣoḍhā samāsaṃ vakṣyāmi aṣṭāviṃśatidhā punaḥ / nityānityavibhāgena luglopena ca dvidhā

हिन्दी अर्थ

अतः उसमें पञ्चमी विभक्ति हुई है

English

(Lord) Rudra (Siva) was attacked by (the demon) Andhaka desirous of carrying away Gauri (consort of Siva). (Lord) Hari, who was fond of (his beloved) Revati killed the demon Andha.

अध्याय ३५३

श्लोक 2

कुम्भकारश् च नित्यः स्याद्धेमकारादिकस् तथा ।राज्ञः पुमान् राजपुमान् नित्यो ऽयञ्च समासकः

kumbhakāraś ca nityaḥ syāddhemakārādikas tathā / rājñaḥ pumān rājapumān nityo 'yañca samāsakaḥ

हिन्दी अर्थ

अधिकरण चार प्रकारके होते हैं-अभिव्यापक, तत्त्व किसी वस्तुमें व्यापक हो, वह आधारभूत वस्तु अभिव्यापक 'अधिकरण' है। यथा “दध्नि घृतम्।' (दहीमें घी है)। “तिलेषु तैलं देवार्थम्।' (तिलमें तेल है, जो देवताके उपयोगमें

English

(Lord) Hari, (manifested as) Parasurama, conquered the demons such as Salva and protected the celestials after killing the wicked ksatriyas (kings).

अध्याय ३५३

श्लोक 3

१ अर्थस्येति ज॥ :प् २५३ कष्टश्रितो लुक्समासः कण्ठेकालादिकस्त्वलुक् ।स्यादष्टधा तत्पुरुषः प्रथमाद्यसुपा सह

1 arthasyeti ja.. :p 253 kaṣṭaśrito luksamāsaḥ kaṇṭhekālādikastvaluk / syādaṣṭadhā tatpuruṣaḥ prathamādyasupā saha

हिन्दी अर्थ

आता है।) यहाँ घी दहीमें और तैल तिलमें व्याप्त है। अतः इनके आधारभूत दही और तिल अभिव्यापक अधिकरण हैं । ' आधारो योऽधिकरणं

English

Madhusudana (the destroyer of demon Madhu) took away the demon of HMahala poison from Mahesvara and des¬ troyed the fear of the celestials.

अध्याय ३५३

श्लोक 4

प्रथमातत्पुरुषो ऽयं पूर्वं कायस्य विग्रहे ।पूर्वकायो ऽपरकायो ह्य् अधरोत्तरकायकः

prathamātatpuruṣo 'yaṃ pūrvaṃ kāyasya vigrahe / pūrvakāyo 'parakāyo hy adharottarakāyakaḥ

हिन्दी अर्थ

विभक्तिस्तत्र सप्तमी।'--इस पूर्वोक्त नियमके अनुसार अधिकरणमें सप्तमी विभक्ति होती है। प्रस्तुत उदाहरणमें ' दध्नि’ और 'तिलेषु'--इन पदोंमें इसी नियमसे सप्तमी विभक्ति हुई है। अब ' औपश्लेषिक अधिकरण' बताया जाता है-- “कपिगृहे तिष्ठेद् वृक्षे च तिष्ठेत्।' (बंदर घरके ऊपर स्थित होता है और वृक्षपर भी स्थित होता है।) कपिके आधारभूत जो गृह और वृक्ष हैं,

English

The kings, princes, sages and the gods are the mani¬ festations of (Lord) Hari, whether (their names) have been narrated or not (in the traditional list).

अध्याय ३५३

श्लोक 5

अर्धं कणाया अर्धकणा भिक्षातूर्यमथेदृशम् ।आपन्नजीविकस्तद्वत् द्वितीया चाधराश्रितः

ardhaṃ kaṇāyā ardhakaṇā bhikṣātūryamathedṛśam / āpannajīvikastadvat dvitīyā cādharāśritaḥ

हिन्दी अर्थ

उनपर वह सटकर बैठता है। इसीलिये वह ' औपश्लेषिक अधिकरण' माना गया है। अधिकरण होनेसे ही 'गृहे' और “वृक्षे'--इन पदोंमें सप्तमी विभक्ति प्रयुक्त हुई है। अब “वैषयिक अधिकरण'

English

Gandhara(was born) from Gandira. The mighty five peoples — Gandharas, Keralas, Colas, Pandyas and Kolas (were born) then.

अध्याय ३५३

श्लोक 6

वर्षम्भोग्यो वर्षभोग्यो धान्यार्थश् च तृतीयया ।चतुर्थी स्याद्विष्णुबलिर्वृकभीतिश् च पञ्चमी

varṣambhogyo varṣabhogyo dhānyārthaś ca tṛtīyayā / caturthī syādviṣṇubalirvṛkabhītiś ca pañcamī

हिन्दी अर्थ

बताते हैं-विषयभूत अधिकरणको 'वैषयिक' कहते है। यथा--'जले मत्स्यः।', “बने सिंहः।' (जलमें मछली, वनमें सिंह।) यहाँ जल और वन 'विषय' हैं और मत्स्य तथा सिंह 'विषयी '। अतः विषयभूत अधिकरणमें सप्तमी विभक्ति हुई। अब 'सामीप्यक अधिकरण' बताते हैं- 'गङ्कायां घोषो वसति।' (गङ्गामें गोशाला बसती है।) यहाँ 'गङ्गा' का अर्थ है-गङ्गाके समीप।

English

Druhyu and Babhrusetu (were the sons of Gandhara). Purovasu(was born) from Babhruselu. Then Gandhara (was born) and Dharma from Gandhara. Ghrta was (born) from Dharma.

अध्याय ३५३

श्लोक 7

राज्ञः पुमान् राजपुमान् षष्ठी वृक्षफलं तथा ।सप्तमी चाक्षशौण्डो ऽयमहितो नञ्समासकः

rājñaḥ pumān rājapumān ṣaṣṭhī vṛkṣaphalaṃ tathā / saptamī cākṣaśauṇḍo 'yamahito nañsamāsakaḥ

हिन्दी अर्थ

अतः 'सामीप्यक अधिकरण' होनेके कारण गङ्गामें सप्तमी विभक्ति हुई। ऐसे वाक्य ' औपचारिक' माने जाते हैं। जहाँ मुख्यार्थ बाधित होनेसे उसके सम्बन्धसे युक्त अर्थान्तरकी प्रतीति होती है, वहाँ

English

"King's man, rajapurusha" — the sixth compound; "tree-fruit" likewise; seventh: "aksha-shaunda"; the negative compound "ahita" (examples of compounds).

अध्याय ३५३

श्लोक 8

कर्मधारयः सप्तधा नीलोत्पलमुखाः स्मृताः ।विशेषणपूर्वपदो विशेष्योत्तरतस् तथा

karmadhārayaḥ saptadhā nīlotpalamukhāḥ smṛtāḥ / viśeṣaṇapūrvapado viśeṣyottaratas tathā

हिन्दी अर्थ

“लक्षणा' होती है । 'गौर्वाहिकः' इत्यादि स्थलोंमें 'गो' शब्दका मुख्यार्थ बाधित होता है, अत: वह स्वसदृशको लक्षित कराता है। इस तरहके वाक्यप्रयोगको 'औपचारिक' कहते हैं। ' अनभिहित कर्ता' में तृतीया अथवा षष्ठी विभक्ति होती है। यथा-- विष्णुः सम्पूज्यते लोकैः।' (लोगोंद्वारा विष्णु पूजे जाते हैं।) यहाँ कर्ममें प्रत्यय हुआ है । अतः कर्म उक्त है और कर्ता अनुक्त। इसलिये

English

Karmadharaya sevenfold: neelotpala and the rest; with qualifier first; also with qualified later;

अध्याय ३५३

श्लोक 9

वैयाकरणखमूचिः शीतोष्णं द्विपदं शुभम् ।उपमानपूर्वपदः शङ्खपाण्डर इत्य् अपि

vaiyākaraṇakhamūciḥ śītoṣṇaṃ dvipadaṃ śubham / upamānapūrvapadaḥ śaṅkhapāṇḍara ity api

हिन्दी अर्थ

अनुक्त कर्ता 'लोक' शब्दमें तृतीया विभक्ति हुई

English

"vyakarana-kha-muchi, shita-ushna, dvipada, shubha"; with comparison-standard first: "shankhapandara";

अध्याय ३५३

श्लोक 10

उपमानोत्तरपदः पुरुशव्याघ्र इत्य् अपि ।सम्भावनापूर्वपदो गुणवृद्धिरितीदृशम्

upamānottarapadaḥ puruśavyāghra ity api / sambhāvanāpūrvapado guṇavṛddhiritīdṛśam

हिन्दी अर्थ

है । “तेन गन्तव्यम्, तस्य गन्तव्यम्? (उसको जाना चाहिए) यहाँ उपर्युक्त नियमके अनुसार तृतीया और षष्ठी-दोनोंका प्रयोग हुआ है। षष्ठीका प्रयोग कृदन्तके योगमें ही होता है। अभिहित कर्ता और कर्ममें प्रथमा विभक्ति होती है। इसीलिये “विष्णुः? में प्रथमा विभक्ति हुई है। “भक्तः हरिं प्रणमेत्।' (भक्त भगवानको प्रणाम करे।) यहाँ अभिहित कर्ता 'भक्त'में प्रथमा

English

with comparison-standard last: "purushavyaghra"; with possibility first: "gunavriddhi" and so on;

अध्याय ३५३

श्लोक 11

गुण इति वृद्धिर्वाच्या सुहृदेव सुवन्धुकः ।अवधारणपूर्वपदो बहुब्रीहिश् च सप्तधा

guṇa iti vṛddhirvācyā suhṛdeva suvandhukaḥ / avadhāraṇapūrvapado bahubrīhiś ca saptadhā

हिन्दी अर्थ

विभक्ति हुई है और अनुक्त कर्म 'हरि' में द्वितीया विभक्ति। 'हेतु'में तृतीया विभक्ति होती है। यथा —' अन्नेन बसेत्।' (अन्नके हेतु कहीं भी निवास करे।) यहाँ हेतुभूत अन्नमें तृतीया विभक्ति

English

"guna and vriddhi are to be said"; "suhrid, subandhuka"; with determination first; the Bahuvrihi is sevenfold;

अध्याय ३५३

श्लोक 12

द्विपदश् च बहुव्रीहिरारूढ्भवनो नरः ।अर्चिताशेषपूर्वोयं बह्वङ्घ्रिः परिकीर्तितः

dvipadaś ca bahuvrīhirārūḍhbhavano naraḥ / arcitāśeṣapūrvoyaṃ bahvaṅghriḥ parikīrtitaḥ

हिन्दी अर्थ

हुई है। 'तादर्थ्य'में चतुर्थी विभक्ति कही गयी है। यथा-' वृक्षाय जलम्' 'वृक्षके लिये पानी।' यहाँ वृक्ष' शब्दमें 'तादर्थ्यप्रयुक्त' चतुर्थी विभक्ति हुई है। परि, उप, आङ् आदिके योगमें पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा--'परि ग्रामात् पुरा बलवत् वृष्टोऽयं देबः।' (गाँवसे कुछ दूर हटकर हैवने पूर्वकालमें बड़े जोरको वर्षा को थी।)-- इस वाक्यमें 'परि'के साथ योग होनेके कारण

English

two-worded Bahuvrihi: "arudhabhuvana naro"; "this one with worshipped remainder first, bahvanghri (many-footed)" is declared;

अध्याय ३५३

श्लोक 13

एते विप्राश्चोपदशाः सङ्ख्योत्तरपदस्त्वयम् ।सङ्ख्योभयपदो यद्वद्द्वित्रा द्व्येकत्रयो नरः

ete viprāścopadaśāḥ saṅkhyottarapadastvayam / saṅkhyobhayapado yadvaddvitrā dvyekatrayo naraḥ

हिन्दी अर्थ

'ग्राम' शब्दमें पञ्चमी विभक्ति हुई है। दिग्वाचक शब्द, अन्यार्थक शब्द तथा “ऋते' आदि शब्दोंके योगमें भी पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा--'पूर्वो

English

"these Brahmins are upadasha"; with number-last: "dvitra, dvyekatra naro" (examples); with number in both words,

अध्याय ३५३

श्लोक 14

सहपूर्वपदो ऽयं स्यात् समूलोद्धृतकस्तरुः ।व्यतिहारलक्षणार्थः केशाकेशि नखानखि

sahapūrvapado 'yaṃ syāt samūloddhṛtakastaruḥ / vyatihāralakṣaṇārthaḥ keśākeśi nakhānakhi

हिन्दी अर्थ

“पृथक्? और 'विना' आदिके योगमें तृतीया एवं पञ्चमी विभक्ति होती है- जैसे “पृथग् ग्रामात्।' यहाँ “पृथक् ' शब्दके योगमें ग्राम' शब्दसे पञ्चमी और “पृथग् विहारेण’ यहाँ “पृथक्? शब्दके योगमें “विहार' शब्दसे तृतीया विभक्ति हुई। इसी प्रकार 'विना' शब्दके योगमें भी जानना चाहिए। “विना श्रिया'- यहाँ “विना' के योगमें ' श्री शब्दसे द्वितीया, “विना श्रिया'-यहाँ “विना'के योगें

English

this would be with sa-first: "samulodhrita tarah"; for reciprocity "kesakesi, nakhanakhi" (examples);

अध्याय ३५३

श्लोक 15

दिग्लक्ष्या स्याद्दक्षिणपूर्वा द्विगुराभाषितो द्विधा ।एकवद्भावि द्विशृङ्गं पञ्चमूली त्वेकधा

diglakṣyā syāddakṣiṇapūrvā dvigurābhāṣito dvidhā / ekavadbhāvi dviśṛṅgaṃ pañcamūlī tvekadhā

हिन्दी अर्थ

“श्री'शब्दसे तृतीया और “बिना श्रियः'-यहाँ

English

direction-marked: "dakshinapurva"; Dvigu is told in two ways: as singular "dvishringa"; "panchamuli" in one way.

अध्याय ३५३

श्लोक 16

द्वन्द्वः समासो द्विविधो हीतरेतरयोगकः ।रुद्रविष्णू समाहारो भेरीपटहमीदृशम्

dvandvaḥ samāso dvividho hītaretarayogakaḥ / rudraviṣṇū samāhāro bherīpaṭahamīdṛśam

हिन्दी अर्थ

“विना'के योगें ' श्री' शब्दसे पञ्चमी विभक्ति हुई है। कर्मप्रवचनीयसंज्ञक शब्दोंके योगमें द्वितीया विभक्ति होती है-जैसे “अन्वर्जुनं योद्धारः योद्धा अर्जुनके संनिकट प्रदेशमें हैं ।'--यहाँ ' अनु ' कर्मप्रवचनीय-संज्ञक है-इसके योगमें ' अर्जुन' शब्दमें द्वितीया विभक्ति हुई। इसी प्रकार अभितः, परितः आदिके योगमें भी द्वितीया होती है। यथा ' अभितो ग्राममीरितम्।'-गाँवके सब तरफ कह

English

Dvandva compound is of two kinds: by mutual joining ("Rudravishnu") and collective ("bheripatahamidrisham").

अध्याय ३५३

श्लोक 17

द्विधाख्यातो ऽव्ययीभावो नामपूर्वपदो यथा ।शाकस्य मात्रा शाकप्रति यथाव्ययपूर्वकः

dvidhākhyāto 'vyayībhāvo nāmapūrvapado yathā / śākasya mātrā śākaprati yathāvyayapūrvakaḥ

हिन्दी अर्थ

दिया है।' यहाँ 'अभितः' शब्दके योगमें “ग्राम' शब्दमें द्वितीया विभक्ति हुई है। नमः, स्वाहा, स्वधा, स्वस्ति एवं वषट् आदि शब्दोंके योगमें चतुर्थी विभक्ति होती है-जैसे 'नमो' देवाय-

English

Avyayibhava is told as twofold: with a noun first: "shakasya matra, shakaprati"; with indeclinable first;

अध्याय ३५३

श्लोक 18

उपकुम्भञ्चोपरथ्यं प्राधान्येन चतुर्विधः ।उत्तरपदार्थमुख्यो द्वन्द्वश्चोभयमुख्यकः ।पूर्वार्थेशो ऽव्ययीभावो बहुव्रीहिश् च वाह्यगः

upakumbhañcoparathyaṃ prādhānyena caturvidhaḥ / uttarapadārthamukhyo dvandvaścobhayamukhyakaḥ / pūrvārtheśo 'vyayībhāvo bahuvrīhiś ca vāhyagaḥ

हिन्दी अर्थ

(देवको नमस्कार है)-यहाँ “नमः” के योगमें 'देव' शब्दमें चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त हुई है। इसी प्रकार 'ते स्वस्ति'--तुम्हारा कल्याण हो-यहाँ “स्वस्ति के योगमें 'युष्मद्' शब्दसे चतुर्थी विभक्ति हुई (“युष्मद्' शब्दको चतुर्थीके एकवचनमें वैकल्पिक 'ते' आदेश हुआ है) । तुमुनप्रत्ययार्थक भाववाची शब्दसे चतुर्थी विभक्ति होती है-जैसे पाकाय याति’ और 'पक्तये याति'-पकानेके लिये जाता

English

"upakumbha, uparathya" — it is fourfold by predominance: Tatpurusha with the latter word's meaning chief; Dvandva with both chief; Avyayibhava with the former meaning chief; Bahuvrihi with outside meaning.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 353
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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