Agni Purana· Agni Purāṇa
354
अध्याय 354 / 381

Adhyaya 355

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अध्याय ३५४

श्लोक 1

तद्धितं स्कन्द उवाच तद्धितं त्रिविधं वक्ष्ये सामान्यवृत्तिरीदृशी ।ले व्यंसलो वत्सलः स्यादिलचि स्यात्तुफेनिलं

taddhitaṃ skanda uvāca taddhitaṃ trividhaṃ vakṣye sāmānyavṛttirīdṛśī / le vyaṃsalo vatsalaḥ syādilaci syāttuphenilaṃ

हिन्दी अर्थ

है।' यहाँ “पाक' और “पक्ति' शब्द 'तुमर्थक भाववाची' हैं। इन दोनोंसे चतुर्थी विभक्ति हुई। “सहार्थ शब्दके योगमें हेतु-अर्थ और कुत्सित अङ्गवाचकमें तृतीया विभक्ति होती है। सहार्थयोगमें

English

Vidu.sa (was born) from Ghrta. Pracetas (was born) from him. He had a hundred sons (among whom) Anadra, Sabhanara, Caksusa and Paramcuka (were foremost).

अध्याय ३५४

श्लोक 2

लोमशः शे पामनो ने इलचि स्यात्तु पिच्छिलं ।अणि प्राज्ञ आर्चकः स्यात् दन्तादुरचि दन्तुरः

lomaśaḥ śe pāmano ne ilaci syāttu picchilaṃ / aṇi prājña ārcakaḥ syāt dantāduraci danturaḥ

हिन्दी अर्थ

तृतीया विशेषणवाचकसे होती है । जैसे 'पिताऽगात् सह पुत्रेण '--पिता पुत्रके साथ चले गये।' यहाँ 'सह' शब्दके योगमें विशेषणवाचक 'पुत्र' शब्दसे तृतीया विभक्ति हुई। इसी प्रकार “गदया हरिः' (भगवान् हरि गदाके सहित रहते है)-यहाँ 'सहार्थक' शब्दके न रहनेपर भी सहार्थ है, इसलिये विशेषणवाचक 'गदा' शब्दसे तृतीया विभक्ति हुई। ' अक्ष्णा काणः आँखसे काना

English

Kalanala (was born) from Sabhanara. Sriijaya, was

अध्याय ३५४

श्लोक 3

रे स्यान्मधुरं सुशिरं रे स्यात् केशर ईदृशः ।हिरण्यं ये मालवो वे वलचि स्याद्रजस्वलः

re syānmadhuraṃ suśiraṃ re syāt keśara īdṛśaḥ / hiraṇyaṃ ye mālavo ve valaci syādrajasvalaḥ

हिन्दी अर्थ

है।'—यहाँ कुत्सितअङ्गवाचक ' अक्षि' शब्द है। उससे तृतीया विभक्ति हुई। ' अर्थेन निवसेद्

English

Prthudarbha, Viraka, Kaikcya and Bhadraka were the four sons of Sibi. There were prosperous regions in their names.

अध्याय ३५४

श्लोक 4

इनौ धनी करी हस्ती धनिकं टिकनीरितं ।पयस्वी विनि मायावी ऊर्णायुर्युचि ईरितं

inau dhanī karī hastī dhanikaṃ ṭikanīritaṃ / payasvī vini māyāvī ūrṇāyuryuci īritaṃ

हिन्दी अर्थ

भृत्यः।'—' भृत्य धनके कारणसे रहता है।-- यहाँ हेतु-अर्थ है 'धन'। तद्वाचक ' अर्थ' शब्दसे तृतीया विभक्ति हुई। कालवाचक और भाव अर्थमें सप्तमी विभक्ति होती है। अर्थात् जिसको क्रियासे अन्य क्रिया लक्षित होती है, तद्वाचक शब्दसे सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे-' विष्णौ नते भवेन्मुक्तिः '-- भगवान् विष्णुको नमस्कार करनेपर मुक्ति मिलती है।-यहाँ श्रीविष्णुकी

English

Given as two separate names and subsequent names also differ. See Vi. P. IV. 17.

अध्याय ३५४

श्लोक 5

वाग्मो मिनि आलचि स्याद्वाचालश्चाटचीरितं ।फलिनो वर्हिणः केकी वृन्दारकस् तथा कनि

vāgmo mini ālaci syādvācālaścāṭacīritaṃ / phalino varhiṇaḥ kekī vṛndārakas tathā kani

हिन्दी अर्थ

नमस्कार-क्रियासे मुक्ति-भवनरूपा क्रिया लक्षित होती है, अतः 'विष्णु' शब्दसे सप्तमी विभक्ति हुई। इसी प्रकार 'बसन्ते स गतो हरिम्'--वह वसन्त ऋतुमें हरिके पास गया।'-यहाँ 'वसन्त'

English

Satyaratha (was born) from Citraratha. Lomapada (was) his son. Caturahga (was born) from Lomapada. Prthu- laksa (was) his son.

अध्याय ३५४

श्लोक 6

आलुचि शीतन्न सहते शीतालुः श्वालुरीदृशः ।हिमालुरालुचि स्याच्च हिमं न सहते तथा

āluci śītanna sahate śītāluḥ śvālurīdṛśaḥ / himālurāluci syācca himaṃ na sahate tathā

हिन्दी अर्थ

कालवाचक है, उससे सप्तमी हुई। (स्वामी, ईश, पति, साक्षी, सूत और दायाद आदि शब्दोंके योगमें षष्ठी एवं सप्तमी विभक्तियाँ होती हैं-) जैसे-'नृणां स्वामी, नृषु स्वामी '--मनुष्योंका स्वामी,-यहाँ ' स्वामी ' शब्दके योगमें ' न्' शब्दसे षष्ठी एवं सप्तमी विभक्तियाँ हुई। इसी प्रकार 'नृणामीशः'नरोंके ईश'-यहाँ 'ईश' शब्दके योगमें 'नृ' शब्दसे, तथा 'सतां पतिः '- सज्जनोंका

English

Vivajit (was born) from Brhadratha. Karna was from Visvajit. Vrsasena (was the son) of Karna. Prthusena was his son. These are the kings born in the race of Anga. Describe me the race of Puru.

अध्याय ३५४

श्लोक 7

रूपं वातादुलचि स्याद् वातुलश्चानपत्यके ।वाशिष्ठः कौरवो वासः पाञ्चालः सोस्य वासकः

rūpaṃ vātādulaci syād vātulaścānapatyake / vāśiṣṭhaḥ kauravo vāsaḥ pāñcālaḥ sosya vāsakaḥ

हिन्दी अर्थ

पति-यहाँ 'सत्' शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई। ऐसे ही “नृणां साक्षी, नृषु साक्षी -मनुष्योंका साक्षी -- यहाँ 'नृ' शब्दसे षष्ठी एवं सप्तमी विभक्तियाँ हुई । 'गोषु नाथो गवां पतिः-गौओंका स्वामी है,

English

Tamsurodha, Pratiratha and Purasta were the sons of Matinara. Kanva was (born) from Pratiratha. Medhatithi was from Kanva.

अध्याय ३५४

श्लोक 8

तत्र वासो माथुरः स्याद्वेत्त्यधीते च चान्द्रकः ।व्युत्क्रमं वेत्ति क्रमकः नरश् चक्राम कौशकः

tatra vāso māthuraḥ syādvettyadhīte ca cāndrakaḥ / vyutkramaṃ vetti kramakaḥ naraś cakrāma kauśakaḥ

हिन्दी अर्थ

यहाँ “नाथ' और “पति' शब्दोंके योगमें 'गो' शब्दसे षष्ठी और सप्तमी विभक्तियाँ हुई। “गोषु सूतो गवां सूतः-गौओंमें उत्पन्न है'-यहाँ 'सूत' शब्दके योगमें 'गो' शब्दसे षष्ठी एवं सप्तमी विभक्ति हुई। “इह राज्ञां दायादकोऽस्तु।'— यहाँ राजाओंका दायाद हो। यहाँ 'दायाद' शब्दके योगमें 'राजन्' शब्दमें षष्ठी विभक्ति हुई है। हेतुवाचकसे ' हेतु' शब्दके प्रयोग होनेपर

English

Hemaratha (was born) from Ketuman. He was well- known as Divodasa. Pratardana (was) from Divodasa. Bharga and Vatsa (were born) from Pratardana.

अध्याय ३५४

श्लोक 9

प्रियङ्गूनां भवं क्षेत्रं प्रैयङ्गवीनकं खञि ।मौद्गीनं कौद्रवीणञ्च वैदेहश्चानपत्यके

priyaṅgūnāṃ bhavaṃ kṣetraṃ praiyaṅgavīnakaṃ khañi / maudgīnaṃ kaudravīṇañca vaidehaścānapatyake

हिन्दी अर्थ

षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे ' अन्नस्य हेतोर्वसति अन्नके कारण वास करता है।-यहाँ “वास'में

English

Bfhat (was) the son of Suhotra. AJamIdha, Dvimidha and the brave Purumidha were the three sons of Brhat.

अध्याय ३५४

श्लोक 10

इञि दाक्षिर्दाशरथिः कचि नारायणादिकं ।आश्वायनः स्याच्च फञि यचि गार्ग्यश् च वात्सकः

iñi dākṣirdāśarathiḥ kaci nārāyaṇādikaṃ / āśvāyanaḥ syācca phañi yaci gārgyaś ca vātsakaḥ

हिन्दी अर्थ

अन्न 'हेतु' है, तद्वाचक 'हेतु' शब्दका भी प्रयोग हुआ है, अत: ' अन्न' शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई। स्मरणार्थक धातुके प्रयोगमें उसके कर्ममें षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे-'मातुः स्मरति।-- माताको स्मरण करता है।' यहाँ 'स्मरति'के योगमें 'मातृ' शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई । कृत्प्रत्ययके योगमें कर्ता एवं कर्ममें षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे--'अपां भेत्ता--जलको भेदन करनेवाला।'

English

In "ini" Daksha (Dakshi), Dasharathi; "Narayana" and the like in "chha"; "Ashvayana" in "phan"; "Gargya" and "Vatsaka" in "yan";

अध्याय ३५४

श्लोक 11

ढ्हकि स्याद्वैनतेयादिश्चाटकेरस्तथैरकि(?) ।ढ्रकि गौधेरको रूपं गौधारश्चारकीरितं

ḍhhaki syādvainateyādiścāṭakerastathairaki(?) / ḍhraki gaudherako rūpaṃ gaudhāraścārakīritaṃ

हिन्दी अर्थ

यहाँ-' भेत्त' शब्द 'कृत्' प्रत्ययान्त’ है। उसके

English

in "dhak" Vainateya and the rest; "Chatakera"; in "drak" "Gaudheraka" — the form Gaudhara; (taddhita examples).

अध्याय ३५४

श्लोक 12

क्षत्रियो घे कुलीनः खे ण्ये कैरव्यादयः स्मृताः(?) ।यति मूर्धन्यमुख्यादिः सुगन्धिरिति रूपकं

kṣatriyo ghe kulīnaḥ khe ṇye kairavyādayaḥ smṛtāḥ(?) / yati mūrdhanyamukhyādiḥ sugandhiriti rūpakaṃ

हिन्दी अर्थ

योगमें-कर्मभूत 'अप्' शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई। इसी प्रकार “तव कृतिः--तुम्हारी कृति है'-यहाँ “कृति' शब्द ' कृत्प्रत्ययान्त' है। उसके योगमें कर्तृभूत “युष्मद्' शब्दसे षष्ठी विभक्ति हुई ( युष्मद्-डस्=तव )--निष्ठा आदि अर्थात्

English

"Kshatriya" in "gha"; "kulina" in "kha"; "Kairavya" and the like in "nya" are remembered; "murdhanya-mukhya" in "yat"; "sugandhi" is a form.

अध्याय ३५४

श्लोक 13

तारकादिभ्य इतचि नभस्तारकितादयः ।अनङि स्याच्च कुण्डोध्नी पुष्पधन्वसुधन्वनी

tārakādibhya itaci nabhastārakitādayaḥ / anaṅi syācca kuṇḍodhnī puṣpadhanvasudhanvanī

हिन्दी अर्थ

खलर्थक, तृन्, शानच्, चानश् आदिके योगमें

English

From tarakadi, "itach": "nabhastarakita" and the rest; with "anang" "kundodhni"; "pushpadhanva", "sudhanvan".

अध्याय ३५४

श्लोक 14

चञ्चुपि वित्तवञ्चुः स्याद्वित्तमस्य च शब्दके ।चणपि स्यात् केशचणः रूपे स्यात् पटरूपकम्

cañcupi vittavañcuḥ syādvittamasya ca śabdake / caṇapi syāt keśacaṇaḥ rūpe syāt paṭarūpakam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणे 'कारक-निरूपण' नामक तीन सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ भगवान् कार्त्तिकेय कहते हैं-- कात्यायन! मैं छ: प्रकारके ' समास ' बताऊँगा। फिर अवान्तर- भेदोंसे 'समास'के अट्ठाईस भेद हो जाते हैं। समास नित्य' और अनित्य' के भेदसे दो प्रकारका

English

In "chanchup": "vittavanchu" — he has wealth; in "chan": "keshachana", "patarupaka" in "rupa" (taddhita suffixes).

अध्याय ३५४

श्लोक 15

ईयसौ च पटीयान् स्यात् तरप्यक्षतरादिकम् ।पचतितराञ्च तरपि तमप्यटतितमामपि

īyasau ca paṭīyān syāt tarapyakṣatarādikam / pacatitarāñca tarapi tamapyaṭatitamāmapi

हिन्दी अर्थ

है तथा 'लुकू' और ' अलुक्'के भेदसे भी उसके दो प्रकार और हो जाते हैं। कुम्भकार और हेमकार “नित्य समास' हैं। (क्योंकि विग्रह- वाक्यद्वारा ये शब्द जातिविशेषका बोध नहीं करा

English

"Iyasu": "patiyan"; in "tarap": "akshatara" and the like; "pachatitara", "atatitama";

अध्याय ३५४

श्लोक 16

मृद्वीतमा कल्पपि स्यादिन्द्रकल्पो ऽर्ककल्पकः ।राजदेशीयो देशीये देश्ये देश्यादिरूपकम्

mṛdvītamā kalpapi syādindrakalpo 'rkakalpakaḥ / rājadeśīyo deśīye deśye deśyādirūpakam

हिन्दी अर्थ

सकते ) ' राज्ञः+पुमान्= राजपुमान्'- यह षष्टी- तत्पुरुष समास स्वपदविग्रह होनेके कारण ' अनित्य' है। कष्टश्रितः ( कष्ट॑श्रितः )- इसमें ' लुक् ' समास है; क्योंकि “कष्ट” पदके अन्तमें स्थित द्वितीया विभक्तिका 'लुक्' (लोप) हो जाता है। “कण्ठेकालः? आदि ' अलुक्? समास हैं; क्योंकि इसमें कण्ठशब्दोत्तरवर्तिनी सप्तमी विभक्तिका ' लुक्' नहीं होता। तत्पुरुष-समास आठ प्रकारका होता

English

"mridvitama"; in "kalpap": "indrakalpa", "arkakalpaka"; "rajadeshiya" in "deshiya", "deshya"; "deshyadirupaka".

अध्याय ३५४

श्लोक 17

पटुजातीयो जातीये जानुमात्रञ्च मात्रचि ।ऊरुद्वयसो द्वयसचि उरुदघ्नञ्च दघ्नचि

paṭujātīyo jātīye jānumātrañca mātraci / ūrudvayaso dvayasaci urudaghnañca daghnaci

हिन्दी अर्थ

जहाँ अनेक पदोंका परस्पर एकार्थीभावरूप सामर्थ्य लक्षित हो, उनमें 'समास' होता है। कृत्, तद्धित, समास, एकशेष तथा

English

"Patujatiya" in "jatiya"; "janumatra" in "matrach"; "urudvayasa" in "dvayasach"; "urudaghna" in "daghna".

अध्याय ३५४

श्लोक 18

तयटि स्यात् पञ्चतयः दौवारिकष्ठकीरितं ।सामान्यवृत्तिरुक्ताथ अव्ययाख्यश् च तद्धितः

tayaṭi syāt pañcatayaḥ dauvārikaṣṭhakīritaṃ / sāmānyavṛttiruktātha avyayākhyaś ca taddhitaḥ

हिन्दी अर्थ

सनाद्यन्त धातु--यै पाँच वृत्तियाँ मानी गयी हैं। परार्थका अभिधान (कथन) 'वृत्ति' है। वृत्त्यर्थे अवबोधक वाक्यको ' विग्रह' कहते हैं। 'विग्रह' दो प्रकारका होता है-'लौकिक' और ' अलौकिक '। परिनिष्ठित (प्रयोगार्ह) होनेके कारण जो साधुवाक्य है, वह 'लौकिक विग्रह' कहलाता है। जो प्रयोगयोग्य न होनेसे असाधु है, वह 'अलौकिक विग्रह' है। 'राज्ञ: पुरुष: '--यह ' लौकिक विग्रह' है 'राजन्+ङस्, पुरुष+सु' यह अलौकिक विग्रह है। समास “नित्य” और 'अनित्य'के भेदसे दो प्रकारका है। जो अविग्रह (लौकिक विग्रहसे रहित) या अस्वपद-विग्रह (समस्यमान “यावत्' पदसे अघटित) हो, वह 'नित्य-समास' है; इसके विपरीत ' अनित्य-समास' है। प्राचीन विद्वानोंने समासके छः प्रकार बताये हैं। यथा --

English

"Panchatayah" in "tayat"; "dauvarika" in "thak" is declared. The general function is told; and the indeclinable-named taddhita:

अध्याय ३५४

श्लोक 19

यस्माद्यततसिलि च यत्र तत्र त्रलीरितं ।अस्मिन् काले ह्य् अधुनास्यादिदानीञ्चैव दान्यपि

yasmādyatatasili ca yatra tatra tralīritaṃ / asmin kāle hy adhunāsyādidānīñcaiva dānyapi

हिन्दी अर्थ

(१) उदाहरणके लिये सुबन्तका सुबन्तके साथ समास-राजपुरुषः। यहाँ ('राज्ञः पुरुषः' इस विग्रहके अनुसार) पूर्व और उत्तर दोनों पद 'सुबन्त' हैं। (२) सुबन्तका तिङ्के साथ समास -यथा--'पर्यभूषत्'। (३) 'सुबन्त'को नामके साथ कुम्भकारः । हेमकारः इत्यादि। (४) 'सुबन्त, का धातुके साथ समास। यथा--' कटप्रूः, अजस्रम् इत्यादि। (५) तिङन्तका तिडन्तके साथ समास, यथा-पिबतखादता। खादतमोदता इत्यादि। (६) तिङन्तका सुबन्तके साथ समास, यथा-कृन्तविचक्षणा। इसका

English

from "yasmat," "yatah," "tasil"; "yatra, tatra" in "tral"; "asmin kale: adhuna, idanim, danim";

अध्याय ३५४

श्लोक 20

सर्वस्मिन् सर्वदा दास्यात्तस्मिन्काले र्हिलीरितं ।तर्हि हो ऽमिन् काल इह कर्हि कस्मिंश् च कालके

sarvasmin sarvadā dāsyāttasminkāle rhilīritaṃ / tarhi ho 'min kāla iha karhi kasmiṃś ca kālake

हिन्दी अर्थ

मयूरव्यंसकादिगणमें पाठ है।' है। प्रथमान्त आदि शब्द सुबन्तके साथ समस्त होते हैं। 'पूर्वकायः' इस तत्पुरुषसमासमें जब “पूर्व कायस्य'-- ऐसा विग्रह किया जाता है, तब यह '“प्रथमा-तत्पुरुष' समास कहा जाता है। इसी

English

"sarvasmin: sarvada, tasmin kale"; "tarhi, harhi" in "rhil"; "tarhi, kasmin cha kalake"; "iha, karhi" (adverbial suffixes).

अध्याय ३५४

श्लोक 21

यथा थालि थमि कथं पूर्वस्यान्दिशि सञ्चयेत् ।अस्ताति चैव पूर्वस्याः पूर्वादिग्रामणीयकाः

yathā thāli thami kathaṃ pūrvasyāndiśi sañcayet / astāti caiva pūrvasyāḥ pūrvādigrāmaṇīyakāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकार 'अपरकायः'कायस्य अपरम्, इस विग्रहमें, ' अधरकायः '--कायस्य अधरम् इस विग्रहमें और ' उत्तरकायः '--कायस्योत्तरम्-- इस विग्रहमें भी प्रथमा-तत्पुरुष समास कहा

English

"Yatha, katham" in "thal, thamu"; "in the east direction": "purvasyam disi sanchayet" and "astati"; "purvasyah purvadi, gramaniyaka";

अध्याय ३५४

श्लोक 22

पुरस्तात् सञ्चरेद् गच्छेत् सद्यस्तुल्ये ऽहनीरितं ।उति पूर्वाब्दे च परुत् पूर्वतरे परार्यपि

purastāt sañcared gacchet sadyastulye 'hanīritaṃ / uti pūrvābde ca parut pūrvatare parāryapi

हिन्दी अर्थ

जाता है। ऐसे ही 'अरद्धकणा' इसमें अर्द्धम् कणायाः-एऐसा विग्रह होनेसे प्रथमा-तत्पुरुष समास होता है एवं 'भिक्षातुर्यम्'-इसमें तुर्य भिक्षायाः एसा विग्रह होनेसे तुर्यभिक्षा और पक्षान्तरमें ' भिक्षातुर्यम्'—ऐसा षष्ठी-तत्पुरुष होता है। ऐसे ही ' आपन्नजीविकः ' यह द्वितीया-तत्पुरुष समास है। इसका विग्रह इस प्रकार होता है-- 'आपन्नो जीविकाम्।' पक्षान्तरमें “जीविकापन्नः '

English

"purastat sancharet gachchhet; sadyah, tulye ahani" is said; in "uti": "parut"; in "purvabde"; "purvatara, parary" (time adverbs).

अध्याय ३५४

श्लोक 23

ऐषमो ऽस्मिन् संबत्सरे रूपं समसि चेरितं ।एद्यवौ परेद्यवि स्यात् परस्मिन्नहनीरितं

aiṣamo 'smin saṃbatsare rūpaṃ samasi ceritaṃ / edyavau paredyavi syāt parasminnahanīritaṃ

हिन्दी अर्थ

ऐसा रूप होता है। इसी प्रकार 'माधवाश्रितः '-- यह द्वितीया-समास है; इसका विग्रह 'माधवम् आश्रितः'-इस प्रकार है। 'वर्षभोग्यः '- यह द्वितीया-तत्पुरुष समास है-इसका विग्रह है ' वर्ष

English

"Aishamas in this year" — the form; "samsi" is told; "edyavi, paredyavi" — on the other day is said;

अध्याय ३५४

श्लोक 24

अद्यास्मिन्नहनि द्ये स्यात् पूर्वेद्युश् च तथैद्युसि ।दक्षिणस्यान्दिशि वसेत् दक्षिणाद्दक्षिणाद्युभौ

adyāsminnahani dye syāt pūrvedyuś ca tathaidyusi / dakṣiṇasyāndiśi vaset dakṣiṇāddakṣiṇādyubhau

हिन्दी अर्थ

भोग्यः ।' ' धान्यार्थः ' यह तृतीया-समास है। इसका विग्रह ' धान्येन अर्थः ' इस प्रकार है। 'विष्णुबलिः ' यहाँ “विष्णवे बलिः'--इस विग्रहमें चतुर्थी- तत्पुरुष समास होता है। वृकभीतिः ' यह पञ्चमौ- तत्पुरुष है। इसका विग्रह “वृकाद् भीतिः इस प्रकार है। 'राजपुमान्'-यहाँ 'राज्ञः पुमान्’ इस विग्रहमें षष्ठी-तत्पुरुष समास होता है। इसी प्रकार ' वृक्षस्य फलम--वृक्षफलम् '--यहाँ षष्ठी -

English

"adya — on this day"; in "dyu": "purvedyuh", "aidyusi"; "dakshinasyam disi vaset: dakshinat, dakshinadyubhau";

अध्याय ३५४

श्लोक 25

उत्तरस्यान्दिशि वसेदुत्तरादुत्तराद्युभौ ।उपरि वसेदुपरिष्टाद् भवेद्रिष्टाति ऊर्ध्वकात्

uttarasyāndiśi vaseduttarāduttarādyubhau / upari vasedupariṣṭād bhavedriṣṭāti ūrdhvakāt

हिन्दी अर्थ

तत्पुरुष समास है। ' अक्षशौण्डः' (द्यूतक्री डामें निपुण) इसमें सप्तमी-तत्पुरुष समास है। अहितः जो हितकारी न हो, वह-इसमें 'नजूसमास'

English

"uttarasyam disi vaset, uttarat, uttaradyubhau"; "uparivaset": "uparishtat" from "urdhva"; (directional adverbs).

अध्याय ३५४

श्लोक 26

उत्तरेण् च पित्रोक्तं आचि च स्याच्च दक्षिणा ।आहौ दक्षिणाहि वसेद्द्विप्रकारं द्विधा च धा

uttareṇ ca pitroktaṃ āci ca syācca dakṣiṇā / āhau dakṣiṇāhi vaseddviprakāraṃ dvidhā ca dhā

हिन्दी अर्थ

“नीलोत्पल? आदि जिसके उदाहरण हैं, वह 'कर्मधारय' समास सात प्रकारका होता है १-विशेषणपूर्वपद (जिसमें विशेषण पूर्वपद हो और विशेष्य उत्तरपद अथवा) । इसका उदाहरण है—' नीलोत्पल' (नीला कमल) । २-विशेष्योत्तर- विशेषणपद-इसका उदाहरण है--'बैया-

English

"Uttarena" told by the father; and "dakshina" in "achi"; "aho": "dakshinahi vaset"; "dvaidha, dvidha" in two kinds and "dha".

अध्याय ३५४

श्लोक 27

ध्यमुञि चैकध्यं कुरु त्वं द्वैधन्धमुञि चेदृशं ।द्वौ प्रकारौ द्विधा धाचि(१) आसुसुरतरं यथा(२)*

dhyamuñi caikadhyaṃ kuru tvaṃ dvaidhandhamuñi cedṛśaṃ / dvau prakārau dvidhā dhāci(1) āsusurataraṃ yathā(2)*

हिन्दी अर्थ

करणखसूचिः' (कुछ पूछनेपर आकाशको ओर देखनेवाला वैयाकरण)। ३-विशेषणोभयपद (अथवा विशेषणद्विपद) जिसमें दोनों पद विशेषणरूप ही हों। जैसे-शीतोष्ण (ठंडा-

English

"Dhyamun": "ekadhyam kuru tvam"; "dvaidham" in "an"; two kinds in "dha" and "achi"; "asusuratara" (adverbial suffix examples).

अध्याय ३५४

श्लोक 28

निपातास्तद्धिताः प्रोक्ताः तद्धितो भाववाचकः ।पटोर्भावः पटुत्वन्त्वे पदुता तलिचेरितं

nipātāstaddhitāḥ proktāḥ taddhito bhāvavācakaḥ / paṭorbhāvaḥ paṭutvantve padutā taliceritaṃ

हिन्दी अर्थ

गरम) । ४-उपमानपूर्वपद। इसका उदाहरण है-शङ्खपाण्डुरः (शङ्खके समान सफेद)। ५-उपमानोत्तरपद- इसका उदाहरण है-'पुरुष- पूर्वपद- (जिसमें पूर्वपद सम्भावनात्मक हो)

English

Particles are said to be taddhita; the taddhita expresses state: "patoh bhavah: patutva, patuta" in "tal" (abstract nouns).

अध्याय ३५४

श्लोक 29

प्रथिमा चेमनि पृथोः सौख्यं सुखात् ष्यञीरितम् ।स्तेयं याति च स्तेनस्य ये सख्युः सख्यमीरितं

prathimā cemani pṛthoḥ saukhyaṃ sukhāt ṣyañīritam / steyaṃ yāti ca stenasya ye sakhyuḥ sakhyamīritaṃ

हिन्दी अर्थ

अर्थात् “गुण' शब्द बोलनेसे वृद्धिको सम्भावना होती है) । तात्पर्य यह है कि “वृद्धि हो'-यह कहनेकी आवश्यकता हो तो 'गुण' शब्दका ही उच्चारण करना चाहिए। ७-अवधारणपूर्वपद-

English

"Prithima" in "iman" of "prithu"; "saukhya" from "sukha" in "shyan"; "steya" of "stena"; "sakhya" from "sakhi" is said.

अध्याय ३५४

श्लोक 30

कपेर्भावश् च कापेयं सैन्यं पथ्यं यकीरितं ।आश्वं कौमारकं चाणि रूपं चाणि च यौवनम् ।आचार्यकं कणि प्रोक्तमेवमन्येपि तद्धिताः

kaperbhāvaś ca kāpeyaṃ sainyaṃ pathyaṃ yakīritaṃ / āśvaṃ kaumārakaṃ cāṇi rūpaṃ cāṇi ca yauvanam / ācāryakaṃ kaṇi proktamevamanyepi taddhitāḥ

हिन्दी अर्थ

जहाँ पूर्वपदमें 'अवधारण' (निश्चय) सूचक शब्दका प्रयोग हो, वह। जैसे - सुहृदेव सुबन्धुकः' (सुहृद् ही सुबन्धु है) । बहुत्रीहिसमास भी सात प्रकारका ही होता है॥ ८--११॥ तथा ७- दिग्लक्षणार्थ। द्विपद बहुव्रीहि ' में दो ही पदोंका समास होता है। यथा-आरूढभवनो नरः'। ( आरूढं भवनं येन सः- इस विग्रहके

English

"Kapeh bhavah: kapeya"; "sainya"; "pathya" in "yak"; "ashva", "kaumarka" in "an"; "yauvana"; "acharyaka" in "kan" — thus other taddhitas too.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 354
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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