अध्याय १८
श्लोक 1.1
पितृमेधः।१-६१ अथर्वा।यमः।, मन्त्रोक्ताः, ४० रुद्रः, ४१-४३ सरस्वती, ४४-४६, ५१-५२ पितरः।त्रिष्टुप्, ८, १५ आर्षी पङ्क्तिः, १४, ४९-५० भुरिक्, १८-२०, २१-२३ जगती, ३७-३८ परोष्णिक्, ५६-५७, ६१ अनुष्टुप्, ५९ पुरोबृहती।ओ चि॒त् सखा॑यं स॒ख्या व॑वृत्यां ति॒रः पु॒रु चि॑दर्ण॒वं ज॑ग॒न्वान्।पि॒तुर्नपा॑त॒मा द॑धीत वे॒धा अधि॒ क्षमि॑ प्रत॒रं दीध्या॑नः
pitṛmedhaḥ| 1-61 atharvā| yamaḥ|, mantroktāḥ, 40 rudraḥ, 41-43 sarasvatī, 44-46, 51-52 pitaraḥ| triṣṭup, 8, 15 ārṣī paṅktiḥ, 14, 49-50 bhurik, 18-20, 21-23 jagatī, 37-38 paroṣṇik, 56-57, 61 anuṣṭup, 59 purobṛhatī| o cit sakhāyaṃ sakhyā vavṛtyāṃ tiraḥ puru cidarṇavaṃ jaganvān| piturnapātamā dadhīta vedhā adhi kṣami prataraṃ dīdhyānaḥ
हिन्दी अर्थ
करा पालन कर स्नातक बन कर भ्राया है। इसलिये वहं विवाह भ्रादि के विधि- विधानं को जानता है 1 यमी है युवति, परन्तु विधाहं के विधिविघानों से अनभि है! बहु यमके साथ विवाह चाहती है 1 इसलिये यम के प्रति विवाह का प्रस्ताव रख रही है । विवाह की सप्तपदी की विधि म “सखे यमी कहती है यमसे कि सिमाव की त्रिधिते ए भ्रपना विवाहित जसे कि उपन्यासो, कथा-कहानिर्यो, भौर नाटकं मँ पात्रं कल्पित कर लिये जति है । वेदो मे एसे संवाद प्ररोचनाथं यत्र-तत्र मिलते है, यथा-उरवंशी गौर पुरवा का संवाद ( ऋऽ.१०।९१५ ) ;: विद्वामित्र भौर नदियों का संवाद (ऋ० ३।३8); सरमा भ्रौर पणियों का संवाद ऋ १०।१०८)। एसे संवादो को निरक्तकार ने “भाख्यान" तथा “्राल्यायिकाए “ कहा.है । भं है- तंर कर, सफलतापूवंक ब्रह्मचर्याधम समाप्त करं “"ैःसंतरंणे" ।
English
An accompaniment to funeral ceremonies and sacrificial offerings to ancestral spirits Fain would I win my friend to kindly friendship. So may the