अध्याय १२
श्लोक 1
॥ षष्ठं ब्राह्मणम् मन्त्र १ [II.vi.1] अथ वँशः पौतिमाष्यो गौपवनाद् गौपवनः पौतिमाष्यात् पौतिमाष्यो गौपवनाद् गौपवनः कौशिकात् कौशिकः कौण्डिन्यात् कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच् छाण्डिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च गौतमः
|| ShaShThaM brAhmaNam mantra 1 ##[II.vi.1]## atha va{\m+}shaH pautimAShyo gaupavanAd gaupavanaH pautimAShyAt pautimAShyo gaupavanAd gaupavanaH kaushikAt kaushikaH kauNDinyAt kauNDinyaH shANDilyAch ChANDilyaH kaushikAchcha gautamAchcha gautamaH
हिन्दी अर्थ
५५२ बृहदारण्यकोपनिषद् अध्याय २ प्रात्मा सबसे श्रसिन्त है, इसका प्रतिपादन नलु कथमन्पसिपन्विदितेऽन्य- शङ्का-क्रितु अन्यका ज्ञान होने जानता हे। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है जो क्षत्रियजातिको आत्सासे भिन्च देखता है । लोक उसे परास्त कर देते है जो लोकोंको आमास भिन्न देखता है । देवगण उसे परास्त कर देते है जो देवताओंको आत्मासे धिन्न ब्रह्म बाह्मणजातिस्तं पुरूपं ब्रह्म-त्ाह्मणजाति उ पुरपको कम् १ यो उन्यत्रारमन च्रारमस्व- 8. है; क्सि ¦ र पः तिरेक --आतमैबन भव छोर अथात् यह ब्रह्णनाति
English
Now follows the stem :