अध्याय १३
श्लोक 1
॥ अथ तृतीयोध्यायः ॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ।मन्त्र १ [III.i.1] ॐ जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे ।तत्र ह कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता बभूवुस् तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कः स्विदेषां ब्राह्मणानामनूचानतम इति ।स ह गवाँ सहस्रमवरुरोध दशदश पादा एकैकस्याः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः
|| atha tR^itIyodhyAyaH .. prathamaM brAhmaNam . mantra 1 ##[III.i.1]## OM janako ha vaideho bahudakShiNena yaj~neneje | tatra ha kurupa~nchAlAnAM brAhmaNA abhisametA babhUvus tasya ha janakasya vaidehasya vijij~nAsA babhUva kaH svideShAM brAhmaNAnAmanUchAnatama iti | sa ha gavA{\m+} sahasramavarurodha dashadasha pAdA ekaikasyAH shR^i~NgayorAbaddhA babhUvuH
हिन्दी अर्थ
वह तीसरा दृष्टान्त एसा है-जेसे कोई बजायी जाती हुई वीणा- के बाह्य शब्दोको ग्रहण करने समथं नहीं होता; कितु वीणा या वीगाके स्वरका ग्रहण होनेपर उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है स्र्यापनाथम्--अनेके हि विल: इसी प्रकार वीणाये वाद्यमानाये' अर्थात् बजायी जाती हुई वीणाका वह् चौथा द्टान्त-- जिस प्रकार जिसका ईधन गीला हे, एेसे आधान किये हए अग्निसे पृथक् श्रुजं निकलता हे, है मेत्रेयि ! इसी प्रकार पुराण, विद्या, उपनिषद्, शलोक, सूत्र, मन््रविवरण ओर अथंवाद है, वे इस
English
Adoration to the Highest Self (Paramâtman)!