Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
102
अध्याय 102 / 154

Adhyāya 102

4 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय १०२

श्लोक 6.5.1

॥ अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्माँसं योऽणिष्ठस्तन्मनः

|| annamashitaM tredhA vidhIyate tasya yaH sthaviShTho dhAtustatpurIShaM bhavati yo madhyamastanmA{\m+}saM yo.aNiShThastanmanaH

हिन्दी अर्थ

ल्निषदेकंका भवति तदुक्तं युरस्तादेव भवतरस्य सोभ्य हे सोम्य उस ८ जलके परिणामभूत शरीर ) का जल्के पिवा ओर कहां मूल हो सकता है ? है पिवदर्शन ¡ नकल भङ्कके दर तृ तेजोरूप मूलक सोन कर ओर है सोम्य तेनोरूप णङ्कके द्वारा सामथ्यात्तिजसोऽप्येतदेव श- । त्िृतकरणके सामर््यसे यह त होताहै कि तेजका भी यही शरीर रास्थं सङ्गम्‌ । अतोऽपश्गन संज्ञक शृङ्ग (कार्य) हेः 0

English

'The earth (food) when eaten becomes threefold; its grossest portion becomes feces, its middle portion flesh, its subtilest portion mind.

अध्याय १०२

श्लोक 6.5.2

आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः

ApaH pItAstredhA vidhIyante tAsAM yaH sthaviShTho dhAtustanmUtraM bhavati yo madhyamastallohitaM yo.aNiShThaH sa prANaH

हिन्दी अर्थ

आहमा तत्वमसि उवेतकेतो इति भूय एव मा भगवा- वह जो यह भणिमा है एतद्रप ही य घब है । वह सत्य है, बह जाला है जोर दे दरवेतकेतो वही तू है मारुणिके इस प्रकार कहने पर इवेतकेतु वोका-- “भगवन्‌ सुञ्ञे फिर समज्ञाद्ये तब

English

'Water when drunk becomes threefold; its grossest portion becomes water, its middle portion blood, its subtilest portion breath.

अध्याय १०२

श्लोक 6.5.3

तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक्

tejo.ashitaM tredhA vidhIyate tasya yaH sthaviShTho dhAtustadasthi bhavati yo madhyamaH sa majjA yo.aNiShThaH sA vAk

हिन्दी अर्थ

नात्मनात्मवस्सवेमिदं जगत्‌ । जगत्तदेव सदाख्यं ऋरणं यह जो सत्संज्ञक भणिमा-- दुषृतिमे 'सत्की प्रापिका ज्ञान न होनेमे मधुमग्खियोका दष्टान्त यत्पृच्छस्यहन्यहनि सस्सम्पद्य तू जो पूछता किभ्रजाजो प्रतिदिन सत्को प्राप्त होकर भी हे सोम्य ! जिस प्रकार धमकियां मधु निष्पन्न (तैयार) करती है तो नाना दिशा धरक्षोका रस कर एकताको प्रात करा देती है

English

'Fire (i. e. in oil, butter, &c.) when eaten becomes threefold; its grossest portion becomes bone, its middle portion marrow, its subtilest portion speech .

अध्याय १०२

श्लोक 6.5.4

अन्नमयँहि सोम्य मनः आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच

annamaya{\m+}hi somya manaH ApomayaH prANastejomayI vAgiti bhUya eva mA bhagavAnvij~nApayatviti tathA somyeti hovAcha

हिन्दी अर्थ

यथा लोके है सोभ्य मधुकृतो दे सोम्य । निस प्रकार ोकमं नि जो मधुकृत कही जाती है । वे मधु- मक्षिका मधु निस्तिष्ठन्ति मधु मदलमौ तर होकर मध तैयार वे रघ जिस प्रफार उस मधम दस प्रकारका विवेक प्राप्त नही क सकते कि भव इतस वृक्षका रस ह गौर भे इस वृका रस है है सोभ्य ठीक इसी प्रकार यह सम्पूणं प्रना सतो प्रात ह्ोकर्‌ यह्‌ नहीं जानतो

English

'For truly, my child, mind comes of earth, breath of water, speech of fire.' 'Please, Sir, inform me still more,' said the son. Be it so, my child,' the father replied.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 102
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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