अध्याय १३८
श्लोक 7.25.1
॥ स एवाधस्तात्स उपरिष्टात्स पश्चात्स पुरस्तात्स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदँ सर्वमित्यथातोऽहंकारादेश एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेदँ सर्वमिति
|| sa evAdhastAtsa upariShTAtsa pashchAtsa purastAtsa dakShiNataH sa uttarataH sa eveda{\m+} sarvamityathAto.ahaMkArAdesha evAhamevAdhastAdahamupariShTAdahaM pashchAdahaM purastAdahaM dakShiNato.ahamuttarato.ahameveda{\m+} sarvamiti
हिन्दी अर्थ
नितना यह भौतिक आक्षा है उतना दी हदयान्तगंत आकाश है । यलोक ओर प्रथिवी- ये दोनों रोक सम्यक् प्र्ारसे इषके भीतर ही स्थित है । इष प्रकार अग्नि ओर वायु-ये दोना, सूय जीर ऽयमाफाश्नो भोतिकस्तावानेषो- भाकाश्च प्रसिद्ध है उतना ही ऽन्तहंदय आकाशो यरिमिन्न्बष्टव्यं यह॒ हृदयान्तगत आक्षा विजिज्ञासितव्यं चावोचाम । निके विषयमे किं हमने अन्ेषण तं चेदृनरूयुरस्मिशदिदं ब्रह्मपुरे सवश्समाहित सर्वाणि च भूतानि स्वे च कामा यदेतज्नरा वामरोति
English
'The Infinite indeed is below, above, behind, before, right and left--it is indeed all this. 'Now follows the explanation of the Infinite as the I: I am below, I am above, I am behind, before, right and left--I am all this.