Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
37
अध्याय 37 / 154

Adhyāya 37

16 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ16 श्लोक

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अध्याय ३७

श्लोक 2.24.1

॥ ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां प्रातः सवनँ रुद्राणां माध्यंदिनँ सवनमादित्यानां च विश्वेषां च देवानां तृतीयसवनम्

|| brahmavAdino vadanti yadvasUnAM prAtaH savana{\m+} rudrANAM mAdhyaMdina{\m+} savanamAdityAnAM cha vishveShAM cha devAnAM tR^itIyasavanam

हिन्दी अर्थ

ोकका द्वार सोर दो, निससे हम स्वाराग्यप्राप्तिके स्यि तुम्हारा दोन कर से । यह आदि्यसम्बन्धी साम है; अव विवेदेवसम्बन्पौ साम कहते ह --रोकका द्वार सोर दो, निससे हम साप्राज्यप्रापतिके ततपशवात्‌ यजमान इस मन्बदवारा हवन करता है स्वर्गमे रहनेवले दुरोकनिवासी आदि्यको ओर ॒विदवेदवोको नमस्कार हे। सुक्ल यजमानकेो तुम पुण्यरोककी प्रा कराओ यह्‌ निश्चय ही यजमानका रोक ण्ड २७ 1 शाङ्करभाष्याथं २४१ अर्थं पहठेके ही समान है । “विन्दत,

English

The teachers of Brahman (Veda) declare, as the Prâtah-savana (morning-oblation) belongs to the Vasus, the Mâdhyandina-savana (noon-libation) to the Rudras, the third Savana (evening-libation) to the Âdityas and the Visve Devas,

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.2

क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात्कथं कुर्यादथ विद्वान्कुर्यात्

kva tarhi yajamAnasya loka iti sa yastaM na vidyAtkathaM kuryAdatha vidvAnkuryAt

हिन्दी अर्थ

उस ८ यनमान ) को आदित्य ओर विभ्वेदेव तृतीय सवन भदान कुरते है । जो इस प्रकार जानता है, नो इस प्रकार जानता ह वह निश्चय ही यज्ञकी मात्रा ८ यज्के यथाथ स्वरूप ) को जानता हे एष ह वै यजमान एवंविद्‌ एवंवित्‌--इस म्नार पूर्वक यथोक्तस्य सामादेर्विद्रान्यक्तस्य सामादिको नाननेवाङा यह यजमान निर्चय दही यज्ञकी मात्रा-यज्ञके श्रीमच्छंकरभगवतः कृतो ान्दोग्यविवरणे

English

Where then is the world of the sacrificer? He who does not know this, how can he perform the sacrifice? He only who knows, should perform it .

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.3

पुरा प्रातरनुवाकस्योपाकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदाङ्मुख उपविश्य स वासवँ सामाभिगायति

purA prAtaranuvAkasyopAkaraNAjjaghanena gArhapatyasyodA~Nmukha upavishya sa vAsava{\m+} sAmAbhigAyati

हिन्दी अर्थ

सर्वयज्ञानां च कार्यनिर्यु्िरूपः स॒ एष सवभराणकर्मफरभूत रुभतः ्रतयक्षं सवेरुपजीव्यते । अतो ॐ यह आदित्य निर्चय ही देवतार्का मधु है । दुरोक ही उकषका तिरा बक है निखपर छि वह र्का हुमा है, अन्तरिक्ष छता है ओर किरणं उसमे रहनेवाठे मव्खयोके वच्चे द इत्यादि । देवताओंको प्रसन्न करने- वाला होनेसे वह॒ आदिय मघुके समान भानो मधु है । वघु जदिको

English

Before the beginning of the Prâtaranuvâka, (matin-chant), the sacrificer, sitting down behind the household altar (gârhapatya), and looking towards the north, sings the Sâman, addressed to the Vasus:

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.4

लो३कद्वारमपावा३र्णू ३३ पश्येम त्वा वयँ रा ३३३३३ हु ३ म् आ ३३ ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति

lo3kadvAramapAvA3rNU 33 pashyema tvA vaya{\m+} rA 33333 hu 3 m A 33 jyA 3 yo 3 A 32111 iti

हिन्दी अर्थ

समान होनेके कारण तथा मधुप सुर्यका आश्रय होनेसे भी अन्तरिक्ष रोक दी मधुका छत्ता है । आदित्यकी पूवदिकसम्बन्धिनी किरणोमे मघुनाड्यादि-दशि उस आदियकी नो पूर्वदिशाकी किरणे है, वे ही इस ( अन्तरिक्ष हप छते ) के पूर्दिशावतीं छिद्र है । ऋक् दी मधुकर है, चछग्ेद दी पुष्प है, वे सोम आदि अशत दौ जर हं । उन इन ऋक् रूप मघु-

English

'Open the door of the world (the earth), let us see thee, that we may rule (on earth).'

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.5

अथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एतास्मि

atha juhoti namo.agnaye pR^ithivIkShite lokakShite lokaM me yajamAnAya vindaiSha vai yajamAnasya loka etAsmi

हिन्दी अर्थ

वह ( यश्च आदि रस ) विरेषूपसे गया । उसने जाकर । आदित्यके पूवं भागम आश्रय लिया । ब नो आदियका रोदित यश बायपयन्तं तद्वथ- यशसे चक अन्नायपरयन्त वह रदविशेषेणाक्षरदगमत्‌ । गत्वा रस व्यक्त विरषरूपसे गया । ल ५ ५ उसने जाकर सुर्यको पार्तः सूरयंके जादित्यकरी दक्षिणदिक्सस्बन्धिनी (करणोमे मधुनाञ्यादि-दष्ट

English

Then he sacrifices, saying: 'Adoration to Agni, who dwells on the earth, who dwells in the world! Obtain that world for me, the sacrificer! That is the world for the sacrificer!'

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.6

अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः प्रातःसवनँ सम्प्रयच्छन्ति

atra yajamAnaH parastAdAyuShaH svAhApajahi parighamityuktvottiShThati tasmai vasavaH prAtaHsavana{\m+} samprayachChanti

हिन्दी अर्थ

तथा इसकी जो दक्षिण दिशाकी किरणं है वे दी इक दक्षिण- दिजचावर्तिनीं मधुनाडयो है, यजुःश्ुतिर्यो द मधुकर है, यजुवद द पुष्प है तथा वह सोमादिरूप अग्रत ही अप्‌ हे इत्यादि समानम्‌ । य्येव यादि शति अथ पूववत्‌ है । मधुकृतो यजुदविदिते कर्मणि बजुश्तयो ही मुक है अर्थात्‌ दविदित ९ मन्त ही पूर्ववत्‌ मधुकरोके समान उन हन यनुःरुतिरयोनि इस यजुर्वेदका अभिताप किया । उस अमि. तप यनुर्वदसे यश, तेज, इन्दिय, वीयं ओर अत्नायूप रस उर हुआ । उस रसने विशेषषूपसे गमन किया ओर आदिक निक

English

'I (the sacrificer) shall go thither, when this life is over. Take this! (he says, in offering the libation.) Cast back the bolt!' Having said this, he rises. For him the Vasus fulfil the morning-oblation.

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.7

पुरा माध्यंदिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योदङ्मुख उपविश्य स रौद्रँसामाभिगायति

purA mAdhyaMdinasya savanasyopAkaraNAjjaghanenAgnIdhrIyasyoda~Nmukha upavishya sa raudra{\m+}sAmAbhigAyati

हिन्दी अर्थ

आदित्यकी पचिमदिवि्तस्वन्धिनी किरणों मधुनाञ्यादिदष्टि तथाये जो इसकी पर्चिम ओरकी रमय दँ वे दी इसको परिच- मीय मूनाथ है । सामश्तिय दौ मधुकर है, सामवेदविहित कमम ही पुष्य है तथा वह सोमादिषप अगत ही आप्‌.हे उन क्न सामशरुतयोनि ही इस सामवेदविहित कमेका अभिताप करिगा । उस अभित सामवेदे ही यश, तेन, इन्दि, वीर्यं ओर

English

Before the beginning of the Mâdhyandina-savana, the noon-oblation, the sacrificer, sitting down behind the Âgnidhrîya altar, and looking towards the north, sings the Sâman, addressed to the Rudras:

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.8

लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं वैरा३३३३३ हु३म् आ३३ज्या ३यो३आ३२१११इति

lo3kadvAramapAvA3rNU33 pashyema tvA vayaM vairA33333 hu3m A33jyA 3yo3A32111iti

हिन्दी अर्थ

उस रखने विशेषरूपसे गमन किया जर आदित्यके समीप पश्चिम भागते जाश्रय ल्वा । यह जो जादि ष्ण तेन है यह वही द इत्यादि समानम्‌। तथा साम्नां श्रति्योका अर्थं पूर्ववत्‌ है । तथा मधु तदादित्यस्य कृष्णं सामशरुिर्योका जो मधु है वही यह रूपम्‌ ॥ १-३ ॥ आदित्यका ङृष्ण तेज है ॥१-३॥ आदित्यकी उत्तरदिक्सम्बन्धिनी किरणे मधुनाञ्यादि-दि

English

'Open the door of the world (the sky), let us see thee, that we may rule wide (in the sky).'

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.9

अथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एतास्मि

atha juhoti namo vAyave.antarikShakShite lokakShite lokaM me yajamAnAya vindaiSha vai yajamAnasya loka etAsmi

हिन्दी अर्थ

तथा इसको जो उत्तर दिशाकी किरणं है वे ही इसकी उत्रदिश- कौ मधुनाडियं है । अथर्वाङ्गिरस श्रुति ही मधुकर रै, इतिद्ास-परण ही पुष्प ह तथा वह सोमादिहूप अमृत ही जप है उन इन अथव्गिरस शरुतियोने ही इस इतिहास-पुराणको अमित किया । उस जमितप्त हए इतिहास-पुराणरूप पुष्प से दी यद, तेन। इन्द्रिय, वीयं ओर अन्नायरप रसकी उत्पत्ति हुई 1 २ ॥ गमन करिया ओर आदित्यके निकट उक्त भागम आश्रय ख्या । यह्‌ जो. ष्णः £ 1 आदित्यका अव्यन्त कष्ण. ख्य है थ

English

Then he sacrifices, saying: 'Adoration to Vâyu (air), who dwells in the sky, who dwells in the world. Obtain that world for me, the sacrificer! That is the world for the sacrificer!'

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.10

अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यंदिनँसवनँसम्प्रयच्छन्ति

atra yajamAnaH parastAdAyuShaH svAhApajahi parighamityuktvottiShThati tasmai rudrA mAdhyaMdina{\m+}savana{\m+}samprayachChanti

हिन्दी अर्थ

® अश्चमेघयज्ञ बहुत दिनों समास होता है । उसके अनुष्ठानमें चुपचाप वे-्रठे यज्ञकर्तार्ओंको आकत्य आने कगता है । उसकी निडप्िकै चयि श्रतिने रात्रिक समय इतिहास-पुराणादिभवणका विधान क्रिया है । विविध उपाख्याना- तथा इसकी जो उ्वरदिमाँ है वे दही इसको उपरी मखी । मधुनादियां है । गुहय आदेश ही मधुकर है; प्रणवरूप रह दी धृष हे तथा वह सोमादिरूप अमृत ही आप है उन इन गुद्च आदेोने ही इस प्रणवसंज्ञक ब्रह्मो अमितप्‌ क्रिया । उस अभितप्त ग्रहमसे ही यश, तेज, इन्दिय, वीर्यं ओर त्र-

English

'I (the sacrificer) shall go thither, when this life is over. Take this! Cast back the bolt!' Having said this, he rises. For him the Rudras fulfil the noon-oblation.

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.11

पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यँस वैश्वदेवँ सामाभिगायति

purA tR^itIyasavanasyopAkaraNAjjaghanenAhavanIyasyoda~Nmukha upavishya sa Aditya{\m+}sa vaishvadeva{\m+} sAmAbhigAyati

हिन्दी अर्थ

उस रसने विरोषूपसे गमन किया ओर वह आदित्यके निकट उष्वं भागम आधित हआ । यह्‌ जो आदित्यके मध्यमे श्ुन्ध-सा दोता ह यदी वह (मषु) है ह मनत्रोका अथं पूर्व रं एवादेशा लोकद्वारीयादिविधय है यानी जो रोकदवारीयादि व यम्‌" ( काकका द्वार सोक दे; जिठसे वे ये पूर्वोक्त रोदहितादि रूप ही रसेकि रस वेद ही रस ह ओरये उनके भीर दहै । वेदीये मृतके अमृत है- वेद ही अमृत है ओर ये उनके भी भमृत है

English

Before the beginning of the third oblation, the sacrificer, sitting down behind the Âhavanîya altar, and looking towards the north, sings the Sâman, addressed to the Âdityas and Visve Devas:

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.12

लो३कद्वारमपावा३र्णू३३पश्येम त्वा वयँ स्वारा ३३३३३ हु३म् आ३३ ज्या३ यो३आ ३२१११ इति

lo3kadvAramapAvA3rNU33pashyema tvA vaya{\m+} svArA 33333 hu3m A33 jyA3 yo3A 32111 iti

हिन्दी अर्थ

केषां रसानाम्‌ १ इत्याह -वेदा हि रपोकि रत है १ एेसा परभ होनेपर - श्रुति कहती है क्योंकि रोकोकि सारभूत होनेके कारण वेद हौ सार तथा ये अमूोके भी असूत है, ष कि वेद ही निलय होनेके कारण प् है, उनके भी ये रोदितादि ह वसुओंके जीवनाश्रयमूत प्रथम अमृतकौ उपासना तवयस्पथममस्तं तद्वसव उपजीवन्त्यञ्चिना सुखेन न

English

'Open the door of the world (the heaven), let us see thee, that we may rule supreme (in heaven).' This is addressed to the Âdityas.

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.13

आदित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयँसाम्रा३३३३३ हु३म् आ३३ ज्या३यो३आ ३२१११ इति

Adityamatha vaishvadevaM lo3kadvAramapAvA3rNU33 pashyema tvA vaya{\m+}sAmrA33333 hu3m A33 jyA3yo3A 32111 iti

हिन्दी अर्थ

हनम जो पहला अभृत है, उससे वघुगण अग्निपरधान होकर जीवन धारण करते है । देवगण न तो लति है भौर न पीतेदी है, वेस. अमृतको देखकर दी तृप्त हो जाते है शाना उपजीवन्त्यभ्निना युखेना- सन्त उपजीवन्तीस्य्थः। अन्ना कथं तद्मुपजीवन्ति १ इत्युच्यते- होनेके अथ प्रयुक्त हनेवोस ह रितु यहो तो कदा गवा है। रोहितरूपको देलकर अर्ष

English

Next the Sâman addressed to the Visve Devas: 'Open the door of the world (heaven), let us see thee, that we may rule supreme (in heaven).'

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.14

अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दत

atha juhoti nama Adityebhyashcha vishvebhyashcha devebhyo divikShidbhyo lokakShidbhyo lokaM me yajamAnAya vindata

हिन्दी अर्थ

९. भ्योकि भाव्यसे यः बाद्का णेखा ही स्थ॑ कषा गया है । । किते निरू्यमा अमृतञ्चुप- तो क्या वे उचयमहीन रहकर ही इस अमृतके उपजीवी होते है ? वे देवगण इस रूपको रक्षित करके दी उदासीन हो जति है जर फिर्‌ इसीसे उत्साहित होते है एतदेव ॒रूपमभिरश्याधुना इस रूपो ही रक्षित कर अरथत्‌ मोगावसरो नास्माकमिति अभी हमारे भोगका अवसर नही (स है-एेसा जानकर वे उदासीन हो

English

Then he sacrifices, saying: 'Adoration to the Âdityas and to the Visve Devas, who dwell in heaven, who dwell in the world. Obtain that world for me, the sacrificer!'

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.15

एष वै यजमानस्य लोक एतास्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहापहत परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति

eSha vai yajamAnasya loka etAsmyatra yajamAnaH parastAdAyuShaH svAhApahata parighamityuktvottiShThati

हिन्दी अर्थ

स थ एतदेवमभरतं वेद वसूनामेवेको भूतवाभ्निनेव वह, नो इस पकार इष अ्रतको जानता है वह वघमोमेसे. ही को एक होकर अग्निकी ही भषानतासे इसे देखकर तृप हो जाता है । वह्‌ इस रूपको र्य करके ही उदासीन हेता है ओर इस खूपसे दी जो कोई पुरुष इस यथोक्त अमृतको इस प्रकार जानता है मृढ्‌ मधुकरतापरससंक्षरणमूृग्ेद- । अर्थात्‌ ऋग्बेदविदित कर्मरूप पुष.

English

'That is the world for the sacrificer! I (the sacrificer) shall go thither, when this life is over. Take this! Cast back the bolt!' Having said this, he rises.

अध्याय ३७

श्लोक 2.24.16

तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनँ सम्प्रयच्छन्त्येष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद

tasmA AdityAshcha vishve cha devAstR^itIyasavana{\m+} samprayachChantyeSha ha vai yaj~nasya mAtrAM veda ya evaM veda ya evaM veda

हिन्दी अर्थ

से छक्‌-श्रतिरूप मथुकरोकि अभि- तापद्वारा रसका संक्षरण होना, उसका आदिव्यके आश्रित होना, कियन्तं कालं विदांस्तदग्रत- मुपजीवति १ इत्युच्यते- अमृतके आश्रित होकर जीवन धारण उदित होता है ओर पश्चिम दिशे न्‌ वपुओंके आधिपत्य ओर भोगकाटस्तावन्तमेव कारं

English

For him the Âdityas and the Visve Devas fulfil the third oblation. He who knows this, knows the full measure of the sacrifice, yea, he knows it.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 37
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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