Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
38
अध्याय 38 / 154

Adhyāya 38

4 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय ३८

श्लोक 3.1.1

तृतीयोऽध्यायः ॥ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवँशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः

tR^itIyo.adhyAyaH || asau vA Adityo devamadhu tasya dyaureva tirashchInava{\m+}sho.antarikShamapUpo marIchayaH putrAH

हिन्दी अर्थ

जवतक आदित्य पूर्वकी ओर-- पूर्वदिज्ामे उदित होता अर पश्चिमकी ओर अस्त होल है तव- सद्रोके कीवनाश्रयभूत द्वितीय अमृतकरी उपासना अथ यदृहितीयमसतं तद्रुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण अ, जो दूसरा अमूत है, रुदरगण इनदरमधान होकर उसके आश्चित जीवन धारण करते है । देवगण न तो खाते है ओर न पीते है, वे इस अमूतको देखकर ही तृप्त हो जाते ह

English

The sun is indeed the honey of the Devas. The heaven is the cross-beam (from which) the sky (hangs as) a hive, and the bright vapours are the eggs of the bees .

अध्याय ३८

श्लोक 3.1.2

तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्यः ।ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः

tasya ye prA~ncho rashmayastA evAsya prAchyo madhunADyaH | R^icha eva madhukR^ita R^igveda eva puShpaM tA amR^itA ApastA vA etA R^ichaH

हिन्दी अर्थ

वे इ रूपो लक्षित करके ही उदासीन हो नाति है भोर स य एतदेवममृतं वेद्‌ रुद्राणामेवैको भूवेनद्रेणैव बह, नो इस प्रकार इस अमृतक्रो जानता हे, र्दोमिसे दही कोई एक होक इनदरकी ही भषानतासे इस अमृतको दी देखकर तृप हो जाता है । वह इस रूपसे ही उदासीन हो जाता है ओर इस रूपे

English

The eastern rays of the sun are the honey-cells in front. The Rik verses are the bees, the Rig-veda (sacrifice) is the flower, the water (of the sacrificial libations) is the nectar (of the flower).

अध्याय ३८

श्लोक 3.1.3

एतमृग्वेदमभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजायत

etamR^igvedamabhyatapa{\m+}stasyAbhitaptasya yashasteja indriyaM vIryamannAdya{\m+}raso.ajAyata

हिन्दी अर्थ

¢ जीवन्तिः इत्यादि श्ुति्ोकरा अर्थ उषजीवन्तीरे ।१-२॥ पूववत्‌ है ॥ १-२ ॥ खाण्ड ७ शाङ्करमाष्याथं २६३ जवतक आदित्य पूर्वसे उदित होता ओौर पश्चिमम अस्त होता है उससे दुगुने समयतक वह ॒दक्षिणसे उदित होता है ओर उत्तमे अस्त होता है । इतने समयपयंन्त वह रदरोके दी आधिपलय एवं स यावदादित्यः पुरस्तादु- वह आदित्य जबतक पवसे उदित देता पश्चादस्तमेता द्विस्ताव- होता ओर पश्चिमम अस्त होता है उससे दूने समयतक दक्षिणसे उदित

English

Those very Rik verses then (as bees) brooded over the Rig-veda sacrifice (the flower); and from it, thus brooded on, sprang as its (nectar) essence, fame, glory of countenance, vigour, strength, and health .

अध्याय ३८

श्लोक 3.1.4

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य रोहितँरूपम्

tadvyakSharattadAdityamabhito.ashrayattadvA etadyadetadAdityasya rohita{\m+}rUpam

हिन्दी अर्थ

आदित्यके जीवनाश्रयभूत तृतीय अमूतकौ उपा्तना अथ यत्ततीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन तदनन्तर जो तीसरा अमृत है, आदिगण वरणग्रधान होकर उसके आश्रित जीवन धारण करते है । देवगण न तो खते है ओर न पीते है; वे इस अमृतको देखकर ही तृप्त हो जाते है वे इस रूपको ही लक्षित करके उदासीन होते है जीर इसीसे

English

That (essence) flowed forth and went towards the sun . And that forms what we call the red (rohita) light of the rising sun.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 38
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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