अध्याय ३८
श्लोक 3.1.1
तृतीयोऽध्यायः ॥ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवँशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः
tR^itIyo.adhyAyaH || asau vA Adityo devamadhu tasya dyaureva tirashchInava{\m+}sho.antarikShamapUpo marIchayaH putrAH
हिन्दी अर्थ
जवतक आदित्य पूर्वकी ओर-- पूर्वदिज्ामे उदित होता अर पश्चिमकी ओर अस्त होल है तव- सद्रोके कीवनाश्रयभूत द्वितीय अमृतकरी उपासना अथ यदृहितीयमसतं तद्रुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण अ, जो दूसरा अमूत है, रुदरगण इनदरमधान होकर उसके आश्चित जीवन धारण करते है । देवगण न तो खाते है ओर न पीते है, वे इस अमूतको देखकर ही तृप्त हो जाते ह
English
The sun is indeed the honey of the Devas. The heaven is the cross-beam (from which) the sky (hangs as) a hive, and the bright vapours are the eggs of the bees .