Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
40
अध्याय 40 / 154

Adhyāya 40

3 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय ४०

श्लोक 3.3.1

॥ अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः

|| atha ye.asya pratya~ncho rashmayastA evAsya pratIchyo madhunADyaH sAmAnyeva madhukR^itaH sAmaveda eva puShpaM tA amR^itA ApaH

हिन्दी अर्थ

वह आदित्य जितने समयतक पश्चिमसे उदित होता ओर पूवम अप्त होता है. उससे दूने कार्तक उत्तरसे उदित होता ओर दक्षिणम अत्त होता रहता है । इतने कार्तक वह मरुदूगणके ही आधिपय ओर साध्योके जीवनाश्रयभुत पचम अम्रतकी उपासना अथ यत्प्चमममुतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्रह्मणा तथा जो पांचवा अमृत हे, साध्यगण ब्रह्मी प्रधानतासे उसके आश्रित जीवन धारण करते है । देवगण न तो सति है ओर न पीते है, वे इस अमृतको देखकर दी तृप्त दो जते है

English

The western rays of the sun are the honey-cells behind. The Sâman verses are the bees, the Sâma-veda sacrifice is the flower, the water is the nectar.

अध्याय ४०

श्लोक 3.3.2

तानि वा एतानि सामान्येतँ सामवेदमभ्यतपँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यँरसोऽजायत

tAni vA etAni sAmAnyeta{\m+} sAmavedamabhyatapa{\m+}stasyAbhitaptasya yashasteja indriyaM vIryamannAdya{\m+}raso.ajAyata

हिन्दी अर्थ

वे इस खूपको रक्षित करके ही उदासीन हेते ई जौर इसीसे उद्यमशीरु हो जाते है स य एतदेवममुतं वेद्‌ साध्यानामेवेको मूता वह, जो इस प्रकार इस अमृतको जानता है, साध्यगणममसे दी कोई एक होकर ब्रहमाकी ही प्रधानतासे इस अमृतको ही देखकर तृ हो जाता है । बह इस रूपको लक्ष्य करके ही उदासीन होता है ओर

English

Those very Sâman verses (as bees) brooded over the Sâma-veda sacrifice; and from it, thus brooded on, sprang as its (nectar) essence, fame, glory of countenance, vigour, strength, and health.

अध्याय ४०

श्लोक 3.3.3

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य कृष्णँरूपम्

tadvyakSharattadAdityamabhito.ashrayattadvA etadyadetadAdityasya kR^iShNa{\m+}rUpam

हिन्दी अर्थ

वह आदित्य जवतकं उत्तरसे उदित होता है ौर दक्षिणमे अस्त होता है उससे दूने समयतक उःपरकी ओर उदित होता है ओर नीचेकी जर अस्त होता है । इतने कारुतक वह सारध्याके दी आधिपत्य भोगक्षयके अनन्तर सवका उपसंहार ह्ये जानेषर जादित्यखूप कृत्वेवयुदयास्तमनेन प्राणिनां इस प्रकार उदय ओर अस्तक स्वकम॑फलमोगनिमित्तमनुग्रहं त-। दारा पराणियोंको अपने-अपने करम पि उस पश्चात्‌ वह ऊर््वगत होकर उदित होनेपर फिर भ ते उदित होगा ओर न अस्त ही होगा; बल्कि अकेखा ही मध्यमं स्थित रहेगा 1 उसके विषयमे यह इरोकं है

English

That flowed forth and went towards the sun. And that forms what we call the dark (krishna) light of the sun. Next: III, 4 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 40
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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