अध्याय ३९
श्लोक 3.2.1
॥ अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूँष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृत आपः
|| atha ye.asya dakShiNA rashmayastA evAsya dakShiNA madhunADyo yajU{\m+}Shyeva madhukR^ito yajurveda eva puShpaM tA amR^ita ApaH
हिन्दी अर्थ
स य तदेवममृतं वेदादित्यानामेवेको भूल वह, जो इस प्रकार इस ॒असेतको जानता है, आदि्योमिसे दी कोई एक होकर वरुणकी दी प्रषानतासे इस अमृतकरो देखकर तृत हो जाता है । बह इस रूपसे ही उदासीन होता है ओर इसीसे उद्योगी वह् आदित्य जितने समयतक ॒दक्षिणसे उदित होता ओर उत्तरं अस्त होता है उपसे दूने समयतक पशचिमसे उदित होता ओर पूर्वमे अस्त होता रहता है । इतने समयतक वह॒ आदिर्योक दी आधिपत्य
English
The southern rays of the sun are the honey-cells on the right. The Yagus verses are the bees, the Yagur-veda sacrifice is the flower, the water (of the sacrificial libations) is the nectar (of the flower).