Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
43
अध्याय 43 / 154

Adhyāya 43

4 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय ४३

श्लोक 3.6.1

॥ तद्यत्प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति

|| tadyatprathamamamR^itaM tadvasava upajIvantyagninA mukhena na vai devA ashnanti na pibantyetadevAmR^itaM dR^iShTvA tR^ipyanti

हिन्दी अर्थ

लो वह गायत्री है वह यही दहै, जो किं यह प्रथिवी है; क्योंकि इसीमें ये सव मूत स्थित है भर इसीका वे कभी अक्क्रिमण नहीं जो वह ेसे रक्षणोवाटी सव- भूतरूप गायत्री है वह यही है, जो कि यह पृथिवी हे। किंतु यह पृथिवी कारण प्रथिवी मूरतोसे सम्बद्ध हे

English

On the first of these nectars (the red light, which represents fame, glory of countenance, vigour, strength, health) the Vasus live, with Agni at their head. True, the Devas do not eat or drink, but they enjoy by seeing the nectar.

अध्याय ४३

श्लोक 3.6.2

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति

ta etadeva rUpamabhisaMvishantyetasmAdrUpAdudyanti

हिन्दी अर्थ

लो भी यह प्रथिवी है वह यदी दहैनोकि इस पूरुषम शरीर ह; वर्योकि इसीम ये प्राण स्थित. है ओर इसीको पे कभी नहीं यावे सां पृथिवी गायत्री; हयं नो भी वह्‌ प्रयिवीरूप गायत्र वाव सेदभेव;तत्किम्‌ १ यदिद्म- है वह यह निश्चय ही है; यही कौन ! स्मन्पुरुषे काय॑करणसंघाते जी- नो इस पृरू्भे-मूत जोर इन्दरोके जो भी इस पुरुषे शरीर है वह यदी हे, जो किं इस अन्तःपुर. मे हृदय हे; क्योंकि इसीमे ये प्राण प्रतिष्ठित है ओर इसीका अतिक्रमण

English

They enter into that (red) colour, and they rise from that colour .

अध्याय ४३

श्लोक 3.6.3

स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति

sa ya etadevamamR^itaM veda vasUnAmevaiko bhUtvAgninaiva mukhenaitadevAmR^itaM dR^iShTvA tR^ipyati sa ya etadeva rUpamabhisaMvishatyetasmAdrUpAdudeti

हिन्दी अर्थ

यदव सुरूपे शरीरं गायत्रीदं । जो भौ इस ॒पुरुषमेः शरीररूप क गायत्री है वह यही है, जो कि हस परुषे हृदयं पण्डरीकार्यभेतद्रा- एण्डरीकसंुक हृद्य है वह गायत्र सेवा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदचाभ्य- वह यह गायत्री चार चरणोवारी ओर छः प्रकारकी है । वह यद गायच्थाख्य ब्रश मन्त्रो द्ारा प्रकालित किया गया है

English

He who thus knows this nectar, becomes one of the Vasus, with Agni at their head, he sees the nectar and rejoices. And he, too, having entered that colour, rises again from that colour.

अध्याय ४३

श्लोक 3.6.4

स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता वसूनामेव तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता

sa yAvadAdityaH purastAdudetA pashchAdastametA vasUnAmeva tAvadAdhipatya{\m+}svArAjyaM paryetA

हिन्दी अर्थ

सेषाः चतुष्पदा षडक्षरपदा वह यह चार पदोवाडी ओर छन्दोरूपा सती भवति गायत्री 9-ढः भक्षरोके पदोवारी है ता ॐ भ ओर प्राणरूपा होनेसे वष्ट षदविषा- पादित है, ऋचा यानी मन्ते भ प्रकारित किया गया है है उतनी ही इस ( गयन्या्य ब्रह्म ) की महिमा हे; तथा निविकार पुरुष इससे भी उक्ष है । सम्पूणं भूत इसका एक पाद है जर

English

So long as the sun rises in the east and sets in the west , so long does he follow the sovereign supremacy of the Vasus.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 43
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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