Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
45
अध्याय 45 / 154

Adhyāya 45

4 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय ४५

श्लोक 3.8.1

॥ अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति

|| atha yattR^itIyamamR^itaM tadAdityA upajIvanti varuNena mukhena na vai devA ashnanti na pibantyetadevAmR^itaM dR^iShTvA tR^ipyanti

हिन्दी अर्थ

तथा इसका नो दक्षिण छिद्र है वह व्यान हे, वह श्रोत्र है, वह चन्द्रमा है ओर वही यद श्री एवं यश है - इस प्रकार उती उपासना तस्थो वायुविशेषः स वीर्यवत्कर्म

English

On the third of these nectars the Âdityas live, with Varuna at their head. True, the Devas do not eat or drink, but they enjoy by seeing the nectar.

अध्याय ४५

श्लोक 3.8.2

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति

ta etadeva rUpamabhisaMvishantyetasmAdrUpAdudyanti

हिन्दी अर्थ

तथा इसका जो दक्षिण छिद्र है उसे स्थित जो वायुविरोष है दह वीयंवान्‌ कर्म करता हुभा गमन हृदयान्तगेत पश्चिमदुषिभ्‌त अपानकी उपासना ऽभ्निस्तदेतदृब्रह्मवचंसमन्ना्यमिल्यु पासीत बह्मवच॑स्य तथा इसका जो परिचम छिद्र है वह अपान है, वह वाक्‌ है, वृह अग्नि है ओर वदी वह बरहतेज एवं अन्नाय है- ईस प्रकार उसकी उपाद्ना करे । जो पूसा जानता है वह ब्रहमतेजस्वी ओर अन्नका

English

They enter into that (dark) colour, and they rise from that colour.

अध्याय ४५

श्लोक 3.8.3

स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति

sa ya etadevamamR^itaM vedAdityAnAmevaiko bhUtvA varuNenaiva mukhenaitadevAmR^itaM dR^iShTvA tR^ipyati sa etadeva rUpamabhisaMvishatyetasmAdrUpAdudeti

हिन्दी अर्थ

अथ योऽस्य प्रत्यङ्‌ सुषिः तथा इसका जो भरयङ्‌ एुषि-- पश्विमस्तत्स्थो वायुविशेषः स नो वाुविरेष है वह॒ मल मूत्रादिको दूर्‌ करता हुआ नीचेकी हृदयान्तगत उत्तर षिभूत समानकी उपासना पजन्यस्तदेतत्कीतिश व्युष्टिश्चेव्युपासीत कीरतिमान्धयु-

English

He who thus knows this nectar, becomes one of the Âdityas, with Varuna at their head, he sees the nectar and rejoices. And he, having entered that colour, rises again from that colour.

अध्याय ४५

श्लोक 3.8.4

स यावदादित्यो दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत्पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेतादित्यानामेव तावदाधिपत्यँस्वाराज्यं पर्येता

sa yAvadAdityo dakShiNata udetottarato.astametA dvistAvatpashchAdudetA purastAdastametAdityAnAmeva tAvadAdhipatya{\m+}svArAjyaM paryetA

हिन्दी अर्थ

तथा इसका जो उत्तरीय छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह मष है ओर वदी यह कीतिं जीर व्युष्टि ( देहका खवण्य ) है- इष भकार उसकी उपाघना करे । जो इष प्रकार जानता है वह कीर्तिमान्‌ करणं स॒पजैन्यो ब्ृष्टयात्मको तदेतत्कीतिथ, मनसो ज्ञानस्य कीतिहततवाद्‌; आत्मपरोकषं विभु हृदयान्तगंत ऊप्मुिभूत उदानकी उपासना स॒ आकाशस्तदेतदोजश्च महश्वेयु पलीतोजस्वी

English

So long as the sun rises in the south and sets in the north, twice as long does it rise in the west and set in the east; and so long does he follow the sovereign supremacy of the Âdityas. Next: III, 9 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 45
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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