Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
46
अध्याय 46 / 154

Adhyāya 46

4 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय ४६

श्लोक 3.9.1

॥ अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति

|| atha yachchaturthamamR^itaM tanmaruta upajIvanti somena mukhena na vai devA ashnanti na pibantyetadevAmR^itaM dR^iShTvA tR^ipyanti

हिन्दी अर्थ

तथा इसका जो उर्व छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, वह भाकाश है ओर वही यद ओन ओर महः है--इस प्रकार उसकी उपासना करे । जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी ८ बल्वान्‌ ) अथ योऽ्स्योध्वैः सुषिःस त्था इसका जो उध्वषद्ि है ९ वह उदान दहै । पेरके तएसे उदान आ पादतलादारभ्योष्व- छक ऊपरक्ो ओर उक्तमण करनेके

English

On the fourth of these nectars the Maruts live, with Soma at their head. True, the Devas do not eat or drink, but they enjoy by seeing the nectar.

अध्याय ४६

श्लोक 3.9.2

त एतदेव रूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्रूपादुद्यन्ति

ta etadeva rUpamabhisaMvishantyetasmAdrUpAdudyanti

हिन्दी अर्थ

उपयुक्त प्राणादि द्वारपालोकी उपास्नाक्ता एल ते वा एते पञ्च ब्रह्मपुरुषाः स्वगस्य रोकस्य दरार. वे ये पंच ब्रह्मपुरुष स्वगंरोकके द्वारपारु है । वह जो कोद भी स्वगरोकके द्वारपारु इन पच त्रह्मपुरर्षोफो जानता है उसके कुरे वीर उत्पन्न होता है । जो इस प्रकार स्व्गरोकके द्वारपारं इन पाँच पुर््षको ह्येतदलितकरणतया बाद्यविषया- सङ्खाचृतप्ररुूटसवान्‌ हाद ब्रह्मणि वे ही ये, जैसे कि ऊपर बतलये

English

They enter in that (very dark) colour, and they rise from that colour.

अध्याय ४६

श्लोक 3.9.3

स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति

sa ya etadevamamR^itaM veda marutAmevaiko bhUtvA somenaiva mukhenaitadevAmR^itaM dR^iShTvA tR^ipyati sa etadeva rUpamabhisaMvishatyetasmAdrUpAdudeti

हिन्दी अर्थ

अतएव जो कोई इन उपर्युक्त गुणविरिष्ट स्वगकोकके द्रारपारको इस प्रकार जानता है--उपासना तथा वह विद्वान्‌ वीर पुरुषका सेवन करनेसे निस स्वगेरोकको बीरपुरुषसेवनासपतिपदयते,यचचोक्त भा होता है ओर निस स्वगंका

English

He who thus knows this nectar, becomes one of the Maruts, with Soma at their head, he sees the nectar and rejoices. And he, having entered that colour, rises again from that colour.

अध्याय ४६

श्लोक 3.9.4

स यावदादित्यः पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधिपत्य्ँस्वाराज्यं पर्येता

sa yAvadAdityaH pashchAdudetA purastAdastametA dvistAvaduttarata udetA dakShiNato.astametA marutAmeva tAvadAdhipaty{\m+}svArAjyaM paryetA

हिन्दी अर्थ

तथा इस दुरोकसे परे जो परम ज्योति विश्वके पृष्ठपर यानी सवके ऊपर, जिनसे उत्तम कोई दुसरा रोक नहीं है एेसे उत्तम ोकोमिं भकाशित हो रदी है बह निश्चय यदी है जो कि इस पुर्षे भीतर ज्योति यदतोऽरप्मादिबो श्लोकात्‌, इस दिव अर्थात्‌ दलोते परे- यहां परः इस पिङ्ग पदको नध सकरि्गमे बदलकर “परम्‌ समञ्चन शाङ्काको निवृत्त करनेके लिय “उत्तमेषु ोकेपु' एेसा कहा है । सत्यरोकादिमे हिरण्यगर्मादि काहू ब्रह्म समीप

English

So long as the sun rises in the west and sets in the east, twice as long does it rise in the north and set in the south; and so long does he follow the sovereign supremacy of the Maruts. Next: III, 10 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 46
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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