Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
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अध्याय 48 / 154

Adhyāya 48

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अध्याय ४८

श्लोक 3.11.1

॥ अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः

|| atha tata Urdhva udetya naivodetA nAstametaikala eva madhye sthAtA tadeSha shlokaH

हिन्दी अर्थ

यहो जो वाक्का प्रतिषेध कियाग््‌ ण्ड ९७ शाङ्करमाष्या्थं ६११ रह्म छोटेसे छटा ओर वड़ेते बड़ा है हदयकमलके भीतर यह मेरा आत्मा धानसे, यवसे, सरससि, इ्यामाकसे अथवा उयामाकतण्डुलसे भी सूक्ष्म है तथा हृदयकमरके भीतर यह मेरा आला थिवी, न्तर, धोक अथवा इन सन सोक

English

When from thence he has risen upwards, he neither rises nor sets. He is alone, standing in the centre. And on this there is this verse:

अध्याय ४८

श्लोक 3.11.2

न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन ।देवास्तेनाहँसत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति

na vai tatra na nimlocha nodiyAya kadAchana | devAstenAha{\m+}satyena mA virAdhiShi brahmaNeti

हिन्दी अर्थ

नाथम्‌ । र्यामाकाद्मा श्यामा- आत्मा अन्तहदय--हृदयकमरूके अन्तः- भीतर व्रीहि ८ धान ) से, सवकमा सवकामः सगन्धः सवैरसः सर्वमिद्‌. मभ्यात्तोऽवाक्यनादर एब म आत्मान्तहदथ एतद्ब्रह्म. जो सकर्मा, सर्वकाम, सर्वगन्ध, सर्वरस, इस सको सब गोपत व्याप्त कटनेवार, वाहित ओर॒सम्भरमरन्य है वह भेरा भास , हृदयकमरूके मध्यमे स्थित है । यही ब्रह्म है, इख शरीरे मरक

English

'Yonder he neither rises nor sets at any time. If this is not true, ye gods, may I lose Brahman.'

अध्याय ४८

श्लोक 3.11.3

न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद

na ha vA asmA udeti na nimlochati sakR^iddivA haivAsmai bhavati ya etAmevaM brahmopaniShadaM veda

हिन्दी अर्थ

यथोक्तगुणलक्षण ईश्वरो पूर्वोक्त गुणोसे रक्षि श ईवरका ही ध्यान करना च) खगुणबरहवाभि-बिशिष्ट एव । यथा 'राजपुर्षको अथवा चित्रको ल अस्य इर वीरो जायते" “इसके कुलम वीर पतर शेत इरयुक्तम्‌ । न ॒वीरजन्ममात्रं कहा गया है । रतु वीर्‌ पुता जन्ममात्र ही पिताकी रक्षाका 1

English

And indeed to him who thus knows this Brahma-upanishad (the secret doctrine: of the Veda) the sun does not rise and does not set. For him there is day, once and for all .

अध्याय ४८

श्लोक 3.11.4

तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायारुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच

taddhaitadbrahmA prajApataya uvAcha prajApatirmanave manuH prajAbhyastaddhaitaduddAlakAyAruNaye jyeShThAya putrAya pitA brahma provAcha

हिन्दी अर्थ

अन्तरिक्ष जिसका उदर है वह को पथिवीरूप मूखवाला है । वह नीणं नहीं होता । दिशा इसके कोण रै, आकाश उपरका छिद्र है वह यह कोश वघुधान है । उसीमें यह सारा विश्च स्थित हे अन्तरिक्षुद्रमन्तः सुषिरं य- अन्तरिक्ष है उद्र--अन्तः्र स्य सोऽयमन्तरिशनोदरः, कोशः जिसका वहं यहं अन्तरि्दर कोश कोश इवानेकधर्मसादृश्यात्कोरः जो अनेक धर्मम सादृश्य रसनेके उस कोकी पूवं दिशा नुह नामबारी है, दक्षिण दिश (सहमाना' नामको है, पश्चिम दिशा “राज्ञी, नामवाटी है तथा उक्त दि भूताः नामकी है । उन दिशार्थोका वायु वत्स है । दह, नो

English

This doctrine (beginning with III, 1, 1) Brahman (m. Hiranyagarbha) told to Pragâpati (Virâg), Pragâpati to Manu, Manu to his offspring (Ikshvâku, &c.) And the father told that (doctrine of) Brahman (n.) to Uddâlaka Âruni.

अध्याय ४८

श्लोक 3.11.5

इदं वाव तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात्प्रणाय्याय वान्तेवासिने

idaM vAva tajjyeShThAya putrAya pitA brahma prabrUyAtpraNAyyAya vAntevAsine

हिन्दी अर्थ

तस्यास्य प्राची दिक्प्राग्गतो उस इस कोटाकी भावी दिश-- पूर्वैकी ओरका माग, "जुह्‌' ष" । मागो जहूर्नाम जुहस्यस्यां वाखा है । कर्मठ रोग इ तार्जोसे अधिष्ठित होनेके कारण उत्तर दिशा मृताः नामवाली है । उन दिशार्ओका वायु वत्स है

English

A father may therefore tell that doctrine of Brahman to his eldest son , or to a worthy pupil. But no one should tell it to anybody else, even if he gave him the whole sea-girt earth, full of treasure, for this doctrine is worth more than that, yea, it is worth more.

अध्याय ४८

श्लोक 3.11.6

नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति

nAnyasmai kasmaichana yadyapyasmA imAmadbhiH parigR^ihItAM dhanasya pUrNAM dadyAdetadeva tato bhUya ityetadeva tato bhUya iti

हिन्दी अर्थ

अरिष्टं कोशं भप्येऽसुनामुनासुना पाणं प म अमुक अमुक अमुकके सहित अविनाशी करोकी शर ह अमुक मुक भमुक्के सहित प्राणी शरण ह; अमुक ममुक अमुके सदित भूकौ शरण ह; अमुक-अभुकं अमुरके सहित भुवःकी शरण पि अरिष्टमविनािनं कोशं य- पुत्रक दी्घायुके ष्थि परवत धोक प्रपये प्रपन्नोऽस्मि पुजा- अरिष्ट-- अविनाशी कोशकी श युषे । अगनारनानेति त्रिरनाम यह्‌ तास है कि तीन-तीन क

English

One should not teach this to anyone else, even if one would give him this earth surrounded by water, full of wealth; for greater than that is this, yea, greater than that is this.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 48
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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