अध्याय ६१
श्लोक 4.5.1
॥ अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रँ स्मः प्रापय न आचार्यकुलम्
|| atha hainamR^iShabho.abhyuvAda satyakAma3 iti bhagava iti ha pratishushrAva prAptAH somya sahasra{\m+} smaH prApaya na AchAryakulam
हिन्दी अर्थ
१, दं-पूण॑मास यमे अन्वाहायपचन अथि हविष्य पकाया जाता है; तथा चन्द्रमाके विषयमे “चन्द्रमाको प्रास्त होकर अनन हो जाता है" एेसा श्रुति वाक्य है । इस्यि इन दोनोंका अन्नसे सम्बन्ध है । तदनन्तर उसे आहवनीयाम्निने उपदेश किया--श्राण, भाकारा, यूरोक ओर विदत् ये भेरे चार शरीर है । यह जो विधुतं प दिखायो देता है वह मँ ह वहीभ ह"
English
The bull of the herd (meant for Vâyu) said to him: 'Satyakâma!' He replied: 'Sir!' The bull said: 'We have become a thousand, lead us to the house of the teacher;