अध्याय ७९
श्लोक 5.6.1
॥ पृथिवी वाव गौतमाग्निस्तस्याः संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः
|| pR^ithivI vAva gautamAgnistasyAH saMvatsara eva samidAkAsho dhUmo rAtrirarchirdisho.a~NgArA avAntaradisho visphuli~NgAH
हिन्दी अर्थ
भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं करे य एतमेवमात्मानं वेदवानर- मुपास्ते मूर्धा सेष आत्मन इति होवाच मूधा ते (तुम अन्न भक्षण करते हो जौर मियका दर्थ॑न करते हो । नो इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है बह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दशन करता है गौर उसके कुमे ब्र्मतेन होता है । यह
English
'The altar is the earth, O Gautama; its fuel is the year itself, the smoke the ether, the light the night, the coals the quarters, the sparks the intermediate quarters.