Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
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अध्याय 8 / 154

Adhyāya 8

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अध्याय ८

श्लोक 1.8.1

॥ त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालावत्यश्चैकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैवलिरिति ते होचुरुद्गीथे वै कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति

|| trayo hodgIthe kushalA babhUvuH shilakaH shAlAvatyashchaikitAyano dAlbhyaH pravAhaNo jaivaliriti te hochurudgIthe vai kushalAH smo hantodgIthe kathAM vadAma iti

हिन्दी अर्थ

लोकास्तांश्वामरोति आदित्या- न्तगेतदेवो भूतेत्य्थो देवका- हस उपर्युक्त देवको बो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष सामगान करता है बह चा्चुष ओर भादि अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाओ्चो खोकास्तासश्वाप्नोति मलुष्यकामाश्च तस्मादु हेवंविदुद्वाता नुयात्‌

English

There were once three men, well-versed in udgîtha , Silaka Sâlâvatya, Kaikitâyana, Dâlbhya, and Pravâhana Gaivali. They said: 'We are well-versed in udgîtha. Let us have a discussion on udgîtha.'

अध्याय ८

श्लोक 1.8.2

तथेति ह समुपविविशुः स ह प्रावहणो जैवलिरुवाच भगवन्तावग्रे वदतां ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचँ श्रोष्यामीति

tatheti ha samupavivishuH sa ha prAvahaNo jaivaliruvAcha bhagavantAvagre vadatAM brAhmaNayorvadatorvAcha{\m+} shroShyAmIti

हिन्दी अर्थ

रसे नीचेके रोक है उन्द ओर भनुष्य- 0 कामनाओंको माप्त करता है । अतः इस भकार जाननेवाला- उदगाता यजमानसे इस प्रकार क्योंकि यह उद्गाता कामनाजोके आगानमें र जाननेवाखा होकर सामगान करता चैतस्मादर्वाश्चो रोकास्तां धा- उद्गीथोपास्ननाक्नी उक्कष्टता प्रदर्शित करनेके ल्यि शिलक, दात्भ्य ओर प्रवाहणका संवाद अनेकेधोपास्यत्वादक्षरस्य प्र- उद्गीथं ्ञक अक्षर (ओंकार) के

English

They all agreed and sat down. Then Pravâhana Gaivali said: 'Sirs, do you both speak first, for I wish to hear what two Brâhmanas have to say.

अध्याय ८

श्लोक 1.8.3

स ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति पृच्छेति होवाच

sa ha shilakaH shAlAvatyashchaikitAyanaM dAlbhyamuvAcha hanta tvA pR^ichChAnIti pR^ichCheti hovAcha

हिन्दी अर्थ

कते है, शाखवानका एन शिरुक, चिकितायनका पुत्र दारभ्य ओर जीवला पत भरवाहण-ये तीनों उदूगीयविधामे कुश ये। उन्होने स्प कदा -- 'इमोग उद्गीयवियामे निपुण हे, अतः यदि आपरोगोंकी त्यचजिसंरूपाकाः; ह इत्यै- त्रयः- तन सल ८५६ तिद्या्थः, उद्वीथ उद्रीथज्ञानं निपात इतिहासको सूचित करनेके करिमधिदेशे काठे च निमित्ते त वे "बहुत अच्छाः पेसा कहकर बैठ गये । फिर जीवे पुत्र भ्वाहणने कहा--“पहले आप दोनों पूज्यवर प्रतिपादन करं । मँ आप „ ब्राहमणो कहौ हदे वाणीको श्रवण करगाः

English

Then Silaka Sâlâvatya said to Kaikitâyana Dâlbhya: 'Let me ask you.' 'Ask,' he replied.

अध्याय ८

श्लोक 1.8.4

का साम्नो गतिरिति स्वर इति होवाच स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच प्राणस्य का गतिरित्यन्नमिति होवाचान्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच

kA sAmno gatiriti svara iti hovAcha svarasya kA gatiriti prANa iti hovAcha prANasya kA gatirityannamiti hovAchAnnasya kA gatirityApa iti hovAcha

हिन्दी अर्थ

-कर बैठ गये । उनम ब्रा्मणोके प्रथम बोलनेसे राजा (क्षत्रिय , . प्रागल्भ्योपपत्तः की प्रगरमता ( धृष्टता ) सिदध होती तव॒ उस्र शाकावानके पुत्र शिल्कने निकितायनकमार दाटभ्यसे कादि वुण्डारी अनुमति हो तो मै तुमसे पृष ® उसने कहा-- उक्तयोः स ह शिलकः शा- उपर्युक्त दोनमिंसे शालवानके पुत्र लावत्यश्रैकितायनं दाल्भ्ययु- शिले चैकितायन दार्भ्यसे कडा- बाच - दन्त यद्यनुमंस्यसे त्वा यदि तुम अनुमति दो तो मेँ तुमसे

English

'What is the origin of the Sâman?' 'Tone (svara),' he replied. 'What is the origin of tone?' 'Breath,' he replied. 'What is the origin of breath?' 'Food,' he replied. 'What is the origin of food?' 'Water,' he replied.

अध्याय ८

श्लोक 1.8.5

अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं लोकमिति नयेदिति होवाच स्वर्गं वयं लोकँ सामाभिसंस्थापयामः स्वर्गसँस्तावँहि सामेति

apAM kA gatirityasau loka iti hovAchAmuShya lokasya kA gatiriti na svargaM lokamiti nayediti hovAcha svargaM vayaM loka{\m+} sAmAbhisaMsthApayAmaH svargasa{\m+}stAva{\m+}hi sAmeti

हिन्दी अर्थ

लन्धानुमतिराद- उसकी अनुमति पाकर शिरक्- का साम्नो गतिरिति स्वर इति हौवाच 1 स्वरस्य का गतिरिति प्राण इति होवाच । प्राणस्य का गतिरित्य- का साम्नः बप्रकृतत्वादुद्री- स्व्रस्य का गतिरिति प्राण गतिः । प्राणस्य का गतिरित्य. अपां का गतिरित्यसौ रोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं खोकमतिनयेदिति

English

'What is the origin of water?' 'That world (heaven),' he replied. 'And what is the origin of that world?'-- He replied: 'Let no man carry the Sâman beyond the world of svarga (heaven). We place (recognise) the Sâman in the world of svarga, for the Sâman is extolled as svarga (heaven).'

अध्याय ८

श्लोक 1.8.6

तँ ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति

ta{\m+} ha shilakaH shAlAvatyashchaikitAyanaM dAlbhyamuvAchApratiShThitaM vai kila te dAlbhya sAma yastvetarhi brUyAnmUrdhA te vipatiShyatIti mUrdhA te vipatediti

हिन्दी अर्थ

(जककी गति क्या है ? रसा प्रशन होनेपर उसने वह लोक! फसा . कहा । “उस रोककी गति क्या है ® इसपर दारभ्यने का कि स्वगं - लोकका अतिक्रमण करके सामको कोर किसी दंसरे आश्रयमे नहीं ले जा अपां का गतिरित्यसौ लोक का गतिः १ इति पृष्टो दान्भ्य 'जर्छोकी गति क्या है इसपर जघ चिकितानपत् दारभ्यसे शाख्वानक पुत्र शिल्कने कदा--ह दारभ्य † तेरा साम निश्चय ही अमतिषठित षै । जो इस मय कोद सामवे्त यह कह दे ढि "तेरा मस्तक एथिवीपर गिर जाय तो निश्चय

English

Then said Silaka Sâlâvatya to Kaikitâyana Dâlbhya: 'O Dâlbhya, thy Sâman is not firmly established. And if any one were to say, Your head shall fall off (if you be wrong), surely your head would now fall.'

अध्याय ८

श्लोक 1.8.7

हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरित्ययं लोक इति होवाचास्य लोकस्य का गतिरिति न प्रतिष्ठां लोकमिति नयेदिति होवाच प्रतिष्ठां वयं लोकँ सामाभिसँस्थापयामः प्रतिष्ठासँस्तावँ हि सामेति

hantAhametadbhagavato vedAnIti viddhIti hovAchAmuShya lokasya kA gatirityayaM loka iti hovAchAsya lokasya kA gatiriti na pratiShThAM lokamiti nayediti hovAcha pratiShThAM vayaM loka{\m+} sAmAbhisa{\m+}sthApayAmaH pratiShThAsa{\m+}stAva{\m+} hi sAmeti

हिन्दी अर्थ

हः इस प्रकार कहनेका अपराध कृरनेवाठे तुज विपरीत विज्ञानवानूसे स्पष्टतया पतित हो जायगा" तो इस एवभुक्तो दाल्भ्य आह- एसा कहे जानेपर दारभ्यने कहा-- चामुष्य रोकस्य का गतिरित्ययं रोक इति होवा- चास्य रोकस्य का गतिरिति न षतिष्ठां खोकमति- भै यह नात श्रीमान जानना चाहता. हवै; इसपर चिलकने कहा-- जान को ' तव “उस लोककी गति क्या है ¢ एसा पृषे नानेपर उसने “यह कोकः पेसा कहा । फिर “इस ोककी गति क्या है ? रेसा

English

'Well then, let me know this from you, Sir,' said Dâlbhya. 'Know it,' replied Silaka Sâlâvatya. 'What is the origin of that world (heaven)?' 'This world,' he replied. 'And what is the origin of this world?'-- He replied: 'Let no man carry the Sâman beyond this world as its rest. We place the Sâman in this world as its rest, for the Sâman is extolled as rest.'

अध्याय ८

श्लोक 1.8.8

तँ ह प्रवाहणो जैवलिरुवाचान्तवद्वै किल ते शालावत्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानीति विद्धीति होवाच

ta{\m+} ha pravAhaNo jaivaliruvAchAntavadvai kila te shAlAvatya sAma yastvetarhi brUyAnmUrdhA te vipatiShyatIti mUrdhA te vipatediti hantAhametadbhagavato vedAnIti viddhIti hovAcha

हिन्दी अर्थ

हन्ताहमेतद्भगवतो वेदानि “जिसमे साम प्रतिष्ठित ( यह यत्पतिषठं सामतयुक्तः ्रत्युवाच । बात भे ॒श्रीमानसे जानना चाहता अबुष्य लोकस्य का गतिरिति रोककी गति क्या है ® इस प्रकार एेसी श्रुतियों भी है । सम्पूणं प्राणियोंकी प्रतिष्ठा पृथिवी है- यह प्रयक्ष ही है । अतः सामकी भी यही रोकप्रतिषठा तब उससे जीवलके पुत्र प्वाहणने कहा--दे शालावत्य निश्वय ही तुम्हारा साम अन्तवान्‌ है । यदि कोई फेसा कह दिया क तुम्हारा मस्तक गिर जाय तो वुम्दारा मस्तक गिर जाता । शालावल्यने कदा

English

Then said Pravâhana Gaivali to Silaka Sâlâvatya: 'Your Sâman (the earth), O Sâlâvatya, has an end. And if any one were to say, Your head shall fall off (if you be wrong), surely your head would now fall.' 'Well then, let me know this from you, Sir,' said Sâlâvatya. 'Know it,' replied Gaivali.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 8
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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