अध्याय ९
श्लोक 1.9.1
॥ अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानकाशः परायणम्
|| asya lokasya kA gatirityAkAsha iti hovAcha sarvANi ha vA imAni bhUtAnyAkAshAdeva samutpadyanta AkAshaM pratyastaM yantyAkAsho hyevaibhyo jyAyAnakAshaH parAyaNam
हिन्दी अर्थ
तमेवयुक्तवन्तं ह प्रवाहणो इस प्रकार कहनेवटे उस शा व्यक प्रति जीवर्के पुत्र प्रवाहणे । है शाखवद्य ! तुम्हारा साम निश भिटककी उक्ति-आकाश्च ही सवका जाश्रय ह प्रवाहणकी अनुमति पाकर अस्य ऊोकस्य का गतिरिस्याकाश इति होवाच “स छोकक्ी क्या गति है क्योंकि ये समस्त भूत॒ आकाशसे इसपर प्रबादणने कहा-- आकाशः
English
'What is the origin of this world?' 'Ether , 'he replied. For all these beings take their rise from the ether, and return into the ether. Ether is older than these, ether is their rest.