अध्याय ३
श्लोक 3.1
ॐ ऋषिरुवाच
OM R^iShiruvAcha
हिन्दी अर्थ
ता आग कक की न.कूतऔवैनकऋनन ३. कई प्रतियोंमें इसके बाद “ततो देवा ददुस्तस्यै स्वानि स्वान्यायुधानि च । ऊचुर्जयजयेत्युच्चैर्जयन्तीं ते जयैषिण: ।। * इतना पाठ अधिक है। २. पा०--ट्य। ३. पा०--ट्य। ४. पा०--तस्यै चर्म। ५. पा०--वाहनाम्। ३. पा०--कैरुग्रदर्शन:। २. पा० किसी-किसी प्रतिमें इसके बाद “वृतः कालो रथानां च रणे पञ्चाशतायुतैः । युयुधे संयुगे तत्र तावद्धि: परिवारित: ॥ ” इतना अधिक पाठ है। > परितो वारयति शत्रूनिति व्युत्पति: । ३. पा०-शरवृष्टिभि:। २. पा०--सेनानु०। शल्यानु०। शैलानु० ३. किसी-किसी प्रतिमें इसके बाद “रुधिरौघविलुप्ताड़ा: संग्रामे लोमहर्षणे ।! इतना पाठ अधिक है। ४. पा०--यथैनां। ५. पा०--तुष्ट् वुर्देवा:। तृतीयो5 ध्याय: सेनापतियोंसहित महिषासुरका वध ध्यान (३० उद्यद्धानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम् । हस्ताब्जैर्दध्ती त्रिनेत्रविलसद्वक्तारविन्दश्रियं देवीं बद्धहिमांशुरत्नमुकुटां वन्देडरविन्दस्थिताम् ।। जगदम्बाके श्रीअड़ोंकी कान्ति उदयकालके सहस्रों सूर्योके समान है। वे लाल रंगकी रेशमी साड़ी पहने हुए हैं। उनके गलेमें मुण्डमाला शोभा पा रही है। दोनों स्तनोंपर रक्त चन्दनका लेप लगा है। वे अपने कर-कमलोंमें जपमालिका, विद्या, अभय तथा व--मुद्राएँ धारण किये हुए हैं। तीन नेत्रोंसे सुशोभित मुखारविन्दकी बड़ी शोभा हो रही है। उनके मस्तकपर चन्द्रमाके साथ ही रत्नमय मुकुट बँधा है तथा वे कमलके आसनपर विराजमान हैं। ऐसी देवीको मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूँ।) ऋषिरुवाच
English
Om. The rishi spoke: