अध्याय १६८
श्लोक 1
इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे वैद्यकशास्त्रपरिभाषा नामाष्टषष्ट्यधिकशततमो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- १६९ धन्वन्तरिरुवाच ।हिताहितविकेकाय अनुपानविधिं ब्रुवे ।रक्तशालि त्रिदोषघ्नं तृष्णामेदोनिवारकम्
iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe pūrvakhaṇḍe prathamāṃśākhye ācārakāṇḍe vaidyakaśāstraparibhāṣā nāmāṣṭaṣaṣṭyadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 169 dhanvantariruvāca / hitāhitavikekāya anupānavidhiṃ bruve / raktaśāli tridoṣaghnaṃ tṛṣṇāmedonivārakam
हिन्दी अर्थ
श्वित्र और कुष्ठ इन दोनों रोगोंकी उत्पत्तिका लक्षणोंके विपरीत होनेपर इसका उपचार करना कारण एक ही है और इनकी चिकित्सा भी एक ही चिकित्सकके लिये त्याज्य है, क्योंकि यह असाध्य है। इसीको किलास तथा दारुण भी कहते हैं। इनमें हो जाता है। रोगीके गुह्यभाग, करतल और ओष्ठ-
English
Crstsevs Rcxburiii.