Garuda Purana· Garuḍa Purāṇa
18
अध्याय 18 / 317

Book 1 - Adhyaya 18

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अध्याय १८

श्लोक 1

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे सूर्यार्चन विधिर्नाम सप्तदशो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- १८ सूत उवाच ।गरुडोक्तं कश्यपाय वक्ष्ये मृत्युञ्जयार्चनम् ।उद्धारपूर्वकं पुण्यं सर्वदेवमयं मतम्

iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe pūrvakhaṇḍe prathamāṃśākhye ācārakāṇḍe sūryārcana vidhirnāma saptadaśo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 18 sūta uvāca / garuḍoktaṃ kaśyapāya vakṣye mṛtyuñjayārcanam / uddhārapūrvakaṃ puṇyaṃ sarvadevamayaṃ matam

हिन्दी अर्थ

साधक उसके बाद भगवती त्रिपुराके पद्मासन, जाती हैं। पूजामें देवोंके आसन तथा पादुकाकी मूर्ति और हृदयादि आङ्गोंको प्रणाम करे। तत्पश्चात् पूजाका भी विधान है। विशेष पूजनमें मन्त्रन्यास उस पद्मपीठपर ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, तथा मण्डलादि-पूजन भी करना चाहिए। वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और चण्डिका--इन (अध्याय २४-२६)

English

I shall now expound the process of worship of Mrtyufijaya (the conqueror of death) narrated to Kaiyapa by Garuda. It is holy, has redeeming features and covers all the deities.

अध्याय १८

श्लोक 2

ओङ्कारं पूर्वमुद्धृत्य जु(हु)ङ्कांरं तदनन्तरम् ।सविसर्गं तृतीयं स्यान्मृत्युदारिद्रयमर्दनम्

oṅkāraṃ pūrvamuddhṛtya ju(hu)ṅkāṃraṃ tadanantaram / savisargaṃ tṛtīyaṃ syānmṛtyudāridrayamardanam

हिन्दी अर्थ

सर्पो एवं अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषको दूर करनेका मन्त्र सूतजीने कहा--अब मैं सर्पादि विभिन्न विषैले आकौलवेगेशे सर्वे बिंचमेघमाले सर्वनागादि- जीव-जन्तुओंके कारनेसे कष्ट पहुँचानेवाले विषको विषहरणम्।' दूर करनेमें समर्थ मन्त्रको कह रहा हूँ, जो इस इस मन्त्रका प्रयोग करते समय माहेश्वरी

English

OAkltra (The mystic syllable Om) should be placed first. Junkdra (the syllable Jum) next. The third one is sa vfiA a oisarga (sa). This mantra {Ofh jufh r<i) suppresses death and poverty.

अध्याय १८

श्लोक 3

ईशविष्णवर्कदेव्यादिकवचं सर्वसाधकम् ।अमृतेशं महामन्त्रन्त्र्यक्षरं पूजनं समम् ।जपनान्मृत्युहीनाः स्युः सर्वपापविवर्जिताः

īśaviṣṇavarkadevyādikavacaṃ sarvasādhakam / amṛteśaṃ mahāmantrantryakṣaraṃ pūjanaṃ samam / japanānmṛtyuhīnāḥ syuḥ sarvapāpavivarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकार है-- उमादेवीसे प्रार्थना करे कि है उमे! तुम रुद्रके “३० कणिचिकीणिकक्वाणी चर्वाणी हदयमें उत्पन्न हुई हो और उसीमें रहती हो। भूतहारिणि फणिविषिणि विरथनारायणि उमे दह तुम्हारा रौद्र रूप है। तुम्हें रौद्री भी कहा जाता है। दह हस्ते चण्डे रौद्रे माहेश्वरि महामुखि ज्वालामुखि तुम्हारा मुख ज्चालाके समान जाज्चल्यमान है तथा

English

By its recital a hundred times a man attains the fruits of the recital of Vedic passages or pilgrimage to holy places. By reciting it a hundred and eight times, three times during the day (dawn, midday and dusk) he can conquer death and enemies.

अध्याय १८

श्लोक 4

शतजप्याद्वेदफलं यज्ञतीर्थफलं लभेत् ।अष्टोत्तरशताज्जाप्यात्रिसन्ध्यं मृत्यु शत्रुजित

śatajapyādvedaphalaṃ yajñatīrthaphalaṃ labhet / aṣṭottaraśatājjāpyātrisandhyaṃ mṛtyu śatrujita

हिन्दी अर्थ

शङ्कुकर्णि शुकमुण्डे शत्रुं हन हन सर्वनाशिनि तुमने अपने करिप्रदेशमें क्षुद्र घण्टिका लगी करधनी स्वेदय सर्वाङ्गशोणितं तत्निरीक्षसि मनसा देविपहन रखी है। तुम भूतोंकी प्रिय हो, सर्पोके लिये सम्मोहय सम्मोहय रुद्रस्य हृदये जाता रुद्रस्यविषरूपिणी हो, तुम्हारा नाम विरथनारायणी हृदये स्थिता। रुद्रो रौद्रेण रूपेण त्वं देवि रक्ष रक्ष है तथा तुम शुकमुण्डा हो और कानोंमें शङ्कु

English

He should contemplate on the god Varada (giver of boons) as seated on a white lotus indicating fearlessness through gestures. The lord of Nectar should be thought of as holding the jar of nectar with both the hands.

अध्याय १८

श्लोक 5

ध्यायेच्च सितपद्मस्थं वरदं चाभयं करे ।द्वाभ्यां चामृतकुम्भं तु चिन्तयेदमृतेश्वरम्

dhyāyecca sitapadmasthaṃ varadaṃ cābhayaṃ kare / dvābhyāṃ cāmṛtakumbhaṃ tu cintayedamṛteśvaram

हिन्दी अर्थ

मां हूं मां हूं फफफ ठठ स्कन्दमेखलाबालग्रह- पहनी हुई हो। है विशाल मुखवाली, भयंकर एवं शत्रुविषहारी ३० शाले माले हर हर प्रचण्ड स्वभाववाली चण्डादेवी! हाथोंमें ज्वलन- विषोङ्काररहिविषवेगे हां हां शवरि हुं शबरि शक्ति पैदा कर, शत्रुका हनन कर, हनन कर। सब

English

He should think of the goddess of nectar, true of speech, as seated on his limb holding the jar in the right hand and the lotus in the left.

अध्याय १८

श्लोक 6

तस्यैवाङ्गगतां देवीममृतामृतभाषिणी(विनि) म् ।कलशं दक्षिणे हस्ते वामहस्ते सरोरुहम्

tasyaivāṅgagatāṃ devīmamṛtāmṛtabhāṣiṇī(vini) m / kalaśaṃ dakṣiṇe haste vāmahaste saroruham

हिन्दी अर्थ

काण्ड श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र ५१

English

Reciting this eight thousand times, three times

अध्याय १८

श्लोक 7

जपेदष्टसहस्रं वै त्रिसन्ध्यं मासमेकतः ।जरामृत्युमहाव्याधिशत्रुच्छिवशान्तिदम्

japedaṣṭasahasraṃ vai trisandhyaṃ māsamekataḥ / jarāmṛtyumahāvyādhiśatrucchivaśāntidam

हिन्दी अर्थ

प्रकारके विषोंका नाश करनेवाली है देवि! मेरे प्रकारके विषोंके वेगका हरण कर, हरण कर।' ऐसा सर्वाङ्गमें फैले हुए विषको प्रभावहीन कर दे। उस उच्चारण करे और 'हां हां शवरि हुँ' शवरि कहकर विषको तुम देख रही हो। उस काटनेवाले जन्तुको वेगपूर्ण गतिशीलोंमें अतिगतिशील सर्वत्र व्यापिनी सम्मोहित करो, सम्मोहित करो । है देवि! तुम मेरी मेघमालारूपिणी देवि ! मेरे सभी नागादि विषजन्तुओंसे

English

First of all, arghya should be ofiTcred and

अध्याय १८

श्लोक 8

आह्वानं स्थापनं रोधं सन्निधानं निवेशनम् ।पाद्यमा चमनं स्नानमर्घ्यं स्रगनुलेपनम्

āhvānaṃ sthāpanaṃ rodhaṃ sannidhānaṃ niveśanam / pādyamā camanaṃ snānamarghyaṃ sraganulepanam

हिन्दी अर्थ

रक्षा करो, रक्षा करो । इस प्रकार प्रार्थना एवं चिन्तन उत्पन्न विषका हरण करो।

English

r.l. orghpdtrirfMdih dadyUssIfftmve

अध्याय १८

श्लोक 9

दीपांबरं भूषणं च नैवद्यं पानवीजनम् ।मात्रामुद्राजपध्यानं दक्षिणा चाहुतिः स्तुतिः

dīpāṃbaraṃ bhūṣaṇaṃ ca naivadyaṃ pānavījanam / mātrāmudrājapadhyānaṃ dakṣiṇā cāhutiḥ stutiḥ

हिन्दी अर्थ

करके ' हुँ मां हुँ फफफ ठठ' इसका उच्चारण करे इस प्रकार चिन्तन और प्रार्थना करते हुए तथा “स्कन्दकी मेखलारूपी बालग्रहों, शत्रुओं और रोगीके प्रति स्पर्शादि करते हुए मन्त्रपाठ करे। विषोंका हरण करनेवाली है शाला-माला! नाना (अध्याय २७) श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र तथा

English

Then he should scatter brilliant flowers on the idol cron the ground all round. For the worship of its Dvdta (entrance-passage), the soul and the AdhdraSakiis are worshipped.

अध्याय १८

श्लोक 10

वाद्यं गतिं च नृत्यं च न्यासयोगं प्रदक्षिणम् ।प्रणतिर्मन्त्रशय्या च वन्दनं च विसर्जनम्

vādyaṃ gatiṃ ca nṛtyaṃ ca nyāsayogaṃ pradakṣiṇam / praṇatirmantraśayyā ca vandanaṃ ca visarjanam

हिन्दी अर्थ

श्रीसूतजीने कहा--हे ऋषियो ! मैं भोग और करके क्रमशः आठौं दिशाओंमें जाम्बवती और मोक्ष प्रदान करनेवाली श्रीगोपालजी तथा भगवान् सुशीलाके साथ रुक्मिणी, सत्यभामा, सुनन्दा, श्रीधर विष्णुकी पूजाका वर्णन कर रहा हूँ, इसे नाग्रजिती, लक्ष्मणा और मित्रविन्दाकी पूजा करनी सुनें। पूजा प्रारम्भ करनेसे पहले पूजा-मण्डलके चाहिए ।

English

Then sdmidhyakarana of x\\t devas (invoking

अध्याय १८

श्लोक 11

षडङ्गादिप्रकारेण पूजनं तु क्रमोदितम् ।परमेशमुखोद्रीतं यो जानाति स पूजकः

ṣaḍaṅgādiprakāreṇa pūjanaṃ tu kramoditam / parameśamukhodrītaṃ yo jānāti sa pūjakaḥ

हिन्दी अर्थ

द्वारदेशमे गङ्गा और यमुनाके साथ धाता और साथ ही श्रीगोपालके शङ्कु, चक्र, गदा, पद्म, विधाताकी, श्रीके साथ शङ्ख, पद्मनिधि एवं शार्ङ्गधनुष मुसल, खड्ग, पाश, अङ्कश, श्रीवत्स, कौस्तुभ, और शरभकी पूजा करनी चाहिए तथा पूर्व दिशामें मुकुट, वनमाला, इन्द्रादि ध्वजवाहक दिक्पाल, भद्र और सुभद्रकी, दक्षिण दिशामें चण्ड और कुमुदादिगण और विष्वक्सेनका पूजन करके

English

Dharma and others, Indra and others are duly worshipped along with their weapons and followers. Worship of the cycles, the Vedas and the muhUrtas yields enjoyment and salvation.

अध्याय १८

श्लोक 12

अर्घ्यपात्रार्चनं चादावस्त्रेणैव तु ताडनम् ।शोधनं कवचेनैव अमृतीकरणं ततः

arghyapātrārcanaṃ cādāvastreṇaiva tu tāḍanam / śodhanaṃ kavacenaiva amṛtīkaraṇaṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

प्रचण्डकी, पश्चिम दिशामें बल और प्रबलकी, श्रीलक्ष्मीसहित कृष्णको भी अर्चना करनी चाहिए। उत्तर दिशामें जय और विजयकी तथा चारों गोपीजनवल्लभके मन्त्र जपनेसे तथा उनका दरवाजोंपर श्री, गण, दुर्गा और सरस्वतीकी पूजा ध्यान करनेसे एवं उनकी (साङ्गोपाङ्ग) पूजा करनी चाहिए। करनेसे साधक सभी कामनाओंको पूर्ण कर

English

The groups of Mothers Nandi and Ganga, Maha- kala and Yamuna are to be worshipped at the threshold.

अध्याय १८

श्लोक 13

पूजा चाधारशक्त्यादेः प्राणायामं तथासने ।पीठसुद्धिं ततः कुर्याच्छोषणाद्यैस्ततः स्मरेत्

pūjā cādhāraśaktyādeḥ prāṇāyāmaṃ tathāsane / pīṭhasuddhiṃ tataḥ kuryācchoṣaṇādyaistataḥ smaret

हिन्दी अर्थ

मण्डलके अग्नि आदि कोणोंमें और दिशाओं में लेता है। परम भागवत नारद, सिद्ध तथा गुरुका एवं नल- त्रैलोक्यमोहन श्रीधरके मन्त्र इस प्रकार हैं- कूबरका पूजन करे। पूर्व दिशामें विष्णु, विष्णुतपा 'ॐ श्रीं ( श्रीः ) श्रीधराय त्रैलोक्यमोहनाय तथा विष्णुशक्तिकी अर्चना करे। इसके बाद विष्णुके नमः। क्लीं पुरुषोत्तमाय त्रैलोक्यमोहनाय नमः।

English

Om obeisance to Bhairava the lord of Nectar. Similarly, Om jutii sah obeisance to sun.

अध्याय १८

श्लोक 14

आत्मानं देवरूपं च कराङ्गन्यासकं चरेत् ।आत्मानं पूजयेत्पश्चाज्यो तीरूपं हृदब्जतः

ātmānaṃ devarūpaṃ ca karāṅganyāsakaṃ caret / ātmānaṃ pūjayetpaścājyo tīrūpaṃ hṛdabjataḥ

हिन्दी अर्थ

परिवारकी अर्चना करे मण्डलके मध्यमें शक्तिकी ॐ विष्णवे त्रैलोक्यमोहनाय नमः। ॐ श्रीं हीं और कूर्म, अनन्त, पृथ्वी, धर्म, ज्ञान तथा वैराग्यको क्लीं त्रैलोक्यमोहनाय विष्णवे नमः। अग्नि आदि कोणोंमें पूजा करे। वायव्य-कोणके --ये मन्त्र समस्त प्रयोजनोंको पूर्ण करनेवाले साथ उत्तर दिशामें प्रकाशात्मक एवं ऐश्वर्यको हैं।

English

In the same manner he should perform the worship of 3iva-Krsia, Brahman, the Gusas Candika Sarasvati, Maha« lakmi and others.

अध्याय १८

श्लोक 15

मूर्तौ वा स्थण्डिले वापि क्षिपेत्पुष्पं तु भास्वरम् ।आह्वानद्वारपूजार्थं पूजा चाधारशक्तितः

mūrtau vā sthaṇḍile vāpi kṣipetpuṣpaṃ tu bhāsvaram / āhvānadvārapūjārthaṃ pūjā cādhāraśaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

पूजा करे। गोपीजनवल्लभाय स्वाहा'-यह श्रीसूतजी पुनः बोले--अब मैं श्रीधरभगवान् गोपालमन्त्र है। मण्डलकी पूर्व दिशासे आरम्भ (विष्णु)-की मङ्गलमयी पूजाका वर्णन करता हूँ ।

English

r. f. pHhaSuddhL

अध्याय १८

श्लोक 16

सान्निध्यकरणं देवे परिवारस्य पूजनम् ।अङ्गषट्कस्य पूजा वै कर्तव्या च विपश्चितैः

sānnidhyakaraṇaṃ deve parivārasya pūjanam / aṅgaṣaṭkasya pūjā vai kartavyā ca vipaścitaiḥ

हिन्दी अर्थ

साधकको सर्वप्रथम ' ॐ श्रां हृदयाय नमः, इस पूजाके पश्चात् ॐ श्रियै नमः: '-इस ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा, ॐ श्रूं शिखायै वषट्, ३ मन्त्रसे लक्ष्मीका पूजन करना चाहिए। ' ॐ श्रां श्रैं कवचाय हुम्, ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ हृदयाय नमः' ' ३ श्रीं शिरसे नमः', ॐ श्रू श्रः अस्त्राय फट्'--इन मन्त्रोंसे अङ्गन्यास और शिखायै नमः, ' ' ॐ श्रैं कवचाय नमः ', ' ॐ श्रं

English

vA, kfiftaiyd ca nfiafritdi,

अध्याय १८

श्लोक 17

धर्मादयश्च शक्राद्याः सायुधाः परिवारकाः ।युगवेदमुहूर्ताश्च पूजेयं भुक्तिमुक्तिकृत्

dharmādayaśca śakrādyāḥ sāyudhāḥ parivārakāḥ / yugavedamuhūrtāśca pūjeyaṃ bhuktimuktikṛt

हिन्दी अर्थ

करन्यास करना चाहिए। तदनन्तर भगवान्को नेत्रत्रयाय नमः”, ' 3७ श्रः अस्त्राय नमः', ॐ

English

An auoeiation of, specially, attendants of Siva.

अध्याय १८

श्लोक 18

मातृकाश्च गणांश्चादौ नन्दिगङ्गे च पूजयेत् ।महाकालं च यमनां देहल्यां पूजयेत्पुरा

mātṛkāśca gaṇāṃścādau nandigaṅge ca pūjayet / mahākālaṃ ca yamanāṃ dehalyāṃ pūjayetpurā

हिन्दी अर्थ

शङ्ख, चक्र, गदास्वरूपिणी मुद्रा प्रदर्शितकर शङ्ख, चक्र तथा गदा-पद्मसे सुशोभित आत्मस्वरूप श्रीधर- भगवान् पुरुषोत्तमका ध्यान करना चाहिए। तत्पश्चात् स्वस्तिक या सर्वतोभद्र-मण्डलमें श्रीधरदेवको पूजा

English

An auoeiation of, specially, attendants of Siva.

अध्याय १८

श्लोक 19

ॐ अमृतेश्वर ॐ भैरवाय नमः ।एवं ॐ जुं हंसः सूर्याय नमः

oṃ amṛteśvara oṃ bhairavāya namaḥ / evaṃ oṃ juṃ haṃsaḥ sūryāya namaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वप्रथम शारङ्गधनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णुके आसनको पूजा करनी चाहिए। ' ॐ श्रीधरासनदेवता आगच्छत' इस मन्त्रसे आवाहन करके ' ३ समस्तपरिवारायाच्युतासनाय

English

An auoeiation of, specially, attendants of Siva.

अध्याय १८

श्लोक 20

एवं शिवाय कृष्णाय ब्रह्मणे च गणाय च ।चण्डिकायै सरस्वत्यै महालक्ष्मादि पूजयेत्

evaṃ śivāya kṛṣṇāya brahmaṇe ca gaṇāya ca / caṇḍikāyai sarasvatyai mahālakṣmādi pūjayet

हिन्दी अर्थ

गङ्गायै नमः”, 'ॐ यमुनायै नमः”, “३०

English

An auoeiation of, specially, attendants of Siva.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_garuDapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Garuda Purana — Chapter 18
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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