Garuda Purana· Garuḍa Purāṇa
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अध्याय 247 / 317

Book 2 - Adhyaya 8

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अध्याय २४७

श्लोक 1

इति श्रीगारुडे महापुराणे उत्तरखण्डे द्वितीयांशे धर्मकाण्डे श्रीकृष्णगरुडसंवादे प्रेतकल्पे पञ्चप्रेतोपाख्यानं नाम सप्तमो ऽद्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- ८ गरुड उवाच ।स्वामिन्कस्याधिकारो ऽत्र सर्व एवौर्ध्वदेहिके ।क्रियाः कतिविधाः प्रोक्ता वदैतत्सर्वमेव मे

iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe uttarakhaṇḍe dvitīyāṃśe dharmakāṇḍe śrīkṛṣṇagaruḍasaṃvāde pretakalpe pañcapretopākhyānaṃ nāma saptamo 'dyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 8 garuḍa uvāca / svāminkasyādhikāro 'tra sarva evaurdhvadehike / kriyāḥ katividhāḥ proktā vadaitatsarvameva me

हिन्दी अर्थ

धर्म एवापवर्गाय तस्माद्धर्म॑ समाचरेत्। श्रद्धया साध्यते धर्मो बहुभिर्नार्थराशिभिः॥

English

Son, grandson, greatgrand-sony his brother and brother's progeny, so also sapinda-progcny—all these are authorized to perform the obsequies. In their absence, samatiodaka-progeny of all these can perform the rite.

अध्याय २४७

श्लोक 2

श्रीकृष्ण उवाच ।पुत्रः पौत्रः प्रपौत्रो वा तद्भ्राता भ्रातृसन्ततिः ।सपिण्डसन्ततिर्वापि क्रियार्हाः खग ज्ञातयः

śrīkṛṣṇa uvāca / putraḥ pautraḥ prapautro vā tadbhrātā bhrātṛsantatiḥ / sapiṇḍasantatirvāpi kriyārhāḥ khaga jñātayaḥ

हिन्दी अर्थ

असदित्युच्यते पक्षिन् प्रेत्य चेह न तत्फलम्॥

English

When Brahma, Indra, Rudra, Nasatyis, Surya,Agni, Vasu, MarutJ, Viivedcvas, manes, birds, men, animak, serpents, the Mother deities and other divine beings are given raddha with faith, there is rejoicing in the whole world.

अध्याय २४७

श्लोक 3

तेषामभावे सर्वेषां समानोदकसन्ततिः ।कुलद्वये ऽपि चोच्छिन्ने स्त्रीभिः कार्याः क्रियाः खग

teṣāmabhāve sarveṣāṃ samānodakasantatiḥ / kuladvaye 'pi cocchinne strībhiḥ kāryāḥ kriyāḥ khaga

हिन्दी अर्थ

प्रेतकल्प वृषोत्सर्ग तथा सत्कर्मकी महिमा ५०९

English

When they are satisfied they satisfy the performer with sons, wife and wealth. Thus t have told you, in brief, about the rites and the persons authorized to perform them.

अध्याय २४७

श्लोक 4

इच्छयोच्छिन्नबन्धश्च कारयेदवनीपतिः ।पूर्वाः क्रिया मध्यमाश्च तथा चैवोत्तराः क्रियाः

icchayocchinnabandhaśca kārayedavanīpatiḥ / pūrvāḥ kriyā madhyamāśca tathā caivottarāḥ kriyāḥ

हिन्दी अर्थ

वृषोत्सर्ग तथा सत्कर्मकी महिमा

English

O Lord, now tell me when no authorized person is alive, who should conduct the obsequious rites.

अध्याय २४७

श्लोक 5

प्रतिसंवत्सरं पक्षिन्नेकोद्दिष्टविधानतः ।श्राद्धं तत्र प्रकर्तव्यं फलं तस्य शृणुष्व मे

pratisaṃvatsaraṃ pakṣinnekoddiṣṭavidhānataḥ / śrāddhaṃ tatra prakartavyaṃ phalaṃ tasya śṛṇuṣva me

हिन्दी अर्थ

श्रीगरुडजीने कहा--हे देवेश! इस भूलोकमें मृत्युको प्राप्त हुए लोगोंकी शुद्धि कैसे हो? है देव! किस कर्मको करनेसे प्राणियोंको प्रेतयोनिकी आप मेरे इस संशयको दूर करें । प्राप्ति नहीं होती? उसे आप मुझे बतायें। श्रीकृष्णने कहा--हे खगेश! उक्त प्रकारसे श्रीकृष्णजीने कहा--अब मैं संक्षेपमें क्षयाहसे अपमृत्युको प्राप्त हुआ ब्राह्मण छः मास, क्षत्रिय

English

After fasting and bathing he should along with his wife worship Viiu, the lord of all, the Creator as well as the Enjoyer.

अध्याय २४७

श्लोक 6

ब्रह्मेन्द्ररुद्रनासत्यसूर्याग्निवसुमारुतान् ।विश्वेदेवान्पितृ गणान्वयांसि मनुजान्पशून्

brahmendrarudranāsatyasūryāgnivasumārutān / viśvedevānpitṛ gaṇānvayāṃsi manujānpaśūn

हिन्दी अर्थ

लेकर आगे की जानेवाली और्ध्वहैहिक क्रियाको ढाई मास, वैश्य डेढ़ मास एवं शूद्र एक मासमें शुद्ध कह रहा हूँ, जिसे मोक्ष चाहनेवाले लोगोंको अपने हो जाता है। यदि तीर्थमें सभी प्रकारका दान देकर ही हाथोंसे करना चाहिए स्त्री और विशेषरूपसे कोई ब्रह्मचारी मर जाता है तो वह शुद्ध होकर पाँच वर्षसे अधिक आयुवाले बालककी मृत्यु ऐहिक दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता। वृषोत्सर्ग आदि

English

With Svadha he should ofler Jaladhenus to the manes along with Daksia and gingelly seeds.

अध्याय २४७

श्लोक 7

सरीसृपान्मातृगणान्यच्चान्यद्भूतसंज्ञितम् ।श्राद्धं श्रद्धान्वितः कुर्वन्प्रीणयत्यखिलं जगत्

sarīsṛpānmātṛgaṇānyaccānyadbhūtasaṃjñitam / śrāddhaṃ śraddhānvitaḥ kurvanprīṇayatyakhilaṃ jagat

हिन्दी अर्थ

होनेपर उनके प्रेतत्वकी निवृत्तिके लिये वृषोत्सर्ग करके यति-धर्मका आचरण करना चाहिए। यदि करना चाहिए । प्रेतत्वकी निवृत्तिके लिये वृषोत्सर्गके संन्यास-धर्मका पालन करते हुए किसी प्राणीकी अतिरिक्त इस पृथ्वीपर अन्य कोई साधन नहीं है मृत्यु हो जाती है तो वह शाश्वत ब्रह्मपदको प्राप्त जो मनुष्य जीवित रहते हुए वृषोत्सर्ग करता है कर लेता है। जो व्यक्ति शिष्टाचाररहित धर्मविरुद्ध

English

Reciting the mantra Agnays Kavyavdhandya svadhd namafyy Somdya tvd piipnaU svadhd namah>

अध्याय २४७

श्लोक 8

ते तृप्तास्तर्पयन्त्येनं पुत्रदारधनैस्तथा ।अधिकारः क्रियाभेदः समासात्ते निरूपितः

te tṛptāstarpayantyenaṃ putradāradhanaistathā / adhikāraḥ kriyābhedaḥ samāsātte nirūpitaḥ

हिन्दी अर्थ

अथवा मृत्युके पश्चात् भी जिसकी यह क्रिया कर्म करता है, वह भी वृषोत्सर्ग आदिकी क्रिया सम्पन्न हो जाती है उसे दान, यज्ञ एवं व्रत किये करके यमराजके शासनमें नहीं जाता। पुत्र, सहोदर बिना भी प्रेतत्वकी प्राप्ति नहीं होती। भाई, पौत्र, बन्धु-बान्धव, सगोत्री अथवा सम्पत्ति गरुडने कहा--हे देवश्रेष्ठ मधुसूदन! जीवित लेनेवाला उत्तराधिकारी कोई भी हो, उसको मरे

English

With right hand he should donate the third one with daksin reciting Tamdyddgirase edtha svadhd namah.

अध्याय २४७

श्लोक 9

गरुड उवाच ।उक्तेष्वेको ऽपि चेन्न स्यादधिकारी सुरोत्तम ।कर्तव्यं किं तदा विष्णो पुरुषेण विजानता

garuḍa uvāca / ukteṣveko 'pi cenna syādadhikārī surottama / kartavyaṃ kiṃ tadā viṣṇo puruṣeṇa vijānatā

हिन्दी अर्थ

रहते हुए अथवा मृत्युके पश्चात् भी किस कालमें हुए स्वजनके लिये वृषोत्सर्ग अवश्य करना चाहिए। यह वृषोत्सर्ग-क्रिया होनी चाहिए? आप इस पुत्रके अभावमें पत्नी, दौहित्र (नाती) और दुहिता बातको मुझे बतायें। सोलह श्राद्धोंको करनेसे (पुत्री) भी इस कर्मको कर सकती है। पुत्रोंके अन्तमें क्या फल प्राप्त हो सकता है? रहनेपर वृषोत्सर्ग अन्यसे नहीं कराना चाहिए।

English

He should then tell the Brahma. Brahmana, I am feeding you for the propitiation of Vasus, Rudras and Suryas.** He should thus tell all the Brahmanas.

अध्याय २४७

श्लोक 10

श्रीकृष्ण उवाच ।अधिकारो यदा नास्ति यदि नास्ति च निश्चयः ।जीविते सति जीवाय दद्याच्छ्राद्धंस्वयं नरः

śrīkṛṣṇa uvāca / adhikāro yadā nāsti yadi nāsti ca niścayaḥ / jīvite sati jīvāya dadyācchrāddhaṃsvayaṃ naraḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णने कहा--हे पक्षिराज ! यदि वृषोत्सर्। गरुडने कहा--हे सुरेश्वर! चाहे स्त्री हो किये बिना ही पिण्डदान दिया जाता है तो उसका अथवा पुरुष जिसके पुत्र नहीं है, उसका संस्कार श्रेय दाताको नहीं प्राप्त होता। प्रत्युत वह क्रिया किस प्रकारसे किया जाय? है देव! इस विषयमें प्रेतके लिये निष्फल हो जाती है। जिसके एकादशाहमें उत्पन्न हुई मेरी शंकाको आप भली प्रकारसे

English

He should then perform dr(invocation), etc, as it is performed in the case of manes. He should give Saumya cow to the Brahmana for the propitiation of Vasus.

अध्याय २४७

श्लोक 11

कृतोपवासः सुस्नातः कृष्णासङ्गः समाहितः ।कर्तारमथ भोक्तारं विष्णुं सर्वेश्वरं यजेत्

kṛtopavāsaḥ susnātaḥ kṛṣṇāsaṅgaḥ samāhitaḥ / kartāramatha bhoktāraṃ viṣṇuṃ sarveśvaraṃ yajet

हिन्दी अर्थ

वृषोत्सर्ग नहीं होता, सौ श्राद्ध करनेपर भी उसका दूर करें। प्रेतत्व सुस्थिर रहता है। श्रीकृष्णने कहा--पुत्रहीन व्यक्तिकी गति नहीं गरुडने कहा--हे प्रभो! सर्पदंशसे मरे हुए है, उसके लिये स्वर्गका सुख नहीं है। अत: ऐसे लोगोंकी अग्निदाहादि क्रिया नहीं की जाती है। मनुष्यको सदुपायसे पुत्र अवश्य उत्पन्न करना

English

He should give Agneya cow for the propitiation of Rudra and Yamya cow for the propitiation of Surya. He should give a vessel full of gingelly see for the propitiation of VUvedevas.

अध्याय २४७

श्लोक 12

सदक्षिणाश्च सतिलास्तिस्त्रश्च जलधेनवः ।निवेदयेत्पितृभ्यश्च स्वधेति सुसमाहितः

sadakṣiṇāśca satilāstistraśca jaladhenavaḥ / nivedayetpitṛbhyaśca svadheti susamāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

यदि जलमें, सींगवाले पशु अथवा शस्त्रादिके चाहिए। पुरुष स्वयं जो कुछ भी दान देते हैं, प्रहारसे कोई मर जाता है, तो इस प्रकार असत् परलोकमें वे सभी उसके सामने ही उपस्थित रहते हँ । एकादशाहे प्रेतस्य यस्य नोत्सृज्यते वृष: । प्रेतत्वं सुस्थिरं तस्य दत्तैः श्राद्धशतैरपि ॥ ( १३।८)

English

Then uttering svasti and giving sacred water (as that of the Ganges) he should dismiss the Br&hmats (i.e. ask them to go away as they liked)» while he himself should set his heart on the eight-syllabled Vifu.

अध्याय २४७

श्लोक 13

अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नम इति स्मरन् ।सोमायत्वा पितृमते स्वधा नम इति स्मरन्

agnaye kavyavāhanāya svadhā nama iti smaran / somāyatvā pitṛmate svadhā nama iti smaran

हिन्दी अर्थ

अपने हाथोंसे जो नाना प्रकारके स्वादिष्ट एवं विविध व्यञ्जन खानेके लिये दिये जाते हैं, वे सभी मृत्युके पश्चात् अक्षय फल प्रदान करते हैं। जो गौ,

English

Muttering the mantra Vastrini lohakhandni jihfh ti he should light fire facing the south.

अध्याय २४७

श्लोक 14

दक्षिणेन तु दद्याच्च तृतीयां दक्षिणायुताम् ।यमायाङ्गिरसे चाथ स्वधा नम इति स्मरन्

dakṣiṇena tu dadyācca tṛtīyāṃ dakṣiṇāyutām / yamāyāṅgirase cātha svadhā nama iti smaran

हिन्दी अर्थ

हाथसे दिये जाते हैं, वे सभी दान जिस-जिस योनिमें जहाँ-जहाँ दानकर्ता जाते हैं, वहाँ-वहाँ उपस्थित रहते है । जबतक प्राणीका शरीर स्वस्थ रहता है, तबतक

English

Then making a Brahmi image with fifty Kuias he should burn the same in fire. He should perform the sacrifice usually done in the crematorium and oflfer the final oblation (Purnahuii).

अध्याय २४७

श्लोक 15

तयोर्मध्ये तु निः क्षिप्य विप्रान्संमन्त्र्य भो जयेत् ।प्रथमामुत्तरे न्यस्य द्वितीयां दक्षिणे न्यसेत्

tayormadhye tu niḥ kṣipya viprānsaṃmantrya bho jayet / prathamāmuttare nyasya dvitīyāṃ dakṣiṇe nyaset

हिन्दी अर्थ

धर्मका सम्यक् पालन करना चाहिए। अस्वस्थ होनेपर दूसरोंकी प्रेरणासे भी वह कुछ नहीं कर पाता है। यदि अपने जीवनकालमे व्यक्ति और्ध्वहैहिक कर्म नहीं कर लेता अथवा मरनेके बाद अधिकारी

English

Or he should not kindle fire but simply propitiate Earth» Yama and Rudra. He should invoke each one of them separately and give offering at the appropriate place.

अध्याय २४७

श्लोक 16

मध्ये तृतीयां विन्यस्य पश्चादावाहनादिकम् ।आवाहनादिना पूर्वं विश्वेदेवान्प्रपूज्यच

madhye tṛtīyāṃ vinyasya paścādāvāhanādikam / āvāhanādinā pūrvaṃ viśvedevānprapūjyaca

हिन्दी अर्थ

पुत्र-पौत्रादिकोंके द्वारा भी यह कर्म नहीं होता है तो वह वायुरूपमें भूख-प्याससे पीडित रात-दिन भटकता रहता है। वह कृमि, कीट अथवा पतिंगा होकर बार-बार जन्म लेता है और मर जाता है।

English

He should sacrifice caru mixed with mudga into the fire. He should offer sacred thread, rice and gingelly seeds to a Brahmana.

अध्याय २४७

श्लोक 17

वसुभ्यस्त्वामहं विप्र रुद्रेभ्यस्त्वामहं ततः ।सूर्येभ्यस्त्वामहं विप्र भोजयामीति तान्वदेत्

vasubhyastvāmahaṃ vipra rudrebhyastvāmahaṃ tataḥ / sūryebhyastvāmahaṃ vipra bhojayāmīti tānvadet

हिन्दी अर्थ

वह कभी असत् मार्गसे गर्भमें प्रविष्ट होता है एवं जन्म लेते ही तत्काल विनष्ट हो जाता है। जबतक यह शरीर स्वस्थ और नीरोग है, जबतक इससे बुढ़ापा दूर है, जबतक इन्द्रियोंकी

English

He should say; *Otb homage to Earlh\ Orii homage to Yama.

अध्याय २४७

श्लोक 18

आवाहनादिकं शेषं कुर्याच्च पितृशेषवत् ।साम्यां धेनुं ततो दद्याद्वसूद्देशं द्विजाय तु

āvāhanādikaṃ śeṣaṃ kuryācca pitṛśeṣavat / sāmyāṃ dhenuṃ tato dadyādvasūddeśaṃ dvijāya tu

हिन्दी अर्थ

शक्ति किसी भी प्रकारसे क्षीण नहीं हुई है और जबतक आयु नष्ट नहीं हुई है, तबतक अपने कल्याणके लिये महान् प्रयत्न कर लेना चाहिए; क्योंकि घरमें महाभयंकर आगके लग जानेपर

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 19

आग्नेय्यां चाथ रौद्राय याम्यां सूर्यद्विजाय तु ।विश्वेभ्यश्चाथ देवेभ्यस्तिलपात्रं निवेदयेत्

āgneyyāṃ cātha raudrāya yāmyāṃ sūryadvijāya tu / viśvebhyaścātha devebhyastilapātraṃ nivedayet

हिन्दी अर्थ

कुआँ खोदनेके उद्योगसे मनुष्यको क्या लाभ प्राप्त हो सकता है--

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 20

स्वस्तीत्येव तथाक्षय्यं जलं दत्त्वाथ तान्द्विजान् ।विसर्जयेत्स्मरन्विष्णुं देवमष्टाक्षरं विभुम्

svastītyeva tathākṣayyaṃ jalaṃ dattvātha tāndvijān / visarjayetsmaranviṣṇuṃ devamaṣṭākṣaraṃ vibhum

हिन्दी अर्थ

आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान् संदीप्ते भवने तु कूपखनने प्रत्युद्यमः कीदूशः॥

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 21

ततः कामं कुलेशानीं शिवं नारायणं स्मरेत् ।चतुर्दश्यां ततो गच्छेद्यथाप्राप्तां सरिद्वराम्

tataḥ kāmaṃ kuleśānīṃ śivaṃ nārāyaṇaṃ smaret / caturdaśyāṃ tato gacchedyathāprāptāṃ saridvarām

हिन्दी अर्थ

और्ध्वहैहिक क्रिया, गोदान एवं वृषोत्सर्गका माहात्म्य

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 22

वस्त्राणि लोहखण्डानि जितं त इति संजपन् ।दक्षिणाभिमुखो वह्निं ज्वालयेत्तत्र च स्वयम्

vastrāṇi lohakhaṇḍāni jitaṃ ta iti saṃjapan / dakṣiṇābhimukho vahniṃ jvālayettatra ca svayam

हिन्दी अर्थ

गरुडने कहा--हे विभो! मृत्युको प्राप्त कर रहे दुःखित व्यक्तिके द्वारा जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल है? स्वस्थ अवस्थामें और विधिहीन जो दान दिया जाता है, उसका क्या फल है?

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 23

पञ्चाशता कुशैर्ब्राह्मीं कृत्वा प्रतिकृतिं दहेत् ।हुत्वा श्माशानिकं होमं पूर्णाहुत्यन्तमेव हि

pañcāśatā kuśairbrāhmīṃ kṛtvā pratikṛtiṃ dahet / hutvā śmāśānikaṃ homaṃ pūrṇāhutyantameva hi

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णने कहा--हे पक्षिश्रेष्ठ ! स्वस्थ चित्तवाले मनुष्यके द्वारा दानमें दी गयी एक गौ, रोगी पुरुषके द्वारा दानमें दी गयी एक सौ गाय, मर रहे प्राणीके द्वारा दानमें धनको छोड़कर दी गयी हजार गाय तथा

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 24

निरग्रिमथ वा भूमिं यमं रुद्रञ्च संस्मरेत् ।हुत्वा प्राधानिके स्थाने पश्चादावाहयेच्च तम्

niragrimatha vā bhūmiṃ yamaṃ rudrañca saṃsmaret / hutvā prādhānike sthāne paścādāvāhayecca tam

हिन्दी अर्थ

व्यक्तिके मर जानेपर विधिवत् पुत्र-पौत्रादिके द्वारा दानमें दी गयी एक लाख गायोंके बराबर होती है। तीर्थ एवं पात्रके समायोगसे यथाविधि एक ही गोदान कर दिया जाय तो वह अकेली गौ दाताको

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 25

श्रपयेच्चापरं वह्नौ मुद्गमिश्रं चरुं ततः ।तिलतण्डुलमिश्रञ्च द्वितीयं सपवित्रकम्

śrapayeccāparaṃ vahnau mudgamiśraṃ caruṃ tataḥ / tilataṇḍulamiśrañca dvitīyaṃ sapavitrakam

हिन्दी अर्थ

एक लाख गोदानका पुण्य प्रदान करती है ।

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 26

ॐ पृथिव्यै नमस्तुभ्यमिति चैकं निवेदयेत् ।ॐ यमाय नमश्चेति द्वितीयं तदनन्तरम्

oṃ pṛthivyai namastubhyamiti caikaṃ nivedayet / oṃ yamāya namaśceti dvitīyaṃ tadanantaram

हिन्दी अर्थ

» व्यञ्जनानि विचित्राणि भक्ष्यभोज्यानि यानि च । स्वहस्तेन प्रदत्तानि देहान्ते चाक्षयं फलम् ॥ गोभूहिरण्यवासांसि भोजनानि पदानि च। यत्र यत्र वसेजन्तुस्तत्रतत्रोपतिष्ठति॥ (१३॥ २०-२१)

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 27

ॐ नमश्चाथ रुद्राय श्माशानपतये नमः ।ततो दीप्ते समिद्धे ऽग्नौ भूमौ प्रकृतिदारुणे

oṃ namaścātha rudrāya śmāśānapataye namaḥ / tato dīpte samiddhe 'gnau bhūmau prakṛtidāruṇe

हिन्दी अर्थ

प्रेतकल्प और्ध्वहैहिक क्रिया, गोदान एवं वृषोत्सर्गका माहात्म्य ५११

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 28

सप्तभ्यो यमसंज्ञेभ्यो दद्यात्सप्त जलाञ्जलीन् ।यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च

saptabhyo yamasaṃjñebhyo dadyātsapta jalāñjalīn / yamāya dharmarājāya mṛtyave cāntakāya ca

हिन्दी अर्थ

हे खगराज ! सत्पात्रको दिया गया दान दिन- मनुष्यको सात पीढियोंके सहित वह दान जला दिन बढ्ता है । दाताके दिये हुए दानको यदि ज्ञानी देता है । अत: इस नश्वर जीवनमें समस्त और्ध्वहैहिक ग्रहण करता है तो उसे पाप नहीं लगता। विष और कर्म स्वयं सम्पन्न कर लेना चाहिए। पाथेयके शीतका अपहरण करनेवाले मन्त्र और अग्नि क्या रूपमें दिये गये दानादिको प्राप्त करके प्राणी उस

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 29

वैवस्वताय कालाय सर्वप्राणहराय च ।स्वधाकारनमस्कारप्रणवैः सह सप्तधा

vaivasvatāya kālāya sarvaprāṇaharāya ca / svadhākāranamaskārapraṇavaiḥ saha saptadhā

हिन्दी अर्थ

दोषभाजन होते हैं? अतः प्रतिदिन सत्पात्रको महाप्रयाणके मार्गमें सुखपूर्वक जाता है, अन्यथा विशेष उद्देश्योंकी पूर्तिके लिये दान देना चाहिए । पाथेयरहित जीवात्मा अनेक प्रकारका कष्ट झेलता अपने कल्याणकी इच्छा करनेवाले व्यक्तिको अपात्रको है । ऐसा जानकर मनुष्य विधिवत् वृषोत्सर्ग करे । कुछ भी नहीं देना चाहिए । यदि कदाचित् अपात्रके जो पुत्रहीन वृषोत्सर्ग किये बिना ही मर जाता है,

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 30

अमुकामुकगौत्रैतत्तुभ्यमस्तु तिलोदकम् ।प्रदद्याद्दश पिण्डांस्तु अर्घपुष्पसमन्वितान्

amukāmukagautraitattubhyamastu tilodakam / pradadyāddaśa piṇḍāṃstu arghapuṣpasamanvitān

हिन्दी अर्थ

लिये गौका दान दिया जाता है तो वह दाताको उसे मुक्ति नहीं प्राप्त होती है । अत: पुत्रविहीन नरकमें ले जाता है और अपात्र ग्रहीताको इक्कीस मनुष्य इस धर्मका पालन विधिवत् करे। ऐसा पीढियोंके सहित नरकमें ढकेल देता है। करनेसे यमके उस महापथमें वह सुखपूर्वक गमन

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 31

धूपो दीपो बलिर्गन्धः सर्वेषामस्तु चाक्षयः ।दश पिण्डांस्तु दान्दत्त्वा विष्णोः सौम्यं मुखं स्मरेत्

dhūpo dīpo balirgandhaḥ sarveṣāmastu cākṣayaḥ / daśa piṇḍāṃstu dāndattvā viṣṇoḥ saumyaṃ mukhaṃ smaret

हिन्दी अर्थ

हे खगेश! जिस प्रकारसे अपने हाथसे भूमिमें करता है । अग्निहोत्र, विभिन्न प्रकारके यज्ञ और निवेश किया गया धन मनुष्यके आवश्यकतानुसार दानादिसे प्राणीको वह सद्गति नहीं प्राप्त होती है, वह जब चाहे काममें आ सकता है, उसी प्रकार जो गति वृषोत्सर्गसे प्राप्त होती है । समस्त यज्ञोंमें अपने हाथसे किया गया दान भी देहान्तरमें प्राप्त वृषोत्सर्ग यज्ञ श्रेष्ठतम है, इसलिये प्रयास करके

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 32

कुर्याच्च मासिकं मासि सपिण्डीकरणं ततः ।आशौचान्ते ततः कुर्यादात्मनो वा मरस्य तु

kuryācca māsikaṃ māsi sapiṇḍīkaraṇaṃ tataḥ / āśaucānte tataḥ kuryādātmano vā marasya tu

हिन्दी अर्थ

होता है। निर्धन होनेके बाद भी अपुत्र व्यक्तिको मनुष्यको भलीभाँति वृषोत्सर्ग सम्पन्न करना चाहिए । मोक्षकी कामनासे अपनी और्ध्वहैहिक क्रिया अवश्य, गरुडने कहा--हे गोविन्द! आप मुझे क्षयाह कर लेनी चाहिए। थोडे धनसे भी अपने हाथसे की और और्ध्वहैहिक क्रियाके विषयमें उपदेश दें कि गयी अपनी और्ध्वहैहिक क्रिया उसी प्रकारसे इस क्रियाको किस काल, किस तिथि और किस

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

अध्याय २४७

श्लोक 33

कुर्यादस्थिरतां ज्ञात्वा शक्त्यारोग्यधनायुषम् ।एतत्ते सर्वमाख्यातं जीवच्छ्राद्धं मया खग

kuryādasthiratāṃ jñātvā śaktyārogyadhanāyuṣam / etatte sarvamākhyātaṃ jīvacchrāddhaṃ mayā khaga

हिन्दी अर्थ

अक्षय फल देनेवाली होती है, जिस प्रकार अग्निमें प्रकारकी विधिसे सम्पन्न करना चाहिए। इसको डाली हुई आज्याहुति। दान लेनेके योग्य व्यक्तिको करके मनुष्य क्या फल प्राप्त करता है, इसे भी आप ही शय्या, कन्या एवं गौका दान देना चाहिए और मुझे बतायें। है गोविन्द! आपकी कृपासे तो प्राणी यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दो शय्याएँ। मुक्त हो जाता है।

English

Om homage to Rudra, lord of cemetery. Then in the fire lit on the earth

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_garuDapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Garuda Purana — Chapter 247
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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