अध्याय २४६
श्लोक 1
इति श्रीगारुडे महापुराणे उत्तरखण्डे द्विदृ धदृप्रेतकल्पे श्रीकृष्णगरुडसंवादे वृषोत्सर्गमाहात्म्यनिरूपणं नाम षष्ठो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- ७ गरुड उवाच ।श्रुतं मे महादाख्यानं वृषोत्सर्गफलं हरे ।पुनरन्यां कथां ब्रूहि यत्र ते महिमाद्भुतः
iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe uttarakhaṇḍe dvidṛ dhadṛpretakalpe śrīkṛṣṇagaruḍasaṃvāde vṛṣotsargamāhātmyanirūpaṇaṃ nāma ṣaṣṭho 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 7 garuḍa uvāca / śrutaṃ me mahādākhyānaṃ vṛṣotsargaphalaṃ hare / punaranyāṃ kathāṃ brūhi yatra te mahimādbhutaḥ
हिन्दी अर्थ
है तथा वही अन्न गन्धर्व-योनिमें भोगरूपसे और संशय नहीं रखना चाहिए। अस्तु, इसे समझनेके पशुयोनिमें तृणरूपमें प्राप्त होता है । वही श्राद्धान्न लिये मैं तुम्हें दूसरा प्रापक बता रहा हूँ । अग्निष्वात्त नागयोनिमें वायुरूपसे, पक्षीकी योनिमें फलरूपसे आदि पितृगण उन पितरोंके राजपदपर नियुक्त हैं। और राक्षसयोनिमें आमिष बन जाता है। वहीसमय आनेपर विधिवत् प्रतिपादित अन्न, अभीष्ट
English
have liftard Ait fttory relatiig co die rite of Vnociargm. I wish to be eolighteDed &rther upon this topk:* for your knowledge ■ very grsat