Garuda Purana· Garuḍa Purāṇa
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अध्याय 251 / 317

Book 2 - Adhyaya 12

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अध्याय २५१

श्लोक 1

इति श्रीगारुडे महापुराणे उत्तरखण्डे द्वितीयांशे धर्मकाण्डे प्रेतकल्पे श्रीकृष्णगरुडसंवाहे ऊर्ध्वाधोगतिज्ञापकोत्क्रमणद्वारनिरूपणं नामैकादशो ऽध्य्याः श्रीगरुडमहापुराणम्- १२ श्रीकृष्ण उवाच ।एवं ते कथितस्तार्क्ष्य जीवितस्य विनर्णयः ।मानुषाणां हितार्थाय प्रेतत्वविनिवृत्तये

iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe uttarakhaṇḍe dvitīyāṃśe dharmakāṇḍe pretakalpe śrīkṛṣṇagaruḍasaṃvāhe ūrdhvādhogatijñāpakotkramaṇadvāranirūpaṇaṃ nāmaikādaśo 'dhyyāḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 12 śrīkṛṣṇa uvāca / evaṃ te kathitastārkṣya jīvitasya vinarṇayaḥ / mānuṣāṇāṃ hitārthāya pretatvavinivṛttaye

हिन्दी अर्थ

हैं ? इसे आप बतानेकी कृपा करें। श्रीकृष्णने कहा--हे पक्षिराज! जहाँ प्रेतगण निवास करते हैं, उसको तुम सुनो। छलसे पराये धन और परायी स्त्रीका अपहरण तथा द्रोहसे

English

O Garua I have thus explained to you the various proclivities of life for the beneiit of men and to ward off the stalemate in which the dead may find themselves.

अध्याय २५१

श्लोक 2

चतुरशीतिलक्षाणि चतुर्भेदाश्च जन्तवः ।अण्डजाः स्वेदजाश्चैव उद्भिज्जाश्च जारायुजाः

caturaśītilakṣāṇi caturbhedāśca jantavaḥ / aṇḍajāḥ svedajāścaiva udbhijjāśca jārāyujāḥ

हिन्दी अर्थ

मनुष्य निशाचर-योनिको प्राप्त होते हैं। जो लोग अपने पुत्रके हितचिन्तनमें ही अनुरक्त रहते हैं तथा सभी प्रकारका पाप करते हैं, वे शरीररहित होकर भूख-प्यासकी अथाह पीड़ाको सहन करते हुए

English

There are eight million four hundred thousand spec* ics of creatures divided into four main classes. They are (1} ardyas (born of egg), (2) soedias (sweaUborn like bugs, etc. (3) udhhijjas (born of seeds), (4) Jartyujas (the viviparous.)

अध्याय २५१

श्लोक 3

एकविंशतिलक्षाणि अण्डजाः परिकीर्तिताः ।स्वेदजाश्च तथा प्रोक्ता उद्भिज्जाश्च क्रमेण तु

ekaviṃśatilakṣāṇi aṇḍajāḥ parikīrtitāḥ / svedajāśca tathā proktā udbhijjāśca krameṇa tu

हिन्दी अर्थ

यत्र-तत्र भटकते रहते हैं। वे प्रेत चोरके समान उस महापथके लिये पितृभागमें दिये गये जलका अपहरण करते हैं। तदनन्तर पुनः अपने घरमें आकर वे मित्रके रूपमें प्रविष्ट हो जाते हैं और वहींपर रहते

English

The receptacle of the set of five sense-organs can be acquired through great merits. Mankind is divided into four vars—Brahmins, Ktriyas, Vaiiyas, Sodras and also Antyajas (the lowest class).

अध्याय २५१

श्लोक 4

जरायुजास्तथा प्रोक्ता मनुष्याद्यास्तथा परे ।सर्वेषामेव जन्तूनां मानुषत्वं हि दुर्लभम्

jarāyujāstathā proktā manuṣyādyāstathā pare / sarveṣāmeva jantūnāṃ mānuṣatvaṃ hi durlabham

हिन्दी अर्थ

हुए स्वयं रोग-शोक आदिकी पीड़ासे ग्रसित होकर सब कुछ देखते रहते हैं। वे एक दिनका अन्तराल देकर आनेवाले ज्वरका रूप धारण करके अपने सम्बन्धियोंको पीड़ा पहुँचाते हैं

English

The Antyajas are divided into seven groups Viz, ~ Washermen, Cobblen, Actors, Varudas Kawartas Bhidas and Bkillas.

अध्याय २५१

श्लोक 5

पञ्चेन्द्रियनिधानत्वं महापुण्यैरवाप्यते ।ब्राह्मणाः क्षत्त्रिया वैश्याः शूद्रास्तत्परजातयः

pañcendriyanidhānatvaṃ mahāpuṇyairavāpyate / brāhmaṇāḥ kṣattriyā vaiśyāḥ śūdrāstatparajātayaḥ

हिन्दी अर्थ

अथवा तिजरिया ज्वर बनकर और शीत-वातादिसे उन्हें कष्ट देते हैं। उच्छिष्ट अर्थात् जूठे अपवित्र स्थानोंमें निवास करते हुए उन प्रेतोंके द्वारा सहैव अभिलक्षित प्राणियोंको कष्ट देनेके लिये शिरोवेदना,

English

Addir the Mlecchas and Dumbas there are thirteen groups of people. The species of lower strata of animals are thouAnds*

अध्याय २५१

श्लोक 6

रजकश्चर्मकारश्च नटो बुरुड एव च ।कैवर्तमेदभिल्लाश्च सप्तैते ह्यन्त्यजाः स्मृताः

rajakaścarmakāraśca naṭo buruḍa eva ca / kaivartamedabhillāśca saptaite hyantyajāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

विषूचिका तथा नाना प्रकारके अन्य बहुत-से रोगोंका रूप धारण कर लिया जाता है। इस प्रकार वे दुष्कर्मी प्रेत नाना दोषोंमें प्रवृत्त होते हैं। गरुडने कहा--हे प्रभो! वे प्रेत किस रूपसे

English

Taking food, indulging in sexual intercourse* sleeping, fearing and becoming angry—these are found in all living beings. Here the distinction is impossible.

अध्याय २५१

श्लोक 7

म्लेच्छतुम्बविभेदेन जातिभेदास्त्वनेकशः ।जन्तूनामेव सर्वेषां जातिभेदाः सहस्रशः

mlecchatumbavibhedena jātibhedāstvanekaśaḥ / jantūnāmeva sarveṣāṃ jātibhedāḥ sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

किसका क्या करते हैं? किस विधिसे उनकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है? क्योंकि वे न कुछ कहते हैं, न बोलते हैं? है हृषीकेश! यदि आप मेरा कल्याण चाहते हों तो मेरै मनके इस

English

Bodies are of ten varieties in view of the divisi¬ ons such as single-footed, etc. Where the dtcr Kfpjosdra is found in plenty that rion is called DharmadeSa (the land of virtue)

अध्याय २५१

श्लोक 8

जन्तूनामेव सर्वेषां भेदाश्चैव सहस्रशः ।आहारो मैथुनं निद्रा भयं क्रोधस्तथैव च

jantūnāmeva sarveṣāṃ bhedāścaiva sahasraśaḥ / āhāro maithunaṃ nidrā bhayaṃ krodhastathaiva ca

हिन्दी अर्थ

अपने ही कुलको पीडित करता है, वह दूसरे कुलके व्यक्तिको तो कोई आपराधिक छिद्र प्राप्त होनेपर ही पीड़ा देता है । जीते हुए तो वह प्रेमीकी तरह दिखायी देता है, किंतु मृत्यु होनेपर वही दुष्ट

English

O Bird* the deities Brahmd and others, the sages and the Pitrs, virtue truthfulness and learning are always present in that land of virtue.

अध्याय २५१

श्लोक 9

सर्वेषा मेव जन्तूनां विवेको दुर्लभः परः ।एकपादादिरूपेण देहभेदास्त्वनेकशः

sarveṣā meva jantūnāṃ viveko durlabhaḥ paraḥ / ekapādādirūpeṇa dehabhedāstvanekaśaḥ

हिन्दी अर्थ

बन जाता है। जो भगवान् श्रीरुद्रके मन्त्रका जप करता है, धर्ममें अनुरक्त रहता है, देवता और अतिथिको पूजा करता है, सत्य तथा प्रिय बोलनेवाला है, उसको प्रेत पीड़ा नहीं दे पाते हैं । जो व्यक्ति

English

Among livir beings, the animals are the best; among the animals, the intelligent are the best; among the intelligent, men are the best and among men, the brahmins arc the best.

अध्याय २५१

श्लोक 10

कृष्णसारो मृगो यत्र धर्मदशः स उच्यते ।ब्रह्माद्या देवताः सर्वास्तत्र तिष्ठन्ति सर्वशः

kṛṣṇasāro mṛgo yatra dharmadaśaḥ sa ucyate / brahmādyā devatāḥ sarvāstatra tiṣṭhanti sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

सभी प्रकारकी धार्मिक क्रियाओंसे परिभ्रष्ट हो गया है, नास्तिक है, धर्मकी निन्दा करनेवाला है और सहैव असत्य बोलता है, उसीको प्रेत कष्ट पहुँचाते है । है तार्क्ष्य! कलिकालमें अपवित्र

English

Among the brahmins the scholara, among the scholars those who cultivate Vedtc studies, among them those who act according to the injunction and among them the Brahmavadins are the best.

अध्याय २५१

श्लोक 11

भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां मतिजीविनः ।मतिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः

bhūtānāṃ prāṇinaḥ śreṣṭhāḥ prāṇināṃ matijīvinaḥ / matimatsu narāḥ śreṣṭhā nareṣu brāhmaṇāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

क्रियाओको करनेवाला प्राणी प्रेतयोनिको प्राप्त होता है। है काश्यप! इस संसारमें उत्पन्न एक ही माता-पितासे पैदा हुए बहुत-से संतानोंमें एक सुखका उपभोग करता है, एक पाप कर्ममें अनुरक्त

English

A man who has hundred (silver pieces) craves for a thousand; a man who has a thousand, yearns for a lac; a person who has a lac, wishes to rule over a kingdom; a man who rules over a kingdom pines away to become an emperor.

अध्याय २५१

श्लोक 12

मानुष्यं यः समासाद्य स्वर्गमेक्षैकसाधकम् ।तयोर्न साधयेदेकं तेनात्मा वञ्चितो ध्रुवम्

mānuṣyaṃ yaḥ samāsādya svargamekṣaikasādhakam / tayorna sādhayedekaṃ tenātmā vañcito dhruvam

हिन्दी अर्थ

रहता है, एक संतानवान् होता है, एक प्रेतसे पीडित रहता है और एक पुत्र धनधान्यसे सम्पन्न रहता है, एकका पुत्र मर जाता है, एकके मात्र पुत्रियाँ ही होती हैं । प्रेतदोषके कारण बन्धु-

English

An emperor wishes to become a d€va (god) and on getting godhood he wishes to be the lord of gods. The lord of gods wishes to go still further and still bis thirst for power does not recede.

अध्याय २५१

श्लोक 13

इच्छति शती सहस्रं सहस्री लक्षमीहते कर्तुम् ।लक्षाधिपती राज्यं राजापि सकलां धरां लब्धुम्

icchati śatī sahasraṃ sahasrī lakṣamīhate kartum / lakṣādhipatī rājyaṃ rājāpi sakalāṃ dharāṃ labdhum

हिन्दी अर्थ

बान्धवोंके साथ विरोध होता है । प्रेतयोनिके प्रभावसे मनुष्यको संतान नहीं होती है । यदि संतान उत्पन्न भी होती है तो वह मर जाती है । प्रेतबाधाके कारण तो व्यक्ति पशुहीन और धनहीन हो जाता है।

English

A person afBicted by covetous thirst falls into hell. Those who are freed of undue thirst secure a residence iu heaven»

अध्याय २५१

श्लोक 14

चक्रधरो ऽपि सुरत्वं सुरभावे सकलसुरपतिर्भवितुम् ।सुरपतिरूर्ध्वगतित्वं तथापि ननिवर्तते तृष्णा

cakradharo 'pi suratvaṃ surabhāve sakalasurapatirbhavitum / surapatirūrdhvagatitvaṃ tathāpi nanivartate tṛṣṇā

हिन्दी अर्थ

उसके कुप्रभावसे उसकी प्रकृतिमें परिवर्तन आ जाता है, वह अपने बन्धु-बान्धवोंसे शत्रुता रखने लगता है। अचानक प्राणीको जो दुःख प्राप्त होता है, वह प्रेतबाधाके कारण होता है। नास्तिकता,

English

A man depending upon his own selfissureto be happy. The qualities of sound, touch, colour, taste and smell make one dependent on the objects of sense and hence one is sure to be unhappy.

अध्याय २५१

श्लोक 15

तृष्णया चाभिभूतस्तु नरकं प्रतिपद्यते ।तृष्णामुक्तास्तु ये केचित्स्वर्गवासं लभन्ति ते

tṛṣṇayā cābhibhūtastu narakaṃ pratipadyate / tṛṣṇāmuktāstu ye kecitsvargavāsaṃ labhanti te

हिन्दी अर्थ

व्यामोहको दूर कर दें। इस कलिकालमें प्राय: जीवन-वृत्तिकी समाप्ति, अत्यन्त लोभ तथा प्रतिदिन

English

The deer, the elephant, the moth, the honeybee and

अध्याय २५१

श्लोक 16

आत्माधीनः पुमांल्लोके सुखी भवति निश्चितम् ।शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च तद्गुणाः

ātmādhīnaḥ pumāṃlloke sukhī bhavati niścitam / śabdaḥ sparśaśca rūpaṃ ca raso gandhaśca tadguṇāḥ

हिन्दी अर्थ

बहुत-से लोग प्रेतयोनिको ही प्राप्त होते हैं।

English

ipoued antelope. The idea it found in M.S. II. 23.

अध्याय २५१

श्लोक 17

तथा च विषयाधीनो दुः खी भवति निश्चितम्

tathā ca viṣayādhīno duḥ khī bhavati niścitam

हिन्दी अर्थ

होनेवाले कलह--यह प्रेतसे पैदा होनेवाली पीड़ा

English

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अध्याय २५१

श्लोक 18

कुरङ्गमताङ्गपतङ्गभृङ्गमीना हताः पञ्चभिरेव पञ्च ।एकः प्रमादी स कथं न हन्यते यः सेवते पञ्चभिरेव पञ्च

kuraṅgamatāṅgapataṅgabhṛṅgamīnā hatāḥ pañcabhireva pañca / ekaḥ pramādī sa kathaṃ na hanyate yaḥ sevate pañcabhireva pañca

हिन्दी अर्थ

श्रीविष्णुने कहा-- है गरुड प्रेत होकर प्राणी है। जो पुरुष माता-पिताकी हत्या करता श्रीविष्णुने कहा- रड अत होकर प्राणी है। जो पुरुष माता-पिताकी हत्या करता है, जो

English

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अध्याय २५१

श्लोक 19

पितृमातृमयो बाल्ये यौवने दयितामयः ।पुत्रपौत्रमयश्चान्ते मूढो नात्ममयः क्वचित्

pitṛmātṛmayo bālye yauvane dayitāmayaḥ / putrapautramayaścānte mūḍho nātmamayaḥ kvacit

हिन्दी अर्थ

धर्मरतो देवतातिथिपूजक :। सत्यवाक् प्रियवादी च न प्रेतैः स हि पीड्यते ॥ नास्तिको धर्मनिन्दकः । असत्यवादनिरतो नरः प्रेतैः स 'पीड्यते ॥

English

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अध्याय २५१

श्लोक 20

लोहदारुमयैः पाशैः पुमान्बद्धो विमुच्यते ।पुत्रदारमयैः पाशैर्नैव बद्धो विमुच्यते

lohadārumayaiḥ pāśaiḥ pumānbaddho vimucyate / putradāramayaiḥ pāśairnaiva baddho vimucyate

हिन्दी अर्थ

प्रेतकल्प प्रेतबाधाका स्वरूप तथा मुक्तिके उपाय ५२७

English

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अध्याय २५१

श्लोक 21

एकः करोति पापानि फलं भुङ्क्ते महाजनः ।भोक्तारो विप्रयुज्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते

ekaḥ karoti pāpāni phalaṃ bhuṅkte mahājanaḥ / bhoktāro viprayujyante kartā doṣeṇa lipyate

हिन्दी अर्थ

दोष लगता है । यह पीड़ा प्रेतसे पैदा होती है। नित्य- बुद्धि--यह सब प्रेत-सम्भूत पीड़ा है। जहाँ पुष्प कर्मसे दूर, जप-होमसे रहित और पराये धनका और फल नहीं दिखायी देते तथा पत्नीका विरह होता अपहरण करनेवाला मनुष्य दुःखी रहता है, इन दुःखोंका है, वहाँ भी प्रेतोत्पन्न पीड़ा है । कारण भी प्रेतबाधा ही है। अच्छी वर्षा होनेपर भी जिन लोगोंमें सहैव उच्चाटनके अत्यधिक चिह्न

English

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अध्याय २५१

श्लोक 22

को ऽपि मृत्युं न जयति बालो वृद्धो युवापि वा ।सुखदुः खादिको वापि पुनरायाति याति च

ko 'pi mṛtyuṃ na jayati bālo vṛddho yuvāpi vā / sukhaduḥ khādiko vāpi punarāyāti yāti ca

हिन्दी अर्थ

कृषिका नाश होता है, व्यवहार नष्ट हो जाता है, दिखायी देते हैं, अपने क्षेत्रमै उसका तेज निष्फल हो समाजमें कलह उत्पन्न होता है, ये सभी कष्ट प्रेतबाधासे जाता है तो उसे प्रेतजनित बाधा ही माननी चाहिए । ही होते हैं। है पक्षिराज! मार्गमें चलते हुए पथिकको जो व्यक्ति सगोत्रीका विनाशक है, जो अपने ही जो बवंडरसे पीड़ा होती है, उसको भी तुम्हें प्रेतबाधा पुत्रको शत्रुके समान मार डालता है, जिसके अन्त:करणमें

English

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अध्याय २५१

श्लोक 23

सर्वेषां पश्यतामेव मृतः सर्वं परित्यजेत् ।एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते

sarveṣāṃ paśyatāmeva mṛtaḥ sarvaṃ parityajet / ekaḥ prajāyate jantureka eva pralīyate

हिन्दी अर्थ

समझना चाहिए। यह बात मैं सत्य ही कह रहा हूँ। प्रेम और सुखकी अनुभूतियोंका अभाव रहता है, वह प्राणी जो नीच जातिसे सम्बन्ध रखता है, हीन दोष उस प्राणीमें प्रेतबाधाके कारण होता है। पिताके कर्म करता है और अधर्ममें नित्य अनुरक्त रहता है, आदेशकी अवहेलना, अपनी पत्नीके साथ रहकर भी वह प्रेतसे उत्पन्न पीड़ा है। व्यसनोंसे द्रव्यका नाश सुखोपभोग न कर पाना, व्यग्रता और क्रूर बुद्धि भी

English

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अध्याय २५१

श्लोक 24

एको ऽपि भुङ्क्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम् ।मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमङ्क्षितौ

eko 'pi bhuṅkte sukṛtameka eva ca duṣkṛtam / mṛtaṃ śarīramutsṛjya kāṣṭhaloṣṭasamaṅkṣitau

हिन्दी अर्थ

हो जाता है, प्राप्तव्यका विनाश हो जाता है। चोर, प्रेतजन्य बाधाके कारण होती है। अग्नि और राजासे जो हानि होती है, यह प्रेतसम्भूत है ताक्ष्य! निषिद्ध कर्म, दुष्ट-संसर्ग तथा वृषोत्सर्गके पीड़ा है।शरीरमें महाभयंकर रोगकी उत्पत्ति, बालकोंकी न होने और अविधिपूर्वक की गयी और्ध्वहैहिक पीड़ा तथा पत्नीका पीड़ित होना--ये सब प्रेतबाधाजनित क्रियासे प्रेत होता है। अकालमृत्यु या दाह-संस्कारसे

English

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अध्याय २५१

श्लोक 25

बान्धवा विमुखा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ।गृहेष्वर्था निवर्तन्ते श्मशानान्मित्रबान्धवाः

bāndhavā vimukhā yānti dharmastamanugacchati / gṛheṣvarthā nivartante śmaśānānmitrabāndhavāḥ

हिन्दी अर्थ

हैं। वेद, स्मृति-पुराण एवं धर्मशास्त्रके नियमोंका वञ्चित होनेपर प्रेतयोनि प्राप्त होती है, जिससे प्राणीको पालन करनेवाले परिवारमें जन्म होनेपर भी धर्मके दुःख झेलना पड़ता है। है पक्षिराज! ऐसा जानकर प्रति प्राणीके अन्त:करणमें प्रेमका न होना प्रेतजनित मनुष्य प्रेत-मुक्तिका सम्यक् आचरण करे। जो व्यक्ति बाधा ही है। जो मनुष्य प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूपसे प्रेत योनियोंको नहीं मानता है, वह स्वयं प्रेतयोनिको

English

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अध्याय २५१

श्लोक 26

शरीरं वह्निरादत्ते सुकृतं दुष्कृतं व्रजेत् ।शरीरं वह्निना दग्धं पुण्यं पापं सह स्थितम्

śarīraṃ vahnirādatte sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ vrajet / śarīraṃ vahninā dagdhaṃ puṇyaṃ pāpaṃ saha sthitam

हिन्दी अर्थ

प्रेतोत्पनन पीड़ा है। अपनी जीविकाका अपहरण, उसके लिये इस संसारमें सुख नहीं है। प्रेतबाधा प्रतिष्ठा तथा वंशका विनाश भी प्रेतबाधाके अतिरिक्त होनेपर मनुष्यकी मति, प्रीति, रति, लक्ष्मी और अन्य प्रकारसे सम्भव नहीं है। स्त्रियोंका गर्भ विनष्ट बुद्धि--इन पाँचोंका विनाश होता है। तीसरी या हो जाता है, जिनमें रजोदर्शन नहीं होता और पाँचवीं पीढ़ीमें प्रेतबाधाग्रस्त कुलका विनाश हो

English

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अध्याय २५१

श्लोक 27

शुभं वा यदि वा पापं भुङ्क्ते सर्वत्र मानवः ।यदनस्तमिते सूर्ये न दत्तं धनमर्थिनाम्

śubhaṃ vā yadi vā pāpaṃ bhuṅkte sarvatra mānavaḥ / yadanastamite sūrye na dattaṃ dhanamarthinām

हिन्दी अर्थ

बालकोंकी मृत्यु हो जाती है, वहाँ प्रेतजन्य बाधा ही जाता है। ऐसे वंशका प्राणी जन्म-जन्मान्तर दरिद्र, समझनी चाहिए । जो मनुष्य शुद्ध भावसे सांवत्सरादिक निर्धन और पापकर्ममें अनुरक्त रहता है। विकृत मुख श्राद्ध नहीं करता है, वह भी प्रेतबाधा है। तीर्थमें तथा नेत्रवाले, क्रुद्ध स्वभाववाले, अपने गोत्र, पुत्र- जाकर दूसरेमें आसक्त हुआ प्राणी जब अपने सत्कर्मका पुत्री, पिता, भाई, भौजाई अथवा बहूको नहीं माननेवाले

English

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अध्याय २५१

श्लोक 28

न जाने तस्य तद्वित्तं प्रातः कस्य भविष्यति ।रारटीति धनं तस्य को मे भर्ता भविष्यति

na jāne tasya tadvittaṃ prātaḥ kasya bhaviṣyati / rāraṭīti dhanaṃ tasya ko me bhartā bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

परित्याग कर दे तथा धर्मकार्यमें स्वार्जित धनका लोग भी विधिवश प्रेत-शरीर धारण कर सदगतिसे उपयोग न करे तो उसको भी प्रेतजन्य पीड़ा ही रहित हो “बडा कष्ट है', यह चिल्लाते हुए अपने समझना चाहिए। भोजन करनेके समय कोपयुक्त पापको स्मरण करते हैं। (अध्याय २०)

English

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अध्याय २५१

श्लोक 29

न दत्तं द्विजमुख्येभ्यः परोपकृतये तथा ।पूर्वजन्मकृतात्पुण्याद्यल्लब्धं बहु चाल्पकम्

na dattaṃ dvijamukhyebhyaḥ paropakṛtaye tathā / pūrvajanmakṛtātpuṇyādyallabdhaṃ bahu cālpakam

हिन्दी अर्थ

प्रेतबाधाजन्य दीखनेवाले स्वप्न, उनके निराकरणके उपाय तथा नारायणबलिका विधान

English

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अध्याय २५१

श्लोक 30

तदीदृशं परिज्ञाय धर्मार्थे दीयते धनम् ।धनेन धार्यते धर्मः श्रद्धापूतेन चेतसा

tadīdṛśaṃ parijñāya dharmārthe dīyate dhanam / dhanena dhāryate dharmaḥ śraddhāpūtena cetasā

हिन्दी अर्थ

श्रीगरुडने कहा--हे भगवन्! प्रेत किस प्रकारसे

English

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अध्याय २५१

श्लोक 31

श्रद्धाविरहितो धर्मो नेहामुत्र च तत्फलम् ।धर्माच्च जायते ह्यर्थो धर्मात्कामो ऽपि जायते

śraddhāvirahito dharmo nehāmutra ca tatphalam / dharmācca jāyate hyartho dharmātkāmo 'pi jāyate

हिन्दी अर्थ

हे पक्षिन्! दान देना अत्यन्त श्रेयस्कर है, दान

English

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अध्याय २५१

श्लोक 32

धर्म एवापवर्गाय तस्माद्धर्मं समाचरेत् ।श्रद्धया साध्यते धर्मो बहुभिर्नार्थराशिभिः

dharma evāpavargāya tasmāddharmaṃ samācaret / śraddhayā sādhyate dharmo bahubhirnārtharāśibhiḥ

हिन्दी अर्थ

मुक्त होते हैं? जिनकी मुक्ति होनेपर मनुष्योंको देनेसे प्रेत मुक्त हो जाता है। जिसके उद्देश्यसे दान प्रेतजन्य पीड़ा पुनः नहीं होती। है देव! जिन दिया जाता है, उसको तथा स्वयंको वह दान तृप्त

English

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अध्याय २५१

श्लोक 33

अकिञ्चना हि मुनयः श्रद्धावन्तो दिवं गताः ।अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।असदित्युच्यते पक्षिन्प्रेत्य चेह न तत्फलम्

akiñcanā hi munayaḥ śraddhāvanto divaṃ gatāḥ / aśraddhayā hutaṃ dattaṃ tapastaptaṃ kṛtaṃ ca yat / asadityucyate pakṣinpretya ceha na tatphalam

हिन्दी अर्थ

लक्षणोंसे युक्त बाधाको आपने प्रेतजन्य कहा है, उनकी मुक्ति कब सम्भव है और क्या किया जाय कि प्राणीको प्रेतत्वकी प्राप्ति हो सके? प्रेतत्व कितने वर्षाका होता है? चिरकालसे प्रेतयोनिको

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_garuDapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Garuda Purana — Chapter 251
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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