Garuda Purana· Garuḍa Purāṇa
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अध्याय 255 / 317

Book 2 - Adhyaya 16

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अध्याय २५५

श्लोक 1

इति श्रीगारुडे महापुराणे उत्तरखण्डे द्वितीयांशे धर्मदृप्रेतकल्पे श्रीकृष्णगरुडसंवादे यमलोकविस्तारतन्माहात्म्यतद्याननिरूपणं नाम पञ्चदशो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- १६ श्रीभगवानुवाच ।एवं विलपतस्तस्य प्रेतस्यैवं खगेश्वर ।क्रन्दमानस्य नितरां पीडितस्य च किङ्करैः

iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe uttarakhaṇḍe dvitīyāṃśe dharmadṛpretakalpe śrīkṛṣṇagaruḍasaṃvāde yamalokavistāratanmāhātmyatadyānanirūpaṇaṃ nāma pañcadaśo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 16 śrībhagavānuvāca / evaṃ vilapatastasya pretasyaivaṃ khageśvara / krandamānasya nitarāṃ pīḍitasya ca kiṅkaraiḥ

हिन्दी अर्थ

हे खगेश्वर! गृहस्थके घरमें यदि किसीका मरण हुआ हो तो विवाह आदि शुभ कार्य नहीं करने चाहिए। जबतक सपिण्डीकरण नहीं हो जाता है तबतक भिक्षुक उस घरकी भिक्षाको

English

In that beautiful city there abides a group of depart* ed souls. The river Pufpabhadrd Sows there and a big fig tree grows up there.

अध्याय २५५

श्लोक 2

सप्तदश दिनान्येको वायुमार्गे विकृष्यते ।अष्टादशे त्वहोरात्रे पूर्वं याम्यपुरं व्रजेत्

saptadaśa dinānyeko vāyumārge vikṛṣyate / aṣṭādaśe tvahorātre pūrvaṃ yāmyapuraṃ vrajet

हिन्दी अर्थ

स्वीकार नहीं करता है। अपने गोत्रमें अशौच तबतक रहता है, जबतक पिण्डका मेलन नहीं हो जाता है पिण्डमेलन होनेपर ' प्रेत' शब्द निवृत्त हो जाता है। कुल-धर्म अनन्त हैं, पुरुषकी आयु

English

O traveller in this foreign world, do you not know th power of Yama who is the lord of us all—hts messengers. Assuredly, you have to travel over that path where there is no provision for barter in virtue or vice.

अध्याय २५५

श्लोक 3

तस्मिन्पुरवरे रम्ये प्रेतानां च गणो महान् ।पुष्पभद्रा नदी तत्रन्यग्रोधः प्रियदर्शनः

tasminpuravare ramye pretānāṃ ca gaṇo mahān / puṣpabhadrā nadī tatranyagrodhaḥ priyadarśanaḥ

हिन्दी अर्थ

क्षयशील है और शरीर नाशवान् है, इस कारण बारहवाँ दिन ही सपिण्डीकरण-कर्मके लिये प्रशस्त समय होता है। मृत व्यक्ति अग्निहोत्री रहा हो अथवा न रहा हो, उसका सपिण्डीकरण

English

Obird, hear attentively what the messengers of Yama speak to the departed soul. They strike him with the rod of iron.

अध्याय २५५

श्लोक 4

पुरे स तत्र विश्रामं प्राप्यते यमकिङ्करैः ।जायापुत्रादिकं सौख्यं स्मरेत्तत्र सुदुः खितः

pure sa tatra viśrāmaṃ prāpyate yamakiṅkaraiḥ / jāyāputrādikaṃ saukhyaṃ smarettatra suduḥ khitaḥ

हिन्दी अर्थ

द्वादशाहको ही कर देना चाहिए । तत्त्वद्रष्टा ऋषियोंने बारहवें दिन, तीसरे पक्षमें, छठे मासमें अथवा वर्ष पूर्ण होनेपर सपिण्डीकरणका विधान किया है।

English

Here, on the earth, whatever U given by hb sons every month, rice-ball, etc., due to aflcction or kindness, he eats the same and then he goes to Sauripara.

अध्याय २५५

श्लोक 5

रुदते करुणैर्वाक्यै स्तृषार्तः श्रमपीडितः ।स्वधनं स्वकलत्राणि गृहं पुत्राः सुखानि च

rudate karuṇairvākyai stṛṣārtaḥ śramapīḍitaḥ / svadhanaṃ svakalatrāṇi gṛhaṃ putrāḥ sukhāni ca

हिन्दी अर्थ

पुत्रवानका सपिण्डीकरणके बाद कभी भी एकोद्दिष्ट नहीं करना चाहिए। सपिण्डीकरणके पश्चात् जहाँ-जहाँ श्राद्ध किया जाय, पुत्रवान्का एकोद्दिष्ट कभी न किया जाय। वहाँ-वहाँ तीन-

English

He reaches Gandharva nagara (or Gandha-m&dana) in the third month. Here, he eats the quarterly rice-ball offered by the relations. Then he moves further.

अध्याय २५५

श्लोक 6

भृत्यमित्राणि चान्यच्च सर्वं शोचति वै तदा ।क्षुधार्तस्य पुरे तस्मिन्किङ्करैस्तस्य चोच्यते

bhṛtyamitrāṇi cānyacca sarvaṃ śocati vai tadā / kṣudhārtasya pure tasminkiṅkaraistasya cocyate

हिन्दी अर्थ

प्रेतकल्प सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व ५४९

English

He reaches the city SaiUgama in the fourth month. The stones rain upon him continuously, O lord.

अध्याय २५५

श्लोक 7

किङ्करा ऊचुः ।क्व धनं क्व सुता जाया क्व गृहं क्व त्वमीदृशः ।स्वकर्मोपार्जितं भुङ्क्ष्व चिरं गच्छ महापथे

kiṅkarā ūcuḥ / kva dhanaṃ kva sutā jāyā kva gṛhaṃ kva tvamīdṛśaḥ / svakarmopārjitaṃ bhuṅkṣva ciraṃ gaccha mahāpathe

हिन्दी अर्थ

तीन श्राद्ध (पार्वण श्राद्ध) करने आवश्यक हें, कहा है कि-यदि सहोदर भाइयोंमेंसे एक भी भाई अन्यथा कर्ता पितृघातक कहलाता है। अशक्त पुत्रवान् हो जाय तो उसी पुत्रसे अन्य सभी होनेपर भी पार्वण श्राद्ध करना चाहिए। ऐसा भाई पुत्रवान् हो जाते हैं। यदि सभी भाई पुत्रहीन मुनियोंने कहा है। यदि दिन और मास न ज्ञात हो हैं तो उनका सपिण्डीकरण उनकी पत्नीको करना

English

There he eats the fourth monthly oblation and feels satisfied.

अध्याय २५५

श्लोक 8

जानासि शंबलवशं बलमध्वगानां नो शंबलः प्रयतते परलोकपान्थ ।गन्तव्यमस्ति तव निश्चितमेव तेन मार्गेण यत्र भवतः क्रयविक्रयौ न

jānāsi śaṃbalavaśaṃ balamadhvagānāṃ no śaṃbalaḥ prayatate paralokapāntha / gantavyamasti tava niścitameva tena mārgeṇa yatra bhavataḥ krayavikrayau na

हिन्दी अर्थ

तो उनका पार्वण श्राद्ध ही करना उचित है। चाहिए अथवा वह पत्नी स्वयं न करके ऋत्विजूसे पितरोंके साथ वह पिता इस लोकमें पुत्रके द्वारा या पुरोहितसे कराये। दिये गये दानका फल तबतक नहीं प्राप्त करता, चूडाकरण एवं उपनयन-संस्कारसे संस्कृत पुत्र जबतक उसके शरीरकी उत्पत्ति पुनः दशगात्रके पिताके श्राद्धको करे। जिस पुत्रका उपनयन-

English

In the fifth month, he goes to Krurapura. There he eats the rice ball offered by his relatives. In the sixth month he reaches the Krauftcapura.

अध्याय २५५

श्लोक 9

यमदूतोदितं वाक्यं पक्षिन्नैवं त्वया श्रुतम् ।एवमुक्तस्ततः सर्वैर्हन्यमानः स मुद्गरैः

yamadūtoditaṃ vākyaṃ pakṣinnaivaṃ tvayā śrutam / evamuktastataḥ sarvairhanyamānaḥ sa mudgaraiḥ

हिन्दी अर्थ

पिण्डसे नहीं हो जाती। ऐसी स्थितिमें पुत्रद्वारा संस्कार नहीं हुआ है केवल चूडाकरण-संस्कार किये गये इन्हीं सोलह श्राद्धोंसे प्रेत यमपाशके हुआ है वह श्राद्धमें स्वधाका उच्चारण तो कर बन्धनसे मुक्त होता है। पुत्ररहित पुरुषका सपिण्डीकरण सकता है पर वेदमन्त्रका उच्चारण नहीं कर नहीं करना चाहिए पतिके जीवित रहनेपर स्त्रीका सकता। स्त्रीका सपिण्डीकरण उसके पति, ससुर

English

There he feeds upon the rice-ball offered by his relatives in the sixth month. He takes rest for a while but all the time he remains frightened and distressed.

अध्याय २५५

श्लोक 10

अत्र दत्तं सुतैः पात्रे (त्रैः) स्नेहाद्वा कृपयाथ वा ।मासिकं पिण्डमश्राति ततः सौरिपुरं व्रजेत्

atra dattaṃ sutaiḥ pātre (traiḥ) snehādvā kṛpayātha vā / māsikaṃ piṇḍamaśrāti tataḥ sauripuraṃ vrajet

हिन्दी अर्थ

भी सपिण्डन नहीं होना चाहिए। तथा परश्वशुरके साथ करना चाहिए। स्त्री-जातिका जिस कन्याका विवाह ब्राह्मादि-विवाह-विधिसे यह कर्म भतीजा तथा सहोदर छोटा भाई भी कर हुआ है, उसकी पिण्डोदक-क्रियाएँ पतिके गोत्रसे सकता है । संवत्सरपूर्ण होनेके पहले अथवा वर्षके करनी चाहिए। आसुरादि-विधिसे जिसका विवाह पूर्ण होनेपर दूसरे वर्षके संधिकालमें जिन प्रेतोंका

English

He passes over that town being struck and dragged by the messengers of Yama. He reaches Citranagara where rules King Vicitra.

अध्याय २५५

श्लोक 11

तत्र नाम्ना तु राजा वै जङ्गमः कालरूपधृक् ।तं दृष्ट्वा भयभीतस्तु विश्रामे कुरुते मतिम्

tatra nāmnā tu rājā vai jaṅgamaḥ kālarūpadhṛk / taṃ dṛṣṭvā bhayabhītastu viśrāme kurute matim

हिन्दी अर्थ

हुआ है, उसकी पिण्डोदक-क्रिया पिताके गोत्रसे सपिण्डीकरण होता है, उनकी क्रिया पृथक् नहीं की करनी चाहिए। पिताका सपिण्डीकरण सहैव पुत्र जाती। है वत्स! सपिण्डीकरण हो जानेके पश्चात् करे। यदि पुत्र नहीं है तो स्वयं उसकी पत्नी उस पृथक् क्रिया करना निन्दनीय माना गया है। जो क्रियाका निर्वाह करे। उसके भी न रहनेपर सहोदर व्यक्ति अपने पिताको पृथक् पिण्डदान देता है, वह

English

*Do my sons, brothers, parents or relatives exist who may take me out of the ocean of distress wherein I have fallen.*'-

अध्याय २५५

श्लोक 12

उदकं चान्नसंयुक्तं भुङ्क्ते तस्मिन्पुरे गतः ।त्रैपक्षिके तु यद्दत्तं तत्पुरं स व्यतिक्रमेत्

udakaṃ cānnasaṃyuktaṃ bhuṅkte tasminpure gataḥ / traipakṣike tu yaddattaṃ tatpuraṃ sa vyatikramet

हिन्दी अर्थ

भाई, भाईका पुत्र अथवा शिष्य सपिण्डीकरण'कर पितृहन्ता होता है। सपिण्डीकरणके बाद पृथक् श्राद्ध सकता है। सपिण्डीकरण करके वह नान्दीमुख उचित नहीं है। यदि कोई पृथक् पिण्डदान करता है श्राद्ध करे। है खग! पुत्र न रहनेपर ज्येष्ठ भाईकातो वह पुनः सपिण्डीकरण करे। जो मनुष्य सपिण्डीकरण कनिष्ठ भाई करे। उसके अभावमें सपिण्डीकरण करके एकोद्दिष्ट श्राद्ध करता है, वह

English

The gift of Vaitaraoi cow destroys his sins and takes him to the region of Visnu. O best of birds, if the Vaitaranl cow is not giftedi the departed soul is drowned in that stream.

अध्याय २५५

श्लोक 13

नगेन्द्रनगरे रम्ये प्रेतो याति दिवानिशम् ।गच्छन्वनानि रौद्राणि दृष्ट्वा क्रन्दति तत्र सः

nagendranagare ramye preto yāti divāniśam / gacchanvanāni raudrāṇi dṛṣṭvā krandati tatra saḥ

हिन्दी अर्थ

भतीजा या पत्नी उस कर्मको सम्पन्न करे। मनुने स्वयंको तथा प्रेतको यमराजके अधीन कर देता है।

English

The messengers of Yama strike him again. He repeats those words but in silence this time.

अध्याय २५५

श्लोक 14

भीषणैः क्लिश्यमानस्तु रुदते च पुनः पुनः ।मासद्वयावसाने तु तत्पुरं सो ऽतिगच्छति

bhīṣaṇaiḥ kliśyamānastu rudate ca punaḥ punaḥ / māsadvayāvasāne tu tatpuraṃ so 'tigacchati

हिन्दी अर्थ

१-(क) यहाँपर ऊनमासिक आदि तथा सांवत्सरिक मृत्यु-तिथि आदि श्राद्ध एकोद्दिष्ट श्राद्धके स्थानपर पार्वण श्राद्धकी विधि कात्यायनके मतसे लिखी गयी है। जो कुछ प्रदेशोंमें भी प्रचलित है । परंतु सामान्यतया ऊनमासिक सांवत्सरिकादि श्राद्धमे शौनकके मतानुसार एकोद्दिष्ट-विधिसे ही श्राद्ध किया जाता है।

English

He eats the sixth monthly offering made by the relatives and proceeds further. O Garuda, the gift of food to the pious brahmins gives relief to the donor in distress.

अध्याय २५५

श्लोक 15

भुक्त्वा चान्नं जलं पीत्वा यद्दत्तं वान्धवैरिह ।क्लिश्यमानस्ततः पाशैर्नोयते यमकिङ्करैः

bhuktvā cānnaṃ jalaṃ pītvā yaddattaṃ vāndhavairiha / kliśyamānastataḥ pāśairnoyate yamakiṅkaraiḥ

हिन्दी अर्थ

(ख) सपिण्डीकरणं कृत्वा गयां गत्वा च धर्म॑वित्। एकोद्दिष्टं न कुर्वीत साग्निर्वा नाग्निमानपि॥ (दिवोदासप्रकाश) २-उपर्युक्त श्लोकोंमें ' अपुत्रस्य’ यह वाक्य 'पुत्रोत्पादन' की विधिको प्रशंसामें पर्यवसित है । इसका तात्पर्य अपुत्रवान् पुरुषके सपिण्डन-निषेधमें नहीं है। अन्यथा

English

O bird, the departed soul covers two hundred and forty seven Yojanas every day. Thereafter he is completely exhausted.

अध्याय २५५

श्लोक 16

तृतीये मासि सम्प्राप्ते गन्धर्वनगरं शुभम् ।तृतीयं मासिकं भुक्त्वा तत्र गच्छत्यसौ पुरः

tṛtīye māsi samprāpte gandharvanagaraṃ śubham / tṛtīyaṃ māsikaṃ bhuktvā tatra gacchatyasau puraḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्राभावे स्वयं कुर्युः स्वभर्तृणाममन्त्रकम् । सपिण्डीकरणं तत्र ततः पार्वणमन्वहम्॥ ( श्राद्धकल्पलता पृष्ठ २४३)

English

In the seventh month he reaches the city Bahvapada. He eats the rice-ball offered by his relatives.

अध्याय २५५

श्लोक 17

शैलागमं चतुर्थे स मासे प्राप्नोति वै पुरम् ।पाषाणास्तत्र वर्षन्ति प्रेतस्योपरि संस्थिताः

śailāgamaṃ caturthe sa māse prāpnoti vai puram / pāṣāṇāstatra varṣanti pretasyopari saṃsthitāḥ

हिन्दी अर्थ

--इन वाक्योंका विरोध हो जायगा। अतः यथाविधि योग्य पुत्र उत्पन्न करनेका प्रयत्न अवश्य करना चाहिए।

English

In the dghth month he reaches Nanakrandapura* There he sees people crying bitterly aloud.

अध्याय २५५

श्लोक 18

चतुर्थमासिके श्राद्धं भुक्ते तत्र सुखी भवेत्

caturthamāsike śrāddhaṃ bhukte tatra sukhī bhavet

हिन्दी अर्थ

३-भ्रातृणामेकजातानामेकश्चेत् पुत्रवान् भवेत् । सर्वे ते तेन पुत्रेण पुत्रिणो मनुरग्रवीत्॥ (२६।२६)

English

Himself in utter distress, he cries in pain. He cats the eighth-monthly rice-ball and feels cmifortable.

अध्याय २५५

श्लोक 19

ततो याति पुरं प्रेतः क्रूरं मासे तु पञ्चमे ।इह दत्तं सुतैर्भुङ्क्ते प्रेतो वै तत्पुरे स्थितः ।षष्ठे मासि ततः प्रेतो याति क्रौञ्चाबिधं पुरम्

tato yāti puraṃ pretaḥ krūraṃ māse tu pañcame / iha dattaṃ sutairbhuṅkte preto vai tatpure sthitaḥ / ṣaṣṭhe māsi tataḥ preto yāti krauñcābidhaṃ puram

हिन्दी अर्थ

हे पक्षिन्! वर्षपर्यन्त प्रेतसे सम्बन्धित जो भी चाहिए, किंतु क्षय-तिथिमें पुत्रको उसका श्राद्ध क्रिया की जाय उसके नाम और गोत्रके सहित पृथकू-रूपमें करना चाहिए । यदि पति-पत्नी पुत्ररहित विद्वान् व्यक्ति करे। सपिण्डीकरण कर देनेपर हैं और वे दोनों एक ही दिन मर जाते हैं तथा भोजन और घटादिका दान, पददान तथा अन्य जो उनका दाह-संस्कार एक ही चितापर होता है तो

English

He, then, leaves for Taptapura. Having reached Taptapura in the ninth month he eats the rice-ball and the SrSidhd which his son or relatives have gifted in his favour.

अध्याय २५५

श्लोक 20

तत्र दत्तेन पिण्डेन श्राद्धेनाप्यायितः पुरे ।मुहूर्तार्धं तु विश्रम्य कम्पमानः सुदुः खितः

tatra dattena piṇḍena śrāddhenāpyāyitaḥ pure / muhūrtārdhaṃ tu viśramya kampamānaḥ suduḥ khitaḥ

हिन्दी अर्थ

दान हैं उन्हें एकको (मृत व्यक्तिको) ही उद्देश्य उन दोनोंके श्राद्धोंको पृथक्-पृथक् करना चाहिए, करके देना चाहिए। वर्षभरके लिये अन्न और किंतु पत्नीका सपिण्डीकरण पतिके साथ ही जलपूर्ण घटादिकी संख्याका निर्धारण करके ब्राह्मणको होगा। यदि पतिके साथ पत्नीका पिण्डदान पृथक्- प्रदान करे। पिण्डदान देनेके पश्चात् यथाशक्ति पृथक् होता है तो उस पिण्डदानसे वह दम्पति

English

In the tenth month he reaches Raudrapura. He eats whatever his son or relatives give in his favour.

अध्याय २५५

श्लोक 21

तत्पुरं स व्यतिक्रम्य तर्जितो यमकिङ्करैः ।प्रयाति चित्रनगरं विचित्रो यत्र पार्थिवः

tatpuraṃ sa vyatikramya tarjito yamakiṅkaraiḥ / prayāti citranagaraṃ vicitro yatra pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

वर्षभरके लिये उपयोगी समस्त सामग्री दानमें दे। पापलिप्त नहीं होता, यह मेरा सत्य वचन है। यदि ऐसा होनेपर मृत व्यक्ति दिव्य देह धारण करके पति-पत्नी दोनोंका एक ही चितापर दाह संस्कार विमानद्वारा सुखपूर्वक यमलोक चला जाता है। होता है तो उन दोनोंके लिये पाक एक ही साथ पिताके जीवित रहनेके कारण मृत पुत्रका बनाया जाय, किंतु पिण्डदान पृथक्-पृथक् होना

English

VaiianS: Name of m river in bell.

अध्याय २५५

श्लोक 22

यमस्यैवानुजः सौरिर्यत्र राज्यं प्रशास्ति हि ।मासैस्तु पञ्चभिः सार्धैरूपषाण्मासिकं भवेत्

yamasyaivānujaḥ sauriryatra rājyaṃ praśāsti hi / māsaistu pañcabhiḥ sārdhairūpaṣāṇmāsikaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

पिताके साथ सपिण्डीकरण नहीं हो सकता अर्थात् चाहिए। एकादशाहको वृषोत्सर्ग, षोडश प्रेतश्राद्ध, उसका सपिण्डीकरण पितामह आदिके साथ होगा घटादि-दान, पददान और जो महादान हैं उन्हे ऐसे ही पतिके जीवित होनेपर स्त्रियोंका सपिण्डीकरण पति-पत्नीका वर्षपर्यन्त पृथक्-पृथक् ही करना उसकी श्वश्रू आदिके साथ होगा। पतिकी मृत्यु हो चाहिए। ऐसा करनेसे प्रेतको चिरकालीन संतृपि

English

A little before a year has passed or at the end of eleven and a half month he reaches a Sitapmra—city of extreme cold and distress.

अध्याय २५५

श्लोक 23

ऊनषाण्मासिकं तत्र भुङ्क्ते याम्यसमाहतः ।मार्गे पुनः पुनस्तस्य बुभुक्षा पीडयत्यलम्

ūnaṣāṇmāsikaṃ tatra bhuṅkte yāmyasamāhataḥ / mārge punaḥ punastasya bubhukṣā pīḍayatyalam

हिन्दी अर्थ

जानेके बाद चौथे दिन जो पतित्रता स्त्री अपने प्राप्त होती है। शरीरको अग्निमें समर्पित कर देती है, उसका एक गोत्रसे सम्बन्धित एक साथ मरे हुए स्त्री वृषोत्सर्गादि कर्म पतिकी क्रियाके ही दिन करना अथवा पुरुषसे सम्बद्ध-कृत्यमें आहुतिकी वेदी चाहिए पुत्रिका पुत्रोत्पत्तिके पूर्व पतिके गोत्रवाली एक ही होनी चाहिए। किंतु होम पृथक्-पृथक्

English

Tormented by cold and hunger be looks in all

अध्याय २५५

श्लोक 24

सन्तिष्ठते मृते को ऽपि मदीयः सुतबान्धवः ।सौख्यं यो मे जनयति पततः शोकसागरे

santiṣṭhate mṛte ko 'pi madīyaḥ sutabāndhavaḥ / saukhyaṃ yo me janayati patataḥ śokasāgare

हिन्दी अर्थ

होती है। पुत्रोत्पत्तिक बाद वह पुनः पिताके गोत्रमें होना चाहिए। पति एवं पत्नीका एक साथ मरण आ जाती है। पुत्रिका उस कन्याको कहते हैं, जिस होनेपर उनका एकादशाहका श्राद्ध एवं उनके कन्याका पिता विवाहके समय जामातासे यह तय निमित्त पिण्डदान, भोजन आदि पृथक्-पृथक् कर लेता है कि इस कन्यासे जो पुत्र पैदा होगा होगा, पर पाककी व्यवस्था एक ही होगी--यह

English

The attendants of Yama speak to him thus: **Where is thy holy merit that it may give relief to thee.'* On hearing their words he cries: 'O my fate.'

अध्याय २५५

श्लोक 25

एवं मार्गे विलपति वार्यमाणश्च किङ्करैः ।आयान्ति संमुखास्तत्र कैवर्तास्तु सहस्रशः

evaṃ mārge vilapati vāryamāṇaśca kiṅkaraiḥ / āyānti saṃmukhāstatra kaivartāstu sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

वह मेरा पुत्र होगा। यदि स्त्री अपने पतिके साथ विधान केवल पति-पत्नीके एक साथ मरणमें ही अग्निमे आरोहण करती है तो उसकी उसके है अन्य किसीके मरणमें ऐसा विधान गर्हित है। पतिके साथ समस्त और्ध्वहैहिक क्रिया करनी पुत्र माता-पिताके लिये एक ही पाकसे यथाविधान

English

At the distance of forty four Yojanas from Sitapura, there is a beautiful city of Dharmaraja (Yama) where live the celestial musicians and the heavenly nymphs.

अध्याय २५५

श्लोक 26

वयं ते तर्तुकामाय महावैतरणीं नदीम् ।शतयोजनविस्तीर्णां पूयशोणितसंकुलाम्

vayaṃ te tartukāmāya mahāvaitaraṇīṃ nadīm / śatayojanavistīrṇāṃ pūyaśoṇitasaṃkulām

हिन्दी अर्थ

पिण्डान्ते तस्य सकला वर्षवृत्तिः स्वशक्तितः। दिव्यदेहो विमानस्थः सुखं याति यमालयम् ॥ (२६। ३५-३६)

English

There live eighty four lacs of people in human and divine forms. The guards are put at the thirteen gates of the city.

अध्याय २५५

श्लोक 27

नानाझषसमाकीर्णां नानापक्षिगणैर्वृताम् ।वयं त्वां तारयिष्यामः सुखेनेति वदन्ति ते

nānājhaṣasamākīrṇāṃ nānāpakṣigaṇairvṛtām / vayaṃ tvāṃ tārayiṣyāmaḥ sukheneti vadanti te

हिन्दी अर्थ

२-पिताके जीवित रहनेपर पुत्रके मर जानेसे पुत्रका सपिण्डीकरण पिताके साथ न करके पितामहके साथ करनेका विधान है इसी प्रकार पतिके जीवित रहनेपर मृत पत्नीका पतिके साथ सपिण्डीकरण न करके उसके श्वश्रू परश्चश्रू और वृद्ध परश्चश्रू (सास, परसास, वृद्धघपरसास)-के साथ सपिण्डीकरण करना चाहिए इसके समर्थनमें ये वाक्य द्रष्टव्य हैं-

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 28

अन्तरं देहि भो पान्थ बहुला चेद्रुचिस्तव ।तेन तत्र प्रदत्ता गौस्तया नावा प्रसर्पति ।मनुजानां हितं दानमन्ते वैतरणी स्मृता

antaraṃ dehi bho pāntha bahulā cedrucistava / tena tatra pradattā gaustayā nāvā prasarpati / manujānāṃ hitaṃ dānamante vaitaraṇī smṛtā

हिन्दी अर्थ

अपुत्रायां मृतायां तु पतिः कुर्यात् सपिण्डनम् । श्वश्वादिभिःसहैवास्याःसपिण्डीकरणं भवेत्॥ (पैठीनसि)

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 29

परापापं दहेत्सर्वं विष्णुलोकं च सा नयेत् ।न दत्ता चेत्खगश्रेष्ठ तां समेत्य समज्जति

parāpāpaṃ dahetsarvaṃ viṣṇulokaṃ ca sā nayet / na dattā cetkhagaśreṣṭha tāṃ sametya samajjati

हिन्दी अर्थ

अपुत्रायां मृतायां तु पतिः कुर्यात् सपिण्डनम्। श्रश्रूमात्रादिभि: सार्धमेव धर्मेण युज्यते॥ (व्यास)

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 30

स्वस्थावस्थे शरीरे ऽत्र वैतरण्या व्रतं चरेत् ।देया च विदुषे धेनुस्तां नदीं तर्तुमिच्छता

svasthāvasthe śarīre 'tra vaitaraṇyā vrataṃ caret / deyā ca viduṣe dhenustāṃ nadīṃ tartumicchatā

हिन्दी अर्थ

प्रेतकल्प सपिण्डीकरण श्राद्धका महत्त्व ५४३

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 31

अवदन्मज्जमानस्तु निन्दत्यात्मानमात्मना ।पाथेयार्थं मया किञ्चिन्न प्रदत्तं द्विजायच

avadanmajjamānastu nindatyātmānamātmanā / pātheyārthaṃ mayā kiñcinna pradattaṃ dvijāyaca

हिन्दी अर्थ

श्राद्ध करता है । विकिरान्नदान एक और पिण्डदान जाती है, वह अन्य जन्मोंमें चमगादड़ी, छिपकली, पृथक्-पृथक् करने चाहिए। इसी विधिका पालन गोहनी अथवा द्विमुखी सर्पिणी होती है। अतः तीर्थ, पितृपक्ष अथवा चन्द्र और सूर्य-ग्रहणके स्त्रीको मन-वाणी और कर्म--इन सभीके द्वारा अवसरमे भी होना चाहिए। प्रयलपूर्वक अपने मृत या जीवित पतिकी सेवा करनी

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 32

न दत्तं न हुतं जप्तं न स्नातं न कृतं स्तुतम् ।यादृशं कर्म चरितं मूढ भुङ्क्ष्वेति तादृशम्

na dattaṃ na hutaṃ japtaṃ na snātaṃ na kṛtaṃ stutam / yādṛśaṃ karma caritaṃ mūḍha bhuṅkṣveti tādṛśam

हिन्दी अर्थ

जब स्त्री अपने मृत पतिके साथ अग्निमें जलती चाहिए। पतिके जीवित रहते हुए अथवा उसके है तो अग्नि उसके शरीरको अवश्य जला देती है, किंतु मरनेपर जो स्त्री व्यभिचार करती है, वह अनेक आत्माको कष्ट नहीं दे पाती है, जिस प्रकार अग्निमें जन्मोंतक वैधव्य जीवन प्राप्त करती है और दुर्भाग्य प्रज्वलित धातुओंका मात्र मल ही जलता है, उसी प्रकार उसका साथ नहीं छोड्ता। देवता और पितरोंको

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 33

तदैव हृदि संमूढस्ताडितो भाषते भटैः ।वैतरण्याः परतटे भुङ्क्ते दत्तं घटादिकम्

tadaiva hṛdi saṃmūḍhastāḍito bhāṣate bhaṭaiḥ / vaitaraṇyāḥ parataṭe bhuṅkte dattaṃ ghaṭādikam

हिन्दी अर्थ

अमृतके समान अमिनिमें प्रविष्ट हुई नारीका शरीर दग्ध श्रद्धापूर्वक जो कुछ दिया जाता है, उसका समग्र फल होता है। पुरुष शुद्ध होकर दिव्य देहधारी हो जाता है, उसे पतिकी पूजा करनेसे ही प्राप्त हो जाता है, इसलिये जिसके कारण वह खौलते हुए तेल, दहकते हुए लौह स्त्रीको पतिको ही पूजा करनी चाहिए । तथा अग्निसे कदापि नहीं जलता, इसी प्रकार पतिके है पक्षिश्रेष्ठ ! पातिव्रत्यधर्मरूप सत्कर्मका पालन

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 34

ऊनषाण्मासिकश्राद्धं भुक्त्वा गच्छति चाग्रतः ।तार्क्ष्य तत्र विशेषेण भोजयीत द्विजाञ्छुभान्

ūnaṣāṇmāsikaśrāddhaṃ bhuktvā gacchati cāgrataḥ / tārkṣya tatra viśeṣeṇa bhojayīta dvijāñchubhān

हिन्दी अर्थ

साथ चितामें जली हुई स्त्रीको कभी जला हुआ नहीं करनेपर स्त्री चिरकालतक पतिलोकमें निवास करती मानना चाहिए; क्योंकि उसकी अन्तरात्मा मरे हुए है। जबतक सूर्य और चन्द्र विद्यमान हैं, तबतक वह पतिकी अन्तरात्मासे मिलकर एक हो जाती है। ।स्वर्गमेँ देवतुल्य बनी रहती है । उसके बाद दीर्घायु

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 35

चत्वारिंशत्तथा सप्त योजनानि शतद्वयम् ।प्रयाति प्रत्यहं तार्क्ष्य अहोरात्रेण कर्शितः

catvāriṃśattathā sapta yojanāni śatadvayam / prayāti pratyahaṃ tārkṣya ahorātreṇa karśitaḥ

हिन्दी अर्थ

यदि स्त्री पतिका साथ छोड़ करके अन्यत्र अपने प्राप्त करके इस लोकमें वैभवशाली कुलमें जन्म लेती प्राणोंका परित्याग करती है तो वह पतिलोकमें है तथा कभी भी पति-वियोगका दुःख नहीं झेलती। तबतक नहीं पहुँच पाती, जबतक प्रलय नहीं हो है खगराज! मैंने यह सब तुम्हें बता दिया । जाता। धन-दौलतसे युक्त माता-पिताको छोड़कर जो अब मृत प्राणीको सुख प्रदान करनेवाले विशेष

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 36

सप्तमे मासि सम्प्राप्ते पुरं बह्वापदं व्रजेत् ।तत्र भुक्त्व प्रदत्तं यच्छ्राद्धं सप्तममासिकम्

saptame māsi samprāpte puraṃ bahvāpadaṃ vrajet / tatra bhuktva pradattaṃ yacchrāddhaṃ saptamamāsikam

हिन्दी अर्थ

स्त्री अपने मरे हुए पतिका अनुगमन करती है, वह कर्मको बताऊँगा। मृत्युके बाद द्वादशाहके दिन चिरकालतक सुखोपभोग करती है। वह पतिसंयुक्ता यथाविधि सपिण्डनादि समस्त कार्य करके वर्षपर्यन्त नारी उस स्वर्गमें साढे तीन करोड़ दिव्य वर्षोतक प्रतिदिन जलपूर्ण घट और अन्नका दान एवं नक्षत्रोके साथ स्वर्गमें रहकर अन्तमें महती प्रीति प्राप्त मासिक श्राद्ध करना चाहिए । है पक्षिन्! प्रेतकार्यको

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 37

अष्टमे मासि सम्प्राप्ते नानाक्रन्दपुरं व्रजेत् ।नानाक्रन्दगणान्दृष्ट्वा क्रन्दमानान्सुदारुणम्

aṣṭame māsi samprāpte nānākrandapuraṃ vrajet / nānākrandagaṇāndṛṣṭvā krandamānānsudāruṇam

हिन्दी अर्थ

करके ऐश्वर्यसम्पन्न कुलमें उत्पन्न होती है । छोड़कर अन्य किये हुए कार्यकी आवृत्ति नहीं

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 38

स्वयं च शून्यहृदयः समाक्रन्दति दुः खितः ।तन्मासिकं च यच्छ्राद्धं भुक्त्वा तत्र सुखी भवेत्

svayaṃ ca śūnyahṛdayaḥ samākrandati duḥ khitaḥ / tanmāsikaṃ ca yacchrāddhaṃ bhuktvā tatra sukhī bhavet

हिन्दी अर्थ

धर्मपूर्वक विवाहिता जो स्त्री यदि पति-संगति होनी चाहिए। यदि कोई मनुष्य अन्य कर्म करता नहीं करती है, तो जन्म-जन्मान्तरतक दुखी, है तो पूर्वका किया गया कार्य विनष्ट हो जाता है। दुःशीला और अप्रियवादिनी होती है। जो स्त्री मृतकके द्वादशाहके दिन विहित कृत्य वर्षपर्यन्त अपने पतिको छोड़कर परपुरुषकी अनुगामिनी हो पुनः करने चाहिए, इससे प्रेत अक्षयसुख प्राप्त

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 39

विहाय तत्पुरं प्रेतो याति तप्तपुरं प्रति ।सुतप्तनगरं प्राप्य नवमे मासि सो ऽश्नुते ।द्विजभोज्यं पिण्डदानं कृतं श्राद्धं सुतेन यत्

vihāya tatpuraṃ preto yāti taptapuraṃ prati / sutaptanagaraṃ prāpya navame māsi so 'śnute / dvijabhojyaṃ piṇḍadānaṃ kṛtaṃ śrāddhaṃ sutena yat

हिन्दी अर्थ

उत्तम षोडशी आदि जो प्रेतोद्देश्यक कार्य हैं सपिण्डनके बाद भी इनकी पुनरावृत्ति ऊनमासिक आदि श्राद्धके द्वारा वर्षपर्यन्त करना चाहिए। परंतु पितरोंके उद्देश्यसे किये गये कर्मको पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए--

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 40

मासि वै दशमे प्राप्ते रौद्रं स्थानं स गच्छति ।दशमे मासि यद्दत्तं तद्भुक्त्वा च प्रयाति सः

māsi vai daśame prāpte raudraṃ sthānaṃ sa gacchati / daśame māsi yaddattaṃ tadbhuktvā ca prayāti saḥ

हिन्दी अर्थ

कृतस्य करणं नास्ति प्रेतकार्याते खग। यः करोति नरः कञश्चित्कृतपूर्वं विनश्यति॥

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 41

दशैकमासिकं भुक्त्वा पयोवर्षणमृच्छति ।मेघास्तत्र प्रवर्षन्ति प्रेतानां दुः खदायकाः

daśaikamāsikaṃ bhuktvā payovarṣaṇamṛcchati / meghāstatra pravarṣanti pretānāṃ duḥ khadāyakāḥ

हिन्दी अर्थ

मृतस्यैव पुनः कुर्यात्प्रितोऽक्षय्यमवाप्नुयात्। प्रतिमासं घटा देया सोदना जलपूरिताः ॥

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 42

(ततः प्रचलितो पोतो बहुर्घमतृषार्दितः) ।द्वादशे मासि यच्छ्राद्धं तत्र भुङ्क्ते सुदुः शितः

(tataḥ pracalito poto bahurghamatṛṣārditaḥ) / dvādaśe māsi yacchrāddhaṃ tatra bhuṅkte suduḥ śitaḥ

हिन्दी अर्थ

अर्वाक्च वृद्धेः करणाच्च ताक्ष्य सपिण्डनं यः कुरते हि पुत्रः । तथापि मासं प्रतिपिण्डमेकमनं च कुम्भं सजलं च दद्यात्॥

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 43

किञ्चिन्न्यूने ततो वर्षे सार्धे चैकादशे ऽथ वा ।याति शीतपुरं तत्र शीतं यत्रातिदुः खदम्

kiñcinnyūne tato varṣe sārdhe caikādaśe 'tha vā / yāti śītapuraṃ tatra śītaṃ yatrātiduḥ khadam

हिन्दी अर्थ

करता है। प्रतिमास जलसे परिपूर्ण सान्नोदक छोडे गये उस कठिन बाणसे वह मृग अत्यन्त

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 44

शीतार्तः क्षुधितः सो ऽथ वीक्षते हि दिशो दश ।तिष्ठेत्तु बान्धवः को ऽपि यो मे दुःखं व्यपोहति

śītārtaḥ kṣudhitaḥ so 'tha vīkṣate hi diśo daśa / tiṣṭhettu bāndhavaḥ ko 'pi yo me duḥkhaṃ vyapohati

हिन्दी अर्थ

घटका दान करना चाहिए। है तार्क्ष्य ! वृद्धिश्राद्धके कारण जो पुत्र अपने पिताका सपिण्डीकरण श्राद्ध कर देता है तो भी उसे प्रत्येक मासमें एक पिण्ड, अन्न और जलसे पूर्ण कुम्भका दान करना चाहिए ।

English

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अध्याय २५५

श्लोक 45

किङ्करास्तं वदन्त्येवं क्व ते पुण्यं हि तादृशम् ।श्रुत्वा तेषां तु तद्वाक्यं हा दैव इति भाषते

kiṅkarāstaṃ vadantyevaṃ kva te puṇyaṃ hi tādṛśam / śrutvā teṣāṃ tu tadvākyaṃ hā daiva iti bhāṣate

हिन्दी अर्थ

तार्क्ष्यने कहा--हे विभो! आपने जिन प्रेतोंका वर्णन किया है, वे इस धरतीपर कैसे निवास करते हैं; उनके रूप किस प्रकारके होते हैं, वे कौन- कौन-से कर्म-फलोंके द्वारा महाप्रेत और पिशाच

English

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अध्याय २५५

श्लोक 46

दैवं हि पूर्वसुकृतं तन्मया नैव सञ्चितम् ।एवं सञ्चिन्त्य बहुशो धैर्यमालम्बते पुनः

daivaṃ hi pūrvasukṛtaṃ tanmayā naiva sañcitam / evaṃ sañcintya bahuśo dhairyamālambate punaḥ

हिन्दी अर्थ

बन जाते हैं और किस शुभ दानसे प्राणीकी प्रेतयोनि छूट जाती है? है मधुसूदन! समस्त जगत्के कल्याणार्थ मुझको यह सब बतानेकी कृपा करें। श्रीकृष्णने कहा--हे तार्क्ष्य! तुमने मानव-

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 47

चत्वारिंशद्योजनानि चतुर्युक्तानि वै ततः ।धर्मराजपुरं रम्यं गन्धर्वाप्सराकुलम्

catvāriṃśadyojanāni caturyuktāni vai tataḥ / dharmarājapuraṃ ramyaṃ gandharvāpsarākulam

हिन्दी अर्थ

कल्याणके लिये बहुत अच्छी बात पूछी। प्रेतका लक्षण मैं कह रहा हूँ, उसे सावधान होकर सुनो। यह अत्यन्त गुप्त है। जिस-किसीके सामने इसको नहीं कहना चाहिए। तुम मेरे भक्त हो, इसलिये मैं

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 48

चतुरशीतिलक्षैश्च मूर्तामूर्तैरधिष्ठितम् ।त्रयोदश प्रतीहारा धर्मराजपुरे स्थिताः

caturaśītilakṣaiśca mūrtāmūrtairadhiṣṭhitam / trayodaśa pratīhārā dharmarājapure sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे सामने इसे कह रहा हूँ। हे पुत्र गरुड! पुराने समयमें बभ्रुवाहन नामका एक राजा था, जो महोदय (कान्यकुब्ज) नामक सुन्दर नगरमें रहता था। वह धर्मनिष्ठ, महापराक्रमी,

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 49

शुभाशुभं तु यत्कर्म ते विचार्य पुनः पुनः ।श्रवणा ब्रह्मणः पुत्रा मनुष्याणां च चेष्टितम् ।कथयन्ति तदा लोके पूजिताः पूजिताः स्वयम्

śubhāśubhaṃ tu yatkarma te vicārya punaḥ punaḥ / śravaṇā brahmaṇaḥ putrā manuṣyāṇāṃ ca ceṣṭitam / kathayanti tadā loke pūjitāḥ pūjitāḥ svayam

हिन्दी अर्थ

यज्ञपरायण, दानशील, लक्ष्मीवान्, ब्राह्मणहितकारी,

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 50

नरैस्तुष्टैश्च पुष्टैश्च यत्प्रोक्तं च कृतं च यत् ।सर्वमावेदयन्ति स्म चित्रगुप्ते यमे च तत्

naraistuṣṭaiśca puṣṭaiśca yatproktaṃ ca kṛtaṃ ca yat / sarvamāvedayanti sma citragupte yame ca tat

हिन्दी अर्थ

सदगुणोंसे संयुत था। वह महाबली राजा सहैव अपनी प्रजाका पालन पुत्रवत् करता तथा क्षत्रिय- धर्मका सम्यक् पालन करते हुए सहैव अपराधियोंको दण्डित किया करता। कभी विशाल भुजाओंवाले

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 51

दूराच्छ्रवणविज्ञाना दूराद्दर्शनगोचराः ।एवञ्चेष्टास्तु ते ह्यष्टौ स्वर्भूपातालचारिणः

dūrācchravaṇavijñānā dūrāddarśanagocarāḥ / evañceṣṭāstu te hyaṣṭau svarbhūpātālacāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

उस राजाने अपनी सेनाके सहित शिकार करनेके लिये नाना प्रकारके वृक्षोंसे भरे हुए सैकड़ों सिंहोंसे 'परिव्याप्त, विभिन्न प्रकारके पक्षियोंके कलरवसे

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 52

तेषां पत्न्यस्तथै वोग्रा श्रवण्यः पृथगाह्वयाः ।एवं तेषां शक्तिरस्ति यर्त्ये मर्त्याधिकारिणः

teṣāṃ patnyastathai vogrā śravaṇyaḥ pṛthagāhvayāḥ / evaṃ teṣāṃ śaktirasti yartye martyādhikāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

निनादित एक घनघोर वनमें प्रवेश किया। वनके

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

अध्याय २५५

श्लोक 53

व्रतैर्दानैस्तवैर्यश्च पूजयेदिह मानवः ।जायन्ते तस्य ते सौम्याः सुखमृत्युप्रदायिनः

vratairdānaistavairyaśca pūjayediha mānavaḥ / jāyante tasya te saumyāḥ sukhamṛtyupradāyinaḥ

हिन्दी अर्थ

बीचमें जाकर राजाने दूरसे ही एक मृगको देखा और उसके ऊपर अपने बाणको छोड़ दिया। उसके द्वारा

English

A morral should worship them with vows, gifts and prayen. They become cordial to him and cause death in an easy manner.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_garuDapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Garuda Purana — Chapter 255
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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