अध्याय २६२
श्लोक 1
इति श्रीगारुडे महापुराणे उत्तरखण्डे द्वितीयांशे धर्मकाण्डे प्रेतकल्पे भीष्म युधिष्ठिरसंवादे प्रेतत्वोत्पत्तितन्मुक्तिपेञ्चप्रेतोपाख्यान निरूपणं नाम द्वाविंशो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- २३ गरुड उवाच ।किङ्किं कुर्वन्ति वै प्रेताः पिशाचत्वेव्यवस्थिताः ।वदन्ति वा कदाचित्किं तद्वदस्व सुरेश्वर
iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe uttarakhaṇḍe dvitīyāṃśe dharmakāṇḍe pretakalpe bhīṣma yudhiṣṭhirasaṃvāde pretatvotpattitanmuktipeñcapretopākhyāna nirūpaṇaṃ nāma dvāviṃśo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 23 garuḍa uvāca / kiṅkiṃ kurvanti vai pretāḥ piśācatvevyavasthitāḥ / vadanti vā kadācitkiṃ tadvadasva sureśvara
हिन्दी अर्थ
आजीवन श्राद्ध करना चाहिए, तभी वह अतिवाहात्मक प्राशन करे, तब उसकी शुद्धि होती है। शूद्र सभी प्रेतरूप पिता पुत्रद्वारा दानमें दिये गये पदार्थोके वर्णोके शवोंका अनुगमन कर उन्हें जलाञ्जलि दे भोगोंसे सुख प्राप्त करता है । दग्ध हुए प्रेतके निमित्त सकता है, वैश्य तीन वर्णो (ब्राह्मण, क्षत्रिय और परिजनोंके द्वारा जो जलाञ्जलि दी जाती है, उससे वैश्य)-के शवोंका अनुगमन कर उन्हें जलाञ्जलि
English
What do the ghosts do in their ghosthood? When do they speak sometime? Please tell me, O lord of gods!