अध्याय २६४
श्लोक 1
इति श्रीगारुडे महापुराणे उत्तरखण्डे द्वितीयांशाख्ये धर्मकाण्डे प्रेतकल्पे श्रीकृष्णगरुडसंवादे ऽल्पायुर्मरणहे तुबालान्त्येष्ट्योर्निरूपणं नाम चतुर्विशो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- २५ श्रीविष्णुरुवाच ।अतः परं प्रवक्ष्यामि पुरुषस्त्री विनिर्णयम् ।जीवन्वापि मृतो वापि पञ्चवर्षाधिको ऽपि वा
iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe uttarakhaṇḍe dvitīyāṃśākhye dharmakāṇḍe pretakalpe śrīkṛṣṇagaruḍasaṃvāde 'lpāyurmaraṇahe tubālāntyeṣṭyornirūpaṇaṃ nāma caturviśo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 25 śrīviṣṇuruvāca / ataḥ paraṃ pravakṣyāmi puruṣastrī vinirṇayam / jīvanvāpi mṛto vāpi pañcavarṣādhiko 'pi vā
हिन्दी अर्थ
विष्णुको शय्या शून्य नहीं होती है, उसी प्रकार सकती है। स्त्रीको अपने मृत पतिके लिये दधि, जन्म-जन्मान्तरमें मेरी शय्या भी शून्य न हो। अन्न, शयन, अञ्जन, कुंकुम, वस्त्राभूषण तथा इस प्रकार ब्राह्मणको उस निर्मल शय्याका शय्यादि सभी प्रकारके दान देना चाहिए । स्त्रियोंके दान देकर क्षमापन करके उसे विदा करे। यही लिये इस लोकमें जो कुछ वस्तुएँ उपकारक हों, जो
English
Death after bii ih and birth ufter de.atli—thus moves the cyt Ic in rirrle, till tint soul is reh-ased from tlte bondage of action. Cr>mparc lihaiffivndi'ilA