अध्याय १०४
श्लोक 1
ततः कृष्णो भोजयित्वा शतानि सुबहूनि च विप्राणाम् ऋषिकल्पानां कृतकृत्यो ऽभवत् तदा
tataḥ kṛṣṇo bhojayitvā śatāni subahūni ca viprāṇām ṛṣikalpānāṃ kṛtakṛtyo 'bhavat tadā
हिन्दी अर्थ
अत्यन्त कुपित होकर इन्द्रध्वजके समान उस विशाल परिघको घुमाया और मुँह फैलाकर बड़ी जोर-जोरसे गर्जना की॥९॥ उसके कण्ठमें सुवर्णमय पदक, भुजाओंमें बाजूबंद, कानोंमें विचित्र कुण्डल तथा वक्ष:स्थलपर सोनेके हार सुशोभित थे, जिनसे वह दानव प्रकाशित हो रहा था॥ १० ॥ लोहेके परिघ और सोनेके आभूषणोंसे युक्त वह दानव इन्द्रधनुष, विद्युत् और गर्जनासे युक्त मेघके समान शोभा पा रहा था॥११॥ परिघ नामक अस्त्रसे वायुसमूहोंकों संचालित करते हुए जोर-जोरसे सिंहनाद करनेवाला वह हैत्य धूम और ज्वालाओंसहित प्रलयकालीन अग्निके समान प्रज्बलित हो उठा विद्याधरगण, गन्धर्वनगर, अमरावती पुरी तथा सिद्धलोकोंके साथ ग्रह-नक्षत्रोंसहित एवं सूर्य और चन्द्रमासे विभूषित आकाश उस हैत्यराजके परिघसे उद्भ्रान्त होकर चक्कर- सा काटने लगा॥ १३-१४॥ परिघको धारण करने और सब ओर घुमानेमें समर्थ वह हैत्य दुर्जय हो गया था। अग्निके समान तेजस्वी वह असुरशज विप्रचित्ति प्रलयकालकी आगके समान उठ खड़ा हुआ था, देवता उसकी आँचसे ईंधनकी भाँति जल रहे थे॥१५॥ देवता और वरुण
English
Vaishampāyana said:—No one can understand waiting how long the Lord will convert all into one ocean. At that time the Lord will only gauge all, see all and know all: nothing else will be perceptible. Having permeated the the sky, earth, air and the other elements with His intelligence and kept the lord of celestials, Brahmā endued with mental faculties immersed in Himself the Lord, controlling His creative energy, will be asleep in the water (21–22).