अध्याय ११२
श्लोक 1
मृत इत्य् अभिविज्ञाय ज्वरं शत्रुनिषूदनः कृष्णो भुजबलाभ्यां तं चिक्षेपाथ महीतले
mṛta ity abhivijñāya jvaraṃ śatruniṣūdanaḥ kṛṣṇo bhujabalābhyāṃ taṃ cikṣepātha mahītale
हिन्दी अर्थ
अविनाशी भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये कैलासपर्वतके शिखरपर गये हैं। अत: इस समय इस द्वारकापुरीकी रक्षा मुझे अवश्य करनी चाहिए।' मन- ही-मन ऐसा सोचकर वे तुरंत धनुष लेकर एक विशाल एवं भयंकर रथपर आरूढ़ हुए, जिसे महात्मा दारुकके पुत्रने सजाया था और वह स्वयं ही उसका सारथि बना था॥ १०--१२॥ वे वह विशाल धनुष और विषधर सर्पोोके समान भयंकर बाण लेकर श्त्रोंका प्रहार जिसकी टंकारको कठिनतासे सह सके, ऐसे भयंकर कवचको धारण करके बाजूबंद, कुण्डल, तरकस, बाण, धनुष, गदा और खड्गसे संयुक्त हो सात्यकि भगवान् श्रीकृष्णफे वचनोंको स्मरण करते हुए युद्धके लिये चल दिये॥ १३-१४॥ जो स्थान मशालोंसे प्रकाशित था, वहीं उत्तम वीर सात्यकि गये। उसी प्रकार महापराक्रमी बलदेव भी युद्ध करनेकी इच्छासे गदा और धनुष-बाण ले तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो वहाँ तीब्र गतिसे गये। उनके साथके सभी सैनिक भयंकर सिंहनाद करते हुए आगे बढ़ रहे थे॥ १५-१६ ॥ नीतिमानोंमें श्रेष्ठ, महापराक्रमी बलवान उद्धव भी उत्तम नीति और प्रीतिका अनुसंधान करते हुए महान् गर्जन करनेवाले भयंकर मतवाले हाथीपर
English
Brahma said:—"O my son, I grant you these wonderful and celestial boons. These boons are rare and not to be obtained by men. Forsooth, by my favour, you will obtain all desirable objects."