Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
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अध्याय 119 / 119

Adhyaya 118

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अध्याय ११९

श्लोक 1

इत्य् एवम् आश्वासयतो राजानं जनमेजयम् अतीतानागतं वाक्यम् ऋषेः परिषदा श्रुतम्

ity evam āśvāsayato rājānaṃ janamejayam atītānāgataṃ vākyam ṛṣeḥ pariṣadā śrutam

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणं केशवं चापि कीर्तयन् नावसीदति जो-जो वस्तु अपनेको अभीष्ट हो, उसी-उसीका ब्राह्मणोंकों दान करना चाहिए। वाचक अपना गुरु है, अत: भक्ति-भावसे उसको सर्वथा संतुष्ट करे। उस समय सम्पूर्ण देवताओंका तथा नर-नारायणका कीर्तन करे॥ ८२॥ तदनन्तर गन्ध, माल्य आदिसे भलीभाँति अलंकृत किये गये श्रेष्ठ ब्राह्मगॉंको उनकी इच्छाके अनुसार नाना प्रकारके कमनीय पदार्थ तथा अनेक प्रकारके छोटे-बड़े दान देकर तृप्त करे॥८३॥ ऐसा करनेवाला मनुष्य अतिरात्र यज्ञका फल पाता है। प्रत्येक पर्वपर ऐसा करनेसे यज्ञ-फलकी प्राप्ति होती है

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अध्याय ११९

श्लोक 2

अमृतस्येव चास्वादः प्रभा चन्द्रमसो यथा अतर्पयत तच् छोत्रं महर्षेर् वाङ्मयो रसः

amṛtasyeva cāsvādaḥ prabhā candramaso yathā atarpayata tac chotraṃ maharṣer vāṅmayo rasaḥ

हिन्दी अर्थ

भरतकुलतिलक जनमेजय ! वाचकको चाहिए कि वह सुस्पष्ट अक्षर, पद एवं स्वरके साथ ब्राह्मणोंको भविष्यपर्व एवं भारतका श्रवण कराये॥ ८५॥ भरतश्रेष्ठ ! श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर वाचकको भी भोजन कराकर उसे भलीभाँति अलंकृत करके यथोचित रूपसे दक्षिणा दे॥ ८६॥ वाचकके संतुष्ट होनेपर परम उत्तम मड़लमयी प्रीति प्राप्त होती है। अन्य ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होते हैं॥ ८७॥ भरतभूषण! तत्पश्चात् यथोचित रूपसे सब प्रकारके उत्तम, मनोवाज्छित पदार्थ देकर क्रमशः सभी द्विजोंका भरण-पोषण करना चाहिए ॥ ८८ ॥ नरश्रेष्ठ ! तुमने मुझसे जो पूछा था, उसके अनुसार मैंने तुमसे महाभारत और हरिवंश सुननेकी यह विधि बतायी है। तुम्हें इसपर श्रद्धा करनी चाहिए राजन! नृपश्रेष्ठ) जो परम कल्याणकी इच्छा रखता हो, उसे हरिवंशसहित महाभारत सुनने और उसकी पारणा पूरी करनेके लिये सदा यत्रशील रहना चाहिए

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अध्याय ११९

श्लोक 3

धर्मार्थकामसंयुक्तं करुणं वीरहर्षणम् रमणीयं तद् आख्यानं कृत्स्नं परिषदा श्रुतम्

dharmārthakāmasaṃyuktaṃ karuṇaṃ vīraharṣaṇam ramaṇīyaṃ tad ākhyānaṃ kṛtsnaṃ pariṣadā śrutam

हिन्दी अर्थ

प्रतिदिन भारतका श्रवण करे। नित्य-प्रति भारतका कीर्तन करे। जिसके घरमें महाभारतकी पुस्तक है, उसके हाथमें विजय है॥९१॥ भारत परम पुण्यमय ग्रन्थ है। भारतमें नाना प्रकारकी कथाएँ हैं। देवतालोग भी भारतका सेवन करते हैं, अतः भारतका अवश्य कीर्तन करे॥ ९२॥ भरतश्रेष्ठ। भारत सम्पूर्ण शास्त्रोंमें उत्तम है। भारतके अनुशीलनसे मोक्ष प्राप्त होता है। यह मैं तुम्हें तत्तकी बात बता रहा हूँ॥ ९३॥ जो महाभारत इतिहास, पृथ्वी, गौ, सरस्वती, ब्राह्मण और भगवान् श्रीकृष्मका कीर्तन करता है, वह कभी कष्टमें नहीं महाभारतके आदि, मध्य और अन्तमें सर्वत्र श्रीहरिका गान किया जाता है

English

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अध्याय ११९

श्लोक 4

केचिद् अश्रूणि मुमुचुः श्रुत्वा दध्युस् तथापरे इतिहासं तम् ऋषिणा पाराशर्येण दर्शितम्

kecid aśrūṇi mumucuḥ śrutvā dadhyus tathāpare itihāsaṃ tam ṛṣiṇā pārāśaryeṇa darśitam

हिन्दी अर्थ

यत्र विष्णुकथा दिव्या: श्रुत॒यश्च सनातना: । तच्छोतव्यं मनुष्येण परं॑ पदमिहेच्छता एततू पवित्र॑ परममेतद् धर्मनिदर्शनम्। क्रियतेडसारसंसारे वाज्छितस्यैव कारणम् जो इस लोकमें परम पदकी इच्छा रखता हो, उस मनुष्यको चाहिए कि जिसमें भगवान् विष्णुकी दिव्य कथाएँ और सनातन श्रुतियाँ हैं, उस महाभारत एवं यह धर्मका निरूपण करनेवाला शास्त्र है तथा यह समस्त उत्तम गुणोंसे युक्त है। अतः कल्याणकामी पुरुषको इसका श्रवण करना चाहिए॥ ९७॥ इस असार संसारमें हरिवंशका श्रवण सभी मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाला है, इसलिये श्रेष्ठ

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अध्याय ११९

श्लोक 5

अतीतानागतं यद् वै मुनिनोक्तं द्विजर्षभ ।सदस्यान्तो ऽभ्यनुज्ञाय कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् पुनर् द्रक्ष्याम इत्य् उक्त्वा जगाम भगवान् ऋषिः

atītānāgataṃ yad vai muninoktaṃ dvijarṣabha | sadasyānto 'bhyanujñāya kṛtvā cāpi pradakṣiṇam punar drakṣyāma ity uktvā jagāma bhagavān ṛṣiḥ

हिन्दी अर्थ

पुरुष इसका श्रवण करते हैं। ऐसा द्वैपायन वेदव्यासका कथन है॥९८॥ एक हजार अश्वमेध और एक सौ वाजपेय यज्ञ करनेसे मनुष्योंको जो फल प्राप्त होता है, वह हरिवंशका पारायण करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है करने योग्य, अनादि, अनन्त, सगुण, निर्गुण, सबके आदिकारण, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, उपमारहित, अनुमानके योग्य, योगियोंके लिये ज्ञानगम्य, तीनों लोकोंके गुरु तथा ईश्वर हैं, अत: मैं आपकी शरणमें आया हूँ॥ १००॥ इस ग्रन्थके नियमपूर्वक पठन एवं श्रवणसे सब लोग दुर्गम संकटोंसे पार हो जायूँ, सब कल्याणका दर्शन करें तथा सबके मनोवाज्छित अर्थ सिद्ध हो जायँ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वण श्रवणफलकथरने द्वात्रिंशदधिकशततमो5ध्याय:

English

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श्लोक 6

अनुजग्मुस् ततः सर्वे प्रयान्तम् ऋषिसत्तमम् लोके प्रवदतां श्रेष्ठं शिष्टाः सर्वे तपोधनाः

anujagmus tataḥ sarve prayāntam ṛṣisattamam loke pravadatāṃ śreṣṭhaṃ śiṣṭāḥ sarve tapodhanāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमयहाथारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें महाभारत और हरिवेशके श्रवणके फ़लका वर्णनविषयक एक सो बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ त्रिपुर-वधकी कथा त्यक्षाद् वधमहं ब्रह्मन् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । हैत्यानां बाहुबलिनां सर्वप्राणिविरोधिनाम् शंकरेण वध॑ राजन् शूलैस्त्रिभिरजिहागै: ।

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अध्याय ११९

श्लोक 7

याते भगवति व्यासे विप्राः सह महर्षिभिः ऋत्विजः पार्थिवाश् चैव प्रतिजग्मुर् यथागतम्

yāte bhagavati vyāse viprāḥ saha maharṣibhiḥ ṛtvijaḥ pārthivāś caiva pratijagmur yathāgatam

हिन्दी अर्थ

जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन्! हैत्योंके जो आकाशमें विचरनेवाले तीन पुर थे, उनका त्रिनेत्रधारी महादेवजीके हाथसे किस प्रकार वध हुआ ? इस प्रसड्गको मैं ठीक- ठीक और संक्षेपसे सुनना चाहता हूँ वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! जो समस्त प्राणियोंके विरोधी थे, उन बाहुबलशाली हैत्योंका भगवान् शड्डूरके हाथ किस प्रकार निधन हुआ ? यह जो तुम मुझसे पूछते हो, यह सार प्रसड़ विस्तारपूर्वक सुनो--पूर्वकालमें सम्पूर्ण प्राणियोंके वधकी इच्छावाले उन असुरेद्रोंका वध भगवान् शिवने अपने सीधे जानेवाले तीन शुलोंद्वाए7 किया था प्राकारेण प्रवृद्धेन काञझ्लननेन विराजता। मणिभिश्च प्रकाशद्धिः सर्वरत्नैश्व तोरणैः

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अध्याय ११९

श्लोक 8

पन्नगानां सुघोराणां कृत्वा तां वैरयातनाम् जगाम रोषम् उत्सृत्य राजा विषम् इवोरगः

pannagānāṃ sughorāṇāṃ kṛtvā tāṃ vairayātanām jagāma roṣam utsṛtya rājā viṣam ivoragaḥ

हिन्दी अर्थ

बभासे नभसो मध्ये थ्रिया परमया ज्वलत्। गन्धर्वाणामिवोदग्रं कर्मणा साधितं पुरम् वाजिन: पक्षसंयुक्ता वहन्ति बलदर्पिता:। पुर प्रभाकरश्रेष्ठ मनोभि: कामबृंहणैः आहूयत इवाकाशं खरे: श्यामदलप्रभे: वायुवेगसमैवेंगे: कालयन्त इवाम्बरम्। असुरा: समदृश्यन्त चश्लुभिविंदितात्मभि: ऋषिभिर्जलनप्रख्यैस्तपसा दग्धकिल्बिषै: । गीतवादित्रबहुलं गन्धर्वनगरोपमम्

English

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अध्याय ११९

श्लोक 9

होत्राग्निदीप्तशिरसं परित्राय च तक्षकम् आस्तीको ऽप्य् आश्रमपदं जगाम च महामुनिः

hotrāgnidīptaśirasaṃ paritrāya ca takṣakam āstīko 'py āśramapadaṃ jagāma ca mahāmuniḥ

हिन्दी अर्थ

चित्रायुधसमाकीणैं: प्रतप्तकनकप्रभे: । भवनैर्बहुभिश्वेव॒प्रांशुभि: समलंकृतैः देवेन्द्रभवनाकारै: शुशुभे तन्महादुति। प्रासादाग्रै: प्रवृद्धश्न॒ कैलासशिखरप्रभे: शुशुभे हैत्यनगरं बहुसूर्यमिवाम्बरम्। वराह्टालकसम्पन्नं तप्तकाझ्जनसप्रभम् प्रदीप्रमिबव तेजोभी रराजाथ महाप्रभो। क्ष्वेडितोत्क्रुष्टनहुल॑ सिंहनादविनादितम्

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अध्याय ११९

श्लोक 10

राजापि हास्तिनपुरं प्रविवेश जनावृतः अन्वशासच् च मुदितस् तदा प्रमुदिताः प्रजाः

rājāpi hāstinapuraṃ praviveśa janāvṛtaḥ anvaśāsac ca muditas tadā pramuditāḥ prajāḥ

हिन्दी अर्थ

बभौ वल्गुजनाकीर्ण बन चैत्ररथं यथा। समुच्छितपताक॑ तदसिभिश्च विराजितम् सूर्यनाभश्च हैल्वेन्द्रश्ननद्दनाभश्च॒ भारत धातुओंसे निर्मित हुए थे। वे आकाशमें उमड़े हुए मेघसमूहोंकी भाँति प्रकट होकर सर्वत्र विचरते थे सुवर्णनिर्मित ऊँचे विशाल एवं प्रकाशमान परकोटेसे उद्दीत्त होनेवाली मणियोंसे तथा सर्वरत्रमय फाटकोंसे वे तीनों पुर आकाशमण्डलमें चमकते रहते थे। वे अपनी उत्कृष्ट प्रभासे प्रजजलित हो रहे थे। तपस्यारूपी कर्मसे साधित हुए वे भयंकर पुर गन्धर्वोके नगर-से जान पड़ते थे॥ ५-६॥ बलके अभिमानसे युक्त, पह्ुवाले घोड़े सूर्यसे भी अधिक प्रकाशमान उस पुरको इच्छानुसार बढ़नेवाले मनके तुल्य वेगसे ढोया करते थे॥ ७॥ सारी

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श्लोक 11

कस्यचित् त्व् अथ कालस्य स राजा जनमेजयः दीक्षितो वाजिमेधाय विधिवद् भूरिदक्षिणः

kasyacit tv atha kālasya sa rājā janamejayaḥ dīkṣito vājimedhāya vidhivad bhūridakṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

प्राणशक्ति लगाकर संचित किये गये बल-विक्रमसे जब वे घोड़े हिनहिनाते हुए दौड़ते थे, उस समय उनकी काली टापोंसे आकाश आहूत होता-सा प्रतीत होता था॥८॥ जिन्होंने तपस्यासे सारे पापोंकों दग्ध कर दिया था तथा जो अग्रिके समान तेजस्वी थे, वे आत्मज्ञानी महर्षि ही अपने नेत्रोंद्रारा उन असुरोंको देख पाते थे। वे वायुके समान वेगसे समूचे आकाशको अपना ग्रास बनाते हुए-से जान पड़ते थे। उन पुरोंमें प्रायः गीत और वाद्यके समारोह होते रहते थे। वे गन्धर्वनगरके समान प्रतीत होते थे। विचित्र आयुधोंसे भरे हुए, तपाये हुए सुवर्णे समान कान्तिमान् तथा विविध अलंकारोंसे अलंकृत बहुसंख्यक ऊँचे भवन, जो देवराज इन्द्रके भवनकी भाँति सुशोभित होते थे, उन महातेजस्वी पुरोंकी शोभा बढ़ाते थे। कैलासके श्रृड्"ोंकी भाँति प्रकाशित होनेवाले बड़े-बड़े प्रासादशिखरोंसे युक्त हैत्योंका वह नगर अनेक सूर्योसे प्रकाशित आकाशके समान

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अध्याय ११९

श्लोक 12

संज्ञप्तम् अश्वं तत्रास्य देवी काश्या वपुष्टमा संविवेशोपगम्याथ विधिदृष्टेन कर्मणा

saṃjñaptam aśvaṃ tatrāsya devī kāśyā vapuṣṭamā saṃviveśopagamyātha vidhidṛṣṭena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

सुशोभित होता था। महाराज ! बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंसे सम्पन्न, तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् तथा तेजसे प्रजजलित-सा वह हैत्यनगर बड़ी शोभा पाता था। वहाँ और कोलाहल अधिक होते थे। वह नगर वबीरोंके सिंहनादसे गूँजता रहता था। मनोहर स्त्री-पुरुषोंसे भरा होनेके कारण वह चैत्ररथ नामक वनके समान सुशोभित होता था। राजन! ऊँची-ऊँची पताकाओंसे सुशोभित तथा चमचमाती हुई तलवारोंसे प्रकाशित वह त्रिपुर नामक नगर आकाशमें विशाल विद्युतूके समान उद्भासित होता था। भारत! उस नगरमें हैत्यराज सूर्यनाभ, चन्द्रनाभ भारत! वे अभिमानसे मोहित होकर ब्रह्माजीके बनाये हुए पन्थानं देवगमनं पितृयानं च भारत। तैरेवमसुराग्रैश्व प्रगुहीतशरासनै:

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अध्याय ११९

श्लोक 13

तां तु सर्वानवद्याङ्गीं चकमे वासवस् तदा संज्ञप्तम् अश्वं आविश्य तया मिश्रीबभूव सः

tāṃ tu sarvānavadyāṅgīṃ cakame vāsavas tadā saṃjñaptam aśvaṃ āviśya tayā miśrībabhūva saḥ

हिन्दी अर्थ

दानवैर्नरशार्दूल देवयाने. महापथे। पितृवह्िबलोपेते हते. भरतसत्तम ब्रह्माणमभ्यधावन्त सर्वे सुरगणास्तथा। विवर्णवदना दीनाश्छलन्ने वै गतिकर्मणि हन्यामहे शत्रुगणैर्भागोच्छेदेव भागद सान्त्वयित्वा तु वरदो ब्रह्मा प्रोवाच देवता: । श्रूणुध्ब॑ देवता: सर्वा: शत्रुप्रतिकृतिं पराम्

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अध्याय ११९

श्लोक 14

तस्मिन् विकारे जनिते विदित्वा तत्त्वतश् च तत् असंज्ञप्तो ऽयम् अश्वस् ते ध्वंसेत्य् अध्वर्युम् अब्रवीत्

tasmin vikāre janite viditvā tattvataś ca tat asaṃjñapto 'yam aśvas te dhvaṃsety adhvaryum abravīt

हिन्दी अर्थ

अवध्या दानवा: सर्वे ऋते शंकरमव्ययम्। प्रतिगुह्म च तद् वाक्य मनोभिर्वाग्भिरिव च काश्यपेयं हरं प्राप्ता जपन्तो ब्रह्मसंहिताम् स्वयं मृतानां कृष्णानां मृगाणां कुरुसत्तम हविर्दत्तमविज्ञानाद् भस्मच्छन्नेषु वह्लिषु यथादेशं यथाकाल क्रियतां ब्रह्मणो वच:

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अध्याय ११९

श्लोक 15

अध्वर्युर् ज्ञानसंपन्नस् तदिन्द्रस्य विचेष्टितम् कथयामास राजर्षेः शशाप स पुरंदरम्

adhvaryur jñānasaṃpannas tadindrasya viceṣṭitam kathayāmāsa rājarṣeḥ śaśāpa sa puraṃdaram

हिन्दी अर्थ

यदुक्त देवदेवेन खेचराणां समीपतः। एवं देववचोभिश्व भाविनोर्थस्य वैभवात् देवयान और पितृयान मार्गको तोड़ने-फोड़ने एवं नष्ट करने लगे। पुरुषसिंह ! भरतवंशशिरोमणे ! इस प्रकार हाथमें धनुष लेकर उन श्रेष्ठ असुरों और दानवोंने जब अग्निबलसे युक्त देवयान और पितरोंके बलसे युक्त पितृयान नामक महामार्गका अपहरण कर लिया, तब समस्त देवगण ब्रह्माजीके पास दौड़े गये। उनका मुख उदास हो गया था। वे दोनों मार्गोंके नष्ट होनेसे गमन-कर्मका उच्छेद हो जानेंके कारण अत्यन्त विवर्ण (शोकाकुल) हो रहे थे॥ ९--२० ॥ वे ब्रह्मजीके सामने खड़े होकर आर्तनादयुक्त स्वस्से बोले--'देवताओंको भाग देनेवाले पितामह ! शत्रुगण हमारे यज्ञभागका उच्छेद करके हमें मार रहे हैं'॥२१॥ 'वक्ताओंमें श्रेष्ठ! उन हैत्योंके वधका कोई उपाय बताइये, जिसे जानकर हम बाहुबलशाली

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अध्याय ११९

श्लोक 16

यद्य् अस्ति मे यज्ञफलं तपो वा रक्षतः प्रजाः फलेन तेन सर्वेण ब्रवीमि श्रूयताम् इदम्

yady asti me yajñaphalaṃ tapo vā rakṣataḥ prajāḥ phalena tena sarveṇa bravīmi śrūyatām idam

हिन्दी अर्थ

वरदायक ब्रह्माजीने उन देवगणोंको सान्त्वना देकर उनसे कहा--'देवताओ ! तुम सब लोग शत्रुओंसे बदला लेनेका उत्तम उपाय सुनो--वे समस्त दानव अविनाशी भगवान् शट्डूरके सिवा दूसरेके लिये अवध्य हैं'। भरतनन्दन! उनके उस वचनको मन और वाण्ीद्वारा स्वीकार करके सब देवता रुद्रगणोंके साथ पृथ्वीपर आये। वे विन्ध्य और मेरुपर्ववकी तलैटीमें तथा भूतलके मध्यभागमें उग्र तपस्या करते हुए सब-के-सब योगज्ञ मुनि हो गये और ब्रह्मसंहिता (प्रणज4)-का जप करते हुए कश्यपनन्दन हरकी शरणमें गये॥ २३--२६॥ उनके लिये जनसमुदायमें परायी स्त्रियाँ वन्ध्य--निष्फल अर्थात् मोह उत्पन्न करनेमें असमर्थ थीं। वे कुशकी चटाई बिछाकर उसीपर सोते थे। ताँबा और लोहा ही उनका आभूषण था॥ २७॥ कुरुश्रेष्ठ स्वयं मरे हुए वनचारी काले मृगोंके शरीरोंसे उधेड़कर लिये गये सुन्दर और कोमल मृगचर्म एवं बाघम्बर ही उनके पहननेके वस्त्र थे। व्याप्रचर्म धारण करके मायासे अपनेको छिपाकर समस्त देवता आकाशमार्गका आश्रय ले भगवान् शड्डूरके धाममें जा पहुँचे और उन भगवान् विश्वनाथ हरको प्रणाम करके स्पष्ट शब्दोंमें उनसे बोले--। ' भगवन्

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अध्याय ११९

श्लोक 17

अद्यप्रभृति देवेन्द्रम् अजितेन्द्रियम् अस्थिरम् क्षत्रिया वाजिमेधेन न यक्ष्यन्तीति शौनक

adyaprabhṛti devendram ajitendriyam asthiram kṣatriyā vājimedhena na yakṣyantīti śaunaka

हिन्दी अर्थ

आपने हमारी ओरसे मुँह फेर लिया है, इसलिये जैसे राखसे ढकी हुई आगमें अज्ञानवश दी हुई आहुति निष्फल हो जाती है, उसी प्रकार हमें मिला हुआ वरदान व्यर्थ हो गया है। अतः देवाधिदेव ब्रह्माजीने आकाशचारी वचनका आप देश-कालके अनुसार पालन करें'। इस प्रकार देवताओंके कहनेसे तथा भावी कार्यके प्रभावसे समनहान्महादेवो देवैः सह सवासवबै:। आदित्यपथमास्थाय संनद्धा: समलंकृता: सर्वे काञ्चनवर्णाभा बभुर्दीप्ता इवाग्रय:। रुद्रेण सहिता रुद्रा दहन्त इब तेजसा

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अध्याय ११९

श्लोक 18

ऋत्विजश् चाब्रवीत् क्रुद्धः स राजा जनमेजयः दौर्बल्यं भवताम् एतद् यद् अयं धर्षितः क्रतुः

ṛtvijaś cābravīt kruddhaḥ sa rājā janamejayaḥ daurbalyaṃ bhavatām etad yad ayaṃ dharṣitaḥ kratuḥ

हिन्दी अर्थ

विश्वे विश्वेन वपुषा बलिन: कामरूपिण: अथ हैत्या भिन्नदेहा: पुराद्टालं गता इब न्यपतन् हैत्यसंघाता वज्नेणेव हता नगा:। असिभिश्च हता देवै: शक्तिचक्रपरश्रथै: बाणैश्व भिन्नमर्माणो हैत्येन्द्रा युद्धगोचरे। प्रपेतु: सहिता उर्व्या छिन्नपक्षा इबाचला: एवं तेउन्योन्यसम्बाधे क्षीयन्ते क्षयकर्मणा

English

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अध्याय ११९

श्लोक 19

विषये मे न वस्तव्यं ध्वंसध्वं सह बान्धवैः इत्य् उक्तास् तत्यजुर् विप्रास् तं नृपं जातमन्यवः

viṣaye me na vastavyaṃ dhvaṃsadhvaṃ saha bāndhavaiḥ ity uktās tatyajur viprās taṃ nṛpaṃ jātamanyavaḥ

हिन्दी अर्थ

अस्तं प्राप्ते दिनकरे सुरेन्द्रास्ते निशामुखे। छिन्नभिन्नक्षममुखा . निपेतुर्वसुधातले अथ हैत्या जयं प्राप्ता निशायां निशितैः शरैः । विनेदुर्विपुलैनदिर्मेघा इव महारवा: त्रासितास्त्रिदशा: सर्वे संग्रामजयकाड्मक्षिण: प्रेरित हो इन्द्र आदि देवताओंके साथ महादेवजी कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये। वे सब-के-सब कवच और अलंकार धारण करके सुवर्णकी-सी कान्तिसे प्रकाशित हो सूर्यके मार्गका आश्रय ले प्रज्वलित अग्नियोंके

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अध्याय ११९

श्लोक 20

अमर्षाद् अन्वशासच् च पत्नीशालागताः स्त्रियः राजा परमधर्मज्ञस् तदासौ जनमेजयः ।असतीं वपुष्टमाम् एतां निर्वासयत मे गृहात् यया मे चरणो मूर्ध्नि भस्मरेणूषितः कृतः

amarṣād anvaśāsac ca patnīśālāgatāḥ striyaḥ rājā paramadharmajñas tadāsau janamejayaḥ | asatīṃ vapuṣṭamām etāṃ nirvāsayata me gṛhāt yayā me caraṇo mūrdhni bhasmareṇūṣitaḥ kṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

समान उद्धासित होने लगे। महादेवजीके साथ कवच बाँधकर युद्धकुशल समस्त रुद्रगण अपने तेजसे शत्रुओंको दग्ध-से करने लगे। वे पर्वतोंके समान ऊँचे दिखायी देते थे। दानवोंका अन्त करनेकी इच्छावाले वे सभी महात्मा बलवान् तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे। वे अपने विश्वमय शरीरसे कवच बाँधकर युद्धके लिये तैयार हो गये। कुबेरसहित इन समस्त देवताओंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए त्रिनेत्रधारी महादेवने धनुष-बाण लेकर त्रिपुरवासियोंके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। तदनन्तर जैसे नगरकी अट्टालिकापर चढ़े हुए लोग गिरते हों, उसी प्रकार वे त्रिपुरवासी हैत्यगण अपने शरीरोंके विदीर्ण हो जानेसे देहरहित हो जीर्ण-शीर्ण हुए पर्वतोंके समान उस नगरसे नीचे गिरने लगे। नरेश्वर! समराज्गणमें आये हुए हैत्यसमूह अत्यन्त घायल और क्षत-विक्षत हो वज्रके मारे हुए पर्वतोंके समान धराशायी होने लगे। देवताओंके खड़गों, शक्तियों, चक्रों, फरसों और बाणोंसे युद्धस्थलमें मारे गये उन हैत्यराजोंके मर्म विदीर्ण हो गये और बे पंख कटे हुए पर्वतोंके समान एक साथ ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २८--४१॥ देवताओंके बढ़ते हुए तेजसे दग्ध

English

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अध्याय ११९

श्लोक 21

शौण्डीर्यं मे ऽनया भग्नं यशो मानश् च दूषितः नैनां द्रष्टुम् अपीच्छामि परिक्लिष्टाम् इव स्रजम्

śauṇḍīryaṃ me 'nayā bhagnaṃ yaśo mānaś ca dūṣitaḥ naināṃ draṣṭum apīcchāmi parikliṣṭām iva srajam

हिन्दी अर्थ

हो वे हैत्य वहाँ अपनी सुध-बुध खोने लगे। इस प्रकार वे देवता और हैत्य एक-दूसरेको बाधा देते हुए युद्धरूपी क्षयकर्मसे क्षीण होने लगे। हैत्योंके दोनों नेत्रोंसे तथा दिव्य दृष्टिसे देखनेपर भी उस समय देवता उनकी पकड़में नहीं आते थे। सूर्यके अस्त हो जानेपर प्रदोषकालमें (सबल हुए हैत्योंक आक्रमणसे) उन देवेश्वरोंके मुख छिन्न-भिन्न एवं क्षत-विक्षत हो गये तथा वे पृथ्वीपर गिर पड़े॥४२-४३॥ रातमें अपने तीखे बाणोंसे विजयको प्राप्त हुए हैत्यगण महान् सिंहनाद करते जोर-जोरसे गर्जना करनेवाले मेघोंकी भाँति बड़ा भारी कोलाहल मचाने लगे॥४४॥ विजयकी प्रासिसे उत्साहित हुए वे असुर आपसमें कहने लगे--'संग्राममें विजयकी इच्छा रखनेवाले समस्त देवताओंको हम बलवान् हैत्योंने संगठित होकर प्रास, खड़्ग और

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अध्याय ११९

श्लोक 22

न स्वादु सो ऽश्नाति नरः सुखं स्वपिति वा रहः अन्वास्ते यः प्रियां भार्यां परेण मृदिताम् इह

na svādu so 'śnāti naraḥ sukhaṃ svapiti vā rahaḥ anvāste yaḥ priyāṃ bhāryāṃ pareṇa mṛditām iha

हिन्दी अर्थ

समरे बलसम्पन्नाः सायुधा हैत्यसत्तमाः। सुरैश्व सहित: सर्व रथमास्थाय शंकरः दर्पितान् निनदन् हैत्यान् प्रदहन्निव तेजसा। युगान्तकाले वितते रश्मिवानिव निर्दहन् भाति सम स रथो राजन सेन्द्रायुध इवाम्बुदः । ततो5म्बरगताः सिद्धास्तुष्टवुर्वषभध्वजम् कर्मभिः पूर्वजं पूर्व: शुचिभिस्त््यम्बर्क तदा। ऋषयश्च तपःशान्ता: सत्यव्रतपरायणा: तस्मिस्तु हैत्यनगरे सर्वभूतभयावहे। ततस्तु शरवर्षाणि मुमुचुर्देत्यदानवा:

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अध्याय ११९

श्लोक 23

पुनर् नैवोपभुञ्जन्ति श्वावलीढं हविर् यथा ।एवम् उच्चैः प्रभाषन्तं क्रुद्धं पारिक्षितं नृपम् गन्धर्वराजः प्रोवाच विश्वावसुर् इदं वाचः

punar naivopabhuñjanti śvāvalīḍhaṃ havir yathā | evam uccaiḥ prabhāṣantaṃ kruddhaṃ pārikṣitaṃ nṛpam gandharvarājaḥ provāca viśvāvasur idaṃ vācaḥ

हिन्दी अर्थ

ते चक्रिरे महत्कर्म दानवा युद्धकोविदा: । गदाभिश्च गदा जघुर्भल्लैर्भल्लंं श्र चिच्छिदु: गन्धर्वनगराकारः सोउसीदत् सहरो रथः तोमरोंसे भयभीत कर दिया'। शुक्राचार्यके हविष्यसे सजग एवं बलसम्पन्न हुए विजयी हैत्यशिरोमणि समराड्भरणमें आयुधोंसहित बड़ी शोभा पा रहे थे। तब दर्पमें भरे हुए उन हैत्योंको अपने तेजसे दग्ध-से करते हुए भगवान् शट्जर समस्त देवताओंके साथ रथपर बैठकर गर्जना करने लगे। जैसे युगान्तकाल आनेपर अंशुमाली सूर्य सम्पूर्ण लोगोंको दग्ध करने लगते हैं तथा प्रलय उपस्थित होनेपर भूतनाथ भगवान् रुद्र सम्पूर्ण भूतोंका

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अध्याय ११९

श्लोक 24

त्रियज्ञशतयज्वानं वासवस् त्वां न मृष्यति न दुष्यतीयं पत्नी ते विहितेयं वपुष्टमा

triyajñaśatayajvānaṃ vāsavas tvāṃ na mṛṣyati na duṣyatīyaṃ patnī te vihiteyaṃ vapuṣṭamā

हिन्दी अर्थ

संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार वे अपने तेजसे हैत्योंको दग्ध करने लगे। मनके समान वेगशाली और शीघ्रगामी घोड़ोंके द्वारा खींचा जाता हुआ वह रथ आकाशके मध्यभागमें पहुँचकर विद्युत्सहित मेघकी भाँति प्रकाशित होने लगा। भरतनन्दन! नरेश्वर ! ध्वजके अग्रभागमें गर्जते हुए वृषभसे उपलक्षित होनेवाला वह रथ इन्द्रधनुबसहित मेघके समान शोभा पाने लगा। तदनन्तर आकाशमें उपस्थित हुए सिद्धोंने सबके पूर्वज त्रिनेत्रधारा भगवान् वृषभध्वजका उनके परम पवित्र पूर्वकर्मोका उल्लेख करते हुए स्तवन किया। तपस्यासे शान्तिको प्राप्त हुए सत्यव्रतपरायण ऋषियों, अमृतभोजी देवसमूहों तथा गन्धर्वों और अप्सराओंने भी गान्धर्वस्वरसे उनकी स्तुति की। नरेश्वर! पितृसम्बन्धी दूसरे स्थानपर खड़े हुए सौम्यस्वभाववाले देवताओंके मुखपर महान् हर्ष छा रहा था। तदनन्तर परकोटे और अट्टालिकाओंसे युक्त, सैकड़ों शतप्नियों (तोपों)-से व्याप्त तथा समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर उस हैत्यनगरके मध्यभागमें खड़े हुए देववैरी हैत्यों और दानवोंने सब ओरसे तीखे अग्रभागवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। भारत! वे युद्धकुशल दानव शतप्नियों, भल्लों और शूलोंसे चोट करते

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अध्याय ११९

श्लोक 25

रम्भा नामाप्सरा देवी काशिराजसुता मता सैषा योषिद्वरा राजन् रत्नभूतानुभूयताम्

rambhā nāmāpsarā devī kāśirājasutā matā saiṣā yoṣidvarā rājan ratnabhūtānubhūyatām

हिन्दी अर्थ

हुए महान् पराक्रम प्रकट कर रहे थे। उन्होंने गदाओंसे गदाएँ तोड़ डालीं, भल्लोंसे भक्ल काट दिये, अस्त्रोंसे अस्त्रोंको बाधा पहुँचायी और मायाओंको मायाओंसे ही शान्त कर दिया। तदनन्तर दूसरे हैत्योंने सहस्नों बाणों, शक्तियों, फरसों और महाभयंकर अशनियोंको उठाकर वर्षाओंसे आहत होते हुए देवता मृत्युके पथपर खड़े थे और गन्धर्वगगरके समान आकारवाला महादेवजीका वह रथ उनके साथ ही बड़े सड्डूटमें पड़ गया॥ ४५--६०॥ हन्यमानो5सुरगणै: प्रासासिशरतोमरैः । उन असुरोंके प्रासों, खड़्गों, बाणों और तोमरोंकी मार तैश्व हैत्यप्रहरणैर्गुरुभि्भारसाहिभिः । खाकर तथा हैत्योंके भार सहन करनेमें समर्थ, भारी,

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अध्याय ११९

श्लोक 26

यज्ञे विवरम् आसाद्य विघ्नम् इन्द्रेण ते कृतम् यज्वा ह्य् असि कुरुश्रेष्ठ समृद्ध्या वासवोपमः

yajñe vivaram āsādya vighnam indreṇa te kṛtam yajvā hy asi kuruśreṣṭha samṛddhyā vāsavopamaḥ

हिन्दी अर्थ

ऋषीणां ब्रह्मपुत्राणां महतामपि भारत स एष शंकरस्याग्रे रथो भूमिं प्रतिष्ठित: । अजेयो जय्यतां प्राप्त: सर्वतोकस्य पश्यत: यत् तद् ब्रह्ममय॑ तेज: सर्वत्र विजयैषिणाम् शान्त्यर्थ सर्वभूतानामिह लोके परत्र च। समाधायात्मना55त्मानं योगप्राप्तेन हेतुना रथन्तरेण साम्राथ ब्रह्मभूतेन भारत। तेजसा ज्वलयनूविष्णोस्त्रयक्षस्थ च महात्मन:

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अध्याय ११९

श्लोक 27

बिभेत्य् अभिभवाच् छक्रस् तव क्रतुफलैर् नृप तस्माद् आवर्तितश् चैव क्रतुर् इन्द्रेण ते विभो

bibhety abhibhavāc chakras tava kratuphalair nṛpa tasmād āvartitaś caiva kratur indreṇa te vibho

हिन्दी अर्थ

सर्वेषां चेव देवानां बलिनां कामरूपिणाम्। ऋषीणां तपसा55ढ्यानां वसतां विजने बने अथ विष्णुर्महायोगी सर्वतो5दृश्य तत्त्वतः। वृषरूपं॑ समास्थाय प्रोज्जहार रथोत्तमम् समाक्रान्तं देवगणै: समग्रबलपौरुषै:। विचित्र और बहुसंख्यक अस्त्र-शस्त्रोंस पीड़ित होकर शचीपति इन्द्र जहाँ-के-तहाँ खड़े रह गये॥ ६१ ॥ पृथ्वीनाथ ! भरतनन्दन! इसी बीचमें ब्रह्माजीके पुत्ररूप महर्षियोंका दिव्य शब्द प्रकट हुआ--'“यह आगे चलनेवाला भगवान्

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अध्याय ११९

श्लोक 28

मायैषा वासवेनेह प्रयुक्ता विघ्नम् इच्छता यज्ञे विवरम् आसाद्य संज्ञप्तं दृश्य वाजिनम् रतिम् इन्द्रेण रम्भायां मन्यसे यां वपुष्टमाम्

māyaiṣā vāsaveneha prayuktā vighnam icchatā yajñe vivaram āsādya saṃjñaptaṃ dṛśya vājinam ratim indreṇa rambhāyāṃ manyase yāṃ vapuṣṭamām

हिन्दी अर्थ

शह्डूरका रथ भूमिपर प्रतिष्ठित हो रहा है। यह अजेय होकर भी सब लोकोंके देखते-देखते जीतने योग्य हो गया राजन! वसुधापते ! रथोंमें श्रेष्ठ भगवान् शड्डरके उस रथके पृथ्वीपर गिरते ही समस्त प्राणी भूतलपर आ गिरे पर्वतोंके शिखर हिलने लगे। बड़े-बड़े वृक्ष झोंके खाने लगे। समुद्रोंमें तूफान आ गया और दसों दिशाएँ श्रीहीन हो गयीं॥ ६५ ॥ वहाँ जो वृद्ध ब्राह्मण थे, वे उस परम उत्तम पुरुषोंके लिये ब्रह्ममय तेज:स्वरूप है, वह तेज इहलोक और परलोकमें भी समस्त प्राणियोंको शान्ति प्रदान करनेवाला है। भारत! तदनन्तर उस तेज:स्वरूप महायोगी विष्णुने सब ओर दृष्टि डालकर अपने-आप ही मनको एकाग्र करके योगबलसे वृषरूप धर्मके स्वरूपका आश्रय ले ब्रह्मभूत रथन्तर सामके द्वारा महादेवजीके उस उत्तम रथको ऊपर उठाया। उस समय वे विष्णुदेव अपने, महात्मा त्रिनेत्रधारी शिवके, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले

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अध्याय ११९

श्लोक 29

अथ ते गुरवः शप्तास् त्रियज्ञशतयाजिनः भ्रंशितस् त्वं च विप्राश् च फलाद् इन्द्रसमाद् इह त्वत्तश् चैव सुदुर्धर्षात् त्रियज्ञशतयाजिनः

atha te guravaḥ śaptās triyajñaśatayājinaḥ bhraṃśitas tvaṃ ca viprāś ca phalād indrasamād iha tvattaś caiva sudurdharṣāt triyajñaśatayājinaḥ

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण बलवान् देवताओंके तथा निर्जन वनमें वास करनेवाले तपोबलसम्पन्न महर्षियोंके तेजसे प्रकाशित हो रहे थे॥ ६६--७० ॥ सम्पूर्ण बल-पौरुषसे सम्पन्न देवता जिसपर आछरूढ़ थे, उस उत्तम रथको अपने दोनों सींगोंसे उठाकर वे महाबली श्रीहरि मथे जाते हुए समुद्रकी भाँति पूरी प्राणशक्तिसे गर्जना करने लगे॥७१॥ दो सींगोंसे युक्त वृषभरूपधारी बलवान विष्णु तृतीय वायु (उद्दह)-के स्थानमें पहुँचकर पूर्णिमाके समुद्रकी भाँति जोर-जोरसे १. महाभारत शान्तिपर्वके अध्याय ३२८ में श्लोक ३८ से ४० तक तृतीय वायुका परिचय इस प्रकार दिया गया है--जो सदा सोम, सूर्य आदि ग्रहोंका उदय एवं उद्धव करता है। मनीषी पुरुष शरीरके भीतर जिसे 'उदान' कहते हैं। जो चारों समुद्रोंसे जलको ऊपर उठाकर जीमूत नामक मेघोंमें स्थापित करता है तथा जीमूत नामक मेघोंको जलसे संयुक्त करके उन्हें पर्जन्यके हवाले कर देता है, वह महान् वायु “उद्दह' कहलाता है। जो तृतीय मार्गपर चलनेके कारण तीसरा कहा गया है।

English

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अध्याय ११९

श्लोक 30

बिभेति हि सदा त्वत्तो ब्राह्मणेभ्यो ऽपि वासवः एकेन वै तद् उभयं तीर्णं शक्रेण मायया

bibheti hi sadā tvatto brāhmaṇebhyo 'pi vāsavaḥ ekena vai tad ubhayaṃ tīrṇaṃ śakreṇa māyayā

हिन्दी अर्थ

ततो नादेन वित्रस्ता हैतेया युद्धदुर्मदाः। पुनस्ते कृतसन्नाहा युयुधुः सुमहाबला: ब्रह्मास्त्रेणाभिसंयोज्य ब्रह्मदण्डे शिवो5व्यय: । मुमोच हैत्यनगरं त्रिधाशब्देन संज्ञितम् सत्येन ब्रह्मययोगेन तपसोग्रेण भारत मुमोच हैत्यनगरे सर्वप्राणहराज्छरान्। दीघ्तान् कनकवर्णाभान् सुवर्णाश्च सुनिर्मलानू गोपुराणि पुरैः सार्थ व्यशीर्यन्त नराधिप

English

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अध्याय ११९

श्लोक 31

स एष सुमहातेजा विजिगीषुः पुरंदरः कथम् अन्यैर् अनाचीर्णं नप्तुर् दारान् अतिक्रमेत्

sa eṣa sumahātejā vijigīṣuḥ puraṃdaraḥ katham anyair anācīrṇaṃ naptur dārān atikramet

हिन्दी अर्थ

अग्निना सप्प्रदीम्तानि वह्विगर्भाणि भारत। धरणीं सम्प्रपद्मन्त पुराणि वसुधाधिप शंकरेण प्रदग्धानि ब्रह्मास्त्रेणापतन्नृप हते च त्रिपुरे देवैर्वाचो हर्षात् किलेरिता:। सर्वाज्ञहीति शत्रूंस्त्वं प्रवृद्धान् पुरुषोत्तम विष्णुरेव महायोगी योगेन प्रस्मयन्निव। स्तूयते ब्रह्मसदृशैक्रषिभि: शंकरेण च। ब्रह्मणा सहितैर्देव: सम्पन्ननलपौरुषे:

English

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अध्याय ११९

श्लोक 32

यथैव हि परा बुद्धिः परो धर्मः परो दमः यथैव परमैश्वर्यं कीर्तिश् च हरिवाहने तथैव तव दुर्धर्ष त्रियज्ञशतयाजिनः

yathaiva hi parā buddhiḥ paro dharmaḥ paro damaḥ yathaiva paramaiśvaryaṃ kīrtiś ca harivāhane tathaiva tava durdharṣa triyajñaśatayājinaḥ

हिन्दी अर्थ

गर्जना करने लगे॥७२॥ तब उस गर्जनासे भयभीत हो वे महाबली रणदुर्मद हैत्य कवच बाँधकर पुनः युद्ध करने लगे॥ ७३॥ वे सब-के-सब बाहुबलशाली और समर्थ बल-पौरुषसे सम्पन्न थे। उन्होंने धनुष लेकर देवताओंकी सेनाका मर्दन करना आरम्भ किया तब अविनाशी शिवने अपने धनुषपर सुन्दर पंखवाले और तीखे अग्रितुल्य तेजस्वी बाणको रखकर उसे ब्रह्मास्त्रसे संयुक्त किया, फिर उस ब्रह्मदण्डको उस त्रिपुर-संज्ञक हैत्यनगरपर छोड़ दिया॥ ७५॥ भरतनन्दन ! भगवान् शिवने मन-ही-मन उस बाणका सत्य, ब्रह्मयोग तथा उग्र तपस्याद्वारा बलपूर्वक तीन रूपोंमें संधान करके उस हैत्यनगरपर ऐसे बाण छोड़े, जो सबके प्राण हर लेनेवाले थे। वे बाण उद्दीप्त, सुवर्णकी-सी कान्तिवाले, सर्पोंके समान उन श्रेष्ठ एवं भयंकर बाणोंको छोड़कर तीन प्रज्वलित एवं वेगशाली बाणोंद्वारा उस हैत्यनगरको विदीर्ण कर दिया॥ ७८॥ भरतनन्दन! नरेश्वर! बाणोंके आघातसे जलते हुए गोपुर विन्ध्यपर्वतके शिखरोंके

English

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अध्याय ११९

श्लोक 33

मा वासवं मा च गुरुम् आत्माणं मा वपुष्तमाम् गच्छ दोषेण कालो हि सर्वथा दुरतिक्रमः

mā vāsavaṃ mā ca gurum ātmāṇaṃ mā vapuṣtamām gaccha doṣeṇa kālo hi sarvathā duratikramaḥ

हिन्दी अर्थ

समान उन तीनों पुरोंसहित भस्म होकर बिखर गये भारत! पृथ्वीनाथ! अग्निसि जलकर भीतर आग छिपाये हुए वे तीनों पुर पृथ्वीपर गिर पड़े॥८०॥ नरेश्वर! पर्वत-शिखरोंके समान वे वैदूर्य-वर्णवाले नगर भगवान् शट्डूरके ब्रह्मास्त्रसे दग्ध होकर नीचे गिर पड़े त्रिपुरके नष्ट हो जानेपर देवताओंने बड़े हर्षसे यह बात कही--' पुरुषोत्तम! आप ही सम्पूर्ण बढ़े हुए शत्रुओंको नष्ट कीजिये'॥ ८२॥ इस प्रकार उस समय योगबलसे सम्पन्न एवं मुस्कराते हुए महायोगी विष्णुकी ही ब्रह्मतुल्य ऋषियोंने, भगवान् शट्डभूरने तथा बल-पौरुषसे सम्पन्न ब्रह्माजीसहित देवताओंने स्तुति की

English

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अध्याय ११९

श्लोक 34

ऐश्वर्येणाश्वम् आविश्य देवेन्द्रेणाभिरोषितः आनुकूल्येन देवस्य वर्तितव्यं सुखार्थिना

aiśvaryeṇāśvam āviśya devendreṇābhiroṣitaḥ ānukūlyena devasya vartitavyaṃ sukhārthinā

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि त्रिपुरबधे अयस्त्रिंशदधिकशततमोध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें त्रिप्रव्धविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ पृथोर्वैन्यस्य चाख्यानं मनूनां कीर्तन तथा। वैवस्वतकुलोत्पत्तिर्धुन्धुमारकथा तथा गालवोत्पत्तिरिक्ष्वाकुवंशस्याप्यनुकीर्तनम् । पितृकल्पस्तथोत्पत्ति: सोमस्य च बुधस्य च अमावसोरन्वयस्थ॒ कीर्तन॑ कीरतिवर्धनम्। च्युतिप्रतिष्ठे शक्रस्य प्रसव: क्षत्रवृद्धज:

English

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अध्याय ११९

श्लोक 35

दुस्तरं प्रतिकूलं हि प्रतिस्रोत इवाम्भसः स्त्रीरत्नम् उपभुङ्क्ष्वेमाम् अपापां विगतज्वरः

dustaraṃ pratikūlaṃ hi pratisrota ivāmbhasaḥ strīratnam upabhuṅkṣvemām apāpāṃ vigatajvaraḥ

हिन्दी अर्थ

ययातिचरितं चैव पूरुवंशस्यथ कीर्तनम् कीर्तन कृष्णसम्भूते: स्थमन्‍्तकमणेस्तथा। संक्षेपात् कीर्तिता विष्णो: प्रादुर्भावास्तत: परम् तारकामययुद्ध॑ चर ब्रह्मलोकस्य वर्णनम्। योगनिद्रासमुत्थानं विष्णोर्वाक्यं च वेधसः पृथ्वीवाक्यं च देवानामंशावतरणं तथा। ततो नारदवाक्यं चर स्वप्रगर्भविधिस्तथा

English

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अध्याय ११९

श्लोक 36

अपापास् त्यज्यमाना वै शपेयुर् अपि योषितः अदुष्टास् तु स्त्रियो राजन् दिव्यास् तु सविशेषतः

apāpās tyajyamānā vai śapeyur api yoṣitaḥ aduṣṭās tu striyo rājan divyās tu saviśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

आर्यास्तव: पुनः कृष्णसमुत्पत्ति: प्रपठ्चत:। गोब्जे गमन॑ विष्णो: शकटस्थ निवर्तनम् कालियस्यापि दमन धेनुकस्यथ च भञ्जनम् गिरियज्ञप्रवृत्तिश्ष॒ गोवर्धनविधारणम् वैशम्पायनजीने कहा--जनमेजय ! इस हरिवंशमें क्रमशः कहे गये वृत्तान्तोंका यहाँ संक्षेपसे कीर्तन किया जाता है-- इसमें पहले (हरिवंशपर्वमें) आदिसृष्टिका वर्णन है, तत्पश्चात् भूतसृष्टिका वर्णन किया गया है फिर बेनके पुत्र पृुथुकी कथा है। इसके बाद मनुओंका वर्णन, वैवस्वत मनुके कुलकी उत्पत्ति तथा धुन्धुमारकी कथा आयी है॥ २॥ फिर गालवकी उत्पत्ति, इक्ष्वाकुबंशका वर्णन, पितृकल्प (श्राद्ध) तथा सोम एवं बुधकी उत्पत्तिका

English

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अध्याय ११९

श्लोक 37

भानोः प्रभा शिखा वह्नेर् वेदीहोत्रे तथाहुतिः परामृष्टाप्य् असंरक्ता नोपदुष्यन्ति योषितः

bhānoḥ prabhā śikhā vahner vedīhotre tathāhutiḥ parāmṛṣṭāpy asaṃraktā nopaduṣyanti yoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रसंग है॥ ३ ॥ तदनन्तर अमावसुके बंशका वर्णन है, जो पढ़ने और सुननेवालेकी कीर्तिको बढ़ानेवाला है। इसके बाद इन्द्रके अपने स्थानसे च्युत होने और पुन: उसपर प्रतिष्ठित होनेका प्रसंग है ॥ तत्पश्चात् क्षत्रवृद्धकी संततिका वर्णन आया है॥४॥ फिर दिवोदासकी प्रतिष्ठा, राजा त्रिशकुुकी कथा, ययातिका चरित्र और पूरुवंशका वर्णन है॥५॥ इसके बाद श्रीकृष्णके प्राकट्यका वर्णन है, फिर स्यमन्तकमणिकी कथा संक्षेपसे कही गयी है। तत्पश्चात् भगवान् विष्णुके अवतार बताये गये हैं॥६॥ तदनन्तर तारकामय युद्धका प्रसंग है। फिर ब्रह्मलोकका वर्णन है। भगवान् विष्णुके योगनिद्रासे उठनेकी कथा है। इसके बाद ब्रह्माजी और पृथ्वीके वचन हैं। तत्पश्चात् देवताओंके अंशावतरणकी कथा है। तदनन्तर (द्वितीय विष्णुपर्वमें ) कंसके प्रति नारदजीका वचन, भगवान् विष्णुका जलमें सोये हुए षड़्गर्भ नामक हैत्योंके जीवोंको खींचकर निद्रादेवीके हाथमें देना, आयदिवीकी स्तुति, श्रीकृष्णेके अवतारका

English

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अध्याय ११९

श्लोक 38

ग्राह्या लालयितव्याश् च पूज्याश् च सततं बुधैः शीलवत्यो नमस्कार्याः पूज्याः स्त्रिय इव स्त्रियः

grāhyā lālayitavyāś ca pūjyāś ca satataṃ budhaiḥ śīlavatyo namaskāryāḥ pūjyāḥ striya iva striyaḥ

हिन्दी अर्थ

विस्तारपूर्वक वर्णन, उनका गौओंके ब्रजमें गमन, छकड़ेको उलटना, पूतनाका वध करना, अर्जुन नामक जुड़वें वृक्षोंको तोड़ देना, गोपोंको भेड़ियोंका दर्शन तथा समस्त गोब्रजका वृन्दावनमें निवास--इन विषयोंका क्रमश: वर्णन है॥ ७--१० ॥ इसके बाद वर्षाका वर्णन, श्रीकृष्णद्वारा यमुनाके कालियदहका दर्शन, कालियनागका दमन, बलरामद्वारा धेनुकासुर और प्रलम्बासुरका वध, शरदू- वर्णन, गिरियज्ञका आरम्भ, श्रीकृष्णद्वारा गोवर्धन-धारण, उनका गोविन्द-पदपर अभिषेक, उनकी गोपियोंके साथ क्रीड़ा, उनके द्वारा अरिष्सुरका वध और कंसका अक्रूरको ब्रजमें भेजना--इन विषयोंका उल्लेख है॥११--१३॥ अन्धकस्य च वाक्यानि केशिनो निधन तथा । अक्रूरागमनं चैव नागलोकस्य दर्शनम् उग्रसेनाभिषेकश्च॒ यादवाश्वासनं॑ तथा

English

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अध्याय ११९

श्लोक 39

एवं स विश्वावसुनानुनीतः प्रसादम् आगम्य वपुष्टमायाम् चकार मिथ्याव्यतिशङ्कितात्मा शान्तिं परां तत्र स धर्मजुष्टाम्

evaṃ sa viśvāvasunānunītaḥ prasādam āgamya vapuṣṭamāyām cakāra mithyāvyatiśaṅkitātmā śāntiṃ parāṃ tatra sa dharmajuṣṭām

हिन्दी अर्थ

प्रत्यागतिर्गुरुकुलादथोक्ता रामकृष्णयो:। मथुरायाश्रोपपोधो. जरासंधनिवर्तनम् गोमन्तस्य॒गिरेर्दाह: करवीरपुरे गतिः। श्रुगालस्य वधस्तत्र मथुरागमनं ततः यमुनाकर्षणं॑ चैव मथुरापक्रमस्तथा। उपायेन वध: कालयवनस्य प्रकीर्तित: बलदेवाह्निकं पुण्यं बलमाहात्म्यमेव च। नरकस्य वध: पारिजातस्यथ हरणं तथा

English

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अध्याय ११९

श्लोक 40

श्रमम् अभिविनिवर्त्य मानसं स समभिलषज्जनमेजयो यशः स्वम् विषयम् अनुशशास धर्मबुद्धिर् मुदितमना रमयन् वपुष्टमां ताम्

śramam abhivinivartya mānasaṃ sa samabhilaṣajjanamejayo yaśaḥ svam viṣayam anuśaśāsa dharmabuddhir muditamanā ramayan vapuṣṭamāṃ tām

हिन्दी अर्थ

द्वारवत्या विशेषेण पुनर्निर्माणकीर्तनम्। द्वारकायां प्रवेशश्व॒ सभायां च प्रवेशनम् नारदस्य च वाक्यानि वृष्णिवंशानुकीर्तनम्। घट्पुरस्थ वधाख्यानमन्धकस्य निबहणम् समुद्रयात्रा कृष्णस्य जलक्रीडाकुतूहलम्। तथा भैमप्रवीराणां मधुपानप्रवर्तकम् भानोश्व दुहितुर्भानुमत्या हरणकीर्तनम् वासुदेवस्य माहात्म्यं बाणयुद्धं प्रपश्चितम्

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अध्याय ११९

श्लोक 41

न च विरमति विप्रपूजनान् न च विनिवर्तति यज्ञशीलनात् न च विषयपरिरक्षणाच् च्युतो ऽसौ न च परिगर्हति वपुष्टमां च

na ca viramati viprapūjanān na ca vinivartati yajñaśīlanāt na ca viṣayaparirakṣaṇāc cyuto 'sau na ca parigarhati vapuṣṭamāṃ ca

हिन्दी अर्थ

भविष्य॑ पुष्करं चैव प्रपञ्लेनेव कीर्तितम्। वाराहं नारसिंहं च वामनं बहुविस्तरम् कैलासयात्रा कृष्णस्य पौण्ड्रकस्य वधस्तत: । हंसस्य डिम्भकस्यैव वधश्चैव प्रकीर्तितः फिर कंसके प्रति अंधकके वचन, केशीका वध, अक्रूरका ब्रजमें आगमन, लौटते समय उन्हें यमुनामें नागलोकका दर्शन, श्रीकृष्णके द्वारा कंसके धनुषके तोड़े जानेका वर्णन, कंसकी चाणूर और मुष्टिकसे बातचीत, तत्पश्चात् श्रीकृष्णद्वार कुवलयापीड, चाणूर एवं अन्ध्र- देशीय मुष्टिकका वध, कंसका निधन, कंसकी स्त्रियोंका विलाप, उग्रसेनका अभिषेक तथा श्रीकृष्णद्वारा यादवोंको आश्वासन आदि विषयोंका वर्णन है॥ १४--१६ ॥ बलराम

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अध्याय ११९

श्लोक 42

विधिविहितम् अशक्यम् अन्यथा हि कर्तुम् यद् ऋषिर् अचिन्त्यतपाः पुराब्रवीत् सः न च तद् अशक्यम् अन्यथा हि कर्तुम् ।इति नरपतिर् आत्मवांस् तदासौ तद् अनुविचिन्त्य बभूव वीतमन्युः

vidhivihitam aśakyam anyathā hi kartum yad ṛṣir acintyatapāḥ purābravīt saḥ na ca tad aśakyam anyathā hi kartum | iti narapatir ātmavāṃs tadāsau tad anuvicintya babhūva vītamanyuḥ

हिन्दी अर्थ

और श्रीकृष्णका गुरुकुलसे विद्या पढ़कर लौटना, जरासंधका मथुरापर घेरा डालना और पराजित होकर लौटना, विकद्गुका भाषण, श्रीकृष्ण और बलरामको परशुरामजीका दर्शन और उनसे बातचीत, उन सबका गोम॑ंत पर्वतपर चढ़ना, जरासंधका आक्रमण, उसके द्वारा गोमंतपर्वतका दाह, श्रीकृष्ण और बलरामका करवीरपुरमें जाना, श्रीकृष्णद्वारा श्रुगालका वध तथा दोनों भाइयोंका मथुरामें आगमन आदि प्रसंगोंका वर्णन है॥१७--१९॥ इसके बाद बलरामद्वारा यमुनाका आकर्षण, यादवोंका मथुरासे हट जाना और कालयवनका युक्तिपूर्वक वध--इन विषयोंका वर्णन है॥ २० ॥ तदनन्तर द्वारकाका निर्माण, रुक्मिणीका हरण, रुक्मिणीके साथ श्रीकृष्णका विवाह, बलरामद्ठारा रुक्‍्मीका वध, ६२ वें अध्यायमें बलदेवजीके माहात्म्य तथा १०९ वें अध्यायमें बलदेवजीके द्वारा प्रद्युम्नको आहिक स्तोत्रके उपदेशका वर्णन है। फिर ६३ वें अध्यायमें नरकासुरके वधका वर्णन है। तदनन्तर पारिजात-हरण, द्वारकापुरीका पुनः विशेषरूपसे निर्माण, द्वारकामें प्रवेश, सभामें प्रवेश, नारदजीके वचन तथा वृष्णिवंशकी परम्पराका वर्णन है। इसके बाद षट्पुर-वधकी कथा, अन्धकासुर- संहार, श्रीकृष्णकी समुद्रयात्रा और जलक्रौड़ा-कौतूहल,

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अध्याय ११९

श्लोक 43

इति नृपतिर् अदीनविक्रमस् तद् अनुविचिन्त्य बभूव निर्वृतः ।इदं महाकाव्यम् ऋषेर् महात्मनः पठन् नृणां पूज्यतमो भवेन् नरः प्रकृष्टम् आयुः समवाप्य दुर्लभं लभेत सर्वज्ञफलं च केवलम्

iti nṛpatir adīnavikramas tad anuvicintya babhūva nirvṛtaḥ | idaṃ mahākāvyam ṛṣer mahātmanaḥ paṭhan nṛṇāṃ pūjyatamo bhaven naraḥ prakṛṣṭam āyuḥ samavāpya durlabhaṃ labheta sarvajñaphalaṃ ca kevalam

हिन्दी अर्थ

भीमवंशी वीरोंकी मधुपानमें प्रवृत्ति, श्रीहरिकी इच्छासे छालिक्य गान्धर्वका भूतलपर आनयन, भानृपुत्री भानुमतीके हरणकी कथा, शम्बरासुरका वध, धन्योपाख्यान, वासुदेव- माहात्म्य तथा बाणासुरके युद्ध आदि विषयोंका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है॥ २१--२७॥ (तीसरे भविष्यपर्वमें) भविष्य- राजवंश एवं भावी कलियुगका वर्णन, फिर पुष्कर-प्रादुर्भावका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् भगवान्के वराह, नूसिंह और वामन अवतारकी कथाका अधिक विस्तृत वर्णन है॥ २८ ॥ तदनन्तर श्रीकृष्णकी कैलासयात्रा, पौण्ड्क-वध तथा हंस और डिम्भकके मारे जानेके प्रसंगका वर्णन आया है पुरत्रयस्थ संहार इति तवृत्तान्तसंग्रहः। नृपश्रेष्ठ ! तत्पश्चात् महादेवजीके द्वारा त्रिपुरके संहारकी

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अध्याय ११९

श्लोक 44

शतक्रतोः कल्मषविप्रमोक्षणं पठन् इदम् मुच्यति कल्मषान् नरः तथैव कामान् विविधान् समश्नुते समाप्तकामश् च चिराय नन्दति

śatakratoḥ kalmaṣavipramokṣaṇaṃ paṭhan idam mucyati kalmaṣān naraḥ tathaiva kāmān vividhān samaśnute samāptakāmaś ca cirāya nandati

हिन्दी अर्थ

संग्रह बताया गया है। यह समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥३०॥ कुरुश्रेष्ठ! जो एकाग्रचित्त होकर हि हि प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल इस वृत्तान्तको सुनता वृत्तान्त श्रणुयाद यस्तु साय॑ प्रातः समाहित: । है, वह सफलमनोरथ होकर भगवान् विष्णुके धाममें जाता स याति वैष्णवं धाम लब्धकामः कुरूद्वह। है। यह वृत्तान्त धन, यश और आयुकी प्राप्ति करनेवाला धन्य यशस्यमायुष्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ ३१ तथा भोग और मोक्षरूपी फलको देनेवाला है इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वृत्तान्तसंग्रहे चतुस्त्रिशदधिकशततमो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें वृत्तान्तसंग्रहविषयक एक सौ चॉँतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

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अध्याय ११९

श्लोक 45

यथा हि पुष्पप्रभवं फलं द्रुमात् ततः प्रजायन्ति पुनश् च पादपाः तथा महर्षिप्रभवा इमा गिरः प्रवर्धयन्ते तम् ऋषिं प्रवर्तिताः

yathā hi puṣpaprabhavaṃ phalaṃ drumāt tataḥ prajāyanti punaś ca pādapāḥ tathā maharṣiprabhavā imā giraḥ pravardhayante tam ṛṣiṃ pravartitāḥ

हिन्दी अर्थ

जनमेजय उवाच जनमेजयने पूछा--मुनिवरोत्तम! अब आप मेरे किं फलं किं च देयं वै तद् ब्रूहि त्वं ममाग्रत: ॥ ९ फल होता है और उस समय क्‍या दान देना चाहिए ? वैशम्पायन उवाच '. वैशम्पायनजीने कहा-- भरतवंशशिरोमणे! हरिवंशपुराण सा वाचिकं चैव मनसा समुपार्जितम् ॥ २ पापोंका उसी प्रकार नाश हो जाता है, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार। अठारह पुराणोंके श्रवणसे जो फल प्राप्त होता है, उसे विष्णुभक्त पुरुष केवल हरिवंश सुनकर प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। जो

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अध्याय ११९

श्लोक 46

पुत्रान् अपुत्रो लभते सुवर्चसश् च्युतः पुनर् विन्दति चात्मनः स्थितिम् व्याधिं न चाप्नोति चिरं च बन्धनं क्रियां च पुण्यां लभते गुणान्वितः

putrān aputro labhate suvarcasaś cyutaḥ punar vindati cātmanaḥ sthitim vyādhiṃ na cāpnoti ciraṃ ca bandhanaṃ kriyāṃ ca puṇyāṃ labhate guṇānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

तत् फल॑ं समवाप्रोति वैष्णवो नात्र संशय: । श्रद्धापूर्वक्कत हरिवंशके आधे या चौथाई श्लोकको भी राजन्! कलियुगमें जम्बूद्यीपका आश्रय लेकर रहनेवाले श्रृण्वन्ति श्रद्धया युक्ता वैष्णवं पदमाप्रुयु;। लोगोंमें इस ग्रन्थके श्रोता दुर्लभ हो जायँगे, यह मैं सत्य- जम्बूद्वीपं समाश्रित्य श्रोतारो दुर्लभा: कलौ॥ ५ सत्य कहता हूँ। पुत्रकी कामना रखनेवाली स्त्रियोंको भविष्यन्ति नरा राजन् सत्य॑ सत्यं वदाम्यहम्। भगवान् विष्णुके सुयशसे भरे हुए इस ग्रन्थका अवश्य स्त्रीभिश्न पुत्र॒कामाभि: श्रोतव्यं वैष्णवं यश: ॥ ६ “रण करना चाहिए ॥ २--६॥ जो शास्त्रोक्त फलको प्राप्त करनेकी इच्छा रखता हो, उस श्रोताको चाहिए कि दक्षिणा चात्र देया बै निष्कत्रयसुवर्णकम्। वह अपनी शक्तिके अनुसार वाचकको हरिवंश सुननेकी वाचकाय यथाशक्त्या यथोक्तं फलमिच्छता।॥। ७ दक्षिणाके रूपमें तीन निष्क सुवर्ण प्रदान करे

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अध्याय ११९

श्लोक 47

पतिम् उपलभते च सत्सु कन्या श्रवणम् उपेत्य शुभा मुनेस् तु वाचः जनयति च सुतान् गुणैर् उपेतान् रिपुजनमर्दनवीर्यशालिनश् च

patim upalabhate ca satsu kanyā śravaṇam upetya śubhā munes tu vācaḥ janayati ca sutān guṇair upetān ripujanamardanavīryaśālinaś ca

हिन्दी अर्थ

अष्टादशपुराणानां श्रवणाद् यत् फलं भवेत् १. सोलह मासे वजनका एक निष्क होता है। (संस्कृत शब्दार्थकौस्तुभ) वाचकाय प्रदद्याद्वै आत्मन: श्रेयकाइल्लया अलंकारं प्रदद्याच्य पाण्योर्वै भरतर्षभ। कर्णस्याभरणं दद्याद् यानं च सविशेषतः

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अध्याय ११९

श्लोक 48

विजयति वसुधां च क्षत्रवृत्तिर् धनम् अतुलं लभते द्विषज्जयं च विपुलम् अपि धनं लभेच् च वैश्यः सुगतिम् इयाच् छ्रवणाच् च शूद्रजातिः

vijayati vasudhāṃ ca kṣatravṛttir dhanam atulaṃ labhate dviṣajjayaṃ ca vipulam api dhanaṃ labhec ca vaiśyaḥ sugatim iyāc chravaṇāc ca śūdrajātiḥ

हिन्दी अर्थ

श्रुणोति श्रावयेद् वापि हरिवंशं तु यो नर: । सर्वथा पापनिर्मुक्तो वैष्णवं पदमाप्रुयात् पितृनुद्धत्ते सर्वानेकादशसमुदभवान्। आत्मानं ससुतं चैव स्त्रियं च भरतर्षभ दर्शांशश्चात्र होमो वै कार्य: श्रोत्रा नराधिप। इदं मया तवाग्रे चर सर्व प्रोक्ते नरर्षभ यस्य स्मरणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते। अपुत्र: पुत्रमाप्नोति अधनो धनमाप्नुयात् तत् फल॑ लभते नूनं पुराणश्रवणाद्धरेः

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अध्याय ११९

श्लोक 49

पुराणम् एतच् चरितं महात्मनाम् अधीत्य बुद्धिं लभते च नैष्ठिकीम् विहाय दुःखानि विमुक्तसङ्गः स वीतरागो विचरेद् वसुंधराम्

purāṇam etac caritaṃ mahātmanām adhītya buddhiṃ labhate ca naiṣṭhikīm vihāya duḥkhāni vimuktasaṅgaḥ sa vītarāgo vicared vasuṃdharām

हिन्दी अर्थ

ब्रह्महा भ्रूणहा गोघ्नः सुरापो गुरुतल्पगः। सकृत्पुराणश्रवणात् पूतो भवति नान्यथा इंद मया ते परिकीर्तितं मह- च्छीकृष्णमाहात्म्यमपारमद्भुतम् । यच्चापि लोकेषु सुदुर्लभ महत् अपने कल्याणकी इच्छासे वह वाचकको वस्त्र और बछड़ेसहित एक कपिला गौ भी दे, जिसके सींगोंमें सोना मढ़ा हुआ हो॥ ८॥ भरतश्रेष्ठ! वह दोनों हाथोंके लिये अलंकार (कड़े, बाजूबन्द, अँगूठी आदि) भी दे

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अध्याय ११९

श्लोक 50

इत्य् एतद् आख्यानम् उदाहृतं वः प्रतिस्मरन्तो द्विजमण्डलेषु स्थैर्येण जातेन पुनः स्मरन्तः सुखं भवन्तो विचरन्तु लोकम्

ity etad ākhyānam udāhṛtaṃ vaḥ pratismaranto dvijamaṇḍaleṣu sthairyeṇa jātena punaḥ smarantaḥ sukhaṃ bhavanto vicarantu lokam

हिन्दी अर्थ

तथा कानके आभूषण (कुण्डल आदि) भी अर्पित करे; विशेषत:, शिविका आदि कोई सवारी अवश्य दे चाहिए; क्योंकि भूमिदानके समान दूसरा कोई दान न तो हुआ है और न होगा ही॥१०॥ जो मनुष्य पापमुक्त होकर भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त कर लेता है॥ ११॥ भरतग्रेष्ठ वह अपनी ग्यारह पीढ़ीके समस्त पितरोंका उद्धार कर देता है। साथ ही अपना, अपने पुत्रका तथा अपनी पत्नीका भी उद्धार करता है नरेश्वर! नरश्रेष्ठ ! श्रोताको इस हरिवंश-श्रवणके उपलक्ष्यमें इसकी श्लोकसंख्याका दशांश हवन करना चाहिए। यह सब कुछ मैंने तुम्हारे सामने कह दिया॥ १३॥ इसके स्मरणमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसके श्रवणसे पुत्रहीनको पुत्र और निर्धनको धनकी प्राप्ति होती है॥ १४॥ नरमेध और अश्वमेध यज्ञोंसे मनुष्योंको जो फल प्राप्त होता है, उसीको श्रीहरिके इस पुराणका श्रवण करनेसे मनुष्य निश्चय ही प्राप्त कर लेता

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अध्याय ११९

श्लोक 51

इति चरितम् इदं महात्मनाम् ऋषिकृतम् अद्भुतवीर्यकर्मणाम् कथितम् इदं हि समासविस्तरैः किम् अपरम् इच्छसि किं ब्रवीमि ते

iti caritam idaṃ mahātmanām ṛṣikṛtam adbhutavīryakarmaṇām kathitam idaṃ hi samāsavistaraiḥ kim aparam icchasi kiṃ bravīmi te

हिन्दी अर्थ

है॥ १५॥ ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या, गोहत्या, सुरापान और गुरुपज्नीगमन--इन महापातकोंसे युक्त मनुष्य भी इस पुराणको एक बार पूर्वोक्त विधिसे सुन लेनेपर पवित्र हो जाता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए यह मैंने तुमसे श्रीकृष्फे अपार, अद्भुत एवं महान् माहात्म्यका वर्णन किया है। जो इसे सुनता और पढ़ता है, वह लोकमें जो परम दुर्लभ और महान् फल है, उसे भी शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है इति श्रीमहाभारते शतसाहस्त्यां संहितायां वैयासिक्यां खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वण श्रवणफलकथने पशञ्ञत्रिंशदधिकशततमो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतमें व्यासनिर्मित एक लाख एलोकोंकी संख्याके अन्तर्गत उसके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 119
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.