Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
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अध्याय 118 / 119

Adhyaya 117

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अध्याय ११८

श्लोक 1

एषं विलुलिते लोके मनुष्याः केन पालिताः निवत्स्यन्ति किमाचाराः किमाहारविहारिणः

eṣaṃ vilulite loke manuṣyāḥ kena pālitāḥ nivatsyanti kimācārāḥ kimāhāravihāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

समान महानील (या काला) प्रतीत होता था उसी महाघोर कालियहदमें हंस कूद पड़ा। उसके कूदनेपर वहाँ बड़ा भारी धमाकेका-सा शब्द हुआ, रथादुत्प्लुत्य कृष्णो5पि तस्योपरि पपात ह देवदेवो जगन्नाथो जगद् विस्मापयतन्निव। प्राहरत् तं महाबाहु: पादाभ्यामथ केशव: ममार च नृपश्रेष्ठ केचिदेव॑ वदन्ति हि॥

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अध्याय ११८

श्लोक 2

किंकर्माणः किमीहन्तः किंप्रमाणाः किमायुषः कां च काष्ठां समासाद्य प्रपत्स्यन्ति कृतं युगम्

kiṃkarmāṇaḥ kimīhantaḥ kiṃpramāṇāḥ kimāyuṣaḥ kāṃ ca kāṣṭhāṃ samāsādya prapatsyanti kṛtaṃ yugam

हिन्दी अर्थ

हते तस्मिन् महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: अकरोद् राजसूयं चर तब पूर्वपितामहः। यदि जीवेदसौ हंस: को नमस्यति त॑ क्रतुम् क्षणादेव महाराज वार्तेयं गामगाहत हतो हंसो हतो हंसः कृष्णेन रिपुमर्दिना। जगुर्गन्‍्धर्वपतयो देवलोके दिवानिशम्

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अध्याय ११८

श्लोक 3

अत ऊर्ध्वं च्युते धर्मे गुणहीनाः प्रजास् ततः शीलव्यसनम् आसाद्य प्राप्स्यन्ते ह्रासम् आयुषः

ata ūrdhvaṃ cyute dharme guṇahīnāḥ prajās tataḥ śīlavyasanam āsādya prāpsyante hrāsam āyuṣaḥ

हिन्दी अर्थ

कृष्णेन लोकनाथेन विष्णुना प्रभविष्णुना। यमुनाया हदे घोरे हंसो निहत इत्यपि मानो इन्द्रके द्वारा समुद्रमें गिराये जाते हुए पर्वतोंका कोलाहल प्रकट हुआ हो। तब जगदीश्वर देवाधिदेव श्रीकृष्ण भी सम्पूर्ण जगत्को विस्मयमें डालते हुए-से रथसे उछलकर उस कुण्डमें हंसके ऊपर कूद पड़े। उस समय महाबाहु केशवने उसपर दोनों पैरोंसे प्रहार किया। नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! श्रीकृष्णके चरणोंका प्रहार पाकर राजा हंस मर गया-ऐसा कुछ लोग कहते हैं॥ ४--७॥ राजेन्द्र! दूसरोंका कहना है कि वह पातालमें धँस गया और वहाँ सर्प उसे खा गये। वह अबतक वहाँसे लौटा नहीं देखा गया--ऐसा उसके पूर्ववत् रथपर आ गये। महाराज ! हंसके मारे जानेपर ही तुम्हारे पूर्वपितामह धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने राजसूय यज्ञ किया था। यदि हंस जीवित होता तो कौन उस यज्ञके सामने मस्तक झुकाता॥ ९-१०॥ प्रभो! वह भगवान्

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अध्याय ११८

श्लोक 4

आयुर्हार्न्या बलग्लानिर् बलग्लान्या विवर्णता वैवर्ण्याद् व्याधिसंपीडा निर्वेदो व्याधिपीडनात्

āyurhārnyā balaglānir balaglānyā vivarṇatā vaivarṇyād vyādhisaṃpīḍā nirvedo vyādhipīḍanāt

हिन्दी अर्थ

रुद्रसे वर पाकर सदाके लिये सम्पूर्ण अस्त्रोंका ज्ञाता हो गया था। महाराज! क्षणभरमें यह समाचार भूमण्डलमें फैल गया। “शत्रुओंका मान-मर्दन करनेवाले श्रीकृष्णने हंसको मार डाला, हंसको मार डाला'--यह गन्धर्वराजगण देवलोकमें दिन-रात गान करने लगे॥ ११-१२ ॥ “सम्पूर्ण जगतके स्वामी प्रभावशाली विष्णुस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने यमुनाके भयंकर हृदमें हंसको मार डाला।' इस प्रकार उनके यशका सर्वत्र गान होने लगा इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि हंसडिम्भकोपाख्याने हंसवधे अष्टाविंशत्यधिकशततमो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें हंस-डिम्थकोपाख्यानके प्रसड़में हंसका वधविषयक

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अध्याय ११८

श्लोक 5

निर्वेदाद् आत्मसंबोधः संबोधाद् धर्मशीलता एवं गत्वा परां काष्ठां प्रपत्स्यन्ति कृतं युगम्

nirvedād ātmasaṃbodhaḥ saṃbodhād dharmaśīlatā evaṃ gatvā parāṃ kāṣṭhāṃ prapatsyanti kṛtaṃ yugam

हिन्दी अर्थ

एक सौ अद्वाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ एकोनत्रिंशदधिकशततमो5ध्याय: “555 एकोनत्रिंशदधिकशततमो5 ध्याय: .- डिम्भककी आत्महत्या बलदेवं परित्यज्य युध्यमानं महारणे

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अध्याय ११८

श्लोक 6

उद्देशतो धर्मशीलाः केचिन् मध्यस्थतां गताः विमर्शशीलाः केचित् तु हेतुवादकुतूहलाः

uddeśato dharmaśīlāḥ kecin madhyasthatāṃ gatāḥ vimarśaśīlāḥ kecit tu hetuvādakutūhalāḥ

हिन्दी अर्थ

डिम्भको वीर्यसम्पन्नो यमुनामनुजग्मिवान्। तमन्वधावद् वेगेन बलभद्रो हलायुध: अथ क्रुद्ध: स डिम्भको भ्रामयित्वा जल॑ बहु। उन्मज्ज्योन्मज्य सहसा निमज्य च पुनः पुन: उन्मज्ज्याथ महाबाहुर्वासुदेवं विलोक्य च उबाच वचन राजन डिम्भको वीर्यवत्तम:ः । अरे गोपकदायाद क्रासौ हंस इति स्थित:

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अध्याय ११८

श्लोक 7

प्रत्यक्षम् अनुमानं च प्रमाणम् इति निश्चिताः प्रमाणं किं करिष्यति नेति पण्डितमानिनः अप्रमाणं करिष्यन्ति वेदोक्तम् अपरे जनाः

pratyakṣam anumānaṃ ca pramāṇam iti niścitāḥ pramāṇaṃ kiṃ kariṣyati neti paṇḍitamāninaḥ apramāṇaṃ kariṣyanti vedoktam apare janāḥ

हिन्दी अर्थ

वासुदेवो5पि धर्मात्मा यमुनां पृष्छ राजक। इत्यब्रवीतू् प्रसन्नात्मा वासुदेव: प्रतापवान् बहुप्रकारमुद्रीक्ष्य भ्रातरं भ्रातृवत्सल: बिललाप ततो राजा डिम्भको भ्रान्तमानस:। क्र नु गच्छसि राजेन्द्र विहायैनमबान्धवम् विलप्यवं नृपश्रेष्ठ डिम्भको भ्रातृवत्सल: ममारान्तर्जले राजन् डिम्भको नरकाय वै। एवं तु निहते हंसे डिम्भके वीर्यशालिनि

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अध्याय ११८

श्लोक 8

तदा मुखभगाश् चैव भविष्यन्ति स्त्रियो ऽपराः ।नास्तिक्यपरमाश् चापि केचिद् धर्मविलोपकाः भविष्यन्ति नरा मूढा मन्दाः पण्डितमानिनः

tadā mukhabhagāś caiva bhaviṣyanti striyo 'parāḥ | nāstikyaparamāś cāpi kecid dharmavilopakāḥ bhaviṣyanti narā mūḍhā mandāḥ paṇḍitamāninaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अपने पराक्रमशाली भाई अत्यन्त उग्र हंसको उस महासमरमें मारा गया सुनकर बलवान डिम्भक जूझते हुए बलभद्रको वहीं छोड़कर यमुनाजीके तटपर गया। उस समय हलधर बलभद्रने बड़े वेगसे उसका पीछा किया॥ १-२॥ महाराज ! हंस जहाँ यमुनाजीमें कूदा था, वहीं डिम्भक भी कूद पड़ा। उसने यमुनाकी जलरशिकों मथ डाला क्रोधमें भरा हुआ डिम्भक उस जलमें चक्कर लगाकर सहसा गोता लगाता और ऊपरको निकल आता था। राजन्! इस प्रकार बारम्बार डुबकी लगानेपर भी उसने अपने पराक्रमशाली भाईको वहाँ नहीं देखा। राजन्! तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु डिम्भक जलसे ऊपर आकर वासुदेव श्रीकृष्णको सामने देख उनसे इस प्रकार बोला-- अरे गोपपुत्र ! वह हंस कहाँ है ?' धर्मात्मा वासुदेवने भी उत्तर दिया--'नीच नरेश! यमुनाजीसे पूछ'। प्रतापी

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अध्याय ११८

श्लोक 9

तदात्वमात्रश्रद्धेयाः शास्त्रज्ञानविमूर्छिताः दाम्भिकास् ते भविष्यन्ति वादशीलपरायणाः

tadātvamātraśraddheyāḥ śāstrajñānavimūrchitāḥ dāmbhikās te bhaviṣyanti vādaśīlaparāyaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

वासुदेवने जब प्रसन्नचित्त होकर इस प्रकार कहा, तब भ्रातृवत्सल डिम्भकने उनकी बात सुनकर पुन: यमुनामें प्रवेश किया और नाना प्रकारसे अपने भाईकी खोज करके भ्रान्तचित्त हुआ वह राजा विलाप करने लगा। “राजेन्द्र! इस बन्धुहीन डिम्भकको छोड़कर कहाँ जा रहे हो ? भैया! मुझे यहीं छोड़कर यहाँसे कहाँ चले जा रहे हो ?!। नृपश्रेष्ठ जनममेजय! इस प्रकार विलाप करके भ्रातृवत्सल डिम्भकने यमुनाजीके महानू कुण्डमें अपने शरीरको त्याग देनेका विचार किया। सहसा गोता लगाकर वह जलसे ऊपरको उठा और मरनेका निश्चय करके बारम्बार विलाप करनेके पश्चात् स्वयं दुःसाहस करनेवाला वह डिम्भक हाथसे जिह्ाको जड़सहित बाहर खींचकर जलके भीतर मर गया। राजन! उसका यह दुर्मरण नरककी प्राप्ति करनेवाला था। इस प्रकार पराक्रमशाली हंस और डिम्भकके मारे जानेपर आगमत् पुण्डरीकाक्षो भूतान् विस्मापयन्निव। ततः प्रीतः प्रसन्नात्मा वासुदेव: प्रतापवानू

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Contributions to the

अध्याय ११८

श्लोक 10

तदा विचलिते धर्मे जनाः शेषपुरस्कृताः शुभान्य् एवाचरिष्यन्ति दानसत्यसमन्विताः

tadā vicalite dharme janāḥ śeṣapuraskṛtāḥ śubhāny evācariṣyanti dānasatyasamanvitāḥ

हिन्दी अर्थ

कंचित् काल॑ महाराज पूर्वभुक्तमुवास ह कमलनयन श्रीकृष्ण सम्पूर्ण भूतोंको विस्मयमें डालते हुए-से लौट आये। महाराज! इससे प्रीतियुक्त और प्रसन्नचित्त हुए प्रतापी भगवान् वासुदेवने बलभद्रजीके साथ गोवर्धन पर्वतपर विश्राम करके अपने पूर्वभुक्त स्थानपर कुछ कालतक निवास किया॥ ४--१५॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि डिम्भकमरणे एकोनत्रिंशदधिकशततमो5ध्याय:

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अध्याय ११८

श्लोक 11

सर्वभक्षो ह्य् असंगुप्तो निर्गुणो निरपत्रपः भविष्यति तदा लोकस् तत् कषायस्य लक्षणम्

sarvabhakṣo hy asaṃgupto nirguṇo nirapatrapaḥ bhaviṣyati tadā lokas tat kaṣāyasya lakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हारिवंश॒के अन्तर्गत भविष्यपर्वमें डिम्थकका मरणविषयक एक सा उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ गोप-गोपियोंसहित यशोदा और नन्दका गोवर्धन पर्वतपर आकर श्रीकृष्ण और बलभद्रगसे मिलना यशोदा नन्दगोपश्च॒ कृष्णदर्शनलालसौ। गोवर्धनगतं श्रुत्वा वासुदेव॑ सहाग्रजम् क्रचिद् वृक्षे समासक्त कृष्णं कृष्णमृगेक्षणम्। ददर्शतुर्मझाबाहूं वासुदेव॑ सहाग्रजम् दर्शयामासतुर्देवी पायसानि महान्ति च

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अध्याय ११८

श्लोक 12

विप्राणां शाश्वतीं वृत्तिं यदा वर्णावरो जनः अभिपत्स्यति वृत्त्यर्थं तत् कषायस्य लक्षणम्

viprāṇāṃ śāśvatīṃ vṛttiṃ yadā varṇāvaro janaḥ abhipatsyati vṛttyarthaṃ tat kaṣāyasya lakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

अपि वा दारका मातर्वत्सपाला: पिबन्ति च बहूनि चापि दामानि कौलका अपि वा बहु। तृणानि बहुरूपाणि कि वा सन्ति पितः सदा अपि गोपष्य: पृत्रवत्यो दारकान् किमजीजननू वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज जनमेजय ! यशोदा और नन्दगोपके मनमें श्रीकृष्णको देखनेके लिये बड़ी लालसा थी। जब उन्होंने सुना कि श्रीकृष्ण अपने बड़े भाईके साथ गोवर्धन पर्वतपर आये हैं, तब वे दोनों

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अध्याय ११८

श्लोक 13

कषायोपप्लवे काले ज्ञानविद्याप्रणाशने सिद्धिम् अल्पेन कालेन यास्यन्ति निरुपस्कृताः

kaṣāyopaplave kāle jñānavidyāpraṇāśane siddhim alpena kālena yāsyanti nirupaskṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

सहसा बड़े प्रसन्न हुए और मक्खन, दही, खीर, खिचड़ी, जंगली फूल तथा मोरपंखके बाजूबंद लेकर सब ओरसे एकत्र हुए दूसरे गोपों और गोपियोंके साथ गोवर्धन पर्वतपर गये॥ १--३॥ वहाँ उन्होंने कृष्णमृगके समान विशाल नेत्रवाले वसुदेवनन्दन महाबाहु श्रीकृष्णको अपने बड़े भाईके साथ कहीं वृक्षेके नीचे उससे सटकर बैठे देखा॥ ४॥ उन्हें देखकर नन्‍्द और यशोदा बड़े प्रसन्न हुए, फिर उन महाबली देवता श्रीकृष्ण-बलदेवने नन्द और यशोदाको प्रणाम किया। इसके बाद यशोदा और नन्दने खीर आदि महत्त्वपूर्ण उपहार उनके सामने प्रस्तुत किया॥ ५॥ उस समय श्रीकृष्णने पूछा--'बाबा! मैया! व्रजके गोष्ठमें अपने सभी गोधन सकुशल तो हैं न? पिताजी ! गौएँ दूध देती हैं न? उनके बड़े-छोटे बछड़े सुखी हैं न?'॥६॥ “क्या ब्रजकी गौओंका दूध शुद्ध एवं मड्नलकारी होता है ? क्या अपने यहाँ सुन्दर शोभामयी गौएँ हैं ? मैया! छोटे-छोटे बच्चे और बछड़े चरानेवाले बालक भरपूर दूध पीते हैं न?॥ ७॥ “बाबा! क्‍या अपने यहाँ बहुत-सी रस्सियाँ, बहुतेंरे खूँटे तथा अनेक प्रकारकी घासें सदा प्रस्तुत रहती हैं ?'॥ ८ ॥ 'पिताजी ! क्या छकड़े सदा गोरससे सुगन्धित रहते हैं ? क्या गोपियाँ पुत्रवती हुई

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अध्याय ११८

श्लोक 14

महायुद्धं महानादं महावर्षं महाभयम् भविष्यति युगे क्षीणे तत् कषायस्य लक्षणम्

mahāyuddhaṃ mahānādaṃ mahāvarṣaṃ mahābhayam bhaviṣyati yuge kṣīṇe tat kaṣāyasya lakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

हैं? क्‍या उन्होंने बच्चोंको जन्म दिया है?' “मैया! कया ब्रजमें सब ओर बिना फूटे हुए बहुत- किं गाव: क्षीरमतुलं स्त्रवन्त्यहरह: पितः ॥ १० से घड़े हैं ? बाबा? क्या गौएँ प्रतिदिन अतुलनीय दुग्ध हैयड्भवीनं क्षीराणि दधि वा किमजीजनन्।

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अध्याय ११८

श्लोक 15

विप्ररूपाणि रक्षांसि राजानः कर्णवेदिनः चरिष्यन्ति वसुंधरां ।प्रनष्टवर्णधर्माश् च ।पृथिवीम् उपभोक्ष्यन्ति युगान्ते प्रत्युपस्थिते

viprarūpāṇi rakṣāṃsi rājānaḥ karṇavedinaḥ cariṣyanti vasuṃdharāṃ | pranaṣṭavarṇadharmāś ca | pṛthivīm upabhokṣyanti yugānte pratyupasthite

हिन्दी अर्थ

कुशलं गोधनस्यैव सर्वकालेषु केशव रक्षणात् तव देवेश सदा कुशलिनो वयम्। सगोधनाः सवत्साश्र नीरोगा इव केशव एकमेव सदा दुःखं न त्वां द्रक्ष्यामि केशव। यदेतत् केवल दुःखमिति धी: शीर्यते सदा एवमादि विलप्यन्तं गच्छेत्याह स केशव: । यशोदां पुनराहेदं मातर्गच्छ गृहं प्रति

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अध्याय ११८

श्लोक 16

निःस्वाध्यायवषट्कारा मुनयश् चाभिमानिनः क्रव्यादा ब्रह्मरूपेण सर्वभक्षा वृथाव्रताः

niḥsvādhyāyavaṣaṭkārā munayaś cābhimāninaḥ kravyādā brahmarūpeṇa sarvabhakṣā vṛthāvratāḥ

हिन्दी अर्थ

ये च त्वां कीर्तयिष्यन्ति ते च स्वर्गमवाप्नुयु:। ये केचित् त्वां नमस्यन्ति ते मे प्रियतरा: सदा। इत्युक्त्वा पितरौ देवो वासुदेव: सनातन: गाढमालिडुद्य तो प्रीतौ प्रेषयामास केशव: । यशोदा नन्दगोपश्च जग्मतुः स्वगृहं प्रति ततः कृष्णो हृषीकेशो यादव: सह वृष्णिभि: । गन्तुमैच्छत् तदा विष्णु: पुरी द्वारवतीं किल

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अध्याय ११८

श्लोक 17

मूर्खाः स्वार्थपरा लुब्धाः क्षुद्राः क्षुद्रपरिच्छदाः व्यवाहारोपवृत्ताश् च च्युता धर्माच् च शाश्वतात्

mūrkhāḥ svārthaparā lubdhāḥ kṣudrāḥ kṣudraparicchadāḥ vyavāhāropavṛttāś ca cyutā dharmāc ca śāśvatāt

हिन्दी अर्थ

पुत्रवान् धनवांश्वैव अन्ते मोक्ष च गच्छति प्रदान करती हैं 2॥ १० ॥ ' क्या अपनी गौओंने दूध-दही और मक्‍्खनकी उपज बढ़ायी हैं? अपना सारा गोधन नीरोग तो है न?' नन्द बोले--प्रभो यदुश्रेष्ठ) अपना यह सारा गोधन प्राय: नीरोग ही है। केशव! गोधन तो सदा ही सकुशल है॥१२॥ देवेश्वर! तुम्हारे संरक्षणसे हमलोग सदा कुशलपूर्वक रहते हैं। केशव ! हम गोधन और बछड़ोंसहित नीरोग-से ही हैं॥ १३ ॥ श्रीकृष्ण! मुझे तो सदा एक ही दुःख बना रहता है कि मैं तुम्हें भर आँख देख नहीं पाता हूँ। यह जो एक ही दुःख है, इससे सदा मेरा अन्त:करण व्यथित रहता है वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस तरह विलाप करते हुए नन्दसे भगवान् श्रीकृष्णने कहा-- “बाबा! रोओ मत! अपने घरको जाओ।' फिर उन्होंने यशोदासे कहा--'मैया तुम भी घर जाओ'॥ १५ ॥ 'जो

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अध्याय ११८

श्लोक 18

हर्तारः पररत्नानां परदारप्रधर्षकाः कामात्मानो दुरात्मानः सोपधाः प्रियसाहसाः

hartāraḥ pararatnānāṃ paradārapradharṣakāḥ kāmātmāno durātmānaḥ sopadhāḥ priyasāhasāḥ

हिन्दी अर्थ

लोग तुम्हारा कीर्तन करेंगे, वे स्वर्गलोकमें जायँगे तथा जो कोई तुम्हें नमस्कार करेंगे, वे सदा-सर्वदा मेरे परम प्रिय भक्त होंगे।! ऐसा कहकर श्रीहरिने मैयासे कहा-- “तुम जाओ'। माता-पितासे ऐसा कहकर सनातन भगवान् वासुदेवने प्रसन्नतापूर्वक उनके गलेसे लगकर उन्हें विदा किया। तत्पश्चात् यशोदा और नन्दगोप अपने घरको लौट गये॥ १६--१८ ॥ तदनन्तर इन्द्रियोंके प्रेरक विष्णुस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने यादवों तथा वृष्णिवंशियोंके साथ द्वारकापुरीको लौट जानेकी इच्छा की ॥ १९ ॥ जो एकाग्रचित्त हो सदा इस प्रसंगको सुनता अथवा पढ़ता है, वह इस लोकमें पुत्रवान् और धनवान् होता है तथा अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लेता है इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वण यशोदानन्दगोपबलभद्रकृष्णसमागमे त्रिंशद्धिकशततमो 5ध्याय:

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अध्याय ११८

श्लोक 19

तेषु प्रभवमानेषु तुल्यशीलेषु सर्वतः अभाविनो भविष्यन्ति मुनयो बहुरूपिणः

teṣu prabhavamāneṣu tulyaśīleṣu sarvataḥ abhāvino bhaviṣyanti munayo bahurūpiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

इस ग्रकार श्रीमहाथारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें यशोदा नन्‍दगरोष बलभद्र और श्रीकृष्णका समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ द्वारका जाते हुए श्रीकृष्णका पुष्करमें ऋषियोंसे मिलना तथा ऋषियोंद्वारा उनका स्तवन गच्छन्नथ महाविष्णु: पुष्कर प्राप्य यादव: । अपष्यन्मुनिमुख्यांस्तु पुस्करस्थान् नृपोत्तम ते समेत्य महादेवमृषयो बीतमत्सराः। अर्ध्यादिसमुदाचारं कृत्वैनं यादवोत्तमम् प्रोचुविश्वेश्वरं विष्णुं भूतभव्यभवत्प्रभुम्। अत्यद्धुतमिदं विष्णो तव वीर्य जनार्दन

English

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अध्याय ११८

श्लोक 20

उत्पन्ना ये कृतयुगे प्रधानपुरुषाश्रयाः कथायोगेन तान् सर्वान् पूजयिष्यन्ति मानवाः

utpannā ye kṛtayuge pradhānapuruṣāśrayāḥ kathāyogena tān sarvān pūjayiṣyanti mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

यो विचक्रो दुराधर्षो देवैरपि सुदुःसहः संगरे निहतो देव दुःसाध्य इति नो मतिः। क्षेमो नः सर्वकार्येषु चरतां तप उत्तमम् त्वमोंकारो वषट्कारस्त्वं यज्ञस्त्वं पितामहः । त्वं ज्योतिर्त्रह्मणो मूर्तिस्त्वं ब्रह्मा रुद्र एव च नमो विश्वसृजे देव नमस्ते विश्वमूर्तये। पाहि लोकमिमं देव हत्वा ब्रह्मद्विष: सदा।

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अध्याय ११८

श्लोक 21

सस्यचोरा भविष्यन्ति तथा चैलापहारिणः भक्ष्यभोज्यहराश् चैव भाण्डानां चैव हारिणः

sasyacorā bhaviṣyanti tathā cailāpahāriṇaḥ bhakṣyabhojyaharāś caiva bhāṇḍānāṃ caiva hāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

इयं चर देवदेवस्थ चेष्टा हि जनमेजय। प्रोक्ता ते पृच्छते राजन् किमन्यच्छोतुमिच्छसि वैशम्पायनजी कहते हैं--नृपश्रेष्ठ जनमेजय ! वहाँसे जाते हुए महाविष्णुस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने यादवोंके साथ पुष्करमें पहुँचकर वहाँ रहनेवाले श्रेष्ठ मुनियोंका दर्शन किया॥ १ ॥ उन मात्सर्यरहित ऋषियोंने इन यदुकुल-तिलक महान् देव श्रीकृष्णसे मिलकर उन्हें अर्घ्ध आदि निवेदन करनेके पश्चात् भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी जगदी श्वर श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा-- “विष्णो! जनार्दन! आपका यह बल-पराक्रम अत्यन्त अद्भुत है, जिससे आपने युद्धमें हंस और डिम्भकको मार डाला। “देव! जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुः:सह था। उस दुर्जय वीर विचक्रको भी आपने युद्धस्थलमें मार डाला! उसे पराजित करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था। ऐसा हमारा विश्वास है'। 'अब उत्तम तपका आचरण करनेवाले हमलोगोंके सभी कार्योंमें क्षेम सुलभ हो गया। हरे! हम आपके स्मरणसे सर्वथा निष्पाप हो जायँगे। “जो सदा आपका ध्यान करते हैं, उनके सभी दुःखोंको आप हर लेते हैं। प्रभो! आपका

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अध्याय ११८

श्लोक 22

चोराश् चोरस्य हर्तारो हन्ता हर्तुर् भविष्यति चोराश् चोरक्षये चापि कृते क्षेमं भविष्यति

corāś corasya hartāro hantā hartur bhaviṣyati corāś corakṣaye cāpi kṛte kṣemaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

बास्म्बार चिन्तन प्राणिमात्रके लिये सदा पुण्य प्रदान करनेवाला है'। 'हरे! आप ही सदा हमारी तपस्याके धारण-पोषण करनेवाले हैं। आप ही ओंकार हैं आप ही वषट्कार हैं। आप ही यज्ञ हैं और आप ही पितामह हैं।' आप ही ज्योति हैं। आप ही ब्रह्ममूर्ति हैं। आप ही ब्रह्मा और रुद्र हैं। आप ही सम्पूर्ण भूतोंके प्राण हैं। आप ही अन्तरात्मा कहलाते हैं। जगत्पते ! यज्ञों और दानोंद्वारा समस्त प्राणियोंके लिये उपासना करने योग्य आप ही हैं'॥ २--९ ॥ 'देव! आप विश्वकी सृष्टि करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्व आपकी मूर्ति है, आपको नमस्कार है। देव! आप ब्रह्मद्रेहियोंका वध करके सदा इस विश्वका पालन कीजिये'॥ १० ॥ तब ' बहुत अच्छा ' कहकर श्रीविष्णु हरि द्वारकापुरीको गये और मागधोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वृष्णिवंशियोंके साथ वहाँ निवास करने लगे॥ ११॥ राजा जनमेजय ! तुम्हारे पूछनेपर मैंने देवाधिदेव श्रीकृष्णकी यह लीला तुम्हें बतायी है । तुम और क्या सुनना चाहते हो 2

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अध्याय ११८

श्लोक 23

निःसारे क्षुभिते लोके निष्क्रिये व्यन्तरे स्थिते नराः श्रयिष्यन्ति वनं करभारप्रपीडिताः

niḥsāre kṣubhite loke niṣkriye vyantare sthite narāḥ śrayiṣyanti vanaṃ karabhāraprapīḍitāḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि द्वारकायां कृष्णस्य प्रत्यागमने एकत्रिंशदधिकशततमोउध्याय: इस प्रकार श्रीयहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रत्यागमनविषयक एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ महाभारत और हरिवंशके श्रवणकी विधि और फल, वाचकके गुण, प्रत्येक पर्वपर दान देने योग्य वस्तु, एकसे लेकर दस पारणाओंकी महत्ता तथा महाभारत एवं हरिवंशका माहात्म्य भगवन् केन विधिना श्रोतव्यं भारतं बुध: । फलंकिं के च देवाश्व पूज्या वै पारणेष्विह वाचकः: कीदृशश्षात्र यष्टव्यस्तद् ब्रवीहि मे

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अध्याय ११८

श्लोक 24

पितॄन् आज्ञापयिष्यन्ति पुत्राः कर्माणि सर्वशः ।स्नुषाः श्वश्रूस् तथा चैव युगान्ते पर्युपस्थिते ।वाक्शरैस् तर्जयिष्यन्ति गुरूञ् शिष्याः समन्ततः ।यज्ञकर्मण्य् उपरते रक्षांसि श्वापदानि च कोटिमूषकसर्पाश् च धर्षयिष्यन्ति मानवान्

pitṝn ājñāpayiṣyanti putrāḥ karmāṇi sarvaśaḥ | snuṣāḥ śvaśrūs tathā caiva yugānte paryupasthite | vākśarais tarjayiṣyanti gurūñ śiṣyāḥ samantataḥ | yajñakarmaṇy uparate rakṣāṃsi śvāpadāni ca koṭimūṣakasarpāś ca dharṣayiṣyanti mānavān

हिन्दी अर्थ

दिवि देवा महीपाल क्रीडार्थमवरनिं गता:। कृत्वा कार्यमिदं चैव ततश्चव दिवमागता: ऋषीणां देवतानां च सम्भवं वसुधातले अन्न रुद्रास्तथा साध्या विश्वेदेवाश्व शाश्रवता: । आदित्याश्चाश्विनो देवी लोकपाला महर्षय: गुहाकाश्व सगन्धर्वा नागा विद्याधरास्तथा। सिद्धा धर्म: स्वयम्भूश्व मुनि: कात्यायनो वर:

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अध्याय ११८

श्लोक 25

क्षेमं सुभिक्षम् आरोग्यं सामग्र्यम् अथ बन्धुभिः उद्देशेन नरश्रेष्ठ भविष्यन्ति युगक्षये

kṣemaṃ subhikṣam ārogyaṃ sāmagryam atha bandhubhiḥ uddeśena naraśreṣṭha bhaviṣyanti yugakṣaye

हिन्दी अर्थ

तेषां श्रुतिप्रतिष्ठानां नामकर्मानुकीर्तनात्। कृत्वापि पातकं घोरं॑ सद्यो मुच्येत मानव: गाव: कांस्योपदोहाश्व कन्याश्वेव स्वलंकृता: जनमेजयने पूछा--भगवन्! विद्वान् पुरुषोंको महाभारतका श्रवण किस विधिसे करना चाहिए? इसका फल क्या है ? तथा इसकी समाप्तिपर किन-किन पर्वके समाप्त होनेपर क्‍या दान देना चाहिए ? तथा इसमें कैसे वाचकका पूजन करना चाहिए? यह सब मुझे बताइये वैशम्पायनजीने कहा--राजन् ! महाभारत सुननेकी इस विधिको सुनिये। राजेन्द्र! महाभारत श्रवण करनेसे जो फल होता है, जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे हो, वह भी बताता हूँ, सुनो॥३॥ महीपाल! स्वर्गके

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अध्याय ११८

श्लोक 26

स्वयंपालाः स्वयंचोरा युगसंभारसंभृताः मण्डलैः प्रभविष्यन्ति देशे देशे पृथक् पृथक्

svayaṃpālāḥ svayaṃcorā yugasaṃbhārasaṃbhṛtāḥ maṇḍalaiḥ prabhaviṣyanti deśe deśe pṛthak pṛthak

हिन्दी अर्थ

(अवतार-) कार्य करके वहाँसे देवलोकको लौट आये॥ ४॥ जनमेजय। मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। भूतलपर ऋषियों और देवताओं का प्रादुर्भाव हुआ था ॥ ५॥ भरतश्रेष्ठ ! रुद्र, साध्य, सनातन विश्वेदेव, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमार नामक देवता, लोकपाल, महर्षि, गुह्मक, गन्धर्व, नाग, विद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू ब्रह्माजी, श्रेष्ठ कात्यायन मुनि, पर्वत, सागर, नदियाँ, अप्सराएँ, ग्रह, संवत्सर, अयन, ऋतु, स्थावर-जड्रमरूप सारा जगत्, देवता और असुर--ये इस महाभारतमें एकत्र स्थित देखे जाते हैं॥ ६--९ ॥ श्रुतिमें प्रतिष्ठित हुए इन सबके नाम और कर्मोका बारम्बार कीर्तन करनेसे मनुष्य घोर पातक करनेपर भी उससे तत्काल मुक्त हो जाता है

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अध्याय ११८

श्लोक 27

स्वदेशेभ्यः परिभ्रष्टा निःसाराः सह बन्धुभिः नरास् तदा भविष्यन्ति सर्वे कालप्रतीक्षिणः

svadeśebhyaḥ paribhraṣṭā niḥsārāḥ saha bandhubhiḥ narās tadā bhaviṣyanti sarve kālapratīkṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

भारत! मनुष्य संयतचित्त एवं पवित्र हो इस इतिहासको क्रमशः: यथावत् रूपसे सुनकर समूचे महाभारतके पार जाकर भारतयुद्धमें काम आये हुए वीरोंके किस प्रकार श्राद्ध करने चाहिए, यह बताता हूँ सुनो। भरतमश्रेष्ठ ! महाभारत सुनकर यथाशक्ति भक्तिपूर्वक उनके लिये ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न एवं बड़े-बड़े दान देने चाहिए। गौएँ, काँसके दुग्धपात्र तथा वस्त्राभूषणोंसे विभूषित कन्याएँ देनी चाहिए॥११--१३॥ सर्वकामगुणोपेता यानानि विविधानि च। भाजनानि विचित्राणि भूमिर्वासांसि काञझ्जनम् शयनं शिबिकाश्चैव स्यन्दनाश्न स्वलंकृता: दानमानग्रहीता च कार्यो भवति वाचकः

English

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अध्याय ११८

श्लोक 28

तदा स्कन्धे समादाय कुमारान् प्रद्रुता भयात् कौशिकीं संश्रयिष्यन्ति नराः क्षुद्भयपीडिताः

tadā skandhe samādāya kumārān pradrutā bhayāt kauśikīṃ saṃśrayiṣyanti narāḥ kṣudbhayapīḍitāḥ

हिन्दी अर्थ

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् वे कन्याएँ सम्पूर्ण कमनीय गुणोंसे सम्पन्न हों। इनके सिवा नाना प्रकारके वाहन, विचित्र पात्र, पृथ्वी, वस्त्र एवं सुवर्णका दान करना चाहिए॥ १४॥ वाहन, घोड़े, मतवाले हाथी, शय्या, शिविका और सजे-सजाये रथ भी देने चाहिए॥ १५॥ अपने घरमें जो-जो कोई श्रेष्ठ वस्तु हो और जो-जो महान् धन हो, उसका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिए। अपने स्त्री-पुत्र और शरीरको भी उनकी सेवामें अर्पण कर देना चाहिए॥ १६॥ क्रमश: महाभारतको समाप्त करनेवाला पुरुष शुद्ध हृदयसे हर्षपूर्वक मनमें सेवाभाव रखते हुए स्थिरतापूर्वक बड़ी श्रद्धाके साथ यथाशक्ति पूर्वोक्त वस्तुओंका दान करे॥ १७॥ सत्य और सरलतामें तत्पर, प्रयत्रशील, पवित्र, शौचाचारपरायण, क्रोधको जीतनेवाले तथा श्रद्धालु

English

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अध्याय ११८

श्लोक 29

प्रचरिष्यन्ति दुर्भिक्ष+ +व्याधिभिः परिपीडिताः ।अङ्गान् वङ्गान् कलिङ्गांश् च काश्मीरान् अथ मेकलान् ऋषिकान्तगिरिद्रोणीः संश्रयिष्यन्ति मानवाः

pracariṣyanti durbhikṣa+ +vyādhibhiḥ paripīḍitāḥ | aṅgān vaṅgān kaliṅgāṃś ca kāśmīrān atha mekalān ṛṣikāntagiridroṇīḥ saṃśrayiṣyanti mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

श्रोताको जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त होती है, वह बताता हूँ, उसे जितेन्द्रिय, संस्कारसम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता, श्रद्धालु, अदोषदर्शी, रूपवान्ू, सौभाग्यशाली, मन और इन्द्रियोंका दमन करनेवाला, सत्यवादी, इन्द्रियविजयी तथा दान-मानको ग्रहण करनेवाला हो, ऐसे विद्वान् पुरुषको ही वाचक बनाना चाहिए॥ १९-२० ॥ स्वस्थ वाचक स्वाधीन और एकाग्रचित्त हो इस तरह कथा बाँचे कि विलम्बसे या रुक-रुककर शब्द न निकले (धारावाहिकरूपसे कथा चलती रहे), कठोर अक्षरका उच्चारण न करे, जल्दबाजी न करे, अस्पष्ट रूपसे शब्दोंका उच्चारण न करे--इस तरह बोले कि कोई अक्षर या पद टूटने न पाये, मनमें कोई विशेष अभिप्राय (लोभ आदि) रखकर कथा न बाँचे। आठ" स्थानोंसे उच्चरित होनेवाले रतिस्सठ वर्णोंसे युक्त महाभारतका इस तरह पाठ करे कि प्रत्येक वर्णका स्पष्टतट: विवेक होता रहे॥ २१-२२॥ वाचक पहले अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन

English

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अध्याय ११८

श्लोक 30

कृत्स्नं च हिमवत्पार्श्वं कूलं च लवणाम्भसः अरण्यानि च वत्स्यन्ति नरा म्लेच्छगणैः सह

kṛtsnaṃ ca himavatpārśvaṃ kūlaṃ ca lavaṇāmbhasaḥ araṇyāni ca vatsyanti narā mlecchagaṇaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (इतिहास, पुराण एवं महाभारत)-का पाठ आरम्भ करे १-कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्‍्त, ओष्ठ, नासिका, जिह्ामूल और हृदय-ये वर्णोके उच्चारणके आठ स्थान हैं। २-पाणिनीय शिक्षामें तिरसठ वर्णोकी गणना इस प्रकार दी गयी है--इक्कीस स्वर, पच्चीस स्पर्श, आठ यादि, चार यम, अनुस्वार, विसर्ग, क, प तथा दुःस्पृष्ट--ये सब मिलाकर तिरसठ वर्ण हैं। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-अ इ उ ऋ!' ये चार स्वर हस्व, दीर्घ और प्लुतके भेदसे तीन-तीन तरहके माने गये हैं, अतः ये बारह हुए। लृकारका केवल हस्वरूप ही ग्रहण किया गया है--इस प्रकार ये तेरह स्वर हुए। इनके सिवा, 'ए ओ ऐ औ' ये दीर्घ और प्लुतके भेदसे दो-दो प्रकारके हैं, अत: आठ हुए। पूर्वोक्त १३ और ये ८ मिलकर २१ स्वर होते हैं। “क' से लेकर 'म' तकके २५ अक्षर स्पर्श कहलाते हैं। इनको मिलानेसे ४६ अक्षर हुए। 'य' से लेकर 'ह” तकके आठ अक्षरोंको जोड़ लेनेपर इनकी संख्या ५४ होती है। प्रतिशाख्यके अनुसार चार यम होते हैं। यथा--'पलिक्कनी ' “चख्ख्नतु: ', ' अग्गिन: ', “'घृष्नन्ति' इन उदाहरणोंमें क् ख् गू घ् से परे जो इन्हींके सदृश वर्ण है, इन्हींकी 'यम' संज्ञा है। इन चार यमोंको जोड़ लेनेसे अक्षरोंकी संख्या ५८ तक पहुँचती है। इनके सिवा, अनुस्वार (अं), विसर्ग (अ:) क (जिह्मामूलीय), प (उपध्मानीय) तथा दुःस्पृष्टवर्ण (दो स्वरोंके

English

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अध्याय ११८

श्लोक 31

नैव शून्या न चाशून्या भविष्यति वसुंधरा गोप्तारश् चाप्य् अगोप्तारः प्रभविष्यन्ति शासिनः

naiva śūnyā na cāśūnyā bhaviṣyati vasuṃdharā goptāraś cāpy agoptāraḥ prabhaviṣyanti śāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

मध्यमें वर्तमान लकार)--ये पाँच अक्षर और हैं। इन सबका योग तिरसठ होता है। ये ही तिरसठ अक्षर हैं। ईंदृशाद् वाचकाद् राजज्च्छुत्वा भारत भारतम्। नियमस्थ: शुचि: श्रोता श्रण्वनूस फलमश्चुते पारणं प्रथम प्राप्य द्विजान् कामैश्न तर्पयेत्। अग्निषप्टोमस्थ यागस्य फल॑ वे लभते नरः अप्सरोगणसंकीर्ण विमान लभते महत्। प्रहष्ट: स तु देवैश्व दिवं याति समाहितः दिव्याड्भरदधरों नित्यं देबलोके महीयते

English

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अध्याय ११८

श्लोक 32

मृगैर् मत्स्यैर् विहंगैश् च श्वापदैः सर्वकीटकैः मृगमत्स्यविहंगैश् च कीटश्वापदवंगमैः (?) ।मधुशाकफलैर् मूलैर् वर्तयिष्यन्ति मानवाः

mṛgair matsyair vihaṃgaiś ca śvāpadaiḥ sarvakīṭakaiḥ mṛgamatsyavihaṃgaiś ca kīṭaśvāpadavaṃgamaiḥ (?) | madhuśākaphalair mūlair vartayiṣyanti mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

वसत्यमरसंकाशो वर्षाण्ययुतशो दिवि उदितादित्यसंकाशं ज्वलन्तमनलोपममू कैलासशिखराकारं बैदूर्यमणिवेदिकम् विमान समधिष्ठाय कामगं साप्सरोगणम्

English

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अध्याय ११८

श्लोक 33

चीरं पर्णं च विविधं वल्कलान्य् अजिनानि च स्वयं कृत्वा निवत्स्यन्ति यथा मुनिजनास् तथा

cīraṃ parṇaṃ ca vividhaṃ valkalāny ajināni ca svayaṃ kṛtvā nivatsyanti yathā munijanās tathā

हिन्दी अर्थ

सर्वल्लीकान् विचरते द्वितीय इव भास्कर: । अष्टमे राजसूयस्य पारणे लभते फलम् अन्द्ररश्मिप्रतीकाशै्ईयैर्युक्ते मनोजबै: सेव्यमानो वरस्त्रीणां चन्द्रकान्ततरेर्मुखै: । मेखलानां निनादेन नूपुराणां च निःस्वनै: नियमोंके पालनमें तत्पर एवं पवित्र रहकर ऐसे वाचकसे महाभारत सुनता है, वह उसके पूर्ण फलको प्राप्त कर लेता है॥ २४॥ प्रथम बार नियमपूर्वक हरिवंशान्त महाभारतका श्रवण पूरा करके ब्राह्मणोंको उनके इच्छानुसार वस्तुओंसे तृप्त करे। ऐसा करनेवाला मनुष्य अग्निष्टोम यागका फल पाता है॥ २५॥ उसे अप्सराओंसे भरा हुआ महान् विमान प्राप्त होता है और वह हर्षसे उत्फुल्ल एवं एकाग्रचित्त होकर देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है॥ २६ ॥ दूसरी

English

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अध्याय ११८

श्लोक 34

बीजानाम् आकृतिं निम्नेष्व् ईहन्ते काष्ठशङ्कुभिः अजैडकं खरोष्ट्रं च पालयिष्यन्ति यत्नतः

bījānām ākṛtiṃ nimneṣv īhante kāṣṭhaśaṅkubhiḥ ajaiḍakaṃ kharoṣṭraṃ ca pālayiṣyanti yatnataḥ

हिन्दी अर्थ

बार हरिवंशान्त महाभारतका श्रवण कर लेनेपर श्रोताको अतिरात्रयज्ञका फल मिलता है तथा वह सम्पूर्ण रत्रोंसे बने हुए दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है॥ २७॥ वहाँ वह दिव्य माला और वस्त्र धारण करके दिव्य गन्धसे विभूषित हो, दिव्य अड्भद आदि आभूषण पहनकर सदा देवलोकमें सम्मानित होता है॥ २८ ॥ तीसरी पारणा पूरी करनेपर उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है तथा वह वर्षोतक देवलोकमें निवास करता है॥ २९ ॥ चौथी पारणापर वाजपेय यज्ञका और पाँचवींपर उससे दूना फल मिलता है। वह उदयकालके सूर्य तथा प्रज्बलित अग्निके समान तेजस्वी विमानपर देवताओंके साथ आरूढ़ हो देवलोकमें जाता है और वहाँ इन्द्रभवनमें दस हजार वर्षोतक आनन्द भोगता है॥ ३०-३१॥ छठी पारणामें इससे दूना अर्थात् चार वाजपेय यज्ञोंका फल पाता है। सातवेंमें तीन गुने अर्थात् बारह वाजपेय यज्ञोंक फलकी प्राप्ति होती

English

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अध्याय ११८

श्लोक 35

नदीस्रोतांसि रोत्स्यन्ति तोयार्थं कूलम् आश्रिताः पक्वान्नव्यवहारेण विपणन्तः परस्परम्

nadīsrotāṃsi rotsyanti toyārthaṃ kūlam āśritāḥ pakvānnavyavahāreṇa vipaṇantaḥ parasparam

हिन्दी अर्थ

है। वह कैलासशिखरके समान उज्वल एवं विशाल बैदूर्यमणिकी वेदीसे विभूषित, अनेक प्रकारके मण्डलाकार मार्गोंसे युक्त, मणियों और मूँगोंसे अलंकृत, अप्सराओंसे परिपूर्ण तथा इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर बैठकर दूसरे सूर्यक समान सम्पूर्ण लोकोंमें विचरता है। आठवीं पारणा पूरी होनेपर उसे राजसूय यज्ञका फल मिलता है। वह चन्द्रोदयके समान रमणीय विमानपर आरूढ़ होता है। जिसमें चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्वल और मनके समान वेगशाली घोड़े जुते होते हैं॥ ३२--३५ ॥ वह देवसुन्दरियोंके चन्द्रमासे भी अधिक कमनीय मुखोंसे, उनकी मेखलाओंकी ध्वनिसे तथा नूपुरोंकी झनकारोंसे काश्जनस्तम्भनिर्व्यूहं॑ बैदूर्यकृतवेदिकम्। जाम्बूनदमरयर्दिव्यैर्गवाक्षे: सर्वतोी वृतम् सेवितं चाप्सर:संघेर्गन्धर्वैर्देविचारिभि: । विमान समधिष्ठाय अिया परमया ज्वलनू

English

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अध्याय ११८

श्लोक 36

तनूरुहैर् यथाजातैः समलान्तरसंवृतैः बह्वपत्याः प्रजाहीनाः क्रूरा लक्षणवर्जिताः

tanūruhair yathājātaiḥ samalāntarasaṃvṛtaiḥ bahvapatyāḥ prajāhīnāḥ krūrā lakṣaṇavarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

मोदते हैवतै: सार्थ दिवि देव इवापरः किड्डिणीजालनिर्घोषं पताकाध्वजशोभितम् रल्रवेदिकसंकाशं बैदूर्यमणितोरणम्। हेमजालपरिक्षिप्तं॑ प्रवालवलभीमुखम् दिव्यॉह्म्रेकान् प्रचरति दिव्यैभोंग: समन्वितः । विबुधानां प्रसादेन भ्रिया परमया युतः

English

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अध्याय ११८

श्लोक 37

एवं भविष्यन्ति तदा मनुष्याः कालकारिताः हीनाद्द् हीनं तदा धर्मं प्रजा समनुवर्त्स्यति

evaṃ bhaviṣyanti tadā manuṣyāḥ kālakāritāḥ hīnādd hīnaṃ tadā dharmaṃ prajā samanuvartsyati

हिन्दी अर्थ

अथ वर्षगणानेवं स्वर्गलोके महीयते। ततो गन्धर्वसहितः सहस्त्राण्येकविंशति: दिव्ययानविमानेषु लोकेषु विविधेषु च दिव्यनारीगणाकीर्णो निवसत्यमरों यथा। ततः सूर्यस्य भवने चन्द्रस्य भवने तथा शिवस्य भवने राजन विष्णोर्याति सलोकताम्। एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा सेवित हो दिव्याड्रनाओंके अड्डमें सुखपूर्वक सोता और जागता है। भरतनन्दन! नवीं पारणा पूर्ण करके श्रोता यज्ञोंके राजा अश्वमेधका फल पाता है। वह सोनेके खम्भों और कंगूरोंसे सुशोभित, वैदूर्यमणिकी वेदीसे अलंकृत,

English

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अध्याय ११८

श्लोक 38

आयुस् तत्र च मर्त्यानां परं त्रिंशद् भविष्यति दुर्बला विषयग्लाना रजसा समभिप्लुताः

āyus tatra ca martyānāṃ paraṃ triṃśad bhaviṣyati durbalā viṣayaglānā rajasā samabhiplutāḥ

हिन्दी अर्थ

सब ओर बने हुए सुवर्णमय दिव्य गवाक्षोंसे आवृत तथा स्वर्गमें विचरनेवाले गन्धर्वों और अप्सराओंसे सेवित विमानपर बैठकर अपनी उत्कृष्ट प्रभासे प्रकाशित होता है तथा दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करके दिव्य चन्दनसे चर्चित हो दूसरे देवताकी भाँति देवलोकमें देवगणोंके साथ आनन्द भोगता है॥ ३६--४० ॥ दसवीं पारणा पूरी करके ब्राह्मणोंको प्रणाम करे, ऐसा करके श्रोता पुण्यात्माओंके आवासस्थान दिव्य विमानको सुखपूर्वक पा लेता है। उस विमानमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी होती हैं, जिनसे मधुर ध्वनि होती रहती है। ध्वजा और पताकाएँ उस विमानकी शोभा बढ़ाती हैं। वह रत्नमयी वेदिकाओंसे प्रकाशित होता है। उसमें वैदूर्यमणिके फाटक लगे होते हैं। वह सब ओरसे सोनेकी जालीसे घिरा रहता है। उसके छज्जोंका मुखभाग मूँगोंसे अलंकृत होता है तथा गीतकुशल गन्धर्व और अप्सराएँ उस विमानपर सेवाके लिये उपस्थित रहती हैं॥४१--४३॥ वह पुरुष अपने

English

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अध्याय ११८

श्लोक 39

भविष्यति तदा तेषां रोगैर् इन्द्रियसंक्षयः आयुःप्रक्षयसंरोधाद्द् हिंसा चोपरमिष्यति

bhaviṣyati tadā teṣāṃ rogair indriyasaṃkṣayaḥ āyuḥprakṣayasaṃrodhādd hiṃsā coparamiṣyati

हिन्दी अर्थ

मस्तकपर सूर्यके समान प्रकाशमान मुकुटसे सुशोभित हो जाम्बूनद (सुवर्ण)-के आभूषण धारण करके सारे अड़ोंमें दिव्य चन्दनसे चर्चित और दिव्य मालाओंसे विभूषित हो, दिव्य भोगों तथा उत्कृष्ट शोभासे सम्पन्न होकर, देवताओंके प्रसादसे दिव्य लोकोंमें विचरता है ॥ ४४-४५ ॥ इस प्रकार बहुत वर्षोतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर गन्धवोके साथ रमणीय पुरन्दरपुरी अमरावतीमें रहकर इक्कीस हजार वर्षोतक इन्द्रके साथ आनन्द भोगता है॥ इसके बाद नाना प्रकारके पुण्यलोकोंमें दिव्य यानों और विमानोंपर दिव्य नारियोंसे घिरा रहकर वहाँ देवताके समान निवास करता है। राजन! तत्पश्चात् वह क्रमश: सूर्यभवनमें, चन्द्रलोकमें तथा भगवान् शिवके धाममें निवास करके अन्तमें भगवान् विष्णुका सालोक्य प्राप्त कर लेता है। महाराज! यह ठीक ऐसी ही बात है। इस विषयमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिए। इसपर श्रद्धा करनी चाहिए। यह मेरे गुरु व्यासजीका कथन है। वाचकको वह मनसे जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करे, वही देनी चाहिए।

English

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अध्याय ११८

श्लोक 40

एवं विप्लाविते लोके पीडिताः संक्षये काले ।ज्ञानिनस् ते भविष्यन्ति पीडया विफलोद्यमाः ।शुश्रूषवो भविष्यन्ति साधूनां दर्शने रताः सत्यं चापि प्रपत्स्यन्ति व्यवहारापशङ्कया

evaṃ viplāvite loke pīḍitāḥ saṃkṣaye kāle | jñāninas te bhaviṣyanti pīḍayā viphalodyamāḥ | śuśrūṣavo bhaviṣyanti sādhūnāṃ darśane ratāḥ satyaṃ cāpi prapatsyanti vyavahārāpaśaṅkayā

हिन्दी अर्थ

कटके कुण्डले चैव ब्रह्मसूत्रं तथापरम् देववत् पूजयेत् तं तु विष्णुलोकमवाप्रुयात् धर्मवृत्ति च विज्ञाय ब्राह्मणानां नराधिप स्वस्ति वाच्य॑ द्विजैरादी ततः कार्य प्रवर्तयेत्। समाप्तपर्वणि ततः स्वशक्त्या तर्पयेद् द्विजान्

English

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अध्याय ११८

श्लोक 41

भविष्यन्ति च कामानाम् अलाभाद् धर्मशीलिनः करिष्यन्ति च संकोचं स्वपक्षक्षयपीडिताः

bhaviṣyanti ca kāmānām alābhād dharmaśīlinaḥ kariṣyanti ca saṃkocaṃ svapakṣakṣayapīḍitāḥ

हिन्दी अर्थ

आस्तीके भोजयेद् राजन् दद्याच्चैव गुडौदनम् आरण्यके मूलफलैस्तर्पयेच्च द्विजोत्तमान्। अरणीपर्व आसाद्य जलकुम्भान् प्रदापयेत् सर्वकामगुणोपेतं विप्रेभ्यो5न्न॑ प्रदापयेत् उद्योगे भरतश्रेष्ठ सर्वकामगुणान्वितम् कर्णपर्वण्यपि तथा भोजन सार्वकामिकम्। विप्रेभ्य: संस्कृतं सम्यग् दह्यात् संघतमानस:

English

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अध्याय ११८

श्लोक 42

एवं शुश्रूषवो दाने सत्ये प्राणाभिरक्षणे चतुष्पादप्रवृत्तं च धर्मम् आप्स्यन्ति मानवाः

evaṃ śuśrūṣavo dāne satye prāṇābhirakṣaṇe catuṣpādapravṛttaṃ ca dharmam āpsyanti mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

घृतौदनं पुरस्ताच्च ऐषीके दापयेत् पुनः। ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात् सुसंस्कृतम् विशेषत: हाथी, घोड़े, रथ और शिविका आदि वाहनका दान करना उचित है। उसके लिये कड़े, कुण्डल, नूतन यज्ञोपवीत, विचित्र वस्त्र तथा विशेषतः गनन्‍्ध आदि देकर पुरुष भगवानू विष्णुके लोकमें जाता है॥४६--५२॥ राजनू्! अब मैं यह बता रहा हूँ कि जब महाभारतका पारायण आरम्भ हो जाय, तब प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर ब्राह्मणोंके लिये किन-किन वस्तुओंका दान देना चाहिए भरतश्रेष्ठट ! नरेश्वर! पर्वके आरम्भमें ब्राह्मणोंकी जाति, देश, सत्य, माहात्म्य तथा धर्मवृत्तिको जानकर पहले उनके द्वारा स्वस्तिवाचन कराना चाहिए। तदनन्तर कार्य (कथा- श्रवण) आरम्भ करे। फिर उस पर्वकी समाप्ति होनेपर

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अध्याय ११८

श्लोक 43

तेसां धर्माभिमानानां गुणेषु परिवर्तताम् स्वादु किं न्व् इति विज्ञाय धर्म एव स्वदिष्यति

tesāṃ dharmābhimānānāṃ guṇeṣu parivartatām svādu kiṃ nv iti vijñāya dharma eva svadiṣyati

हिन्दी अर्थ

अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको तृत्त करे राजन्! आदिपर्वके अनुक्रमणिकापर्वमें पहले वाचककी वस्त्र और गन्ध आदिसे पूजा करके उसे मधुयुक्त खीरका विधिवत् भोजन कराये ॥ ५६ ॥ नरेश्वर तदनन्तर आस्तीकपर्वमें प्रायः फल-मूल तथा मधु और घीसे युक्त खीर भोजन कराये तथा गुड़ और चावलका दान करे॥ ५७॥ राजेन्द्र फिर सभापर्वमें पूप (पुआ), अपूप (मालपुआ) और मोदक (लड्ड)-के साथ खीर ब्राह्मणोंको भोजन कराये आरण्यक (वन) पर्वमें श्रेष्ठ ब्राह्यणॉंकों फल-मूलसे तृप् करे। अरणीपर्वमें पहुँचकर जलसे भरे हुए घड़ोंका दान करे॥ ५९ ॥ तृप्तिके मुख्य साधन, जंगली फल-मूल तथा मनोवाज्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका ब्राह्मणोंको दान करे विराटपर्वमें भाँति-भाँतिके वस्त्र दान करे। भरतग्रेष्ठ उद्योगपर्वमें ब्राह्मणोंको गन्ध और मालाओंसे अलंकृत करके उन्हें मनोवाज्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका भोजन कराये। राजेन्द्र ! भीष्मपर्वमें परम उत्तम शिबिकाका दान

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अध्याय ११८

श्लोक 44

यथा हानिः क्रमप्राप्ता तथा वृद्धिः क्रमागता यदा हानिर् भविष्यति कलेः सर्वाणि भूपते ।प्रगृहीते ततो धर्मे प्रपत्स्यन्ति कृतं पुनः

yathā hāniḥ kramaprāptā tathā vṛddhiḥ kramāgatā yadā hānir bhaviṣyati kaleḥ sarvāṇi bhūpate | pragṛhīte tato dharme prapatsyanti kṛtaṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

करके अच्छी तरह छौंक-बघारकर तैयार किये गये सर्वगुण-सम्पन्न अन्नका दान करे॥६१-६२॥ राजेन्द्र ! द्रोणपर्वमें ब्राह्मणोंको परम उत्तम भोजन अर्पित करे तथा उन्हें धनुष, बाण एवं उत्तम खड़ग दे॥ ६३ ॥ कर्णपर्वमें भी मनको संयममें रखकर ब्राह्मणोंको सबकी रुचिके अनुकूल उत्तम संस्कारयुक्त भोजन दे॥ ६४ ॥ महाराज । शल्यपर्वमें लड्डू, गुडमिश्रित ओदन और पूओंसे ब्राह्मणोंको तृप्त करे तथा उन्हें सब प्रकारके अन्नका दान दे॥ ६५ ॥ गदापर्वमें भी मूँग मिलायी हुई खिचड़ीका दान करे। स्त्रीपर्वमें उत्तम ब्राह्मणोंको रल्रोंद्वारा तृत करे ॥ ६६ ॥ ऐषीकपर्वमें पहले घी मिलाये हुए भातका दान करे तत्पश्चात् अच्छी तरह छौंक- बघारकर बनाया हुआ सर्वगुण-सम्पन्न अन्नका दान दे आश्वमेधिकमासाद्य भोजन सार्वकामिकम्

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अध्याय ११८

श्लोक 45

साधुवृत्तिः कृतयुगे कषाये हानिर् उच्यते एक एव तु कालः स हीनवर्णो यथा शशी

sādhuvṛttiḥ kṛtayuge kaṣāye hānir ucyate eka eva tu kālaḥ sa hīnavarṇo yathā śaśī

हिन्दी अर्थ

तथा55श्रमनिवासे तु हविष्यं भोजयेद् द्विजान्। मौसले सार्वगुणिकं गन्धमाल्यानुलेपनम् महाप्रास्थानिके तद्बत् सर्वकामगुणान्वितम् । स्वर्गपर्वण्यपि तथा हविष्यं भोजयेद् द्विजान् गामेकां निष्कसंयुक्तां ब्राह्मणाय निवेदयेत् सुवर्णेन च संयुक्त वाचकाय निवेदयेत्। एलोकं वा श्लोकपादं वा अक्षरं वा नृपात्मज। श्रुणुयादेकचित्तस्तु स विष्णुदयितो भवेत्

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अध्याय ११८

श्लोक 46

छन्नो हि तमसा सोमो यथा कलियुगे तथा पूर्णश् च तपसा हीनो यथा कलियुगे तथा

channo hi tamasā somo yathā kaliyuge tathā pūrṇaś ca tapasā hīno yathā kaliyuge tathā

हिन्दी अर्थ

लक्ष्मीनारायणं देवं पूजितं त॑ं च पूजयेत् विष्णु: सम्पूजितस्तेन स साक्षाद् देवकीसुतः समाप्य सर्वाः प्रयत: संहिता: शास्त्रकोविद: संहितापुस्तकान् राजन् प्रयत: शिष्टसम्मतः

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अध्याय ११८

श्लोक 47

अर्थवादपरो धर्मो वेदार्थ इति तु विदुः अनिर्णिक्तम् अविज्ञातं दायाद्यम् इव धार्यते

arthavādaparo dharmo vedārtha iti tu viduḥ anirṇiktam avijñātaṃ dāyādyam iva dhāryate

हिन्दी अर्थ

भक्ष्येभोज्यैश्व पेयैश्व कामैश्व विविधे: शुभे: । हिरण्यं गां च वस्त्र च दक्षिणामथ दापयेत् शान्तिपर्व पूर्ण होनेपर ब्राह्मणोंको हविष्यका भोजन कराये। फिर आश्वमेधिकपर्वमें पहुँचकर सबकी रुचिके अनुकूल भोजन दे॥ ६८ ॥ आश्रमवासिकपर्वमें ब्राह्मणोंको हविष्य भोजन कराये। मौसलपर्वमें सर्वगुणसम्पन्न अन्न तथा गन्ध, माला और अनुलेपनका दान करे उसी प्रकार महाप्रस्थानिकपर्वमें समस्त मनोवाब्छित गुणोंसे सम्पन्न अन्नका तथा स्वर्गारोहणपर्वमें हविष्यका ब्राह्मणांको भोजन कराये॥७०॥ हरिवंशकी समाप्ति होनेपर एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा स्वर्णपदकसे युक्त एक गौका ब्राह्मणको दान करे

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अध्याय ११८

श्लोक 48

इष्टं दानं तपो नाम ब्रह्मचर्यं सुपूजितम् गुणैः कर्माभिनिर्वृत्तिर् गुणास् तथ्येन कर्मणा

iṣṭaṃ dānaṃ tapo nāma brahmacaryaṃ supūjitam guṇaiḥ karmābhinirvṛttir guṇās tathyena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीनाथ ! दरिद्रको भी पूरा नहीं तो आधा दान अवश्य करना चाहिए। बुद्धिमान् मनुष्य प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर वाचकको सुवर्णयुक्त पुस्तक अर्पित करे। हरिवंशपर्वमें ब्राह्मणोंको खीर भोजन कराये। राजकुमार ! जो एकाग्रचित्त होकर हरिवंशके एक श्लोक, एक चरण अथवा एक अक्षरका भी श्रवण करता है, वह भगवान् विष्णुका प्रिय भक्त होता है॥ ७२--७४॥ कथावाचक व्यासकी उसकी पत्नीके साथ विधिवत् पूजा करे। इससे भगवान् लक्ष्मीनागायणका पूजन हो जाता है। फिर पूर्वपूजित भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी भी पूजा करे॥७५॥ जो भूमि, वस्त्र और उत्तम धेनु देकर वाचककी पूजा करता है, उसके द्वारा साक्षात् विष्णुस्वरूप देवकीनन्दन श्रीकृष्मफका पूजन सम्पन्न हो जाता है॥७६॥ राजन् भरतवंशावतंस जनमेजय! शास्त्रज्ञ पुरुष इन्द्रिय- संयमपूर्वक यथोचित रूपसे सम्पूर्ण महाभारत-संहिताको (हरिवंशसहित) पूर्ण करके प्रत्येक पारणामें वाचकको

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अध्याय ११८

श्लोक 49

आशीस् तु पुरुषं दृष्ट्वा देशकालानुवर्तिनी युगे युगे यथाकालम् ऋषिभिः समुदाहृता

āśīs tu puruṣaṃ dṛṣṭvā deśakālānuvartinī yuge yuge yathākālam ṛṣibhiḥ samudāhṛtā

हिन्दी अर्थ

शुभ स्थानमें बैठाकर रेशमी वस्त्र अथवा शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण करके शोभा-सम्पन्न, पवित्र एवं अलंकृत हो यथोचित रीतिसे पृथक्-पृथक् गन्ध, माल्य आदि अर्पित करके उस वाचककी पूजा करे। राजन्! संयतचित्त एवं शिष्ट पुरुषोंद्वारा सम्मानित पुरुष संहिताकी पुस्तकोंका भी पूजन करे॥७७--७९॥ वाचकको उत्तमोत्तम भक्ष्य- भोज्य पदार्थ, पेय रस आदि तथा नाना प्रकारकी शुभ मनोवाज्छित वस्तुओंके साथ सुवर्ण, गौ, वस्त्र तथा दक्षिणा समर्पित करे॥८०॥ सभी पारणाओंमें प्रणतभावसे तीन पल (तीन भर) सुवर्ण देना चाहिए। दे। धन रहते हुए कंजूसी न करे यद् यदेवात्मनो5भीष्टं तत् तद् देय॑ द्विजातये।

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अध्याय ११८

श्लोक 50

इह धर्मार्थकामानां वेदानां च प्रतिक्रिया आशिषश् च शुभाः पुण्यास् तथैवायुर् युगे युगे

iha dharmārthakāmānāṃ vedānāṃ ca pratikriyā āśiṣaś ca śubhāḥ puṇyās tathaivāyur yuge yuge

हिन्दी अर्थ

तर्पयेद् विविधे: कामैदनिश्ोच्यावचैस्तथा अतिगरात्रस्य यज्ञस्य फल प्राप्नोति मानव:। प्राप्रुयाच्य क्रतुफलं तथा पर्वणि पर्वणि वाचको भरतश्रेष्ठ व्यक्ताक्षरपदस्वर:। भविष्यं श्रावयेद् विप्रान् भारतं भरतर्षभ वाचके परितुष्टे तु शुभा प्रीतिरनुत्तमा। ब्राह्मणेषु चर तुष्टेषु प्रसन्ना: सर्वदेवता:

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अध्याय ११८

श्लोक 51

भविष्यन्ति महाराज नरा बह्वायुषस् तदा ।यथा युगानां परिवर्तनानि चिरप्रवृत्तानि विधिस्वभावात् क्षणं न संतिष्ठति जीवलोकः क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः

bhaviṣyanti mahārāja narā bahvāyuṣas tadā | yathā yugānāṃ parivartanāni cirapravṛttāni vidhisvabhāvāt kṣaṇaṃ na saṃtiṣṭhati jīvalokaḥ kṣayodayābhyāṃ parivartamānaḥ

हिन्दी अर्थ

ततो हि भरणं कार्य द्विजानां भरतर्षभ। सर्वकामैर्यथान्यायं साधुभिश्च यथाक्रमम् भारतश्रवणे राजन् पारणे च् नृपोत्तम। सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता भारतं श्रृणुयान्नित्यं भारतं परिकीर्तयेत्। भारतं भवने यस्य तस्य हस्तगतो जय: भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परिकीर्तयेत् भारतात् प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद् त्रवीमि ते

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 118
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.