Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
33
अध्याय 33 / 119

Adhyaya 33

32 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ32 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय ३३

श्लोक 1

निहन्मि दानवान्दृप्तान् युष्माकं विग्रहैः सह ।गिरं ते दानवान् उग्रान् मेनिरे निहतान् युधि ।ततो भयं विष्णुमयं श्रुत्वा दैतेयदानवाः उद्योगं विपुलं चक्रुर् युद्धाय युधि दुर्जयाः

nihanmi dānavāndṛptān yuṣmākaṃ vigrahaiḥ saha | giraṃ te dānavān ugrān menire nihatān yudhi | tato bhayaṃ viṣṇumayaṃ śrutvā daiteyadānavāḥ udyogaṃ vipulaṃ cakrur yuddhāya yudhi durjayāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! एक दिन आधा प्रदोष (अर्थात् डेढ़ घंटा रात) बीतनेपर जब भगवान् श्रीकृष्ण रासक्रीडामें संलग् थे, उसी समय सारे ब्रजको त्रास देता हुआ मतवाला अरिष्टासुर वहाँ दिखायी दिया वह बुझे हुए अज्भार (कोयले) तथा मेघोंके समान काला था, उसके सींग तीखे थे और आँखें सूर्यके समान तेजस्विनी दिखायी देती थीं। उसके चरणोंके अग्रभाग अथवा खुर छुरेके समान तेज थे। वह काला हैत्य दूसरे कालके समान जान पड़ता था॥ २॥ वह दाँतसे ओठोंको चबाता और जिह्ासे उन्हें बारम्बार चाटता था। उसने बलके घमंडमें आकर पूँछ उठा रखी थी तथा उसके कंधेका कुब्बड़ बहुत ही कठोर था॥३॥ वह अपने कंधेके कुब्बड़से चोट करके बने-बनाये महल आदिको धराशायी कर देता था। उसकी ऊँचाई इतनी थी कि उसे लाँघकर जाना किसीके लिये भी बहुत कठिन था। उसके पिछले अड्भ गोबर और मूतसे लिप्त हो रहे थे तथा वह गौओंको

English

Vaishampāyana said:—After Nārada had said this and gone away Kansa, meditating on his words, began to laugh aloud with his lips open, and smilingly said to his servants who were before him. "Truly the gods make fun with Narada and he has no knowledge of things (21–22). Even when I am seated on my throne, asleep, mad or intoxicated, the gods headed by Vāsava cannot terrify me the least (23). Who is there in the land of men who can dare make me angry? I can even agitate the earth with these two my huge arms (24). From to-day I shall greatly oppress men, beasts, birds and all other creatures who follow the gods (25). Do ye issue this command to Keshi, in the shape of a horse, Pralamva, Dhenuka, Aristha, in the form of a bull, Putanā, Kaliya and other demons (26). Assuming diverse forms do ye range all over the world and destroy them whom you will find against me (27). Nārada has said that our fear proceeds from conception and therefore you should always be informed of the movements of all those who have been conceived by women (28). When I am your master you need not be afraid of any accidental calamity. Therefore freed of all anxiety do ye enjoy objects of pleasure of your own accord (29). Narada is greatly fond of quarrels and is intent on creating dissensions. In order to set one against another that Brāhmana, with a restive mind, travels in all the worlds, creates dissensions even amongst men of highly quiet temparament and works out enmity amongst kings by various means" (30–31).

अध्याय ३३

श्लोक 2

मयस् तु काञ्चनमयं त्रिनल्वान्तरम् अव्ययम् चतुश्चक्रं सुवपुषं सुकल्पितमहायुधम्

mayas tu kāñcanamayaṃ trinalvāntaram avyayam catuścakraṃ suvapuṣaṃ sukalpitamahāyudham

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त उद्देगमें डाल देता था हैत्यो वृषभरूपेण गोष्ठान् विपरिधावति कस्यचित् त्वथ कालस्य स वृष: केशवाग्रतः। आजगाम बलोदग्रो वैवस्वतवशे स्थितः अकार निर्वषं गोष्ठ॑ निर्वत्सशिशुपुड्गरवम्

English

Having vauntingly said this Kansa entered his own palace but his heart was burning with the fire of anger (32).

अध्याय ३३

श्लोक 3

किंकिणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम् रचितं रत्नजालैश् च हेमजालैश् च शोभितम्

kiṃkiṇījālanirghoṣaṃ dvīpicarmapariṣkṛtam racitaṃ ratnajālaiś ca hemajālaiś ca śobhitam

हिन्दी अर्थ

एतस्मिन्नेव काले तु गाव: कृष्णसमीपगा: । त्रासयामास दुष्ट्रात्मा वैवस्वतवशे स्थित: सेन्द्राशनिरिवाम्भीदो नर्दमानो महासुरः। तालशब्देन तं कृष्ण: सिंहनाहैश्व मोहयन् अभ्यधावत गोविन्दो हैत्यं वृषभरूपिणम्। सकृष्णं गोवृषो दृष्ठा हष्टलाइगूललोचन:ः रोषितस्तालशब्देन युद्धाकाडञ्ली ननर्द ह।

English

Vaishampayana said:—Thereupon worked up with anger Kansa said to all his well-meaning ministers:—"Do ye always be on your guard for destroying the (eight born) children of Devaki (1). The calamity, which we suspect, should be eradicated. Therefore from the very beginning destroy all the embryos of Devaki (2). Let Devaki, well guarded in the inner appartment by the warders, range there confidently. And when she conceives keep her with care (3). As soon as she will conceive, the women of my harem will count the months from the very first, and being informed of the time of delivery we will do what we think proper (4). Let Vasudeva too be kept unconsciously day and night in the inner appartment by eunuchs and women engaged in my well being. Let no body disclose to him the secret (5). With these human efforts people should accomplish their objects. Hear how persons like me avert the course of destiny (6). Even an adverse destiny is made propitious by well employed _mantras_, properly administered medicines, care and devotion (7)."

अध्याय ३३

श्लोक 4

ईहामृगगणाकीर्णं पक्षिभिश् च विराजितम् दिव्यास्त्रतूणीरधरं पयोधरनिनादितम्

īhāmṛgagaṇākīrṇaṃ pakṣibhiś ca virājitam divyāstratūṇīradharaṃ payodharanināditam

हिन्दी अर्थ

तस्मात् स्थानान्न व्यचलत् कृष्णो गिरिरिवाचल: कृष्णस्थ निधनाकाडक्षी तूर्णमभ्युत्पपात ह उसका कटिभाग विशाल था और मुख स्थूल था, दोनों घुटने सुदृढ़ थे और पेट बहुत बड़ा था। उसके गलेका कंबल लटक रहा था और वह सींग नीचे किये उछलता-कूदता आगे बढ़ रहा था॥५॥ वह गौओंके पिछले भागपर चढ़नेके लिये चञ्लल हो रहा था। वृजक्षोंसे टक्कर लेनेके कारण उसके मस्तकमें कई जगह घडट्टे पड़ गये थे। वह अपने सींगोंके अग्रभागको सदा जूझनेके लिये उद्यत रखता था तथा विपक्षी बैलोंको मार डालता था

English

Vaishampāyana continued:—Hearing from Nārada, the account of his death, Kansa, out of fear, began to hold counsels as to how he should destroy Devaki's embryo (8). On the other hand, being informed of the portendous and dreadful efforts of Kansa while out of sight, the powerful Vishnu began to think (9) "Bhoja's descendant Kansa will destroy the first seven children of Devaki. In her eighth conception I shall have to live in her womb" (10). While thus meditating his mind flew where the Saragarbha Danavas, by name, Hansa, Suvikrātha, Damana, Ripunardana, and Krodhahartā were living in the water (11). These immortal-like Saragarbhas, the sons of Kālanemi, were powerful like the celestials, were of effulgent persons and experts in battle (12). Leaving their own grand-father Hiranyakasipu and wearing mantted locks those Saragarbha Daityas worshipped the Grand-father of all, Brahmā, with hard penances who, being pleased, conferred on them the following boon (13-14).

अध्याय ३३

श्लोक 5

स्वक्षं रथवरोदारं सूपस्थम् अगमोपमम् गदापरिघसंपूर्णं मूर्तिमन्तम् इवार्णवम्

svakṣaṃ rathavarodāraṃ sūpastham agamopamam gadāparighasaṃpūrṇaṃ mūrtimantam ivārṇavam

हिन्दी अर्थ

भयानक आकारवाला वह अरिष्टासुर गौओंके लिये अरिषप्टकारक ग्रह बन गया था। वह हैत्य बैलके रूपमें आकर सभी गोठोंमें दौड़ लगाया करता था॥ ७॥ वह गौओंके गर्भ गिरा देता था। मदमत्त होकर बिना ऋतुके ही उनसे समागम करता तथा वह चञ्जल हैत्य तुरंतकी ब्यायी हुई गौओंका भी उपभोग करनेके लिये उनके पीछे पड़ा रहता था॥ ८ ॥ सींग ही उसके आयुध थे। वह बड़ा भयंकर एवं दुर्मद प्रतीत होता था। गौओंपर प्रहार करना उसका नित्यका काम था। वह वृषभरूपधारी हैत्य गोठोंमें पहुँचकर युद्ध किये बिना संतुष्ट नहीं होता था किसी समय यमराजके वशमें पड़ा हुआ वह उत्कट बलशाली वृषभरूपधारी असुर भगवान् श्रीकृष्णके सामने आया॥ १० ॥ मदमत्त अरिष्टासुर वहाँ आते ही बलपूर्वक गौओंको सताने लगा। उसने उस गोष्ठको बैल, बछड़ों तथा

English

Brahma said:—"O ye foremost of Dānavas, I have been greatly pleased with your ascetic austerities. Express to me clearly your wishes, I shall grant them to you all." (15). Encouraged by Brahmā's words the Daityas said "O lord, if thou art pleased with us do thou confer upon us this best of boons. O Brahman, if thou art ready to confer upon us a boon, do thou grant us such a one as may render us unslayable by the gods, the huge Uragas, Yakshas, Gandharvas, Siddhas, Chāranas, men and by the great Rishis ever engaged in penances, whose weapons are their curses"

अध्याय ३३

श्लोक 6

हेमकेयूरवलयं स्वर्णकुण्डलकूबरम् सपताकध्वजोदग्रं सादित्यम् इव मन्दरम्

hemakeyūravalayaṃ svarṇakuṇḍalakūbaram sapatākadhvajodagraṃ sādityam iva mandaram

हिन्दी अर्थ

बालकोंसे सूना कर दिया॥११॥ इसी समय कालके वशमें पड़ा हुआ वह दुष्टात्मा हैत्य श्रीकृष्णके पास खड़ी हुई गौओंको त्रास देने लगा॥१२॥ उस समय गर्जना करता हुआ वह महान् असुर इन्द्रके वज़की गड़गड़ाहटके साथ आकाशमें छाये हुए मेघके समान जान पड़ता था। उसे मोहमें डालनेके लिये श्रीकृष्णने ताल ठोंका और सिंहनाद किया॥ १३॥ फिर वे भगवान् गोविन्द उस वृषभरूपधारी हैत्यकी ओर दौड़े। श्रीकृष्णको देखते ही उस बैलने हर्षमें भरकर अपनी पूँछ उठायी और उसके नेत्र भी खिल उठे॥ १४॥ उनके ताल ठोंकनेके शब्दसे वह रोषमें भरा हुआ था, अतः युद्धकी इच्छासे गर्जना करने लगा। बैलका रूप धारण करके अपनी ओर आते हुए उस दुराचारी हैत्यको देखकर भी श्रीकृष्ण उस स्थानसे तनिक भी इधर-उधर नहीं हुए, पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े रह गये॥ १५॥ उस वृषभने श्रीकृष्णके पेटमें दृष्टि जमाकर उधर ही मस्तक भिड़ाया

English

The Grand-father was greatly delighted at heart with their ascetic observances and therefore affectionately said to them:—"What you have prayed for will all be accomplished." Having conferred this boon on Saragarbhas the self-born repaired to the celestial region.

अध्याय ३३

श्लोक 7

गजेन्द्राम्भोदवपुषं क्वचित् केसरवर्चसम् युक्तम् ऋक्षसहस्रेण सहस्राम्बुदनादितम्

gajendrāmbhodavapuṣaṃ kvacit kesaravarcasam yuktam ṛkṣasahasreṇa sahasrāmbudanāditam

हिन्दी अर्थ

और उनके वधकी इच्छा रखकर तुरंत ही उछला कृष्ण: कृष्णाज्जननिभो वृष प्रति वृषोषम: स संसक्तस्तु कृष्णो वै वृषेणेव महावृषः । मुमोच वक्त्रजं फेनं नस्तश्चाथ सशब्दवतू तावन्योन्यावरुद्धाड़ौ युद्धे कृष्णवृषावुभौ। रेजतुर्मेंघधमये . संसक्ताविव तोयदौ

English

Thereupon Hiranyakasipu addressed them in angry words saying (19–20). "By your disregarding me and praying for a boon to the lotus-sprung Brahmā, you have become my enemies. I therefore have no affection for you and forsake you all. That father, who has given you the high sounding name of _Saragarbha_, will kill you all while in embryo (21–22.) O ye great Asuras Saragarbhas, you all six will be born in order from Devaki and Kansa will kill you (23)."

अध्याय ३३

श्लोक 8

दीप्तम् आकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम् अतिष्ठत् समराकाङ्क्षी मेरुं दीप्त इवांशुमान्

dīptam ākāśagaṃ divyaṃ rathaṃ pararathārujam atiṣṭhat samarākāṅkṣī meruṃ dīpta ivāṃśumān

हिन्दी अर्थ

साधु साध्विति भूतानि तत्कर्मास्याभितुष्टवु: स चोपेन्द्रो वृषं हत्वा कान्तचन्द्रे निशामुखे। अरविन्दाभनयन: पुनरेव ररास ह तेडपि गोवृत्तय: सर्वे कृष्णं कमललोचनम्। उपासाञ्ञक्रिरे हष्टाः सर्वे शक्रमिवामरा: काले अज्नके समान श्याम शरीरवाले श्रीकृष्ण उस बैलका सामना करनेके लिये विपक्षी साँड़ुके समान प्रतीत होते थे। उन्होंने वेगसे अपनी ओर आते हुए उस दुर्धर हैत्यकों पकड़ लिया॥ १७॥ फिर तो श्रीकृष्ण

English

Vaishampayana said:—Thereupon repairing to the nether region Vishnu arrived where Saragarbha Asuras, on account of the imprecation of Hiranyakasipu, were living in the womb of water. He saw them lying there possessed by death-like sleep (24–25). Thereupon entering into the body of the Saragarbhas in a state of dream, Vishnu, having truth for his prowess, caught hold of their vital breaths and consigned them to the care of sleep. He said "O sleep, by my command take the vital airs of all these leading Dānavas Saragarbhas and place them in order in the womb of Devaki (26-28). They will be born of her womb and proceed to the abode of Death. Kansa's efforts will be baffled and Devaki's labour will be crowned with success (29). I will show you such a favour that like me you will be powerful on earth and adored of all creatures (30). Thereupon when my gentle portion will be conceived by Devaki in her seventh conception, take that eldest brother of mine in the seventh month and place him within Rohini's womb (31). On account of his thus being taken away from the womb, that moon-like elder brother of mine will pass, in his youth, by the name of Sangkarsana (32). Thereupon thinking that 'Devaki has untimely given birth to a child out of fear in the seventh time' Kansa will be very careful for the eighth time when I will be in her womb (33). O goddess, may you fare-well; as being the ninth of our race, you will be conceived by Yashodā, the best of milk-women, the most beloved wife of Nanda the master of Kansa's kine. You will be born on the ninth day of the dark half of the month (34–35). I too, in the middle of the night under the influence of Abhijit,¹⁸⁷ will come out happily of the womb (36). O sleep, highly dreadful is Kansa's rule. Therefore in the eighth month, we will be simultaneously born (and exchanged by Vasudeva) (37). I will be taken to Yashodā and you will be taken to Devaki. By this our interchange Kansa will be stupified (38). Then taking you by the leg he will dash you against a stone; you will then at once go up to the sky and attain to your eternal region (39). O goddess, there the effulgence of your face will be like that of Sangkarshana and your body will be dark-blue like mine and your arms will be as huge as those of mine (40). O sleep, when armed with an uplifted mace of three heads, and with a dagger of golden handles, when with a cup full of wine and a clean lotus, when adorned with a blue raiment and a yellow cloth thrown round your breast, you will occupy the road of the celestials, your breast will adorned with a necklace shining like the rays of the moon, your two ears will be adorned with two celestial _Kundalas_ and your countenance will shine like the moon (41-43). O goddess, adorned, at my command, with a wonderful crown and hair nets, with flags of peacock feather and _Angadas_, embellishing the ten quarters, with your dreadful arms resembling the serpents, encircled by terrible goblins and observing the vow of celibacy you will enter into the celestial region (44–46). When you will reach the land of gods, the thousand-eyed Indra will confer upon you the dignity of a god by sprinkling you with water according to the rules laid down by me and accept you as his sister. Having been adopted in the family of Kushika you will pass by the name of Koushika (47–48). Afterwards when Vāsava will assign to you the mount Vindhyā for your habitation you will adorn the world with thousand provinces (49). On whomever on earth you will bestow a boon while ranging of your own accord in the three worlds, he will at once attain to the fruit thereof (50). O goddess, there thinking of me in your mind, and starting with the goblins you will kill the two demons Shumbha and Nishumbha living in mountain, with all their attendants (51). O sleep, you are greatly fond of an offering of meat. You will therefore, on a _Navami_,¹⁸⁸ receive, on earth, worship accompanied by the sacrifice of beasts (52). Children or wealth, it will not be difficult to acquire any of these for him, who, amongst men cognizant of my prowess, will bow unto you (53). You will save them all from danger, those who will be tired in a huge forest, those who will be drowned in a mighty deep, those who will be attacked by robbers (54). O auspicious lady, I will not kill him who will propitiate you with devotion nor will he meet with ruin at my hands (55)".

अध्याय ३३

श्लोक 9

तारस् तु क्रोषविस्तारम् आयसं वाहयन् रथम् शैलोत्करिमसंकाशं नीलाञ्जनचयोपमम्

tāras tu kroṣavistāram āyasaṃ vāhayan ratham śailotkarimasaṃkāśaṃ nīlāñjanacayopamam

हिन्दी अर्थ

उसके साथ इस तरह उलझ गये, जैसे एक साँड़के साथ दूसरा महासाँड़ भिड़ गया हो। अरिष्टासुर हाँफता हुआ अपनी नाक और मुखसे फेन छोड़ने लगा॥ १८॥ श्रीकृष्ण और अरिष्टासुर दोनोंने उस युद्धमें एक-दूसरेके शरीरको अवरुद्ध कर लिया था। उस समय वे दोनों वर्षाकालमें परस्पर सटे हुए दो मेघोंके समान शोभा पा रहे थे इस प्रकार उसके बलको क्षीण करके घमंड चूर कर देनेके बाद श्रीकृष्णने उसके दोनों सींगोंके बीचमें एक पैर रखा और जैसे भीगे हुए कपड़ेको निचोड़ा जाता है, उसी प्रकार अरिष्टासुरंक गलेको दबाकर मरोड़ दिया तत्पश्चात् उसके बायें सींगको जो यमदण्डके समान जान पड़ता था, उखाड़ लिया और उसीके द्वारा उसके मुखपर प्रहार किया । उसकी गहरी चोट खाकर अरिष्टासुर मर गया॥ २१॥ उसका सींग उखड़ गया, मुख कुचल

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 10

काललोहाष्टचरणं लोहेषायुगकूबरम् तिमिरोद्गारिकिरणं गर्जन्तम् इव तोयदम्

kālalohāṣṭacaraṇaṃ loheṣāyugakūbaram timirodgārikiraṇaṃ garjantam iva toyadam

हिन्दी अर्थ

दिया गया और गर्दन टूट गयी, उस दशामें वह दानव जलकी धारा बरसानेवाले मेघके समान अपने मुखसे रक्त वमन करता हुआ गिर पड़ा॥ २२॥ मदसे उन्मत्त रहनेवाले उस वृषभरूपी दानवको भगवान् गोविन्दके हाथसे मारा गया देख सब प्राणी साधु-साधु कहकर उनके उस कर्मकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे उस प्रदोषकालमें जब कि चन्द्रमाकौ कमनीय कान्ति बढ़ी हुई थी, कमलनयन भगवान् उपेन्द्र वृषभासुरको मारकर पुनः रासक्रीड़ामें संलग्न हो गये॥ २४॥ गौएँ ही जिनकी आजीविका हैं, वे समस्त गोप भी हर्षमें भरकर कमलनयन श्रीकृष्णकी उसी तरह उपासना करने लगे, जैसे सम्पूर्ण देवता इन्द्रकी आराधना करते हैं

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 11

लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम् आयसैः परिघैः पूर्णं क्षेपणीयैश् च मुद्गरैः

lohajālena mahatā sagavākṣeṇa daṃśitam āyasaiḥ parighaiḥ pūrṇaṃ kṣepaṇīyaiś ca mudgaraiḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि वृषभासुरवधे एकविंशोउध्याय: इस प्रकार श्रीयहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें वृषभायुरका वधविषयक इक्रीसवाँ अध्याय पूरा हुआ कंसकी आशड्डा, उसका रात्रिके समय यदुवंशियोंको बुलाकर भरी सभामें श्रीकृष्ण और विष्णुके प्रभावको बताना, वसुदेवपर कठोर आक्षेप करना तथा अक्वूरको श्रीकृष्ण आदिको बुला लानेके लिये ब्रजमें जानेकी आज्ञा देना कृष्णं ब्रजगतं श्रुत्वा वर्धभानमिवानलम्। उद्देगमगमत् कंसः शड्भूमानस्ततों भयम्

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 12

प्रासैः पाशैश् च विततैर् अवसक्तैश् च मुद्गरैः शोभितं त्रासनीयैश् च तोमरैः सपरश्वधैः

prāsaiḥ pāśaiś ca vitatair avasaktaiś ca mudgaraiḥ śobhitaṃ trāsanīyaiś ca tomaraiḥ saparaśvadhaiḥ

हिन्दी अर्थ

पूतनायां हतायां च कालिये च पराजिते। धेनुके प्रलयं नीते प्रलम्बे च निपातिते॥ गोषु त्रातासु च तथा स्पृहणीयेन कर्मणा कर्षणे वृक्षयोश्रेव शकटस्थ तथेव च। अच्ित्त्य॑ कर्म तच्छुत्वा वर्धमानेषु शत्रुषु निशि स्तिमितमूकायां मथुरायां जनाधिप:

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 13

उद्यतं द्विषतां हेतोर् द्वितीयम् इव मन्दरम् युक्तं खरसहस्रेण सो ऽध्यारोहद् रथोत्तमम्

udyataṃ dviṣatāṃ hetor dvitīyam iva mandaram yuktaṃ kharasahasreṇa so 'dhyārohad rathottamam

हिन्दी अर्थ

बसुदेवं च देवाभं कड्ढें चाहूय यादवम्। सत्यक॑ दारुकं चैव कड्ढडावरजमेव च भयशडुं च धर्मज्ञं विपृथुं च पृथुअ्रयम् उग्रसेनसुतो राजा प्रोवाच मथुरेश्वरः भवन्तः सर्वकार्यज्ञा वेदेषु परिनिष्ठिता:। न्यायवृत्तान्तकुशलास्त्रिवर्गस्थ प्रवर्तका:

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 14

विरोचनस् तु संक्रुद्धो गदापाणिर् अवस्थितः प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तशृङ्ग इवाचलः

virocanas tu saṃkruddho gadāpāṇir avasthitaḥ pramukhe tasya sainyasya dīptaśṛṅga ivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्ण ब्रजमें जाकर अग्निकी भाँति बढ़ते, उत्तरोत्तर प्रज्वलित होते जा रहे हैं, यह सुनकर कंसको बड़ा उद्देग हुआ। उसके मनमें श्रीकृष्णससे भय प्राप्त होनेकी शद्डा दृढ़ होने लगी॥ १ ॥ पूतना मारी गयी, कालिय नाग परास्त हुआ, धेनुकासुर कालके गालमें भेज दिया गया, प्रलम्बासुरको मार गिराया गया, गोवर्धन पहाड़को श्रीकृष्णने हाथपर उठा लिया, इन्द्रका शासन निष्फल हो गया, वैसे स्पृहणीय कर्मके द्वारा सम्पूर्ण गौओंकी रक्षा कर ली गयी, ऊँचे ककुदवाले अरिष्टासुरको मार डाला गया, गोपगण आनन्दमें मग्न रहते हैं और अपना (कंसका) महाभयंकर विनाशकाल संनिकट दिखायी देने लगा है, यमलार्जुन-वृक्षोंका ओखली खींचते समय टूट जाना, शकटका भड़ हो जाना आदि असम्भव कार्य सम्भव हो गये, शत्रु निरन्तर बढ़ रहे हैं और उनके द्वारा अचिन्त्य कर्म सम्पादित होने लगा है, यह सब सुनकर मथुरापति कंसने यह मान लिया कि

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 15

युक्तं हयसहस्रेण हयग्रीवस् तु दानवः स्यन्दनं वाहयाम् आस सपत्नानीकमर्दनम्

yuktaṃ hayasahasreṇa hayagrīvas tu dānavaḥ syandanaṃ vāhayām āsa sapatnānīkamardanam

हिन्दी अर्थ

अब मेरे ऊपर अरिष्ट आया ही चाहता है। इससे उसकी इन्द्रियाँ, शरीर और मन-बुद्धि सब-के-सब अचेत हो गये तथा वह प्राणहीन-सा प्रतीत होने लगा॥ २--६ ॥ तदनन्तर भयंकर शासनवाले राजा कंसने रात्रिके नीरव एवं निस्तब्धकालमें मथुरापुरीके भीतर रहनेवाले समस्त बन्धु- बान्धवों तथा अपने पिता उग्रसेनको भी बुलाया दारुक, कड्डके छोटे भाई, भोज, वैतरण, महाबली विकद्रु, धर्मज्ञ भयशह्'ु, पृथुल राजलक्ष्मीसे सम्पन्न विपृथु, दानपति इन सब यादवोंको बुलाकर सबको सम्बोधित करके मथुराके स्वामी उग्रसेनकुमार राजा कंसने कहा--' बन्धुओ आपलोग सुनें ॥ ८--११ ॥ आप समस्त कर्तव्य-कर्मोके ज्ञाता, वेदोंके परिनिष्ठित विद्वान, न्‍्यायोचित बर्तावमें कुशल, धर्म, अर्थ

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 16

व्यायतं बहुसहस्रं धनुर् विस्फारयन् महत् वराहः प्रमुखे तस्थौ सावरोह इवाचलः

vyāyataṃ bahusahasraṃ dhanur visphārayan mahat varāhaḥ pramukhe tasthau sāvaroha ivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

कर्तव्यानां च कर्तारो लोकस्य विबुधोपमा: । तस्थिवांसो महावृत्ते निष्कम्पा इव पर्वता: यशःप्रदीपा लोकानां वेदार्थानां विवक्षव: । आश्रमाणां निसर्गज्ञा वर्णानां क्रमपारगा: व्यावर्तमानं सुमहद् भवद्धिः ख्यातकीर्तिभि:। धृतं यदुकुल॑ वीरैर्भूतलं॑ पर्वतैिरिव एष कृष्ण इति ख्यातो नन्दगोपसुतो ब्रजे। वर्धमान इवाम्भोधिमूल नः परिकृन्तति

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 17

क्षरस् तु विक्षरन् दर्पान् नेत्राभ्यां रोषजं जलम् स्फुरद्दन्तौष्ठवदनः संग्रामं सो ऽभ्यकाङ्क्षत

kṣaras tu vikṣaran darpān netrābhyāṃ roṣajaṃ jalam sphuraddantauṣṭhavadanaḥ saṃgrāmaṃ so 'bhyakāṅkṣata

हिन्दी अर्थ

कारणान्नन्दगोपस्य स सुतो गोपितो गृहे और कामके प्रवर्तक, कर्तव्य-पालक, जगतूके लिये दृढ़तापूर्वक स्थिर रहनेवाले और पर्वतके समान अविचल हैं' आप सब लोग पाखण्डपूर्ण वृत्तिसे दूर रहते हैं। सबने गुरुकुलमें रहकर शिक्षा पायी है। आप सब लोग राजाकी गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित रखनेवाले तथा भरनुर्वेदमें पारड्गभत हैं ॥ १४॥ आपके यशरूपी प्रदीप सम्पूर्ण जगत्में

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 18

त्वष्टा त्व् अष्टादशहयं यानम् आस्थाय दानवः व्यूहितो दानवैर् व्यूहैः परिचक्राम वीर्यवान्

tvaṣṭā tv aṣṭādaśahayaṃ yānam āsthāya dānavaḥ vyūhito dānavair vyūhaiḥ paricakrāma vīryavān

हिन्दी अर्थ

अपना प्रकाश फैला रहे हैं। आपलोग वेदोंके तात्पर्यका प्रतिपादन करनेमें समर्थ हैं। आश्रमोंके जो स्वाभाविक कर्म हैं, उन्हें आप जानते हैं। चारों वर्णोके जो क्रमिक धर्म हैं, उनके आपलोग पारज्भत दिद्वान् हैं आपलोग उत्तम विधियोंके वक्ता, नीतिदर्शी पुरुषोंके भी नेता, शत्रुराष्ट्रोंक गुप्त रहस्योंका भेदन करनेवाले तथा शरणार्थियोंके संरक्षक हैं ॥ १६॥ आपके सदाचारमें कभी आँच नहीं आने पायी है। आपलोग श्रीसम्पन्न हैं तथा श्रेष्ठ पुरुषोंकी चर्चा होते समय आपलोगोंके नाम बारम्बार लिये जाते हैं। आपलोग चाहें तो स्वर्गलोकपर भी अनुग्रह कर सकते हैं, फिर इस भूतलकी तो बात ही क्या है?॥ १७॥ आपका आचार ऋषियोंके, प्रभाव मरुदृणोंके, क्रोध रुद्रोंके और तेज या दीप़ि अग्रनियोंके समान है॥ १८ ॥ यह महान् यदुकुल जब अपनी मर्यादासे भ्रष्ट हो रहा था, उस समय विख्यात कीर्तिवाले आप- जैसे वीरोंने ही इसे मर्यादामें स्थापित किया, ठीक उसी

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 19

विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुण्डलभूषणः श्वेतशैलप्रतीकाशो युद्धायाभिमुखः स्थितः

vipracittisutaḥ śvetaḥ śvetakuṇḍalabhūṣaṇaḥ śvetaśailapratīkāśo yuddhāyābhimukhaḥ sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

तरह जैसे पर्वतोंने इस भूतलको दृढ़तापूर्वक धारण कर रखा है॥ १९॥ आपलोग ऐसे सुयोग्य हैं और सदा मेरे अनुकूल चलते हैं, परंतु इस समय आपलोगोंके होते हुए भी मेरे अनर्थ (संकट)-की वृद्धि हो रही है, पता नहीं आपने उसकी उपेक्षा कैसे कर दी है॥ २० ॥ ब्रजमें कृष्ण नामसे विख्यात जो यह नन्द-गोपका बेटा है, वह (मर्यादाको लाँधघकर) बढ़नेवाले समुद्रकी भाँति बढ़कर हमारी जड़ काट रहा है॥ २१॥ मेरे पास कोई सुयोग्य गुप्तचररूपी नेत्रसे हीन होनेके कारण अंधा हो गया हूँ। मेरे इसी दोषके कारण नन्द-गोपका वह पुत्र अपने घरमें सुरक्षित रह सका है॥२२॥ वह दुरात्मा उपेक्षित रोग तथा वर्षा-ऋतुमें निरन्तर जलसे भरनेवाले गरजते हुए मेघकी भाँति बढ़ता जा रहा है'

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 20

अरिष्टो बलिपुत्रस् तु वरिष्ठो ऽद्रिशिलायुधः युद्धायातिष्ठद् आयस्तो धराधर इवापरः

ariṣṭo baliputras tu variṣṭho 'driśilāyudhaḥ yuddhāyātiṣṭhad āyasto dharādhara ivāparaḥ

हिन्दी अर्थ

नन्दगोपस्यथ भवने जातस्याद्धुतकर्मण: किं तद्धूतं समुद्धूतं देवापत्यं न विद्दाहे। अतिदेवैरमानुष्यै: कर्मभि: सो5नुमीयते यमुनाया ह॒दे नाग: कालियो दमितस्तथा। रसातलचरो नीतः क्षणेनादर्शनं हृदात् प्रलम्बं य॑ मृधे देवा न शेकुरतिवर्तितुम्। बालेन मुष्टिनेकेन स हतः प्राकृतो यथा

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 21

किशोरस् त्व् अतिसंहर्षात् किशोर इव चोदितः अभवद् दैत्यसैन्यस्य मध्ये रविर् इवोदितः

kiśoras tv atisaṃharṣāt kiśora iva coditaḥ abhavad daityasainyasya madhye ravir ivoditaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रबन्ध: कर्मणामेवं तस्य गोबन्नजवासिन: । संनिकृष्टं भयं चैव केशिनो मम चर ध्रुवम् युद्धाकाडुक्षी चस यथा तिष्ठतीह ममाग्रत: क्ल च देवप्रभावेण क्रीडितव्यं ब्रजे मम “नन्दके घरमें उत्पन्न हुए उस अद्भधुतकर्मा बालकका आश्रय क्‍या है? यह मैं नहीं जानता। उसे वशमें करनेका उपाय क्या है, इसका भी मुझे पता नहीं तथा उसमें कितना पराक्रम है, यह भी अच्छी तरह ज्ञात नहीं हो सका

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 22

लम्बस् तु लम्बमेघाभः प्रलम्बाम्बरभूषणः दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान्

lambas tu lambameghābhaḥ pralambāmbarabhūṣaṇaḥ daityavyūhagato bhāti sanīhāra ivāṃśumān

हिन्दी अर्थ

पता नहीं कौन-सा भूत उसके रूपमें उत्पन्न हुआ है। वह किसी देवताकी संतान है, यह बात भी मेरी समझमें नहीं आती। उसके जो कर्म हैं, वे देवताओं और मनुष्योंके लिये असाध्य हैं। उन कर्मोंस ही यह अनुमान होता है कि वह देवताओंसे भी अधिक शक्तिशाली है पूतना नामवाली पक्षिणी एक दुर्जय राक्षती थी।वह जब इसे बाल्यावस्थामें दूध पिलाने गयी, उस समय यह खाटपर उत्तान सोनेवाला शिशुमात्र था, परंतु उसका स्तनपान करनेकी इच्छासे जब इसने मुँह लगाया, तब उसके प्राणोंक साथ यह उसे ही पी गया॥ २६ ॥ यमुनाके कुण्डमें जो कालिय नाग रहता था, उसका भी इसने दमन कर दिया और क्षणभरमें उस कुण्डसे उसको अदृश्य करके रसातलचारी बना दिया॥ २७॥ उस नागके हट

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 23

स्वर्भानुरास्ययोधी तु दशनौष्ठेक्षणायुधः प्रमुखे देवसेनाय रराज गिरिसंनिभः ।हसंस् तिष्ठति दैत्यानां प्रमुखे सुमुखो ग्रहः

svarbhānurāsyayodhī tu daśanauṣṭhekṣaṇāyudhaḥ pramukhe devasenāya rarāja girisaṃnibhaḥ | hasaṃs tiṣṭhati daityānāṃ pramukhe sumukho grahaḥ

हिन्दी अर्थ

जानेका उचित उपाय करके नन्दगोपका यह पुत्र पुनः जलसे बाहर निकल आया। धेनुकासुरको ताड़के शिखरसे गिराकर प्राणशून्य कर दिया॥ २८॥ युद्धमें देवता भी जिस प्रलम्बासुरका सामना करने या उसे हरा देनेकी शक्ति नहीं रखते थे, उसे इस बालकने केवल एक मुकेसे मारकर साधारण मनुष्यकी भाँति कालके गालमें भेज दिया॥ २९ ॥ इन्द्रके उत्सवको भजड़् करके उनके रोषसे होनेवाली वर्षापर भी काबू पा लिया और गौओंके लिये सुरक्षित घर प्रस्तुत करनेके लिये गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठा लिया॥ ३०॥ ब्रजमें बलवान् अरिष्टासुरको मार डाला और उसका सींग उखाड़ लिया। यह वास्तवमें बालक नहीं है, केवल बाल्यावस्थाका आश्रय लेकर बालकों-जैसा खेल कर रहा है॥ ३१॥ गौओंके ब्रजमें निवास करनेवाले इस बालकके कर्मोकी जो इस प्रकार परम्परा चल रही है, उसे देखते हुए मुझे ऐसा जान पड़ता है कि मुझपर और केशीपर भी निश्चय ही भय आनेवाला

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 24

अन्ये हयगता भान्ति नागस्कन्धगताः परे सिंहव्याघ्रगताश् चान्ये वराहर्क्षगताः परे

anye hayagatā bhānti nāgaskandhagatāḥ pare siṃhavyāghragatāś cānye varāharkṣagatāḥ pare

हिन्दी अर्थ

है और वह भय दूर नहीं अत्यन्त निकट है पूर्वजन्ममें इस शरीरके लिये जो भूतपूर्व मृत्यु था, वही इस समय भी युद्धकी अभिलाषा रखकर सदा मेरे सामने खड़ा रहता है॥३३॥ कहाँ तो अशुभ गोपत्व और मौतकी दुर्बलता धारण करनेवाला मानव-शरीर तथा कहाँ उसका मेरे ब्रजमें रहकर देवतुल्य प्रभावसे अद्भुत क्रीड़ा करना को5प्येष रमते देव: एमशानस्थ इवानल:

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 25

केचित् खरोष्ट्रयातारः केचित् तोयदवाहनाः नानापक्षिगताः केचित् केचित् पवनवाहनाः

kecit kharoṣṭrayātāraḥ kecit toyadavāhanāḥ nānāpakṣigatāḥ kecit kecit pavanavāhanāḥ

हिन्दी अर्थ

श्रूयते हि पुरा विष्णु: सुराणां कारणान्तरे। वामनेन तु रूपेण जहार पृथिवीमिमाम् कृत्वा केसरिणो रूप॑ विष्णुना प्रभविष्णुना। हतो हिरण्यकशिपुर्दानवानां पितामहः भवेन च्याविता हैत्या: पुरा तत्त्रिपुरं घ्वता चालितो गुरुपुत्रेण भार्गवो5ड्रिरसेन वै। प्रविश्य दार्दुरीं मायामनावृष्टिं चकार ह

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 26

पत्तिनस् त्व् अपरे दैत्या भीषणा विकृताननाः एकपादा द्विपादाश् च ननृतुर् युद्धकङ्क्षिणः

pattinas tv apare daityā bhīṣaṇā vikṛtānanāḥ ekapādā dvipādāś ca nanṛtur yuddhakaṅkṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

अनन्तः शाश्वतो देव: सहस्त्रशिरसो5व्यय: । वाराहं रूपमास्थाय प्रोजहारार्णवान्महीम् अमृते निर्मिते पूर्व विष्णु: स्त्रीरूपमास्थित: । सुराणामसुराणां च युद्धं चक्रे सुदारुणम् अमृतार्थ पुरा चापि देवहैत्यसमागमे। दधार मन्दरं विष्णुरकूपार इति श्रुति: त्रिभि: क्रमैस्तु त्रीललोकाझहार त्रिदिवालयम्

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 27

प्रक्ष्वेडमाना बहवः स्फोटयन्तश् च दानवाः दृप्तशार्दूलनिर्घोषा नेदुर् दानवपुंगवाः

prakṣveḍamānā bahavaḥ sphoṭayantaś ca dānavāḥ dṛptaśārdūlanirghoṣā nedur dānavapuṃgavāḥ

हिन्दी अर्थ

साधयत्यात्मन: कार्य सुराणामर्थसिद्धये 'अहो! कितने आश्चर्यकी बात है कि यह कोई स्थित हुई अग्नरिके समान यहाँ रम रहा है॥ ३५॥ सुना जाता है कि पूर्वकालमें विष्णुने देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये वामनरूप धारण करके राजा बलिके हाथसे इस पृथ्वीको छीन लिया था॥ ३६॥ उन्हीं प्रभावशाली विष्णुने सिंहका-सा रूप बनाकर दानवोंके पितामह हिरण्यकशिपुका वध कर डाला था॥ ३७॥ इसी तरह पूर्वकालमें रुद्र (-रूपधारी विष्णु)-ने अचिन्त्य रूपका आश्रय लेकर श्वेताचलके शिखरपर स्थित हो त्रिपुरका

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 28

ते गदापरिघैर् उग्रैर् धनुर् व्यायामशालिनः बाहुभिः परिघाकारैस् तर्जयन्ति स्म दानवाः

te gadāparighair ugrair dhanur vyāyāmaśālinaḥ bāhubhiḥ parighākārais tarjayanti sma dānavāḥ

हिन्दी अर्थ

नाश करके हैत्योंको वहाँसे नीचे गिरा दिया था बृहस्पतिके पुत्र कचने दार्दुरी मायामें प्रविष्ट होकर शुक्राचार्यको अपनी प्रतिज्ञासे विचलित कर दिया था। उन्होंने ही हैत्योंके जगतूमें 'अनावृष्टि ' उत्पन्न कर दी थी। (जिससे हैत्योंकी बड़ी भारी हानि हुई। ये कच भी विष्णुकी ही विभूति थे)॥३९॥ “वे विष्णु अनन्त, सनातन देव, सहस्रों मस्तकोंसे विभूषित और अविनाशी हैं। उन्होंने वाराहरूप धारण करके समुद्रसे इस पृथ्वीका उद्धार किया ॥ ४० ॥ पूर्वकालमें जब अमृत प्रकट हुआ था, तब विष्णुने ही मोहिनी स्त्रीका रूप धारण करके देवताओं और असुरोंमें अत्यन्त भयंकर युद्ध करवाया था

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 29

प्रासैः पाशैश् च खड्गैश् च तोमराङ्कुशपट्टिसैः चिक्रीडुस् ते शतघ्नीभिः शितधारैश् च मुद्गरैः

prāsaiḥ pāśaiś ca khaḍgaiś ca tomarāṅkuśapaṭṭisaiḥ cikrīḍus te śataghnībhiḥ śitadhāraiś ca mudgaraiḥ

हिन्दी अर्थ

अमृत निकालनेके लिये सम्मिलितरूपसे प्रयत्न करनेके उद्देश्य्से जब देवता और हैत्य परस्पर मिले थे, उस समय श्रीविष्णुने ही कच्छपरूप धारण करके समुद्रके भीतर मन्दराचलको अपनी पीठपर धारण किया था--ऐसा सुना जाता है॥४२॥ उन्होंने ही पहले अभिनन्दनीय वामन- रूप धारण करके तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको नापकर बलिके हाथसे स्वर्गलोकका राज्य ले लिया था वे ही राजा दशरथके घरमें अपने तेजको चार भागोंमें विभक्त करके अवतीर्ण हुए और “राम” नामसे प्रसिद्ध हुए, जिन्होंने उस समय रावणका वध किया था॥ ४४॥ इस प्रकार ये विष्णु छलसे भिन्न-भिन्न रूप धारण करके जैसे मेढक बार्म्बार मरकर उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार कच भी हैत्योंद्वारा बारम्बार मारे जानेपर जीवित हुए। यही उनका दादुरी मायामे प्रवेश है। एक बार दानवोंने कचको मारकर युक्तिसे शुक्राचार्यके पेटमें पहुँचा दिया। उनकी जीवन-रक्षाके लिये विवश होकर शुक्राचार्यको “संजीवनी विद्या किसीको भी नहीं सिखाऊँगा' अपनी यह प्रतिज्ञा छोड़नी पड़ी और उन्होंने कचको विद्या सिखा दी। उसके प्रभावसे कच गुरुजीका पेट फाड़कर निकल आये। फिर उन्होंने गुरुजीको भी जीवित कर

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 30

गण्डशैलैश् च शैलैश् च परिघैश् चोत्तमायुधैः चक्रैश् च दैत्यप्रवराश् चक्रुर् आनन्दितं बलम्

gaṇḍaśailaiś ca śailaiś ca parighaiś cottamāyudhaiḥ cakraiś ca daityapravarāś cakrur ānanditaṃ balam

हिन्दी अर्थ

दिया। हैत्योंने जो ब्रह्महत्या की, उसी पापसे उनके राज्यमें वर्षा बंद हो गयी। तदेष नून॑ विष्णुर्वा शक्रो वा मरुतां पति: । मत्साधनेच्छया प्राप्तो नारदो मां यदुक्तवान् अन्न मे शद्भते बुद्धिर्वसुदेवं॑ प्रति ध्रुवा। अस्य बुद्धिविशेषेण वयं कातरतां गता: वबसुदेवेन ते रात्रौ तत्कर्म विफलीकृतम्

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 31

काङ्क्षन्तो विजयं युद्धे दानवा युद्धदुर्मदाः ।एवं तद् दानवं सैन्यं सर्वं युद्धमदोत्कटम् देवान् अभिमुखं तस्थौ मेघानीकम् इवोद्धतम्

kāṅkṣanto vijayaṃ yuddhe dānavā yuddhadurmadāḥ | evaṃ tad dānavaṃ sainyaṃ sarvaṃ yuddhamadotkaṭam devān abhimukhaṃ tasthau meghānīkam ivoddhatam

हिन्दी अर्थ

दारिका या त्वया रात्रौ शिलायां कंस पातिता। तांयशोदासुतां विद्ध्धि कृष्णं च वसुदेवजम् वसुदेवेन संधाय मित्ररूपेण शत्रुणा कृताभिषेका वरदा भूतसंघनिषेविता। अर्च्यते दस्युभिर्षोरैर्महाबलिपशुप्रिया वृक्षगम्भीरनिबि्ड कान्तारैः सर्वतों वृतम्

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

अध्याय ३३

श्लोक 32

तदद्भुतं दैत्यसहस्रगाढं वाय्वग्नितोयाम्बुदशैलकल्पम् बलं रणौघाभ्युदयाभ्युदीर्णं युयुत्सयोन्मत्तम् इवाबभासे

tadadbhutaṃ daityasahasragāḍhaṃ vāyvagnitoyāmbudaśailakalpam balaṃ raṇaughābhyudayābhyudīrṇaṃ yuyutsayonmattam ivābabhāse

हिन्दी अर्थ

देवतूर्यनिनादेश्न॒ शतशः प्रतिनादितम् “अतः यह श्रीकृष्ण निश्चय ही विष्णु है अथवा देवराज इन्द्र। यह मेरा वध करनेकी इच्छासे ही ब्रजभूमिमें आया है; जैसा कि देवर्षि नारदने मुझे बताया था॥ ४६॥ इस विषयमें मेरी बुद्धि निश्चय ही वसुदेवके प्रति संदेह करने लगी है। इस वसुदेवकी विशिष्ट बुद्धिसे हम अवश्य कातर हो उठे हैं॥४७॥ मैं खट्वाड्भवनमें जब दूसरी बार नारदसे मिला था, तब उस ब्राह्मणने मुझसे पुनः: इस प्रकार कहा--॥४८॥ कंस! तुमने जो देवकीका गर्भ नष्ट कर देनेके लिये महान् प्रयल आरम्भ किया था, तुम्हारे उस कर्मको रातके समय वसुदेवने निष्फल कर दिया॥४९॥ कंस! तुमने रातके समय जिस कन्याकों शिलापर दे मारा था, उसे यशोदाकी

English

¹⁸⁷ One of the _Nakshatras_ or lunar asterisms.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 33
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.