Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
34
अध्याय 34 / 119

Adhyaya 34

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अध्याय ३४

श्लोक 1

श्रुतस् ते दैत्यसैन्यस्य विस्तरस् तात विग्रहे सुराणां सर्वसैन्यस्य विस्तरं वैष्णवं शृणु

śrutas te daityasainyasya vistaras tāta vigrahe surāṇāṃ sarvasainyasya vistaraṃ vaiṣṇavaṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

पुत्री समझो और वहाँ जो श्रीकृष्ण है, वही वसुदेव (तथा देवकी)-का पुत्र है॥५०॥ तुम्हारे मित्ररूपधारी शत्रु वसुदेवने रातंके समय छलपूर्वक तुम्हारे वधके लिये इन दोनों बच्चोंकी अदला-बदली कर ली थी॥५१॥ यशोदाकी वह कन्या पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्य- गिरिपर जाकर रहती है। वहाँ उस पर्वतपर विचरनेवाले जो शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दानव थे, उनका वध करके प्रतिष्ठित हुई है॥ ५२ ॥ प्राणियोंके समुदायद्वारा सेवित वह देवी उपासकोंको अभीष्ट वर देनेवाली है। उसे महती पूजन-सामग्री और वहाँ विचरनेवाले पशु प्रिय हैं। वहाँ भयानक दस्यु उस देवीका अभिषेक करके पूजन करते हैं॥५३॥ वह मधु तथा फलके गूदोंसे भरे हुए दो कलशोंसे सुशोभित होती है। मोरपंखके बने हुए विचित्र भुजदण्ड तथा मोरोंकी पाँखसे ही बनाये गये दूसरे-दूसरे आभूषण उस देवीके अलंकार हैं॥५४॥ उस विन्ध्यपर्वतपर उसके अपने

English

¹⁸⁸ The ninth day of the dark half of the month.

अध्याय ३४

श्लोक 2

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च महाबलौ सबलाः सानुगाश् चैव संनह्यन्त यथाक्रमम्

ādityā vasavo rudrā aśvinau ca mahābalau sabalāḥ sānugāś caiva saṃnahyanta yathākramam

हिन्दी अर्थ

ही तेजसे निर्मित हुआ स्थान एक सुन्दर वन है, जहाँ हर्षमें भरे हुए मुर्गोका कलनाद सुनायी देता है। कौओंके काँव-काँवकी आवाज भी गूँजती रहती है। मृग आदि पशुओंके समुदाय भी वहाँ भरे रहते हैं तथा मनके अनुकूल पक्षियोंसे भी वह स्थान सुशोभित रहता है। वहाँ सिंहों, व्याप्रों और वराहोंकी गर्जनाका गम्भीर शब्द प्रतिध्वनित होता रहता है। वृक्षोंके बाहुल्यसे वह गम्भीर एवं गहन प्रतीत होता है। सब ओरसे दुर्गम स्थानोंद्वारा वह घिरा हुआ है। दिव्य गड़आ, चँवर और दर्पण देवीके उस स्थानकी शोभा बढ़ाते हैं। सैकड़ों देववाद्योंकी ध्वनियोंसे वह वन गूँजता रहता है। शत्रुओंको त्रास देनेवाली वह देवी सदा उसी मनोरम वनमें बसते परमप्रीता देवतैरपि पूजिता। यस्त्वयं नन्दगोपस्य कृष्ण इत्युच्यते सुत:

English

Vaishampayana said:—Having saluted the goddess Nārāyani, the mistress of the three worlds I shall recite the sacred hymn as sung by the ancient

अध्याय ३४

श्लोक 3

पुरुहूतस् तु पुरतो लोकपालः सहस्रदृक् ग्रामणीः सर्वदेवानाम् आरुरोह सुरद्विपम्

puruhūtas tu purato lokapālaḥ sahasradṛk grāmaṇīḥ sarvadevānām āruroha suradvipam

हिन्दी अर्थ

अत्र मे नारदः प्राह सुमहत्कर्मकारणम्। द्वितीयो वसुदेवाद् वै वासुदेवो भविष्यति स एवं वासुदेवों वै वसुदेवसुतो बली। बान्धवो धर्मतो मह्ांं हृदयेनान्तको रिपु: वसुदेवस्तथेवायं सपुत्रज्ञातिबान्धव:। छिनत्ति मम मूलानि भुड्न्ते च मम पार्श्रत: न कृतप्चस्थ लोको5स्ति बान्धवस्य विशेषत:

English

"O goddess, thou art the salvation, intelligence, glory, bashfulness, learning, advancement and inclination of all the worlds. Thou art identical with twilight, night, ray, sleep and the night of death (2). Thou art designated as the worshipful goddess Kātyāyani, Koushiki, observant of the vow of celibacy and the mother of Kārtikeya. Thou art highly powerful and dost practise hard austerities (3). O goddess, thou art Jayā, Vijayā, satisfaction, nourishment, forgiveness and mercy. Thou art clad in a blue silken raiment and the eldest sister of Yama (4). Thou art of various forms, art without any, hast dreadful and large eyes and art the protector of thy votaries (5). O great goddess, living on the summits of fearful mountains, in rivers, caves, and forest and being adored by Savaras,¹⁸⁹ Varvaras¹⁹⁰ and Pulindas¹⁹¹ thou dost traverse the worlds in a car consisting of peacock-feathered flags (6-7). Surrounded by cocks, goats, lambs, lions and tigers and worshipped by the ringing of bells thou dost always live in the mount Vindhyā (8). Thou dost hold trident, Pattisha and other weapons. The sun and the moon are thy flags. Thou art the ninth day of the dark half of the month and the eleventh day of the light half (9). Thou art the quarrelsome Rajani, the sister of Baladeva, the abode of all creatures, the death and the supreme end of all animals and the daughter of the milk-man Nanda who carries the victory of the gods. Thou dost wear bark, excellent cloth and art the dreadful twilight (10-11). Thou art of dishevelled hairs and the death. Thou art fond of wine and meat. Although thou art Lakshmi (of beautiful form) thou dost assume a dreadful form for the destruction of the Dānavas (12). Thou art Sāvitri¹⁹² of the Vedas, the mother of _mantras_, the celibacy of the maidens, the good luck of women, the external altar of the sacrifices, the gift of the priest, the plough of the cultivators, the earth of all creatures, the success of sea-faring merchants, the bank of the ocean, the first woman of the Yakshns,¹⁹³ Surasa¹⁹⁴ of Nāgas, art conversant with the knowledge of Brahman, initiation and great beauty. Thou art the effulgence of luminous bodies, Rohini of stars, the consummate prosperity in courts, forts, confluences of rivers and the full-moon (13–17). Thou art the goddess of learning in Valmiki,¹⁹⁵ the memory of Dwaipayana¹⁹⁶ the intellect of the Rishis in religious matters, the determination of the gods and dost live in all creatures as the goddess of wine adored by thy own deeds (18). O goddess, thou art the charming look of the thousand eyes of the king of gods, the Arani of the Agnihotra ascetics, the hunger of all creatures, the gratification, oblation, intellect and brain of the celestials, the receptable of all the Vasus, the hope of men and the pleasure of all those who are crowned with success. Thou art the direction, the contrary direction, the flame of fire, ray, Shakuni, Putanā, the terrible Revati, the over-powering sleep of all creatures and Kshatrya (19-22). Thou art Brahmavidya¹⁹⁷ in learning, Om¹⁹⁸ and Vasha¹⁹⁹. The Rishis know thee as the ancient Parvati amongst women (23). As said by Brahmā thou art Arundhati²⁰⁰ amongst chaste women. Truly thou hast been designated by the gods as Indrani²⁰¹ (24). This universe, mobile and immobile, is permeated by thee. Undoubtedly thou art the saviour in battle, burning fire, rivers, fear of thieves, caves, foreign countries, courts, in assailing the enemies and in all other matters where life is at stake (25–26). My heart, mind and reasoning faculty are all devoted to thee. Do thou save me from all sins; show me this favour (27).

अध्याय ३४

श्लोक 4

सव्ये चास्य रथः पार्श्वे पक्षिप्रवरवेगवान् सुचारुचक्रचरणो हेमवज्रपरिष्कृतः

savye cāsya rathaḥ pārśve pakṣipravaravegavān sucārucakracaraṇo hemavajrapariṣkṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

यः कृतप्नो5नुबन्धेन प्रीतिं वहति दारुणाम् नरकाध्युषित: पन्था गन्तव्यस्तेन दारुण: । अपापे पापहदयो यः पापमनुतिष्ठति नियमैर्गुणवृत्तेन त्वया बान्धवकाम्यया बान्धवानामपि तथा भेदकाले समुत्थिते। वध्यते योउन्तरप्रेप्सु: स्वजनो यदि वेतर:

English

"O goddess, thou art always propitiated with him, who, rising up early in the morning, purifying himself and controlling his mind, will read this heavenly hymn (28). Thou dost give their desired-for objects to those who recite it for three months, and a most excellent boon to those who do it for six months, and celestial vision to those who continue it for nine months and _Siddhi_ as they desire to those who sing it for one full year (29–30). O goddess, as recorded by the great saint Krishna Dwaipayana thou art the supreme Brahman identical with truth. Thou dost drive away the fear of men, proceeding from chains, death, the destruction of children and wealth and disease. Assuming various forms at thy will, thou dost confer boons (31–32). Stupifying Kansa thou shalt alone enjoy the world. And I shall adopt the life of a milk-man amongst kine. For accomplishing my own work I shall become Kansa's milk-man"

अध्याय ३४

श्लोक 5

देवगन्धर्वयक्षौघैर् अनुयातः सहस्रशः दीप्तिमद्भिः सदस्यैश् च ब्रह्मर्षिभिर् अभिष्टुतः

devagandharvayakṣaughair anuyātaḥ sahasraśaḥ dīptimadbhiḥ sadasyaiś ca brahmarṣibhir abhiṣṭutaḥ

हिन्दी अर्थ

कालस्त्वं हि विनाशाय मया पुष्ठो विजानता। बसुदेव कुलस्यास्य यद् विरोधयसे भूशम् अमर्षी वैरशीलश्व सदा पापमति: शठ:। स्थाने यदुकुलं मूढ शोचनीयं त्ववा कृतम् प्रसन्नतापूर्वक निवास करती है। वहाँ देवता भी उसकी पूजा करते हैं। “यह कृष्ण नामसे प्रसिद्ध जो नन्‍्दगोपका पुत्र बताया जाता है, उसके विषयमें नारदजीने मुझसे कहा है कि 'ब्रजमें जो पूतना-वध आदि बड़े-बड़े कर्म हो रहे हैं, उनका प्रधान कारण वही है। वह वसुदेवसे उत्पन्न होनेवाला दूसरा पुत्र है, इसलिये वासुदेव नामसे विख्यात होगा। वह तुम्हारी सहज मृत्यु तथा बान्धव भी होगा। वसुदेवका वह बलवान पुत्र वासुदेव ही धर्मतः मेरा बान्धव

English

Having thus addressed (the goddess of sleep) the lord disappeared and she too, saluting him, expressed her consent by saying, "So be it" (34).

अध्याय ३४

श्लोक 6

वज्रविस्फूर्जितोद्धूतैर् विद्युदिन्द्रायुधार्पितैः गुप्तो बलाहकगणैः पर्वतैर् इव कामगैः

vajravisphūrjitoddhūtair vidyudindrāyudhārpitaiḥ gupto balāhakagaṇaiḥ parvatair iva kāmagaiḥ

हिन्दी अर्थ

है; किंतु हृदयसे विनाशकारी शत्रु बना है॥ ५५--६१॥ जैसे कौवा जिसके सिरपर दोनों पंजे रखकर बैठता है, अपनी मांसलोलुप चोंचसे उसीके दोनों नेत्रोंपर प्रहार करता है; उसी प्रकार ये वसुदेव भी अपने पुत्र और भाई- बन्धुओंसहित मेरे ही पास खाते हैं और मेरी ही जड़ काटते हैं ॥ ६२-६३ ॥ भ्रूणहत्याके पापसे मनुष्य तर सकता है, गोबध अथवा स्त्रीवधके पापको भी प्रायश्चित्त आदिके द्वारा लाँघा जा सकता है; परंतु जो कृतघ्न है, विशेषत: अपने भाई-बन्धुपर कृतघ्नता करता है, उसके लिये कोई लोक नहीं है--उसका कहीं भी ठिकाना नहीं लगता जो भीतरसे कृतघ्न रहकर अपना काम बनानेके लिये ऊपरसे भयानक प्रीतिका बोझ ढोता है, वह शीघ्र ही पतितोंके पथका आश्रय लेता है॥ ६५॥ जो पापहीनके प्रति अपने हृदयमें पापपूर्ण भाव लेकर पापका ही बर्ताव करता

English

¹⁸⁹ A barbarian race inhabiting the mountainous districts of India and wearing the feathers of the peacock as decorations.

अध्याय ३४

श्लोक 7

यम् आरूढः स भगवान् पर्येति मघवान् गजम् हविर् धानेषु गायन्ति विप्रा मखमुखे स्थिताः

yam ārūḍhaḥ sa bhagavān paryeti maghavān gajam havir dhāneṣu gāyanti viprā makhamukhe sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

है, उसे नरकके भयंकर मार्गपर जाना पड़ता है नियम, गुण और आचार-इनको सामने रखकर तुम्हें किसीको मित्र बनानेकी इच्छा करनी चाहिए। बतलाओ, तुम मुझ स्वजनको स्पृहणीय मानते हो अथवा अपने उस पुत्रकों मुझसे भी अधिक श्लाघध्य समझते हो ? हाथियोंमें भयंकर युद्ध छिड़ जानेपर घास-पात और लता- बेलें नष्ट होती हैं; फिर युद्धका विराम होनेपर वे हाथी उस महान् वनमें साथ-साथ खाते-पीते हैं; उसी प्रकार भाई-बन्धुओंमें भेद उपस्थित होनेपर जो छिद्र ढूँढ़नेवाला होता है, वही मारा जाता है; भले ही वह स्वजन हो या और कोई॥ ६८-६९ ॥ वसुदेव! तुम इस कुलके काल हो। मैंने अपने विनाशके लिये ही तुम्हें जान-बूझकर पाला- पोसा है। तभी तो तुम मुझसे अत्यन्त विरोध बढ़ा रहे

English

¹⁹⁰ One of a degraded tribe or occupation.

अध्याय ३४

श्लोक 8

स्वर्गे शक्रानुयातेषु देवतूर्यानुनादिषु इन्द्रं समुपनृत्यन्ति शतशो ह्य् अप्सरोगणाः

svarge śakrānuyāteṣu devatūryānunādiṣu indraṃ samupanṛtyanti śataśo hy apsarogaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

स्वभावत: वैर रखनेवाले हो। तुम्हारी बुद्धि सदा पापमें ही लगी रहती है। तुम शठ हो। तुमने जो इस यदुकुलकी शोचनीय अवस्था कर दी है, वह उचित ही है' बसुदेव वृथा वृद्ध यन्मया त्वं पुरस्कृतः। श्रेतेन शिरसा वृद्धों नैव वर्षशतैर्भवेत् त्वं च कर्कशशीलश्च बुद्धया च न बहुश्रुतः । केवलं वयसा व॒द्धो यथा शरदि तोयद: किं च त्वं साधु जानीषे वसुदेव वृथामते। मृते कंसे मम सुतो मथुरां पालयिष्यति

English

¹⁹¹ A barbarian using an uncultivated and unintelligible dialect.

अध्याय ३४

श्लोक 9

केतुना वंशराजेन भ्राजमानो यथा रविः युक्तो हयसहस्रेण मनोमारुतरंहसा

ketunā vaṃśarājena bhrājamāno yathā raviḥ yukto hayasahasreṇa manomārutaraṃhasā

हिन्दी अर्थ

प्रहर्तुकामो विश्वस्ते यस्त्वं दुष्टेन चेतसा। तत् ते प्रतिकरिष्ये5हं पुत्रयोस्तव पश्यत: कृतपूर्व: करिष्ये वा विशेषेण तु बान्धवे गुर्वर्थ पूजितः सद्धिर्महद्धिर्धर्मबुद्धिभि: किं करिष्यामहे सर्वे सत्सु वक्तव्यतां गता:। यदूनां यूथमुख्यस्य यस्य ते वृत्तमीदूशम्

English

¹⁹² The holy verse of the repetition of which forms an essential part of the ceremonies, enjoined to the Brāhmanas for daily observances.

अध्याय ३४

श्लोक 10

स स्यन्दनवरो भाति युक्तो मातलिना तदा कृत्स्नः परिवृतो मेरुर् भास्करस्येव तेजसा

sa syandanavaro bhāti yukto mātalinā tadā kṛtsnaḥ parivṛto merur bhāskarasyeva tejasā

हिन्दी अर्थ

“बूढ़े वसुदेव ! मैंने जो तुम्हें पुरस्कृत किया--सदा अगुआ बनाकर रखा, वह सब व्यर्थ हो गया। सिरके बाल सफेद हो जायूँ और सौ वर्षोकी आयु हो जाय-- इतनेसे ही कोई वृद्ध (श्रेष्ठ) नहीं हो सकता, जिसकी बुद्धि परिपक्त हो, वही मनुष्योंमें वृद्धतर (श्रेष्ठठतम या बड़ा-बूढ़ा) माना गया है॥७२-७३॥ तुम्हारा स्वभाव तो कर्कश (क्रूर) है। तुम बुद्धिसे भी बहुश्रुत (अधिक बातोंके जानकार) नहीं हो। शरदू-ऋतुके बादलकी भाँति केवल अवस्थामें ही बूढ़े हो ( अनुभवमें नहीं) इतना ही नहीं, व्यर्थ बुद्धि रखनेवाले वसुदेव! तुम यह अच्छी तरह समझने लगे हो कि कंसके मर जानेपर मेरा बेटा मथुराका पालन करेगा--वही यहाँका राजा होगा

English

¹⁹³ The mother of Kuvera.

अध्याय ३४

श्लोक 11

यमस् तु दण्डम् उद्यम्य कालयुक्तं च मुद्गरम् तस्थौ सुरगणानीके दैत्यान् नादेन भीषयन्

yamas tu daṇḍam udyamya kālayuktaṃ ca mudgaram tasthau suragaṇānīke daityān nādena bhīṣayan

हिन्दी अर्थ

परंतु तुम्हारी यह आशा छिलन्न-भिन्न हो जायगी। तुम व्यर्थ ही बूढ़े हुए। तुमने झूठे ही ऐसा विचार किया है। अरे! जो मेरे सामने प्रतिद्वन्द्ती बनकर खड़ा हो, उसके तुमने दुष्टतापूर्ण चित्तसे मुझपर प्रहार करनेकी अभिलाषा की। इसका बदला मैं तुम्हारे दोनों पुत्रोंसे लूँगा और तुम उसे अपनी आँखों देखोगे॥ ७७॥ मैंने पहले कभी भी किसी बूढ़ेका, ब्राह्मणका अथवा स्त्रीका वध नहीं किया है तथा न आगे ही ऐसा करूँगा; विशेषत: अपने बन्धु- बान्धवपर तो मैं हाथ उठाऊँगा ही नहीं ॥ ७८ ॥ वसुदेव ! तुम यहीं पैदा हुए, यहीं बढ़े और मेरे पिताने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया। तुम मेरी चचेरी बहिनके पति हो और यदुवंशियोंमें सर्वश्रेष्ठ गुरुूूप माने जाते हो

English

¹⁹⁴ The mother of the Nagas.

अध्याय ३४

श्लोक 12

चतुर्भिः सागरैर् गुप्तो लेलिहद्भिश् च पन्नगैः शङ्खमुक्ताङ्गदधरो बिभ्रत् तोयमयं वपुः

caturbhiḥ sāgarair gupto lelihadbhiś ca pannagaiḥ śaṅkhamuktāṅgadadharo bibhrat toyamayaṃ vapuḥ

हिन्दी अर्थ

चक्रवर्तियोंक' सुविख्यात एवं महान् कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ, तुम स्वयं भी प्रसिद्ध हो तथा धर्मविषयक बुद्धि रखनेवाले श्रेष्ठ महापुरुषोंने उसी गौरवके कारण तुम्हारा पूजन, आदर-सत्कार किया है॥८०॥ तुम यदुवंशियोंके समुदायमें मुख्य हो। जब तुम्हारा आचार- व्यवहार ऐसा है (तो औरोंका क्या कहा जाय ?)। क्या करें, हम सब लोग केवल तुम्हारे कारण सत्पुरुषोंके समाजमें निन्‍्दाके पात्र बन गये! १. यद्यपि ययातिके शापसे यदुकुलका कोई भी पुरुष चक्रवर्ती राजा नहीं हुआ तथापि यहाँ चक्रवर्तीके लक्षण-विशेषसे सम्पन्न पुरुषोंको ही चक्रवर्ती कहा गया है। वह लक्षण इस प्रकार है--यस्य मूर्थनि दृश्येत विना छत्रेण भूपते:। पद्मानुकारिणी छाया तमाहुश्रक्रवर्तिनम्॥ अर्थात् जिस राजाके मस्तकपर बिना छत्र लगाये ही कमल-जैसी छाया दिखायी दे, उसे चक्रवर्ती मद्रधो वा जयो वाथ वसुदेवस्य दुर्नयैः। सत्सु यास्यन्ति पुरुषा यदूनामवगुण्ठिता: अविश्वास्थ॑ कृतं कर्म वाच्याश्न यदवः कृता:

English

¹⁹⁵ According to tradition Valmiki obtained a boon from the goddess of learning and composed his great work Ramayana.

अध्याय ३४

श्लोक 13

शङ्खमुक्तामलतनुः शीतीभूतो ऽयम् अम्बुपः ।कालपाशान् समाविध्य हयैः शशिकरोपमैः वाय्वीरितजलोद्गारैः कुर्वंल् लीलाः सहस्रशः

śaṅkhamuktāmalatanuḥ śītībhūto 'yam ambupaḥ | kālapāśān samāvidhya hayaiḥ śaśikaropamaiḥ vāyvīritajalodgāraiḥ kurvaṃl līlāḥ sahasraśaḥ

हिन्दी अर्थ

अशाम्यं वैरमुत्पन्नं मम कृष्णस्य चोभयो:। शान्तिमेकतरे शान्तिं गते यास्यन्ति यादवा: नन्दगोपं च गोपां श्व करदान् मम शासनात् वाच्यश्व नन्दगोपो वै करमादाय वार्षिकम्। शीघ्रमागच्छ नगरं गोपै: सह समन्वितः कृष्णसंकर्षणौ चैव वसुदेवसुतावुभौ। द्रष्टमच्छति वै कंस: सभूत्य: सपुरोहितः

English

¹⁹⁶ Dwaipayana Vyasa was celebrated for his memory for he had by heart all the Vedas and Puranas.

अध्याय ३४

श्लोक 14

पाण्डुरोद्धूतवसनः प्रवालरुचिराङ्गदः मणिश्यामोत्तमवपुर् हारभारार्पितोदरः

pāṇḍuroddhūtavasanaḥ pravālarucirāṅgadaḥ maṇiśyāmottamavapur hārabhārārpitodaraḥ

हिन्दी अर्थ

एतौ युद्धविदौ रड्ढे कालनिर्माणयोधिनौ। दूढौ च कृतिनौ चैव श्रुणोमि व्यायतोद्यमौ राजा धनुर्म्ं नाम कारयिष्यति वै सुखी यथाकामप्रदानाय भोज्याधिश्रयणाय च “वसुदेवकी दुर्नीतिसे मेश वध हो अथवा विजय, आजसे यदुकुलके पुरुष सजनोंके समाजमें अपना मुँह ढँककर जायूँगे॥ ८२॥ वसुदेव ! तुमने युद्धमें मेरे वधका उपाय सोचते-सोचते ऐसा कर्म कर डाला, जिसके कारण यादवोंके ऊपरसे सबका विश्वास उठ गया। तुमने यदुवंशियोंको कलड्लडित करके निन्दाके योग्य बना दिया॥ ८३॥ अब तो हम दोनोंमें--मुझ कंस और कृष्णमें कभी शान्त न होनेवाला वैर उत्पन्न हो गया है। हममेंसे

English

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अध्याय ३४

श्लोक 15

वरुणः पाशभृन्मध्ये देवानीकस्य तस्थिवान् वरुणः पाशहस्तः सन् देवानीके व्यतिष्ठत ।युद्धवेलाम् अभिलषन् भिन्नवेल इवार्णवः

varuṇaḥ pāśabhṛnmadhye devānīkasya tasthivān varuṇaḥ pāśahastaḥ san devānīke vyatiṣṭhata | yuddhavelām abhilaṣan bhinnavela ivārṇavaḥ

हिन्दी अर्थ

किसी एक व्यक्तिके शान्त होने--मर जानेपर ही यादवोंको शान्ति मिलेगी ॥ ८४॥ दानपते अक्रूर! तुम मेरे आदेशसे वसुदेवके उन दोनों पुत्रोंको, नन्दगोपको तथा मुझे कर देनेवाले अन्य गोपोंको भी ब्रजसे यहाँ बुला लानेके लिये शीघ्र जाओ॥ ८५॥ नन्दगोपसे कह देना कि तुम हमारा वार्षिक कर लेकर गोपोंके साथ शीघ्र ही मथुरापुरीको चलो॥ ८६॥ वसुदेवके दोनों पुत्र जो श्रीकृष्ण और संकर्षण हैं, इन्हें सेवकों और पुरोहितोंसहित महाराज कंस देखना चाहते हैं॥८७॥ सुनता हूँ कि ये दोनों अखाड़ेमें लड़ना जानते हैं और सामयिक युद्धकी कलामें कुशल हैं। इन्होंने दीर्घकालसे इसके लिये विशेष यत्न और परिश्रम किया है तथा ये दोनों भाई सुदृढ़ और चतुर हैं॥ ८८॥ हमारे यहाँ भी दो पहलवान लड़ाईके लिये तैयार हैं। इन्हें लड़ने-भिड़नेमें बड़ा आनन्द आता है। वे दोनों ही युद्धमें कुशल हैं, जो उन दोनों श्रीकृष्ण और संकर्षणके साथ युद्ध करेंगे॥८९॥ वे दोनों देवोपम

English

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अध्याय ३४

श्लोक 16

यक्षराक्षससैन्येन गुह्यकानां गणैर् अपि मणिश्यामोत्तमवपुः कुबेरो नरवाहनः ।युक्तश् च शङ्खपद्माभ्यां निधीनाम् अधिपः प्रभुः राजराजेश्वरः श्रीमान् गदापाणिर् अदृश्यत

yakṣarākṣasasainyena guhyakānāṃ gaṇair api maṇiśyāmottamavapuḥ kubero naravāhanaḥ | yuktaś ca śaṅkhapadmābhyāṃ nidhīnām adhipaḥ prabhuḥ rājarājeśvaraḥ śrīmān gadāpāṇir adṛśyata

हिन्दी अर्थ

बालक मेरी चचेरी बहिनके प्रधान पुत्र हैं, जो इस समय ब्रजमें रहते और वनमें विचरते हैं। मुझे अवश्य उन दोनोंको देखना चाहिए॥९०॥ उस ब्रजमें जाकर ब्रजवासियोंके समीप तुम्हें यह कहना चाहिए कि सुखी राजा कंस धनुर्यज्ञका उत्सव करायेंगे॥ ९१॥ इस उत्सवमें आमन्त्रित हुए लोगोंको जिस प्रकार हर तरहसे आराम मिले, उसके लिये तुम सब ब्रजवासी मथुराके समीपवर्ती वनमें आकर सुखपूर्वक रहो ॥ ९२॥ दूध, घी, दही और तक्र आदिको अतिथियोंकी इच्छाके अनुसार जुटाकर देना और खीर आदि बनानेके लिये जब जितने दूधको आगपर रखना आवश्यक हो, तब-तब उस आवश्यकताकी पूर्तिके लिये पर्याप्त दूध प्रस्तुत करना--इसी उद्देश्यसे तुम्हें नगरके निकट निवास करना है! संकर्षणं च कृष्णं च् द्रष्ट कौतूहलं हि मे

English

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अध्याय ३४

श्लोक 17

विमानयोधी धनदो विमाने पुष्पके स्थितः स राजराजः शुशुभे युद्धार्थी नरवाहनः प्रेक्षमाणः शिवसखः साक्षाद् इव शिवः स्वयम्

vimānayodhī dhanado vimāne puṣpake sthitaḥ sa rājarājaḥ śuśubhe yuddhārthī naravāhanaḥ prekṣamāṇaḥ śivasakhaḥ sākṣād iva śivaḥ svayam

हिन्दी अर्थ

नागच्छेतां यथाकालं निग्राह्मावपि तौ मम यदि वा नोपजप्तोडसि वसुदेवेन सुत्रत। तथा कर्तव्यमेतद्द्धि यथा तावागमिष्यत: एवमाक्षिप्पमाणो5पि वसुदेवो वसूपम: । सागराकारमात्मानं निष्प्रकम्पमधारयत् वाक्छल्यैस्ताड्यमानस्तु कंसेनादीर्घदर्शिना । क्षमां मनसि संधाय नोत्तरं प्रत्यभाषत

English

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अध्याय ३४

श्लोक 18

क्षौमवासाः शिवः साक्षाच् छिवरूपः स्वयं स्वयम् ।पूर्वं पक्षं सहस्राक्षः पितृराजस् तु दक्षिणम् वरुणः पश्चिमं पक्षम् उत्तरं नरवाहनः

kṣaumavāsāḥ śivaḥ sākṣāc chivarūpaḥ svayaṃ svayam | pūrvaṃ pakṣaṃ sahasrākṣaḥ pitṛrājas tu dakṣiṇam varuṇaḥ paścimaṃ pakṣam uttaraṃ naravāhanaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रीतिमान् पुण्डरीकाश्षं द्रष्ट दानपति: स्वयम् 'अक्रूर! शीघ्र जाओ। मेरी आज्ञासे उन दोनों संकर्षण और कृष्णको यहाँ ले आओ। मुझे उन्हें देखनेके लिये बड़ी उत्कण्ठा है॥९४॥ उनके आ जानेसे मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी (जिसका श्रेय तुम्हें मिलेगा)। उन दोनों महापराक्रमी बालकोंको देखकर मैं वही करूँगा, जिसमें मेरा हित होगा॥९५॥ मेरी यह आज्ञा तथा बातें सुनकर यदि वे दोनों यहाँ ठीक समयपर आनेको तैयार न हों तो मेरी रायमें वे बंदी बना लेनेके भी योग्य हैं (अर्थात् तुम उन्हें कैद करके भी ला सकते हो) ॥ ९६॥ समझा-बुझाकर काम लेना ही बालकोंके प्रति प्रधान एवं प्रमुख नीति है; इसलिये तुम उन दोनों मूर्खोको मीठी बातोंसे स्वयं ही राजी करके यहाँ शीघत्र ले आओ॥९७॥ उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले अक्रूर ! यदि वसुदेवने तुम्हािरे भी कान न भर दिये हों तो तुम मेरी इस परम दुर्लभ प्रीतिका सम्पादन करो। तुम्हें वैसा ही प्रयत्त करना चाहिए, जिससे वे

English

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अध्याय ३४

श्लोक 19

चतुर्षु युक्ताश् चत्वारो लोकपाला बलोत्कटाः स्वां स्वां दिशं ररक्षुस् ते तस्य देवबलस्य ह

caturṣu yuktāś catvāro lokapālā balotkaṭāḥ svāṃ svāṃ diśaṃ rarakṣus te tasya devabalasya ha

हिन्दी अर्थ

दोनों स्वतः यहाँ आ जायँ'॥ ९८॥ कंसके इस प्रकार आक्षेप करनेपर भी वसुओंके समान शक्तिशाली वसुदेवने अपने समुद्र-जैसे हृदयको क्ुब्धथ या कम्पित नहीं होने दिया। उसे धेर्यपूर्वक काबूमें रखा अदूरदर्शी कंसने उन्हें वाग्बाणोंसे बार-बार घायल किया। फिर भी उन्होंने मनमें क्षमाभाव रखकर उसे उसकी बातोंका कोई उत्तर नहीं दिया॥१००॥ जिन लोगोंने वहाँ वसुदेवजीपर बारम्बार आक्षेप होता देखा, वे अपना धिक्कार है, धिक्कार है॥ १०१ ॥ महातेजस्वी अक्रूर अपनी दिव्य दृष्टिसि सब कुछ जानते थे (कि भगवान् श्रीकृष्ण कौन हैं और किसलिये अवतीर्ण हुए हैं); अतः जैसे प्यासा मनुष्य पानीको देखते ही प्रसन्न हो उठता है, उसी प्रकार उन्हें कंसके भेजनेपर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव हुआ॥ १०२॥ दानपति अक्रूर मन-ही-मन प्रसन्न हो स्वयं जाकर कमलनयन श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये उसी मुहूर्तमें मथुरासे निकल पड़े

English

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अध्याय ३४

श्लोक 20

सूर्यः सप्ताश्वयुक्तेन रथेनाम्बरगामिना श्रिया जाज्वल्यमानेन दीप्यमानैश् च रश्मिभिः

sūryaḥ saptāśvayuktena rathenāmbaragāminā śriyā jājvalyamānena dīpyamānaiś ca raśmibhiḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अक्रूरप्रस्थाने द्वाविंशो5ध्याय: इस प्रकार श्रीयहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अक्वूरका ग्रस्थानविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ अन्धकका कंसको मुँहतोड़ उत्तर निपीड्य श्रवणान् हस्तैमेंनिरे तं गतायुषम् अन्धकोडनुद्विग्रमना धैर्यादविकृतं वच:। प्रोवाच वबदतां श्रेष्ठ; समाजे कंसमोजसा

English

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अध्याय ३४

श्लोक 21

उदयास्तगचक्रेण मेरुपर्यन्तगामिना त्रिदिवद्वारचित्रेण तपता लोकम् अव्ययम्

udayāstagacakreṇa meruparyantagāminā tridivadvāracitreṇa tapatā lokam avyayam

हिन्दी अर्थ

इक्ष्वाकुवंशजो राजा विनिवृत्त: स्वयं सकृत् उग्रसेनस्त्वयं शोच्यो यो5स्माकं॑ कुलपांसन:। दुर्जातीयेन येन त्वमीदूशों जनितः सुतः वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! यदुकुलके उन सभी श्रेष्ठ पुरुषोंने यदुकुल॒तिलक वसुदेवपर आशक्षेप होता देख शीघ्र ही हाथोंसे अपने-अपने कान बंद कर लिये। उन सबको यह निश्चय हो गया कि कंसकी आयु समाप्त हो चली है॥१॥ उसी समाजमें वक्ताओंमें श्रेष्ठ अन्धक भी थे, जिनके मनमें कंससे तनिक भी भय नहीं था। उन्होंने धेर्यसे अपनी वाणीको विकाररहित रखते हुए कंससे ओजस्वी स्वरमें कहा-- ॥ २॥ “बेटा !

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अध्याय ३४

श्लोक 22

सहस्ररश्मियुक्तेन भ्राजमानेन तेजसा चचार मध्ये देवानां द्वादशात्मा दिनेश्वरः

sahasraraśmiyuktena bhrājamānena tejasā cacāra madhye devānāṃ dvādaśātmā dineśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

तुमने जो इतनी देरतक भाषण देनेका कष्ट उठाया है, तुम्हारा यह परिश्रम मेरे मतमें आदर या प्रशंसाके योग्य नहीं है। यह सर्वथा अनुचित है। श्रेष्ठ पुरुषोंने इसकी सदा निन्‍्दा की है। विशेषतः अपने बन्धु-बान्धवोंके प्रति ऐसा आक्षेप सर्वथा निन्दित है॥३॥ वीर! अब इस समय मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। यदि तुम यादव नहीं हो या अपनेको यादव नहीं मानते हो तो ये यदुवंशी तुम्हें जबरदस्ती यादव नहीं बना रहे हैं (और न बनाना चाहते हैं)॥४॥ वत्स! जिनके शासक तुम हो, वे वृष्णिवंशी आदर और प्रशंसाके योग्य हो ही नहीं सकते हैं। इक्ष्वाकुवंशमें एक प्रजापीड़क राजा उत्पन्न हुआ था, जो स्वयं ही किसी समय राज्य छोड़कर भाग गया अथवा मिट गया (इस यदुकुलमें तुम भी वैसे ही जान पड़ते हो, अतः तुम्हारी भी वैसी ही दशा होनेवाली है) ॥ ५॥ तात! तुम भोज हो, यादव हो अथवा कंस हो या जैसा-तैसा कोई भी हो, तुम्हारा मस्तक तुम्हारे साथ ही उत्पन्न हुआ है (और वह अभीतक मौजूद है) । तुम उसपर बड़ी-बड़ी जटाएँ रखा लो अथवा मूँड़ मुड़ा लो (यदि तुम यादव रहना नहीं चाहते तो जो चाहो, वही बन जाओ) ॥ ६॥ मेरी दृष्टिमें

English

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अध्याय ३४

श्लोक 23

सोमः श्वेतहयो भाति स्यन्दने शीतरश्मिवान् हिमतोयप्रपूर्णाभिर् भाभिर् आप्लावयञ् जगत्

somaḥ śvetahayo bhāti syandane śītaraśmivān himatoyaprapūrṇābhir bhābhir āplāvayañ jagat

हिन्दी अर्थ

तो यह उग्रसेन शोचनीय है, जो हमलोगोंमें कुलाड्रार पैदा हो गया और जिस दुर्जातिने तुम्हारे-जैसे बेटेको जन्म दिया॥७॥ तात! मनीषी पुरुष अपने मुखसे अपने गुणोंका बखान नहीं करते हैं। दूसरेके द्वारा वर्णित या प्रशंसित हुए गुण ही सफल होते और वेदार्थके तुल्य प्रामाणिक माने जाते हैं' न चाप्यासादितं कार्यमात्मा च विवृतः कृतः क्रोधो हि तेषां प्रदहेल्‍लोकानन्तर्गतानपि

English

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अध्याय ३४

श्लोक 24

तम् ऋक्षयोगानुगतं शिशिरांशुं द्विजेश्वरम् शशच्छायाङ्किततनुं नैशस्य तमसः क्षयम्

tam ṛkṣayogānugataṃ śiśirāṃśuṃ dvijeśvaram śaśacchāyāṅkitatanuṃ naiśasya tamasaḥ kṣayam

हिन्दी अर्थ

धर्मस्य गतिरन्वेष्या मत्स्यस्थ गतिरप्स्विव केवलं त्वं तु दर्पेण वृद्धानग्रिसमानिह। वाचा तुदसि मर्मघ्य्या अमन्ब्रोक्ता यथा55हुति: वसुदेव॑ च ॒पुत्रार्थ यदिमं परिगहसि। तत्र मिथ्या प्रलापं ते निन्दामि कृपणं बच: छादितो वसुदेवेन यदि पुत्र: शिशुस्तदा। मन्यसे यद्यकर्तव्यं तत् पृच्छ पितरं स्वकम् गईता वसुदेव॑ चर यदुवंशं चर निन्दता। त्वया यादवपुत्राणां वैरजं विषमर्जितम्

English

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अध्याय ३४

श्लोक 25

ज्योतिषाम् ईरणं व्योम्नि रसानां रसनं प्रभुम् ओषधीनां परित्राणं निधानम् अमृतस्य च

jyotiṣām īraṇaṃ vyomni rasānāṃ rasanaṃ prabhum oṣadhīnāṃ paritrāṇaṃ nidhānam amṛtasya ca

हिन्दी अर्थ

अकर्तव्यं यदि कृतं वसुदेवेन पुत्रजम्। किमर्थमुग्रसेनेन शिशुस्त्व॑ न विनाशितः ' भूमण्डलमें यह यदुवंश समस्त भूपालोंके लिये निन्दनीय बन गया; क्योंकि तुम्हारे समान कुलनाशक, मूर्ख और अविवेकी बालक इन यादवोंका शासक है॥९॥ तुमने निन्दायुक्त वचनोंको उत्तम मानकर जो यहाँ कहा है, उनसे कोई कार्य तो सिद्ध हुआ नहीं; केवल तुम्हारे स्वरूपका स्पष्टीकरण हो गया है (इन बातोंसे सब लोग यह जान गये कि तुम कितने ओछे हो !)॥ १०॥ जो अहंकाररहित तथा महापुरुषोंके लिये भी माननीय गुरुजन हैं, उनपर आक्षेप करना ब्रह्महत्याके समान है। उसे करके कौन अपने लिये कल्याणकी आशा कर सकता है॥ ११॥ तात! वृद्ध पुरुष अग्नियोंके समान आदरणीय तथा सेव्य होते हैं, उनका क्रोध

English

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अध्याय ३४

श्लोक 26

जगतः प्रथमं भागं सौम्यं शैत्यमयं रसम् ददृशुर् दानवाः सोमं हिमप्रहरणं स्थितम्

jagataḥ prathamaṃ bhāgaṃ saumyaṃ śaityamayaṃ rasam dadṛśur dānavāḥ somaṃ himapraharaṇaṃ sthitam

हिन्दी अर्थ

आन्तरिक साधनाओंसे प्राप्त हुए लोकोंको भी जलाकर भस्म कर सकता है॥१२॥ तात! जिसका आत्मा उन्नतिके पथपर अग्रसर है तथा जो जितेन्द्रिय एवं विवेकशील विद्वान् है, उस पुरुषको धर्मकी गतिका सदा ही अन्वेषण करना चाहिए, जैसे जलमें मछलीकी गति अत्यन्त सूक्ष्म या अव्यक्त होती है, उसी प्रकार धर्मकी गति भी सूक्ष्म है॥ १३॥ तुम तो केवल अहंकारवश यहाँ बैठे हुए अग्निके समान तेजस्वी वृद्ध पुरुषोंको अपनी मर्मभेदिनी वाणीद्वारा पीड़ा दे रहे हो। जैसे है, उसी प्रकार तुम्हारी ये आश्षेपपूर्ण बातें निष्फल हैं॥ १४॥ वसुदेवने अपने पुत्रकी रक्षाके लिये जो कुछ किया है, उसके लिये जो तुम इनपर आक्षेप करते हो, वह सब तुम्हारा मिथ्या प्रलाप है। उस विषयमें कही गयी तुम्हारी इन कायरतापूर्ण बातोंकी मैं निन्‍दा करता हूँ॥ १५॥ पुत्र क्रूर स्वभावका हो जाय तो भी पिता उसके प्रति निष्ठर नहीं हो सकता; क्योंकि पुत्रोंके लिये पिताओंको कितनी ही कष्टदायिनी विपत्तियाँ झेलनी

English

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अध्याय ३४

श्लोक 27

यः प्राणः सर्वभूतानां पञ्चधा भिद्यते नृषु सप्तस्कन्धगतो लोकांस् त्रीन् दधार चचार च

yaḥ prāṇaḥ sarvabhūtānāṃ pañcadhā bhidyate nṛṣu saptaskandhagato lokāṃs trīn dadhāra cacāra ca

हिन्दी अर्थ

पड़ती हैं॥१६॥ यदि वसुदेवने उस समय अपने पुत्रको उसकी रक्षाके लिये छिपा दिया था तो यह कोई अनुचित कर्म नहीं किया। यदि तुम इसे न करनेयोग्य बुरा कर्म मानते हो तो इस विषयमें अपने पितासे ही पूछो ॥ १७॥ वसुदेवपर आक्षेप और यादवकुलकी निन्दा करके तुमने यहाँ यादवकुमारोंके बैरजनित विषका ही उपार्जन किया है॥१८॥ यदि वसुदेवने अपने पुत्रके प्राण बचाकर अनुचित कर्म किया है तो उग्रसेनने शैशवाबस्थामें तुम्हें क्यों नहीं मार डाला था' पुन्नाम्नो नरकात् पुत्रो यस्मात् त्राता पितृंस्तदा। तस्माद् ब्रुवन्ति पुत्रेति पुत्रं धर्मविदो जना:

English

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अध्याय ३४

श्लोक 28

यम् आहुर् अग्नेर् यन्तारं सर्वप्रभवम् ईश्वरम् सप्तस्वरगता यस्य योनिर् गीभिर् उदीर्यते

yam āhur agner yantāraṃ sarvaprabhavam īśvaram saptasvaragatā yasya yonir gībhir udīryate

हिन्दी अर्थ

जात्यां हि यादव: कृष्ण: स च संकर्षणो युवा। त्वं चापि विधृतस्ताभ्यां जातवैरेण चेतसा बसुदेवे त्वया55क्षिप्ते वासुदेवे च कोपिते कृष्णे च भवतो द्वेष्ये वसुदेवविगर्हणात्। शंसन्ति चेमानि भय निमित्तान्यशुभानि ते पुर्या वैधव्यशंसीनि कारणैरनुमीमहे केतुना धूमकेतोस्तु नक्षत्राणि त्रयोदश। भरण्यादीनि भिन्नानि नानुयान्ति निशाकरम्

English

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अध्याय ३४

श्लोक 29

यं वदन्त्य् उत्तमं भूतं यं वदन्त्य् अशरीरिणम् यम् आहुर् आकाशगमं शीघ्रगं शब्दयोनिनम्

yaṃ vadanty uttamaṃ bhūtaṃ yaṃ vadanty aśarīriṇam yam āhur ākāśagamaṃ śīghragaṃ śabdayoninam

हिन्दी अर्थ

प्राक्संध्या परिधग्रस्ता भाभिर्बाधति भास्करम्। प्रतिलोम॑ च यान्त्येव व्याहरन्तो मृगद्विजा: शिवा श्मशानातन्निष्क्रम्य नि: श्वासाड्ररवर्षिणी। उभे संध्ये पुरीं घोरा पर्येति बहु वाशती “पुत्र पुत् नामक नरकसे पितरोंकी रक्षा करता है, इसलिये धर्मज्ञ पुरुष पुत्रको पुत्र कहते हैं ॥ २० ॥ श्रीकृष्ण और नवयुवक संकर्षण भी यादव ही हैं, किंतु तुमने उनके उत्पन्न होते ही उनसे वैर बाँध लिया; फिर उन दोनोंने मनमें वैरभावको स्थान देकर तुमसे शत्रुता बाँध ली है (अत: इस वैरभावमें प्रथम अपराध तुम्हारा ही है) ॥ २१॥ तुमने वसुदेवपर आक्षेप किया और वसुदेव- पुत्र श्रीकृष्णके मनमें अपने प्रति क्रोध उत्पन्न कर दिया,

English

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अध्याय ३४

श्लोक 30

स वायुः सर्वभूतायुर् उद्धतः स्वेन तेजसा प्रववौ व्यथयन् दैत्यान् प्रतिलोमः सतोयदः

sa vāyuḥ sarvabhūtāyur uddhataḥ svena tejasā pravavau vyathayan daityān pratilomaḥ satoyadaḥ

हिन्दी अर्थ

इससे समस्त यादवोंके हृदय यहाँ कम्पित हो उठे हैं एक तो श्रीकृष्णके प्रति तुम्हारा द्वेष था ही, दूसरे तुमने वसुदेवकी भरपूर निनन्‍दा भी कर डाली, इससे ये अशुभ- सूचक अपशकुन प्रकट होकर तुम्हारे लिये भयकी प्राप्ति बता रहे हैं ॥ २३ ॥ जब रात समाप्त हो रही हो, उस समय सर्पों और बुरे स्वप्रोंका दर्शन अत्यन्त कष्टदायक होता है। ये जो शकुन दिखायी देते हैं, वे इस नगरीके भावी वैधव्यकी सूचना देनेवाले हैं। अबतक जो कारण प्राप्त हुए हैं, उनसे हमें ऐसा ही अनुमान होता है यह भयंकर ग्रह राहु आकाशमें अपनी किरणोंद्वारा स्वातिका वेध कर रहा है तथा भयानक दिखायी देनेवाला मंगल सर्वतोभद्रचक्रमें वक्रीभूत होकर चित्रा नक्षत्रपर स्थित है॥ २५॥ बुधने भयानक तेजसे पश्चिम संध्याको व्याप्त कर रखा है (अर्थात् वे पश्चिम दिशामें उदित हो रहे हैं, ऐसा होना राज्यभंगका सूचक है) तथा शुक्रने वैश्वानरपथ (सूर्यमार्ग)-पर अतिचार गतिसे चलना आरम्भ किया है (सूर्यको लाँधघकर जाना ही अतिचार

English

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अध्याय ३४

श्लोक 31

मरुतो देवगन्धर्वा विद्याधरगणैः सह चिक्रीडुर् असिभिः शुभ्रैर् निर्मुक्तैर् इव पन्नगैः

maruto devagandharvā vidyādharagaṇaiḥ saha cikrīḍur asibhiḥ śubhrair nirmuktair iva pannagaiḥ

हिन्दी अर्थ

है) ॥ २६॥ धूमकेतु नामक उत्पात-ग्रहके पुच्छभागसे भरणी आदि तेरह नक्षत्र विद्ध हो गये हैं, इसलिये वे चन्द्रमाका अनुसरण नहीं करते हैं॥ २७॥ पूर्वकालकी संध्या परिघसे॥ ग्रस्त है। वह अपनी प्रभाओंद्वारा सूर्यदेवको बाधा पहुँचाती है तथा पशु और पक्षी अपनी बोली बोलते हुए प्रतिकूल दिशासे होकर जाते हैं॥ २८ ॥ दोनों संध्याओंके समय एक भयानक गीदड़ी श्मशानभूमिसे निकलकर अपने नि:श्वाससे अड्भारकी वर्षा करती और बहुत बोलती हुई मथुरापुरीके चारों ओर चक्कर लगाती है! ज्योतिषके अनुसार सर्वतोभद्र नामक चक्रमें मृगशशिरा कंसका जन्म-नक्षत्र है, उससे दशम नक्षत्र चित्रा है, जो उसीका कर्म- नक्षत्र है। वहीं भयंकर ग्रह राहु, जो क्रूर ग्रह माना गया है, स्थित है। मंगल भी वक्रगतिसे वहीं आ गया है। इन दोनोंने कर्म-नक्षत्रको व्याप्त करके जन्म-नक्षत्रको विद्ध कर दिया है। इसका फल बताते हुए अन्धक कहते हैं--'कंस ! तुम्हारा जीवित रहनेके लिये जो प्रयत्न है, वह निष्फल होगा और तुम्हारे देहका भी नाश हो जायगा।” (नीलकण्ठी)

English

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अध्याय ३४

श्लोक 32

यक्षैश् च सुमहाभोगैः पन्नगैर् गरुडैर् अपि ।सृजन्तः सर्पपतयस् तीव्रं रोषमयं विषम् शरभूताः सुरेन्द्राणां चेरुर् व्यात्तमुखा दिवि

yakṣaiś ca sumahābhogaiḥ pannagair garuḍair api | sṛjantaḥ sarpapatayas tīvraṃ roṣamayaṃ viṣam śarabhūtāḥ surendrāṇāṃ cerur vyāttamukhā divi

हिन्दी अर्थ

त सूर्यमण्डलमें उगा हुआ तिरछा डंडा परिघ कहलाता है। उल्का निर्घातनादेन पपात धरणीतले। चलत्यपर्वणि मही गिरीणां शिखराणि च धूमोत्पातर्दिशों व्याप्ता: शुष्काशनिसमाहता: चलिता देवता: स्थानात् त्यजन्ति विहगा नगान् यानि राजविनाशाय हैवज्ञा: कथयन्ति ह। तानि सर्वाणि पश्यामो निमित्तान्यशुभानि वै

English

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अध्याय ३४

श्लोक 33

पर्वतास् तु शिलाशृङ्गैः शतशाखैश् च पादपैः उपतस्थुः सुरगणान् प्रहर्तुं दानवं बलम्

parvatās tu śilāśṛṅgaiḥ śataśākhaiś ca pādapaiḥ upatasthuḥ suragaṇān prahartuṃ dānavaṃ balam

हिन्दी अर्थ

त्वं चापि स्वजनद्वेषी राजधर्मपराड्मुख:। अनिमित्तागतक्रोध: संनिकृष्टठभयो हासि यस्त्वं देवोपमं वृद्धं वसुदेवं॑ वसूपमम्। भोहात् क्षिपसि दुर्बुद्धे कुतस्ते शान्तिरात्मन: पुण्डरीकविशालाक्ष॑ कृष्णमक्लिषप्टकारिणम् कृष्णो ज्ञातीनू समानाय्य स संधानं करिष्यति

English

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अध्याय ३४

श्लोक 34

यः स देवो हृषीकेशः पद्मनाभस् त्रिविक्रमः कृष्णवर्त्मा युगान्ताभो विश्वस्य जगतः प्रभुः

yaḥ sa devo hṛṣīkeśaḥ padmanābhas trivikramaḥ kṛṣṇavartmā yugāntābho viśvasya jagataḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

क्षान्तमेव तवानेन वसुदेवेन धीमता। कालसम्यक्परिज्ञानो ब्रूहि त्वं यद्यदिच्छसि महां तु रोचते कंस वसुदेवसहायवान्। गच्छ कृष्णस्य निलयं संधिस्तेन च रोचताम् “कुछ ही समय पहले वज्रपातकी-सी ध्वनिके साथ पृथ्वीपर उल्कापात हुआ है। यह पृथ्वी तथा पर्वतोंके शिखर अकस्मात् काँपने लगते हैं जिससे दिनमें ही रात हो गयी थी। धूम और उत्पातोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हैं। सूखेमें ही बिजलियाँ गिरती हैं॥३१॥ मेघ बिजली और गड़गड़ाहटके साथ रक्तकी वर्षा करते हैं। देवताओंकी प्रतिमाएँ अपने स्थानसे हट जाती हैं और पक्षी वृक्षोंको त्याग देते हैं ॥ ३२॥ ज्योतिषी लोग राजाके विनाशकी सूचना देनेवाले जो-जो अशुभ निमित्त (अपशकुन) बताते हैं, उन सबको हमलोग देख रहे हैं॥३३॥ तुम भी

English

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अध्याय ३४

श्लोक 35

समुद्रयोनिर् मधुहा हव्यभुक् क्रतुसत्कृतः भूम्यापोव्योमभूतात्मा स्यामः शान्तिकरो ऽरिहा

samudrayonir madhuhā havyabhuk kratusatkṛtaḥ bhūmyāpovyomabhūtātmā syāmaḥ śāntikaro 'rihā

हिन्दी अर्थ

स्वजनोंसे द्वेष रखते हो, राजधर्मसे विमुख हो चुके हो और अकारण ही तुम्हें क्रोध आ जाता है, इससे जान पड़ता है, निकट भविष्यमें ही तुम्हारे ऊपर भय आनेवाला है॥ ३४॥ दुर्बुद्धे! तुम जो देवताओं तथा वसुओंके समान तेजस्वी बूढ़े वसुदेषपर मोहवश आत्षेप कर रहे हो, इससे तुम्हारी आत्माको शान्ति कैसे मिल सकती है॥ ३५॥ तुम्हारे प्रति जो हमारा स्नेह रहा है, उसे हमलोग आज त्याग देते हैं। तुम अपने बंशका अहित करनेवाले हो, अतः: अब हम एक क्षण भी तुम्हारे पास नहीं बैठेंगे॥ ३६॥ वे दानपति अक्रूर धन्य हैं, जो आज वनमें गये हुए अनायास ही महान कर्म करनेवाले कमलनयन श्रीकृष्फो अपनी आँखोंसे देखेंगे॥ ३७॥ तुम्हारे कारण इस यदुवंशकी जड़ कट गयी है। अब श्रीकृष्ण ही आकर समस्त भाई- बन्धुओंको जुटायेंगे और उनमें मेल करायेंगे॥ ३८ ॥ इन बुद्धिमान् वसुदेवने तो तुम्हारे अपराधको क्षमा ही कर

English

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अध्याय ३४

श्लोक 36

जगयोनिर् जगद्बीजो जगद्गुरुर् उदारधीः ।सो ऽर्कम् अग्नाव् इवोद्यन्तम् उद्यम्योत्तमतेजसम् अरिघ्नम् असुरानीके चक्रं चक्रगदाधरः सपरीवेषम् उद्यन्तं सवितुर् मण्डलं यथा

jagayonir jagadbījo jagadgurur udāradhīḥ | so 'rkam agnāv ivodyantam udyamyottamatejasam arighnam asurānīke cakraṃ cakragadādharaḥ saparīveṣam udyantaṃ savitur maṇḍalaṃ yathā

हिन्दी अर्थ

दिया है। कालने तुम्हारी विवेकशक्ति नष्ट कर दी, अतः यही अच्छा लगता है कि तुम वसुदेवको साथ लेकर श्रीकृष्णके स्थानपर जाओ और उनके साथ संधि करना स्वीकार करो! इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अन्धकवचने त्रयोविंशो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अन्धकका वचनविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ केशीके अत्याचार और श्रीकृष्णद्वारा उसका वध

English

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अध्याय ३४

श्लोक 37

सव्येनालम्ब्य महतीं सर्वासुरविनाशिनीम् करेण कालीं वपुषा शत्रुकालप्रदां गदाम्

savyenālambya mahatīṃ sarvāsuravināśinīm kareṇa kālīṃ vapuṣā śatrukālapradāṃ gadām

हिन्दी अर्थ

न किंचिदब्रवीत् क्रोधाद् विवेश स्व॑ निकेतनम् अक्रूरोषपि यथा55ज्ञप्त: कृष्णदर्शनलालस: । जगाम रथमुख्येन मनसा तुल्यगामिना कृष्णस्थापि निमित्तानि शुभान्यड्रगतानि वै। प्रागेोव च नरेन्‍्द्रेण माथुरेणौग्रसेनिना। केशिनः प्रेषितो दूतो वधायोपेन्द्रकारणातू

English

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अध्याय ३४

श्लोक 38

शेषैर् भुजैः प्रदीप्तानि भुजगारिध्वजः प्रभुः दधारायुधजातानि शार्ङ्गादीनि महायशाः

śeṣair bhujaiḥ pradīptāni bhujagāridhvajaḥ prabhuḥ dadhārāyudhajātāni śārṅgādīni mahāyaśāḥ

हिन्दी अर्थ

सच दूतवच:ः श्रुत्वा केशी क्लेशकरो नृणाम्। वृन्दावनगतो गोपान् बाधते सम दुरासद: दुर्दान्तो वाजिदेत्योड्सावकरोत् कदनं महत् दुर्मद: कामचारी च स केशी निरवग्रह: यत्रास्ते स हि दुष्टात्मा केशी तुरगदानव: ईरिणं तद् वन॑ सर्व तेनासीत् पापकर्मणा। कृतं तुरगहैत्येन सर्वान् गोपाज्चलिघांसता

English

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अध्याय ३४

श्लोक 39

स कश्यपस्यात्मभुवं द्विजं भुजगभोजनम् पवनाधिकसंपातं गगनक्षोभणं खगम्

sa kaśyapasyātmabhuvaṃ dvijaṃ bhujagabhojanam pavanādhikasaṃpātaṃ gaganakṣobhaṇaṃ khagam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! अन्धककी बातें सुनकर कंसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वह उनसे कुछ नहीं बोला और रोषपूर्वक उठकर अपने महलमें चला गया॥ १॥ फिर वे सब यादव, जो वहाँकी सारी बातें विस्तारपूर्वक सुन चुके थे, निराश होकर अपने-अपने घरको लौट गये। वे मार्गमें यह चर्चा कर रहे थे कि कंसका मस्तिष्क खराब हो गया है अक्रूरके मनमें भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनकी लालसा जाग उठी थी, अत: वे भी कंसकी आज्ञाके अनुसार उठे और मनके समान शीत्रगामी श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो वहाँसे चल दिये॥ ३॥ उधर श्रीकृष्णको भी अपने अझ्लोंमें ही कुछ ऐसे शुभ लक्षण दिखायी देते थे, जो पिता-जैसे बान्धवसे भेंट होनेकी सूचना दे रहे थे॥४॥ (अक्रूरको भेजनेसे) पहले ही मथुराके राजा उग्रसेनकुमार कंसने केशीके पास दूत भेजा और कहलाया कि तुम श्रीकृष्णका

English

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अध्याय ३४

श्लोक 40

भुजगेन्द्रेण वदने निविष्टेन विराजितम् अमृतारम्भनिर्मुक्तं मन्दराद्रिम् इवोच्छ्रितम्

bhujagendreṇa vadane niviṣṭena virājitam amṛtārambhanirmuktaṃ mandarādrim ivocchritam

हिन्दी अर्थ

वध कर डालो॥५॥ दूतकी बात सुनकर मनुष्योंको क्लेश प्रदान करनेवाला दुर्जय हैत्य केशी वृन्दावनमें जाकर गोपोंको सताने लगा॥६॥ केशी घोड़ेके रूपमें रहनेवाला दुर्दान्त हैत्य था और मनुष्यका मांस खाता था। उस दुष्ट पराक्रमी असुरने कुपित होकर वहाँ महान संहार आरम्भ कर दिया॥ ७॥ वह ग्वालोंसहित गौओंको मार डालता और गौओंका मांस खाया करता था। मदमत्त केशी स्वच्छन्द विचरनेवाला और उच्छूछुल था अश्वरूपधारी दुष्टात्मा दानव केशी जहाँ रहता था, वह वन मनुष्योंके मांस और हड्डियोंसे व्याप्त होकर श्मशान- भूमिके समान प्रतीत होता था॥ ९॥ वह टपोंसे पृथ्वीको विदीर्ण कर देता और वेगसे वृज्षोंको भी तोड़ डालता था, हींसते या हिनहिनाते समय प्रचण्ड वायुके कोलाहलसे होड़ लगाता था और उछलकर आकाशको भी लाँघ जाता था॥ १०॥ वह वनमें विचरनेवाला दुष्ट अश्व बहुत बड़ा और मतवाला था। उसके अयाल कुछ हिलते रहते थे। वह भयंकर हैत्य कंसके चरित्रका अनुसरण करनेवाला था॥ ११॥ समस्त गोपोंको मार डालनेकी इच्छावाले उस पापाचारी अश्वरूपधारी हैत्यने वह सारा वन मनुष्योंसे सूना कर दिया था

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अध्याय ३४

श्लोक 41

देवासुरविमर्देषु शतशो दृष्टविक्रमम् महेन्द्रेणामृतस्यार्थे वज्रेण कृतलक्षणम्

devāsuravimardeṣu śataśo dṛṣṭavikramam mahendreṇāmṛtasyārthe vajreṇa kṛtalakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

न नृभिगोंधनैर्वापि सेव्यते वनवृत्तिभि: जगाम घोषसंवबासं चोदितः कालधर्मणा क्रन्दमाना जगन्नाथ कृष्णं नाथमुपाश्रिता: दत्त्वाभयं तु कृष्णो वै केशिनं सो उभिदुद्वुवे

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अध्याय ३४

श्लोक 42

शिखिनं चूडिनं चैव तप्तकुण्डलभूषणम् विचित्रपत्रवसनं धातुमन्तम् इवाचलम्

śikhinaṃ cūḍinaṃ caiva taptakuṇḍalabhūṣaṇam vicitrapatravasanaṃ dhātumantam ivācalam

हिन्दी अर्थ

केशी चाप्युन्नतग्रीवः प्रकाशदशनेक्षण: । हेषमाणो जवोदग्रो गोविन्दाभिमुखो ययौ तमापतन्तं सम्प्रेकष्य केशिनं हयदानवम्। प्रत्युज्जगाम गोविन्दस्तोयद: शशिनं यथा केशिनस्तु तमभ्याशे दृष्ठा कृष्णमवस्थितम्। मनुष्यबुद्धयों गोपाः कृष्णमूचुहितैषिण: कृष्ण तात न खल्वेष सहसा ते हयाधम: । उपसप्यों भवान् बाल: पापश्चेष दुरासदः अवध्यः सर्वभूतानां प्रथम: पापकर्मणाम्

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अध्याय ३४

श्लोक 43

तीक्ष्णतुण्डोग्रनखरं चलत्पक्षसमाकुलम् ।स्फीतक्रोडावलम्बेन शीतांशुसमतेजसा भोगिभोगावसक्तेन मणिरत्नेन भास्वता

tīkṣṇatuṇḍogranakharaṃ calatpakṣasamākulam | sphītakroḍāvalambena śītāṃśusamatejasā bhogibhogāvasaktena maṇiratnena bhāsvatā

हिन्दी अर्थ

केशिना सह युद्धाय मतिं चक्रे 5रिसूदन: मुखे लम्बसटे चास्य स्कन्धे केशघनावृते। वलयोभ्रतरड्राभा: सुख्रुवुः क्रोधजं॑ जलम् उस दुराचारीने वह विशाल वन दूषित कर डाला था। वनसे ही जीवन-निर्वाह करनेवाले मनुष्य और गोधन भी कभी उस वनका सेवन नहीं करते थे मदके कारण वह सदाचारसे भ्रष्ट हो चुका था और अधिकतर मनुष्योंके ही मांस खाता था। उसके निवास- स्थानमें होकर जो रास्ता जाता था, उसे उसने अगम्य बना दिया था॥ १४॥ एक समय मनुष्योंके शब्दका अनुसरण

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अध्याय ३४

श्लोक 44

पक्षाभ्यां चारुपत्राभ्याम् आवृत्य दिवि लीलया युगान्ते सेन्द्रचापाभ्यां तोयदाभ्याम् इवाम्बरम्

pakṣābhyāṃ cārupatrābhyām āvṛtya divi līlayā yugānte sendracāpābhyāṃ toyadābhyām ivāmbaram

हिन्दी अर्थ

करता हुआ केशी क्रोधमें भरकर व॒न्दावनके भीतर गोपोंकी बस्तीमें गया, उस समय उसपर काल सवार था॥ १५॥ उसे देखते ही गोप और गोपाड्नाएँ शिशुओंको साथ लेकर भागीं तथा करुण क्रन्दन करती हुई जगत्के रक्षक, अपने स्वामी श्रीकृष्णकी शरणमें आ पहुँचीं गोपाड्ननाओंके रोदन और गोपोंके क्रन्दनसे द्रवित होकर श्रीकृष्णने उन्हें अभय कर दिया। फिर वे केशीपर टूट पड़े॥ १७॥ केशी भी अपनी गर्दन ऊपर उठाये हींसता हुआ बड़े वेगसे श्रीकृष्णणी ओर चला। उस समय वह दाँत दिखाता हुआ आँखें फाड़-फाड़कर उनकी ओर देख रहा था॥ १८॥ उस अश्वरूपधारी दानव केशीको अपनी ओर आते देख भगवान् श्रीकृष्ण उसका सामना करनेके लिये आगे बढ़े, मानो श्याम मेघ चन्द्रमाकी ओर जा रहा हो॥ १९॥ श्रीकृष्णको केशीके निकट खड़ा हुआ देख उनके प्रति मनुष्य-बुद्धि रखनेवाले हितैषी गोप उनसे इस प्रकार बोले--॥ २०॥ “तात श्रीकृष्ण! तुम सहसा इस नीच अश्वके पास न चले जाना; क्योंकि तुम अभी

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अध्याय ३४

श्लोक 45

नीललोहितपीताभिः पताकाभिर् अलंकृतम् केतुवेषप्रतिच्छन्नं महाकायनिकेतनम्

nīlalohitapītābhiḥ patākābhir alaṃkṛtam ketuveṣapraticchannaṃ mahākāyaniketanam

हिन्दी अर्थ

बालक हो और यह पापात्मा एक दुर्धर्ष हैत्य है तात! यह कंसका बाहर विचरनेवाला सहज प्राण है, बड़े-बड़े अश्वराजोंमें उत्तम है। युद्धमें इस दानवकी समानता करनेवाला कोई नहीं है ॥ २२ ॥ समस्त प्राणियोंको त्रास देनेवाला यह हैत्य घोड़ोंमें सबसे अधिक बलवान् है। सम्पूर्ण भूतोंमेंसे किसीके लिये भी यह वध्य नहीं है। पापाचारियोंमें यह सबसे अग्रगण्य है'॥ २३॥ उपर्युक्त बातें कहनेवाले गोपोंका वह कथन सुनकर शत्रुसूदन भगवान् मधुसूदनने केशीके साथ युद्धके लिये विचार किया॥ २४॥ तदनन्तर वह अश्व दायें-बायें चक्कर काटता हुआ अपने दोनों पैरोंसे क्रोधपूर्वक वृक्षोंको तोड़ने लगा॥ २५॥ उसके लम्बे अयालवाले मुख और घने केशोंसे ढके हुए कंधेपर जो मेघोंकी लहरोंके समान

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अध्याय ३४

श्लोक 46

अरुणावरजं श्रीमान् आरुरोह रणे हरिः स्थितः समरदुर्जेयो दैत्यसैन्यं विलोकयन् ।सुपर्णः स्वेन वपुषा सुपर्णं खेचरोत्तमम्

aruṇāvarajaṃ śrīmān āruroha raṇe hariḥ sthitaḥ samaradurjeyo daityasainyaṃ vilokayan | suparṇaḥ svena vapuṣā suparṇaṃ khecarottamam

हिन्दी अर्थ

वलियाँ (चमड़ोंके सिकुड़नेसे बनी हुई रेखाएँ) थीं, वे क्रोधजनित जल (पसीना) टपकाने लगीं हिमकाले यथा व्योप्नि नीहारमिव चन्द्रमा: गोविन्दमरविन्दाक्ष॑ हेषितोद्रारशीकरैः स फेनैर्वक्त्रनिर्गा्णें: प्रोक्षयामास भारत रजसा स हयः कृष्णं चकारारुणमूर्थजम् दन्ताननिर्दशमानस्तु केशी कृष्णमुपाद्रवत्

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अध्याय ३४

श्लोक 47

दहंस् तस्थौ सुरानीके दैत्यान् अतिविभीषयन् ।तम् अन्वयुर् देवगणा मुनयश् च समाहिताः गीर्भिः परममन्त्राभिस् तुष्टुवुश् च गदाधरम्

dahaṃs tasthau surānīke daityān ativibhīṣayan | tam anvayur devagaṇā munayaś ca samāhitāḥ gīrbhiḥ paramamantrābhis tuṣṭuvuś ca gadādharam

हिन्दी अर्थ

स संसक्तस्तु कृष्णेन केशी तुरगसत्तमः। पूर्वाभ्यां चरणाभ्यां वै कृष्णं वक्षस्यताडयतू कृष्णस्थ दानवो घोरं प्रहारममितौजस: अदशद् बाहुशिखरं कृष्णस्य रुषितो हयः स लम्बकेसरसटः कृष्णेन सह सड्भतः। रराज केशी मेघेन संसक्त: ख इवांशुमान्

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अध्याय ३४

श्लोक 48

नमस् ते ऽस्तु हृषीकेश जहि दैत्यबलं विभो ।नमस् त्रिमूर्तये तुभ्यं हरिब्रह्मशिवात्मने ।नमस् त्रैविद्यरूपाय ऋक्सामयजुषे नमः ।नमो ऽस्तु योगिचिन्त्याय तेषां योगप्रदायिने ।नमो विकल्पशून्याय नमो विज्ञप्तिरूपिने ।यं च ज्ञानमयं तेजः प्रवदन्ति मनीषिणः ।तं नताः स्म जगन्नाथं जहि दैत्यगणान् हरे ।त्वां स्तोतुं हि वयं देव शक्ता वर्षशतैर् अपि ।न हि देव जगन्नाथ जयस्व पुरुषोत्तम ।इतीरितां गिरिं श्रुत्वा गन्तुम् अभ्युद्यतो हरिः ।तद् वैश्रवणसुश्लिष्टं वैवस्वतपुरःसरम् वारिराजपरिक्षिप्तं देवराजविराजितम्

namas te 'stu hṛṣīkeśa jahi daityabalaṃ vibho | namas trimūrtaye tubhyaṃ haribrahmaśivātmane | namas traividyarūpāya ṛksāmayajuṣe namaḥ | namo 'stu yogicintyāya teṣāṃ yogapradāyine | namo vikalpaśūnyāya namo vijñaptirūpine | yaṃ ca jñānamayaṃ tejaḥ pravadanti manīṣiṇaḥ | taṃ natāḥ sma jagannāthaṃ jahi daityagaṇān hare | tvāṃ stotuṃ hi vayaṃ deva śaktā varṣaśatair api | na hi deva jagannātha jayasva puruṣottama | itīritāṃ giriṃ śrutvā gantum abhyudyato hariḥ | tad vaiśravaṇasuśliṣṭaṃ vaivasvatapuraḥsaram vārirājaparikṣiptaṃ devarājavirājitam

हिन्दी अर्थ

वेगेन वासुदेवस्य क्रोधाद् द्विगुणविक्रमः तस्योत्सिक्तस्थ बलवान् कृष्णो5प्यमितविक्रम: । बाहुमाभोगिनंकृत्वा मुखे क्रुद्ध: समादधत् उत्कर्णो नष्टचेतास्तु स केशी बह्नचेष्टत उत्पतन्नसकृत्पाहैः शकृन्मूत्र समुत्सूजन्। खिन्नाड़रोमा श्रान्तस्तुनिर्यन्रचरणो 5 भवत् वह अपने मुखसे पैदा हुए धूलमिश्रित फेनकी वर्षा करने लगा। मानो हेमन्त-ऋतुमें चन्द्रमा आकाशमें

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अध्याय ३४

श्लोक 49

चन्द्रप्रभाभिर् विमलं युद्धाय समवस्थितम् ययौ हितं देवपथं दीप्तभास्करतेजसम् ।पवनाविद्धनिर्घोषं संप्रदीप्तहुताशनम्

candraprabhābhir vimalaṃ yuddhāya samavasthitam yayau hitaṃ devapathaṃ dīptabhāskaratejasam | pavanāviddhanirghoṣaṃ saṃpradīptahutāśanam

हिन्दी अर्थ

हींसनेके साथ निकले हुए जलकणों तथा मुखसे गिरते हुए फेनोंद्वार कमलनयन श्रीकृष्णको नहला दिया अपनी टापोंसे उठकर फैली हुई धूलसे, जो मुलेठीके चूर्णकी भाँति कुछ-कुछ पीले रंगकी थी, उस घोड़ेने श्रीकृष्फे: मस्तकके बालोंको कुछ लाल-सा कर दिया॥ २९ ॥ केशीके पैर वहाँ उछल-कूद मचा रहे थे। वह अपनी टापोंसे पृथ्वीको खोदता और दाँतोंको पीसता हुआ श्रीकृष्णकी ओर दौड़ा॥ ३०॥ अश्रोमें श्रेष्ठ केशी श्रीकृष्फे साथ उलझ गया। उसने अपने दोनों आगेवाले पैरोंसे उनकी छातीमें प्रहार किया॥ ३१॥ उस बलवान् दानवने अगल-बगलसे भी बारम्बार अपनी टाप चलायी और अमित तेजस्वी श्रीकृष्णपर घोर प्रहार किया॥ ३२॥ तीखी दाढ़ ही जिसका आयुध थी, उस भयानक मुखके द्वारा रोषमें भरे हुए उस घोड़ेने श्रीकृष्णकी

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अध्याय ३४

श्लोक 50

विष्णोर् जिष्णोः सहिष्णोश् च भ्राजिष्णोस् तेजसा वृतम् बलं बलवदुद्धूतं युद्धाय समवर्तत

viṣṇor jiṣṇoḥ sahiṣṇoś ca bhrājiṣṇos tejasā vṛtam balaṃ balavaduddhūtaṃ yuddhāya samavartata

हिन्दी अर्थ

भुजाके अग्रभागको दाँत गड़ाकर घायल कर दिया लम्बे-लम्बे अयालसे सुशोभित केशी श्रीकृष्णके साथ जूझता हुआ उसी तरह शोभा पाने लगा, जैसे आकाशमें अंशुमाली सूर्य मेघके साथ उलझ गये हों॥ ३४॥ उस बलवान घोड़ेका पराक्रम उसके क्रोधके कारण दूना बढ़ गया था। उसने श्रीकृष्णकी छातीपर अपनी छातीसे वेग- पूर्वक चोट पहुँचानेका विचार किया॥ ३५॥ तब अमित पराक्रमी बलवान श्रीकृष्णने भी कुपित होकर उस घमंडी हैत्यके मुखमें अपनी एक बाँहको बहुत बड़ी करके डाल दिया॥ ३६॥ वह उनकी उस बाँहको अपने दाँतोंसे चबाने या विदीर्ण करनेमें समर्थ न हो सका, उलटे उसके दाँत ही जड़से उखड़ गये; साथ ही वह मुखसे फेनसहित रक्त वमन करने लगा॥ ३७॥ उसके ओठ और गलफर 'फटकर दो दलोंमें विभक्त हो गये। स््रायु-बन्धनके ढीले हो जानेसे केशीकी आँखें फटकर बाहर निकल आयीं

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अध्याय ३४

श्लोक 51

स्वस्त्य् अस्तु देवेभ्य इति स्तुवंस् तत्राङ्गिराब्रवीत् स्वस्त्य् अस्त्व् इति स्तुवंस् तत्र देवान् आङ्गिरसो ऽब्रवीत् ।स्वस्त्य् अस्तु दैत्येभ्य इति उशना वाक्यम् अब्रवीत्

svasty astu devebhya iti stuvaṃs tatrāṅgirābravīt svasty astv iti stuvaṃs tatra devān āṅgiraso 'bravīt | svasty astu daityebhya iti uśanā vākyam abravīt

हिन्दी अर्थ

उसके होठोंका निचला भाग फटकर निकल गया। उस बाँहसे आविष्ट होनेके कारण उसके फटे हुए दोनों नेत्रोंसे रक्त बहने लगा। उसके कान भी उखड़कर गिर पड़े तथा चेतना नष्ट हो गयी। उस अवस्थामें केशी बारम्बार छटपटाने लगा॥३९॥ वह बार-बार पैरोंको उछालने और मल-मूत्र छोड़ने लगा। उसका एक-एक अड्ग और रोम-रोम खिन्न हो उठा था। अन्तमें वह थक गया और उसके पैर निश्चेष्ट हो गये केशिवक्त्रविलग्रस्तु कृष्णबाहुशोभत। व्याभुग्न इव घर्मान्ते चन्द्रार्थकिरणैर्घन: केशी च कृष्णसंसक्त: शान्तगात्रो व्यरोचत। प्रभातावनतश्चन्द्र: श्रान्तो मेर॒मिवाभ्रित:

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 34
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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