Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
62
अध्याय 62 / 119

Adhyaya 62

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अध्याय ६२

श्लोक 1

धृतं गोवर्धनं दृष्ट्वा परित्रातं च गोकुलम् कृष्णस्य दर्शनं शक्रो रोचयामास विस्मितः

dhṛtaṃ govardhanaṃ dṛṣṭvā paritrātaṃ ca gokulam kṛṣṇasya darśanaṃ śakro rocayāmāsa vismitaḥ

हिन्दी अर्थ

निकलनेके मार्गको नहीं देख पाता था, उसमें फेंक देनेके लिये उद्यत हो गये॥ ४५-४६ ॥ नरेश्वर! बलवान् वीर श्रीकृष्णकुमारने युद्धके मुहानेपर विजयके लिये प्रयत्न करते हुए कर्णको वेगपूर्वक पटककर उसके और गरजकर उसे घोर मायामयी गुफामें फेंकनेका विचार किया। भारत! इसी तरह उन्होंने राजा दुर्योधन, विराट, द्रुपद, शकुनि, शल्य, नील, भीष्म, राजा विन्द और अनुविन्द तथा जरासंधको, त्रिगर्त, मालव एवं महाबली वासन्त्यगणोंको और अस्त्रज्ञानमें निपुण धुष्टय्युम्न आदि पाश्चाल वीरोंको भी पकड़ लिया। फिर अपने मामा आहवृति और रुक्‍्मीको एवं राजा शिशुपाल और भगदत्तको सम्बोधित करके कहा-- ॥ ४७--५१ ॥ “नरेश्वरो हमारे साथ आपलोगोंका जो सम्बन्ध और गुरुत्व है, उसका मैं आदर करता हूँ तो भी आपलोगोंको इस भयंकर गुफामें जहाँ फेंक रहा हूँ, वहाँ फेंकनेके लिये बुद्धिमानू शूलपाणि भगवान् बिल्वोदकेश्वरने मुझे आज्ञा

English

Bhishmaka said:—I bow unto that celestial bird, the son of Kashya endued with the velocity of the wind who can assume various forms at will (63).

अध्याय ६२

श्लोक 2

स निर्जलाम्बुदाकारं मत्तं मदजलोक्षितम् आरुह्यैरावतं नागम् अजगाम महीतलम्

sa nirjalāmbudākāraṃ mattaṃ madajalokṣitam āruhyairāvataṃ nāgam ajagāma mahītalam

हिन्दी अर्थ

दी है। उन्होंने कहा है कि तुम सब राजाओंको गुफामें मायाका आश्रय लेकर जिन यादवोंको गुफामें डाल रखा है, उन्हें मैं सर्वथा छुड़ा लूँगा' इत्युक्त: शिशुपालस्तु राजा सेनापतिस्तथा। शरैस्ततर्द तान् भमान् प्रद्यस्नं च विशेषतः बिल्वोदके श्वरं देवं रौक्मिणेयो नमस्य च। आरम्भन्पतिं बद्"धुं शिशुपालं महाबलम् बिल्वोदके श्वरो देवः प्राह त्वां यदुनन्दन। सर्व कुरु तथा रात्र्यां चोक्तस्त्वं भो यथा मया

English

Vaishampāyana said:—Having thus chanted, in brief, the glories of Vinatā's son Bhismaka offered him various sorts of most excellent raiment. After the lotus-eyed Krishna, the younger brother of Vāsava, on taking leave, had departed all the kings followed him. Having thus received honors, taken farewell of all the kings, placed Vinatā's son the foremost of birds, of a gentle form before him, been encircled by huge cars, and lighted up all the quarters the energetic Krishna set out for Mathurā. At that time there arose a great tumult consisting of the sound of bugles, trumpets, conches, the hissing of the serpents, the neighing of horses, and the rattle of the wheels of the cars resembling the muttering of huge clouds.

अध्याय ६२

श्लोक 3

स ददर्शोपविष्टं वै गोवर्धनशिलातले कृष्णम् अक्लिष्टकर्माणं पुरुहूतः पुरंदरः

sa dadarśopaviṣṭaṃ vai govardhanaśilātale kṛṣṇam akliṣṭakarmāṇaṃ puruhūtaḥ puraṃdaraḥ

हिन्दी अर्थ

असुरांस्तु महाबाहो निःशेषान् कर्तुमहसि। एवमेव च वक्तव्यस्त्वया वीर जनार्दनः अनिरुद्धं चकाराथ रक्षितारं स्वमात्मजम् सेनापतीनु क्षत्रियां श्व कोशाध्यक्षांश्व भारत हस्त्यश्वरथवृन्दांश्व चकार च तथा55त्मसात्। अव्यग्रस्तु ततो हन्तुमसुरानुद्यतः प्रभो

English

After the departure of the highly powerful Krishna the gods repaired to the celestial region with that assembly hall and the most excellent seat. Encircled by their huge four-fold forces the kings followed Janārddana, a distance of two miles and afterwards at his command returned to Swayamvara (64–69).

अध्याय ६२

श्लोक 4

तं दृश्य बालं महता तेजसा दीप्तम् अव्ययम् गोपविषधरं विष्णुं परिजज्ञे पुरंदरः

taṃ dṛśya bālaṃ mahatā tejasā dīptam avyayam gopaviṣadharaṃ viṣṇuṃ parijajñe puraṃdaraḥ

हिन्दी अर्थ

संनद्ध एव चोवाच ब्रह्मदत्तं द्विजोत्तमम्। विस्त्रब्धं वर्ततां कर्म मा भे: पशय धनंजयम् न देवेभ्यो नासुरेभ्यो नागेभ्यो द्विजसत्तम। भयंहि विद्यते तस्य गोप्तारो यस्य पाण्डवा: यज्ञवाटे निरीक्ष्यन्तां मायया निहिता मया। उनके ऐसा कहनेपर सेनापति राजा शिशुपालने प्रद्यूँम्नको पीड़ित कर दिया॥५५॥ तब रुक्मिणीनन्दन प्रद्ुम्नने बिल्वोदकेश्वरको नमस्कार करके महाबली राजा शिशुपालको बाँधना आरम्भ किया॥ ५६॥ तत्पश्चात् रुद्रदेवके पार्षदोंमें श्रेष्ठ नन्दीने एक सहसत्न पाश लेकर

English

Vaishampayana said:—After the departure of Vasudeva's son the kings, who had their limbs embellished with ornaments and who were anxious to go to their respective kingdoms, returned to the assembly-hall of Bhishmaka in order to inform (Jarāsandha of their intention) (1). Thereupon king Bhishmaka, the foremost of kings and well-read in moral laws, said to the kings, effulgent like the sun and the moon and seated at ease on beautiful seats (2). "O ye kings, you all know the calamity that will befall the Swayamvara. Do you forgive me for the fruit that is the outcome of my misconduct" (3).

अध्याय ६२

श्लोक 5

तालस्तम्भवनश्यामं स तं श्रीवत्सलक्षणम् पर्याप्तनयनः शक्रः सर्वैर् नेत्रैर् उदैक्षत

tālastambhavanaśyāmaṃ sa taṃ śrīvatsalakṣaṇam paryāptanayanaḥ śakraḥ sarvair netrair udaikṣata

हिन्दी अर्थ

महाबली रुक्मिणीकुमार वीर प्रद्युम्नने कहा-- “यदुनन्दन ! बिल्वोदकेश्वरने तुम्हें यह संदेश दिया है कि मैंने जैसा तुमसे कहा है, उसके अनुसार तुम रातमें सब कार्य करो॥५८॥ यदुनन्दन! कन्याओं और रत्नोंपर लुभाये हुए इन राजाओंको पाशोंसे बाँधकर फिर इन्हें मुक्त करनेमें तुम्हीं प्रमाण हो-तुम्हीं चाहो तो इन्हें छोड़ सकते हो॥५९॥ वीर महाबाहो! तुम इन असुरोंको निःशेष कर डालो-इनमेंसे एकको भी जीवित न छोड़ो तुम्हें जनार्दनसे भी ऐसा ही कहना चाहिए! पृथ्वीपते ! कुरुनन्दन ! तदनन्तर उत्तम बल धारण करने- वाले प्रद्युश्नने भगवान् शड्गूरके दिये हुए पाशोंसे राजा

English

Vaishampāyana said:—Having thus addressed and welcomed duly all the kings, (the king) sent away all the monarchs of Central India and of the East, West and Northern Provinces. Having honored the king Bhishmaka duly in return, those kings, the foremost of men and mighty car-warriors, went away delightedly. Jarāsandha, Sunitha, the energetic Dantavakra, the king of Soubha, the king Mahākurma, Kaishika, all the leading kings of the Pravara race, the royal saint Venudāri, the king of Kashmira all those and other kings of the Deccan remained by Bhishmaka desirous of listening to the mystery.

अध्याय ६२

श्लोक 6

दृष्ट्वा चैनं श्रिया जुष्टं मर्त्यलोके ऽमरोपमम् सुराणां कार्यसिद्ध्यर्थं नित्यं कर्मसु निष्ठितम् ।सूपविष्टं शिलापृष्टे शक्रः स व्रीडितो ऽभवत्

dṛṣṭvā cainaṃ śriyā juṣṭaṃ martyaloke 'maropamam surāṇāṃ kāryasiddhyarthaṃ nityaṃ karmasu niṣṭhitam | sūpaviṣṭaṃ śilāpṛṣṭe śakraḥ sa vrīḍito 'bhavat

हिन्दी अर्थ

नरेशोंको भी बाँधा और उन सबको मायामयी गुफामें ले आये ॥ ६१-६२ ॥ रुक्मिणीकुमारने फुफकारते हुए सर्पोंके समान लम्बी साँस खींचते हुए राजाओंको बाँधकर डाल दिया और अपने पुत्र अनिरुद्धको उनका रक्षक नियुक्त कर दिया॥ ६३ ॥ भारत ! यदुनन्दन प्रद्युम्नने उनमेंसे किसीको भी बिना बाँधे नहीं छोड़ा। फिर उनके क्षत्रिय-सेनापतियों, कोषाध्यक्षों तथा हाथी, घोड़ों और रथके समूहोंको भी अपने अधीन कर लिया। प्रभो तत्पश्चात् अव्यग्र (शान्त)- भावसे स्थित हो वे असुरोंको मार डालनेके लिये उद्यत हो गये और संनद्ध रहकर द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मदत्तसे बोले-- “ब्रह्मन्! आप निर्भय हो अपना यज्ञकर्म चालू रखें। देखिये, अर्जुन आपकी रक्षामें खड़े हैं॥६४--६६॥ द्विजश्रेष्ट ! पाण्डव जिसके रक्षक हों, उसे न तो देवताओंसे, न असुरोंसे और न नागोंसे ही भय ही प्राप्त हो सकता है॥ ६७॥ असुरोंने आपकी पुत्रियोंका मनसे भी स्पर्श नहीं किया है। आप यज्ञमण्डपमें देखिये, मैंने मायाद्वारा उन्हें छिपाकर वहीं रख छोड़ा है'

English

O monarch, beholding these kings waiting there the powerful king Bhishmaka, with an affectionate heart and grave and cool voice, said to them moral words relating to three-fold objects and embellished with

अध्याय ६२

श्लोक 7

तस्योपविष्टस्य सुखम् पक्षाभ्यां पक्षिपुंगवः अन्तर्धानगतश् छायाम् चकारोरगभोजनः

tasyopaviṣṭasya sukham pakṣābhyāṃ pakṣipuṃgavaḥ antardhānagataś chāyām cakāroragabhojanaḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बट्पुरवधे चतुरशीतितमो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमयहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बट्पुरवत्धविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ निकुम्भका जयन्तसे पराजित होकर भगवान् श्रीकृष्णके साथ युद्ध करना, श्रीकृष्णका अर्जुनको निकुम्भका चरित्र बताना, आकाशवाणीकी प्रेरणासे सुदर्शन चक्रद्वारा निकुम्भका वध करना और ब्रह्मदत्तको षट्पुरनगर देकर द्वारकाको प्रस्थान करना आविवेशासुरांश्राथ कश्मल॑ जनमेजय

English

Bhishmaka said:—"O ye kings, I have acted thus in pursuance of moral words given vent to by you; you should forgive me for we must always abide by moral laws" (4-12).

अध्याय ६२

श्लोक 8

छायया च तया युक्तं केशवं यज्ञरूपिणम् ।तं विविक्ते नगगतं लोकवृत्तान्ततत्परम् उपतस्थे गजं हित्वा कृष्णं बलनिषूदनः

chāyayā ca tayā yuktaṃ keśavaṃ yajñarūpiṇam | taṃ vivikte nagagataṃ lokavṛttāntatatparam upatasthe gajaṃ hitvā kṛṣṇaṃ balaniṣūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

कृष्णानन्तप्रभृतिभिर्यदुभिर्युद्धदुर्मदे: हीनप्रतिज्ञा: काँहोकान् प्रयास्यथ पलायिता: । फल जित्वेह भोक्तव्यं रिपूनू समरकर्कशान्। हतेन चापि शूरेण वस्तव्यं त्रिदिवे सुखम पलायित्वा गृहं गत्वा कस्य द्रक्ष्यथ है मुखम्। दारान् वक्ष्यथ किंचापिधिग्धिक् कि कि न लजथ ये यान्ति यज्ञवार्ट तं तान् निहन्ति धनंजय:

English

Vaishampāyana said:—Having thus expressed himself in the concourse of kings, the king Bhishmaka, well-versed in moral laws, again said aiming at his son (13).

अध्याय ६२

श्लोक 9

स समीपगतस् तस्य दिव्यस्रगनुलेपनः रराज देवराजो वै वज्रपूर्णकरः प्रभुः

sa samīpagatas tasya divyasraganulepanaḥ rarāja devarājo vai vajrapūrṇakaraḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

यमौ भीमश्च राजा च धर्मपुत्रो युधिष्टिर:। दां प्रयाताञ्जघानेन्द्रि: प्रवरश्च द्विजोत्तम: अथासुरासृकृतोयाढ्या केशशैवलशाद्वला। चअक्रकूर्मरथावर्ता गजशैलानुशोभिनी वैशम्पायनजी कहते हैं--प्रजानाथ! जनमेजय ! जब अनुचरोंसहित सब भूपाल गुफामें बंद कर दिये गये, तब असुरोंपर मोह छा गया॥१॥ श्रीकृष्ण, बलराम आदि रणदुर्मद यादवोंद्वारा सब ओरसे मारे जाते हुए वीर असुर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर पलायन करने लगे॥ २॥ यह देख दानवश्रेष्ठ निकुम्भ रोषमें भरकर उनसे बोला--' अरे ! तुमलोग मोहवश अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर भयसे पीड़ित और विहल होकर क्‍यों भागे जा रहे हो ?॥ ३ ॥ प्रतिज्ञाहीन

English

Bhishmaka said:—Observing the movements of my son my eyes are agitated with fear; I consider all now as mere boys. He (Krishna) alone is the foremost of Purushas (14). He, the very incarnation of glory, the foremost of the illustrious, the partaker of fame and powerful, has established great fame and the might of his arms in this land of mortals (15). Blessed is Devaki, the foremost of damsels who has conceived as her son the lotus-eyed Krishna, identical with the sum total of beauty, the greatest of all in the three worlds, and adored of all the immortals and who has seen his lotus countenance with her eyes full of affection

अध्याय ६२

श्लोक 10

किरीतेणार्कवर्णेन विद्युद्विद्योतकारिणा कुण्डलाभ्यां स दिव्याभ्यां सततं शोभिताननः ।पञ्चस्तबकलम्बेन देवभूषणभूषितः ॥ सहस्रपत्रकान्तेन देहभूषणकारिणा ।ईक्षमाणः सहस्रेण नेत्राणां कामरूपिणाम् ।त्रिदशाज्ञापनार्थेन मेघनिर्घोषकारिणा ।प्रणाम अकरोच् छक्रः क्षन्तव्यम् इति चाब्रवीत् ।तुष्टाव च हरिं विष्णुं गोपवेषविभूषितम् ॥ नमस् ते देवदेवेश भूतभावनभावन ।हिरण्यरेतसे तुभ्यं नमः सोमप्रदायिने ॥ नमो वेदैकतत्त्वार्थ तन्निबोधन बोधन ।नमः प्रणववाच्याय वाचकाय नमो नमः ॥ नमस् ते विश्वरूपाय नमो लोकहिताय ते ।नमो गोपविरूपाय नमो गोधरधारिणे ॥ नमः पुराणरूपाय नमस् ते मधुसूदन ॥ किं वानेन जगन्नाथ नमस्कारेण केशव ।या यास् तु देवदेवस्य मूर्तयो मूर्तिमत्तर ।नमस् ताभ्यस् तथा विष्णो सर्वाभ्यः सर्वकामद ॥ क्षन्तव्यं मम देवेश कृतं गोपालनन्दन ।अज्ञानाद् एथ वा ज्ञानाद् रोषाद् वा यदुनन्दन ॥ समर्थेष्व् असमर्थेषु रोषः प्रस्फुरति प्रभो ।न केनचिद् भवाञ् शास्यः शास्ता सर्वस्य वै प्रभो ॥ त्वन्निमित्तम् इदं सर्वम् ऐन्द्रं मम सुदुर्लभम् ।त्वत्प्रसादज् जगन्नाथ देवानाम् ईश्वरो यतः ॥ ततश् च देवदेवेश क्षन्तव्यं दास इत्य् अहम् ।इत्य् उक्त्वाथ पुनर् वाक्यं व्याजहार शचीपतिः ॥ कृष्णं कमलपत्राक्षम् अबालं बालरूपिणम् ।अतसीपुष्पसंकाशं श्रीवत्सकृतलक्षणम् ।उपविष्टं शिलापृष्ठे कृत्वा कर्मातिमानुषम् ॥ न हि दासेषु कोपो ऽस्ति स्वामिनां स्वामिसत्तम ।अथ दिव्येन मधुरम् व्याजहार स्वरेण तम्

kirīteṇārkavarṇena vidyudvidyotakāriṇā kuṇḍalābhyāṃ sa divyābhyāṃ satataṃ śobhitānanaḥ | pañcastabakalambena devabhūṣaṇabhūṣitaḥ || sahasrapatrakāntena dehabhūṣaṇakāriṇā | īkṣamāṇaḥ sahasreṇa netrāṇāṃ kāmarūpiṇām | tridaśājñāpanārthena meghanirghoṣakāriṇā | praṇāma akaroc chakraḥ kṣantavyam iti cābravīt | tuṣṭāva ca hariṃ viṣṇuṃ gopaveṣavibhūṣitam || namas te devadeveśa bhūtabhāvanabhāvana | hiraṇyaretase tubhyaṃ namaḥ somapradāyine || namo vedaikatattvārtha tannibodhana bodhana | namaḥ praṇavavācyāya vācakāya namo namaḥ || namas te viśvarūpāya namo lokahitāya te | namo gopavirūpāya namo godharadhāriṇe || namaḥ purāṇarūpāya namas te madhusūdana || kiṃ vānena jagannātha namaskāreṇa keśava | yā yās tu devadevasya mūrtayo mūrtimattara | namas tābhyas tathā viṣṇo sarvābhyaḥ sarvakāmada || kṣantavyaṃ mama deveśa kṛtaṃ gopālanandana | ajñānād etha vā jñānād roṣād vā yadunandana || samartheṣv asamartheṣu roṣaḥ prasphurati prabho | na kenacid bhavāñ śāsyaḥ śāstā sarvasya vai prabho || tvannimittam idaṃ sarvam aindraṃ mama sudurlabham | tvatprasādaj jagannātha devānām īśvaro yataḥ || tataś ca devadeveśa kṣantavyaṃ dāsa ity aham | ity uktvātha punar vākyaṃ vyājahāra śacīpatiḥ || kṛṣṇaṃ kamalapatrākṣam abālaṃ bālarūpiṇam | atasīpuṣpasaṃkāśaṃ śrīvatsakṛtalakṣaṇam | upaviṣṭaṃ śilāpṛṣṭhe kṛtvā karmātimānuṣam || na hi dāseṣu kopo 'sti svāmināṃ svāmisattama | atha divyena madhuram vyājahāra svareṇa tam

हिन्दी अर्थ

होकर भागे जानेवाले तथा पहले बदला लेनेका निश्चय करके भी युद्धमें अपने भाई-बन्धुओंका ऋण उतारे बिना पीठ दिखानेवाले तुमलोग किन लोकोंमें जाओगे 2 समराज्भणमें निर्दयतापूर्वक जूझनेवाले शत्रुओंको जीतकर इस लोकमें उत्तम फल (राज्य आदि)-का उपभोग प्राप्त होगा अथवा रणमें मारे जानेपर शूरवीरको स्वर्गलोकमें सुखदायक निवास सुलभ होगा॥ ५॥ है हैत्यो! भागकर घर जाकर किसका मुँह देखोगे (अथवा किसे मुँह दिखाओगे) ? अपनी पत्रियोंसे क्या कहोगे ? धिक्कार है, धिक्कार है। क्‍यों ? क्यों तुम्हें लज्जा नहीं आती ?' नरेश्वर! निकुम्भके ऐसा कहनेपर वे असुर लज्जित होकर लौट पड़े और दुगुने वेगसे यादवोंके साथ युद्ध करने लगे॥ ७॥ राजन! नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा युद्धकुशल योद्धाओंके उस समरोत्सवमें जो हैत्य यज्ञममण्डपकी ओर जाते थे, उन्हें अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव तथा धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर मार डालते थे। जो लोग आकाशमें जाते थे, उन्हें इन्द्रकुमार जयन्त और द्विजश्रेष्ठ प्रवर कालके गालमें भेज देते थे॥ ८--९॥ फिर तो वहाँ वर्षामें बढ़ी

English

Vaishampāyana said:—When the king Bhishmaka gave vent to these words again and again in the midst of the assembled kings the highly effulgent king Shalya said in sweet words (18).

अध्याय ६२

श्लोक 11

कृष्ण कृष्ण महाबाहो ज्ञातीनां नन्दिवर्धन अतिदैवं कृतं कर्म त्वया प्रीतिमता गवाम्

kṛṣṇa kṛṣṇa mahābāho jñātīnāṃ nandivardhana atidaivaṃ kṛtaṃ karma tvayā prītimatā gavām

हिन्दी अर्थ

हुई नदीके समान एक खूनकी नदी बह चली। असुरोंके रक्त ही उसके जल थे। उनके सिरके केश ही उसमें सेवार और घासके समान प्रतीत होते थे। रथके पहिये उसमें कछुए-जैसे लगते थे और रथ भवँरके समान प्रतीत होते थे। हाथियोंकी लाशें पर्वतोंकी चट्टानोंके समान उसकी शोभा बढ़ाती थीं हतान् सर्वान् सहायां श्व वीर्यादेवात्पपात ह शरैः कुलिशसंकाशैर्निकुम्भो रणकर्कश:

English

Shalya said:—O slayer of thy enemies, O lord of kings, do not lament for thy son. The Kshatriyas meet either with success or defeat in battle (19). This is the inevitable course and eternal religion of the mortals. Save Baladeva and Krishna what third person can withstand thy highly powerful son in battle? Taking up his bow thy mighty-armed son is alone capable of withstanding the car-warriors and great heroes of the enemy in battle. When by the might of his arms he handles the Bhārgava weapons, difficult of being used even by the celestials what man is capable of bearing it? This Eternal Purusha Krishna is without birth or death (20-23). In this land of mortals even the holder of trident (Siva) cannot defeat him. O Emperor, thy son is well-versed in the true meaning of all the Shastras (24). Knowing Keshava as Ishāna he did not engage in fight with him. It is not that there is none who can defeat him (25). Kālayavana is incapable of being slain by Keshava. With a view to have a son the great Muni Gārgya adored Rudra for twelve years living on powdered iron and practising dreadful and highly difficult penances. Thereat pleased when Shankara offered him a boon Gārgya prayed for a son whom the kings of Mathurā would not be able to slay. Rudra granted him the boon, saying 'so be it' (26-28). Thus by virtue of Rudra's boon, Gārgya's son Kālayavana is unslayable by the kings of Mathura in the battle-field and especially in the city of Mathurā (29). Though Krishna is highly powerful amongst the princes of Mathura still if he comes to battle and fights with him he will be able to defeat him (30). O kings, if you accept my words as becoming and sound, send an emissary to the capital of the king of Yavanas (33).

अध्याय ६२

श्लोक 12

मया सृष्टेषु मेघेषु युगान्तावर्तकारिषु यत् त्वया रक्षिता गावस् तेनास्मि परितोषितः

mayā sṛṣṭeṣu megheṣu yugāntāvartakāriṣu yat tvayā rakṣitā gāvas tenāsmi paritoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

परिघेणापि हैतेयो जयन्तं समताडयतू कृष्णेन सह योद्धव्यं वैरिणा ज्ञातिघातिना। श्रावयामि किमात्मानमाहवे शक्रसूनुना जगाम चेैव युद्धार्थ यत्र कृष्णो महाबलः द्रष्टमभ्यागतो युद्ध॑ं जहषे सह देवते: प्रवरं चापि धर्मात्मा सस्वजे मोहवर्जितम्

English

Vaishampāyana said:—Hearing the words of the highly powerful Shalya the king of Soubha all the leading kings were delighted and said "We will do it" (32). Hearing their words and recollecting those of Brahmā the Emperor Jarāsandha lost heart and said (33).

अध्याय ६२

श्लोक 13

स्वायंभुवेन योगेन यच् चायं पर्वतोत्तमः धृतो वेश्म इवाकाशे को ह्य् एतेन न विस्मयेत्

svāyaṃbhuvena yogena yac cāyaṃ parvatottamaḥ dhṛto veśma ivākāśe ko hy etena na vismayet

हिन्दी अर्थ

देवदुन्दुभयश्चापि प्रणेदुर्वासवाज्ञया। जयमानं रणे दृष्ठा जयन्तं रणदुर्जयम् दरदर्शाथ निकुम्भस्तु केशवं रणदुर्जयम्। अर्जुनेन स्थितं सार्ध यज्ञवाटाविदूरतः ध्वज और भाले तटवर्ती वृक्षोंके समान उसे आच्छादित किये हुए थे। योद्धाओंका गरजना और चीखना ही उसका कलकल नाद था। वह नदी श्रीकृष्णरूपी पर्वतसे प्रकट हुई थी और भीरु पुरुषोंके हृदयमें भय उत्पन्न करती थी। रक्तके बुलबुले ही उसमें फेन थे और तलवारें ही मछलियों और तरंगोंके समान प्रतीत होती थीं

English

Jarasandha said:—Alas! formerly, assailed by the fear of a foreign king, all the Chiefs, seeking refuge with me, used to get back their lost kingdoms, servants, army and conveyances (34). Now, on account of their bad feelings towards their lord, they, like unto a damsel, coming in contact with a stranger, are now exciting me to seek another's shelter (35). Alas! even when I, afraid of Krishna, am constrained to seek refuge with another, Destiny alone is powerful. And by no means can any one overcome it (36). O ye kings, it is better for me to die than to seek helplessly the protection of another (king). I shall not therefore seek refuge with any body else (37). I shall give him battle who has been pointed out as my Death by the invisible words, may he be Krishna, or Baladeva, or a man, or some one amongst the immortals (38). Even this is my firm resolution and such is the conduct of a worthy person. I shall not act against it seeking another's protection (39). Even if you be all well disposed he (Krishna) may destroy you all. For your protection I shall send an envoy to him (40), O kings, the messenger should so proceed by the etherial way that Krishna may not put in any impediment. Do ye find out such a person who can go in this way (41). This effulgent king of Soubha is gifted with the prowess of fire, the sun and the moon. In a sunny car let him proceed to the capital of Yavana (42). Let him approach the king of Yavanas as our envoy and communicate to him our quarrel with Krishna. Let him try to bring him over to this assemblage of Chiefs (43).

अध्याय ६२

श्लोक 14

प्रतिषिद्धे मम महे मयेयं रुषितेन वै अतिवृष्टिः कृता कृष्ण गवां वै सप्तरात्रिकी

pratiṣiddhe mama mahe mayeyaṃ ruṣitena vai ativṛṣṭiḥ kṛtā kṛṣṇa gavāṃ vai saptarātrikī

हिन्दी अर्थ

निकुम्भ अपने उन शत्रुओंको बढ़ता हुआ और समस्त सहायकोंको मारा गया देख अपने बलसे ही ऊपरको उछला॥ १३ ॥ भारत ! ऊपर गये हुए रणकर्कश निकुम्भको जयन्त और प्रवरने अपने वज्रतुल्य बाणोंद्वारा रोका। तब दुर्जय वीर निकुम्भ दाँतोंस ओठ दबाकर लौटा। उसने प्रवरपर परिघसे प्रहार किया। इससे वह पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ १४-१५ ॥ पृथ्वीपर गिरे हुए इन प्रवरको इन्द्रकुमार जयन्तने अपनी दोनों भुजाओंसे उठाकर हृदयसे लगा लिया और जब उन्हें मालूम हुआ कि प्रवर जीवित हैं, तब वे उन्हें छोड़कर उस असुरकी ओर दौड़े निकुम्भपर धावा करके जयन्तने उसे खड़्गसे मारा। तब उस हैत्यने भी जयन्तपर परिघसे प्रहार किया इन्द्रकुमारने युद्धस्थलमें निकुम्भके शरीरको प्राय: क्षत- विक्षत कर दिया। उनके द्वारा मारे जाते हुए उस महान् असुरने उस समय मन-ही-मन सोचा कि मुझे श्रीकृष्णके साथ युद्ध करना चाहिए, क्‍योंकि वे मेरे बन्धु-बान्धवोंके

English

Vaishampāyana said:—Having thus expressed himself the Emperor Jarāsandha again said to the powerful king of Soubha:—"Do thou depart, O giver of honors and help all these Chiefs (44). Use such tactics that the king of Yavanas may proceed and vanquish Krishna and we may be pleased" (45).

अध्याय ६२

श्लोक 15

सा त्वया प्रतिषिद्धेयं मेघवृष्टिर् दुरासदा देवैः सदानवगणैर् दुर्निवार्या मयि स्थिते

sā tvayā pratiṣiddheyaṃ meghavṛṣṭir durāsadā devaiḥ sadānavagaṇair durnivāryā mayi sthite

हिन्दी अर्थ

घातक एवं वैरी हैं। में युद्धमें इन्द्रकुमारके साथ लड़कर अपने लिये कौन-सी ख्याति प्राप्त करूँगा ऐसा निश्चय करके वह महाबली असुर वहीं अन्तर्धान हो गया और युद्धके लिये उस स्थानपर गया, जहाँ महाबली श्रीकृष्ण विराजमान थे॥ २० ॥ उसे वहाँ गया हुआ देख बलनाशन इन्द्र ऐरावतकी पीठपर बैठकर वह युद्ध देखनेके लिये आये। उस समय वे देवताओंके साथ बहुत प्रसन्न थे॥ २१ ॥ धर्मात्मा इन्द्रने 'साधु-साधु (वाह-वाह) ' कहकर संतुष्ट हो अपने पुत्र जयन्तको हृदयसे लगा लिया और मूर्छा दूर हो जानेपर प्रवरसे भी गले मिले॥ २२॥ उस समय रणदुर्जय जयन्तकी युद्धमें विजय देखकर इन्द्रकी आज्ञासे देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं

English

Having thus commanded all and worshipped Bhishmaka duly the Emperor, encircled by his own army, set out for his city (46). Shalya, too, the foremost of kings, having honored all duly, set out by the etherial way in a car, coursing like air (47). Following Jarāsandha to some distance the Deccan Chiefs repaired to their respective cities (48). Thinking of his own evil conduct, of Krathā, Kaishika and Krishna, the king Bhishmaka, along with his own son, entered into his Palace (49). On account of the discomfiture of the kings consequent upon Krishna's arrival and the termination of the Swayamvara the chaste and wise Rukshmini approached her friends and with her face bent down in shame said:—"I tell you truly, I do not wish to be the spouse of any body else save Krishna having lotus eyes" (50-51).

अध्याय ६२

श्लोक 16

अहो मे सुप्रियं कृष्ण यत् त्वं मानुषदेहवान् समग्रं वैष्णवं तेजो विनिगूहसि रोषितः

aho me supriyaṃ kṛṣṇa yat tvaṃ mānuṣadehavān samagraṃ vaiṣṇavaṃ tejo vinigūhasi roṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

निकुम्भने देखा, युद्धमें जिनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है, वे श्रीकृष्ण यज्ञमण्डपसे थोड़ी ही दूरपर अर्जुनके साथ खड़े हैं॥ २४॥ फिर तो उसने बड़े जोरसे सिंहनाद करके अत्यन्त भयंकर परिधद्वारा पक्षिराज यमौच वासुदेव स साम्बं काम च वीर्यवान् युयुधे मायया हैत्य: शीघ्रकारी च भारत। न चैनं ददृशुः सर्वे सर्वशस्त्रविशारदा: यदा तु नैवापश्यंस्तं तदा बिल्वोदके श्वरम् । दध्यो देवं हषीकेश: प्रमथानां गणेश्वरम् बिल्वोदकेश्वरस्याशुनिकुम्भं मायिनां वरम्

English

Vaishampayana said:—Kālayavana, the king of Yavanas, was highly powerful and used to govern the inhabitants of his city in pursuance of royal duties (1). He was wise, conversant with three Vargas,²⁷⁴ proficient in six Gunas²⁷⁵ innocent of sevenfold calamities,²⁷⁶ endued with all accomplishments, well-versed in Srutis, pious, truthful, a master of his senses, acquainted with the rules of war, an expert in capturing forts, heroic, of great strength and used to honor his ministers. One day encircled by his ministers he was seated at ease and the learned and intelligent Yavanas, discoursing amongst themselves on various celestial themes were adoring him (2–5). In the meantime there blew delightful, but exciting, cold and fragrant wind. Thereat the assembled Yavanas and the king Kālayavana were all worked up and thought "Whence it has come?" Thereupon they saw a car coming from the south. It was golden and white, lighted up with the lustre of jewels, adorned with celestial flags and pennons, drawn by horses fleet like the mind or air, adorned with tiger-skins, a terror to the enemies, the enhancer of joy to the friends, constructed by the celestial Architect, effulgent like the sun, the grinder of others' cars and embellished with jems like the rays of the sun and moon. The powerful and beautiful king of Soubha was seated thereon. Delighted greatly at seeing his friend the mighty-armed king of Yavanas, the foremost of speakers, repeatedly sent for Arghya and water to wash feet. And rising up from his throne and with Arghya in his hands he went out and waited at the landing stair of the car. Be holding the king Kālayavana, powerful like Sakra the highly energetic Shalya was greatly delighted, got down alone from the chariot with a confident heart and joyously entered into the Palace of Yavana for seeing his friend. Observing _arghya_ in the hands of the king of Yavanas, Shalya, the foremost of kings, said in sweet words:—"O thou of great effulgence, I am not now worthy of _arghya_. I am now an envoy of the kings and have been despatched to thee by the intelligent Jarāsandha. I therefore do not deserve _arghya_ from the kings" (5–18).

अध्याय ६२

श्लोक 17

साधितं देवतानां हि मन्ये ऽहं कार्यम् अव्ययम् त्वयि मानुष्यम् आपन्ने युक्तेनैवं स्वतेजसा

sādhitaṃ devatānāṃ hi manye 'haṃ kāryam avyayam tvayi mānuṣyam āpanne yuktenaivaṃ svatejasā

हिन्दी अर्थ

कैलासशिखराकारं ग्रसन्तमिव धिष्ठितम् । आह्वयन्तं रणे कृष्णं वैरिणं ज्ञातिनाशनम् पप्रच्छ केशवं बीर: किमेतदिति भारत किमिदं देवकी पुत्र विस्मयो5त्र महान् मम तमुवाच ततः कृष्ण: प्रहसन्निव भारत। महद्धूत॑ निकुम्भो5यं कौन्तेय श्रृणु विस्तरात्

English

Kalayavana said:—"O you of large-arms, I know that you have been despatched here as an envoy by the king of Magadha for the behoof of kings (19). O intelligent king, I adore you duly with water to wash feet, seat and various other means of welcome because you have been sent here by the entire circle of kings. By adoring you, O king, I shall worship the entire host of kings and by honoring you all of them will be honored. Therefore, O king, sit with me on this throne" (20–21).

अध्याय ६२

श्लोक 18

सेत्स्यते वीर कार्यार्थो न किंचित् परिहास्यते देवानाम् यद् भवान् नेता सर्वकार्यपुरोगमः

setsyate vīra kāryārtho na kiṃcit parihāsyate devānām yad bhavān netā sarvakāryapurogamaḥ

हिन्दी अर्थ

शतं वर्षसहस्त्राणां देवशन्रुर्दुरासदः अथेैनं छन्दयामास वरेण भगवान् हरः। स वत्रे त्रीणि रूपाणि न वध्यानि सुरासुरै: तमुवाच् महादेवो भगवान् वृषभध्वज:। मम वा ब्राह्मणानां वा विष्णोर्वाप्रियमाचरन् ब्रह्मण्यो5हं च विष्णुश्न विप्राणां परमा गति: तत्पश्चात् उस पराक्रमी असुरने श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा श्रीकृष्णकुमार साम्ब और प्रद्युम्रपर भी प्रहार किया॥ २६॥ भरतनन्दन! वह शीघ्रकारी हैत्य मायाद्वारा युद्ध कर रहा था; इसलिये

English

Vaishampāyana said:—Thereupon shaking hands with each other and enquiring of their mutual welfare those two kings sat at ease on the sacred throne (92).

अध्याय ६२

श्लोक 19

एकस् त्वम् असि लोकानां देवानां च सनातनः द्वितीयं नानुपश्यामि धुरं यस् ते समुद्वहेत्

ekas tvam asi lokānāṃ devānāṃ ca sanātanaḥ dvitīyaṃ nānupaśyāmi dhuraṃ yas te samudvahet

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण शस्त्रोंके ज्ञाममें कुशल वे समस्त वीर उसे देख नहीं पाते थे॥ २७॥ जब वे उस असुरको नहीं देख सके, तब भगवान् श्रीकृष्णने प्रमथगणोंके स्वामी बिल्वोदकेश्वर देवका स्मरण किया॥ २८॥ फिर तुरंत ही अत्यन्त तेजस्वी बिल्वोदकेश्वरके प्रभावसे उन सबने मायावियोंमें श्रेष्ठ निकुम्भको देखा॥२९॥ उसका शरीर कैलास- शिखरके समान विशाल था। वह इस प्रकार खड़ा था, मानो सबको ग्रस लेगा वह अपने बन्धु-बान्धवोंका नाश करनेवाले वैरी श्रीकृष्णको युद्धेके लिये ललकार रहा था। उस समय जिनके गाण्डीव धनुषपर प्रत्यञ्ञा चढ़ी हुई थी, उन अर्जुनने रथका भेदन करनेवाले बाणों- द्वारा उसके परिध और अड्जोंपर बारम्बार प्रहार किया॥ ३०-३१॥ नरेश्वर! अर्जुनके वे सभी बाण जो शिलापर तेज किये गये थे, उसके परिघ और अड्ञोंसे टकराकर टूटकर अथवा मुड़कर पृथ्वीपर गिर पड़े

English

Kalayavana said:—What has become impossible to him, depending on the might of whose arms you kings are all living without any anxiety as the gods do under the protection of Sachi's lord, that he has sent you to me. Tell me, truly, O king, what mandate, the powerful king of Magadha has issued to me. Even if it be very difficult I shall carry out his

अध्याय ६२

श्लोक 20

यथा हि पुंगवः श्रेष्ठो मग्ने धुरि नियुज्यते एवं त्वम् असि देवानां मग्नानां द्विजवाहन

yathā hi puṃgavaḥ śreṣṭho magne dhuri niyujyate evaṃ tvam asi devānāṃ magnānāṃ dvijavāhana

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! उन दिव्यास्त्रयुक्त बाणोंको निष्फल हुआ देख वीर अर्जुनने श्रीकृष्णसे पूछा--'यह क्या हुआ ? देवकीनन्दन ! मेरे वज्रतुल्य बाण पर्वतोंको भी विदीर्ण कर डालते हैं (परंतु यहाँ निष्फल हो गये)। यह क्‍या बात है ? इस विषयमें मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है' भारत ! तब श्रीकृष्णने हँसते हुए-से कहा--' कुन्तीनन्दन ! यह निकुम्भ एक महान् भूत है। इसका परिचय विस्तारपूर्वक सुनो ॥ ३५ ॥ पूर्वकालमें इस दुर्जय देवद्रोही महान् असुरने उत्तर-कुरुमें जाकर एक लाख वर्षोतक तपस्या की थी॥ ३६ ॥ तब भगवान् शिवने इसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये आज्ञा दी। उस समय इसने महादेवजीसे तीन रूप माँगे, जो देवताओं और असुरोंके लिये अवध्य हो तब महान् देव भगवान् वृषभध्वजने इससे कहा-महान् असुर ! यदि तुम मेरा, ब्राह्मणोंका अथवा भगवान् विष्णुका अप्रिय करोगे तो श्रीहरिके हाथसे मारे जाओगे। दूसरे किसीके द्वारा नहीं; क्योंकि मैं और विष्णु दोनों ब्राह्मणोंके

English

Shalya said:—O king of Yavanas, hear I shall describe at length what the king of Magadha has deputed me to communicate to you (25).

अध्याय ६२

श्लोक 21

त्वच्छरीरगतं कृष्ण जगत्प्रहरणं त्व् इदम् ब्रह्मणा साधु निर्दिष्टं धातुभ्य इव काञ्चनम्

tvaccharīragataṃ kṛṣṇa jagatpraharaṇaṃ tv idam brahmaṇā sādhu nirdiṣṭaṃ dhātubhya iva kāñcanam

हिन्दी अर्थ

हितैषी हैं। उनके परम आश्रय हैं ॥ ३८-३९ ॥ पाण्डुनन्दन ! वही यह तीन शरीर धारण करनेवाला अत्यन्त प्रमथनशील दानव है, जो वरदान पाकर मदमत्त हो उठा है। यह सम्पूर्ण शस्त्रोंद्रारा अवध्य है' भानुमत्यापहरणे देहो5स्थैको गतो मया। अवध्यं षट्पुरं देहमिदमस्य दुरात्मन: दितिं शुश्रूषति त्वेको देहो5स्य तपसान्वित: । अन्यस्तु देहो घोरो5स्थ येनावसति षट्पुरम् तयो: कथयतोरेव॑ कृष्णयोरसुरस्तदा। गुहां षट्पुरसंज्ञां तां विवेश रणदुर्जय:

English

Jarasandha said:—The highly irrepressable Krishna has been oppressing the world from his very birth. Informed of his wicked deeds I attempted to slay him (26). Accompanied by a number of kings along with their four-fold forces and conveyances I besieged the mount Gomanta with a huge army (27). And there listening to the highly sensible words of the king of Chedi I set fire to that best of mountains for their (Rāma and Krishna's) destruction (28). Beholding that fire consisting of hundreds and thousands of flames and resembling the fire of dissolution, Rāma, holding the golden hilt of a sword, leaped down from the mountain summit in the midst of the ocean-like army of the kings. And that highly irrepressible one began to kill the car-warriors, the infantry and cavalry (30). He moved about like a serpent; and catching elephants, horses and soldiers with his plough-share he grinded them with his mace (31). In that battle-field abounding in hundreds of kings that highly energetic Rāma, endued with the prowess of the sun, ranging in various ways like the setting sun, destroyed elephants, with elephants, car-warriors with cars, and the cavalry with horses (32-33). After Rāma, the highly powerful and energetic Yadu hero, Krishna, taking up his discus effulgent like the sun, and his black iron club, forcibly leaped down in the midst of the enemie's army agitating the mountain with the force of his feet as a lion attacks the poor deer (34–35). O king, at that time whirling and bathed with shower that mountain extinguished the fire and entered into the earth as if dancing (36). Jumping down from that burning mountain Janārddana with his hand holding the discus began to destroy our army (37). Whirling his huge discus and throwing all down with his club he began to grind men, elephants and horses with his mace (38). Then with the fire of discus and plough-share begotten by their anger that huge army, protected by sun-like kings, was consumed (39). Within a moment our army consisting of men, elephants horses infantry and flags, was consumed by those two foot soldiers (40).

अध्याय ६२

श्लोक 22

स्वयं स्वयंभूर् भगवान् बुद्ध्याथ वयसापि वा न त्वानुगन्तुं शक्तो वै पङ्गुर् द्रुतगतिं यथा

svayaṃ svayaṃbhūr bhagavān buddhyātha vayasāpi vā na tvānugantuṃ śakto vai paṅgur drutagatiṃ yathā

हिन्दी अर्थ

अन्विष्य तस्य भगवान् विवेश मधुसूदन: । तां षटपुरगुहां घोरां दुर्धर्षा कुरुनन्दन तत्र प्रविश्य भगवानपश्यत जनाधिपान्। युयुधे सह घोरेण निकुम्भेन जनाधिप कृष्णस्यानृप्रविष्टास्तु बलाद्या यादवास्तदा। प्रविष्टाश्च तथा सर्वे पाण्डवास्ते महात्मन: समेतास्तु प्रविष्टास्ते कृष्णस्यानुमतेन वै। युयुधे स तु कृष्णेन रौक्मिणेय: प्रच्चोदितः। आनयद् यादवान् सर्वान् यानयं बद्धवान् पुरा प्रहष्टमनस: सर्वे निकुम्भवधकाड्नक्षेण:

English

O king, beholding that army distressed by the fear of the fire of discus and routed, I, encircled by a huge collection of cars, engaged in battle. And Keshava's brother the heroic and valiant Baladeva, the destroyer of Bala, stood before me with a club in his hand (41–42). Having slain the twelve Akshouhinis of soldiers and cast off his plough-share and mace Sounanda, that leonine hero pursued me with his club (43). O king, having thrown the club on me with a force like that of the fall of a thunder-bolt he again stood manfully on the ground (44). Then like unto Kārtikeya at the time of the destruction of Krounch, he, with his two large eyes, as if consumed me, looking at my joints (45). O king of Yavanas, beholding such a form of Baladeva, what person, having hopes of life, can stand before him in the battle-field (46)? When he stood before him holding up that terrible club resembling the rod of the Regent of the dead and whirling it along with his plough-share Brahmā, the grand-father of all, filling the welkin with his invisible voice grave as the muttering of clouds, said:—"O sinless Rāma, do not strike (him); O holder of plough-share, it has been destined that he shall not meet with his death from any other person." Hearing with my own ears those words given vent to by the Grand-father I was filled with anxiety and returned from the battle-field (47–50).

अध्याय ६२

श्लोक 23

स्ताणुभ्यो हिमवाञ् श्रेष्ठो ह्रदानां वरुणालयः गरुत्मान् पक्षिणां श्रेष्ठो देवतानां भवान् वरः

stāṇubhyo himavāñ śreṣṭho hradānāṃ varuṇālayaḥ garutmān pakṣiṇāṃ śreṣṭho devatānāṃ bhavān varaḥ

हिन्दी अर्थ

राजानो वीर मुझेति पुनः काम यथाब्रुवन्। मुमोच चाथ तान् वीरो रौक्मिणेय: प्रतापवानू योधयामास भगवान् घोरमात्मरिपुं हरिः परिघेनाहतः कृष्णो निकुम्भेन भूशं विभो। गदया चापि कृष्णेन निकुम्भस्ताडितो भूशम् 'भानुमतीके अपहरणके समय मैंने इसके एक शरीरको नष्ट कर दिया था। यह अवध्य षट्पुर इस दुरात्माका दूसरा शरीर है॥४१॥ तथा इसका एक तपस्वी शरीर दितिदेवीकी सेवामें संलग्र रहता है।

English

O king, for this reason, and for the behoof of the kings, I communicated this incident to you. Hearing this you should do what you think proper in pursuance of my words (51). Desirous of having a son your father propitiated Sankara, the god of gods with hard austerities and obtained you as his son unslayable by the princes of Mathurā (52). Fasting and feeding on powdered iron for twelve years the great Muni Gārgya propitiated the great god Siva, on whose lotus feet even the gods and Asuras meditate and therefore obtained his wished-for prosperity in the person of yourself (53). By virtue of the asceticism of the ascetic Gārgya and of the power of Mahādeva carrying the emblem of a crescent forsooth, shall Janārddana meet with his death as the dews are dried up by the rays of the sun (54), O king, thus requested by the kings, be up and doing and march for vanquishing Krishna. And entering the city of Mathurā with your army establish your glory there (55). Vasudeva's son is a native of Mathurā and Baladeva is his brother. If you go to the city of Mathurā you will be able to defeat them in battle (56).

अध्याय ६२

श्लोक 24

अपाम् अधस्ताल् लोको वै तस्योपरि महीधराः नागानाम् उपरिष्टाद् भूः पृथिव्युपरि मानुषाः

apām adhastāl loko vai tasyopari mahīdharāḥ nāgānām upariṣṭād bhūḥ pṛthivyupari mānuṣāḥ

हिन्दी अर्थ

जिससे यह षट्पुरमें निवास करता है, वह इसका घोर शरीर दूसरा ही है॥४२॥ वीर! यह सब निकुम्भका चरित्र मैंने कह सुनाया। अब तुम इसके वधके लिये जल्दी करो। यह कथा पीछे होती रहेगी' श्रीकृष्ण और अर्जुन इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि वह रणदुर्जय असुर उस षट्पुर नामवाली गुफामें जा घुसा॥४४॥ कुरुनन्दन! उसके जानेके मार्गका अनुसंधान करके भगवान् मधुसूदन भी उस घोर, दुर्जय घट्पुर नामवाली गुफामें घुस गये॥ ४५॥ वहाँ चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश नहीं था। वह गुफा अपने ही तेजसे प्रकाशित होती और वहाँके निवासियोंको सुख-दुःख, गरमी-सर्दी आदि प्रदान करती थी॥ ४६॥ नरेश्वर! उस गुफामें प्रवेश करके भगवान् श्रीकृष्णने निकुम्भद्वारा बंदी बनाये गये यादवनरेशोंकों देखा; फिर वे उस घोर असुर निकुम्भके साथ युद्ध करने लगे॥ ४७ ॥ महात्मा श्रीकृष्णकी अनुमतिसे बलराम आदि समस्त यादववीर भी उस समय उनके पीछे-पीछे उस गुफामें जा घुसे तथा समस्त पाण्डव भी एक साथ ही उसमें घुस आये

English

Shalya said:—O king, I have thus communicated to you, the message entrusted to me by the Emperor Jarāsandha for the behoof of the kings. Do you now undertake what is proper and conducive to your well-being after consulting duly with your ministers (57).

अध्याय ६२

श्लोक 25

मनुष्यलोकाद् ऊर्ध्वं तु खगानां गतिर् उच्यते आकाशस्योपरि रविर् द्वारं स्वर्गस्य भानुमान्

manuṣyalokād ūrdhvaṃ tu khagānāṃ gatir ucyate ākāśasyopari ravir dvāraṃ svargasya bhānumān

हिन्दी अर्थ

निकुम्भ तो श्रीकृष्णके साथ युद्ध करने लगा। इधर श्रीकृष्णकी आज्ञासे रुक्मिणीनन्दन प्रद्यु्न उन सब यादवोंको छुड़ा लाये, जिन्हें निकुम्भने पहले बंदी बना प्रसन्नचित्त हो निकुम्भका वध करनेकी इच्छासे उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध कर रहे थे॥५०॥ तब वे राजा जो प्रद्युम्नद्ठारा कैद किये गये थे, उन कामस्वरूप प्रद्यश्लसे बार-बार कहने लगे-- “वीर! हमें मुक्त कर दो।' तब प्रतापी वीर रुक्मिणी- कुमारने उन सबको छोड़ दिया॥ ५१॥ वे समस्त वीर नरेश अपना मुँह नीचे किये चुपचाप खड़े थे। उनकी श्री नष्ट हो गयी थी। वे उस समय लज्ञामें डूबे हुए थे॥५२॥ पापहारी भगवान् गोविन्द विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले अपने घोर शत्रु निकुम्भके साथ युद्ध कर रहे थे॥५३॥ प्रभो! निकुम्भने परिघद्वारा भगवान् श्रीकृष्णपर बड़े जोरका आघात किया तथा श्रीकृष्णने

English

²⁷⁴ Three conditions of a king or state; prosperity, evenness or decay or loss, gain and equality.

अध्याय ६२

श्लोक 26

देवलोकः परस् तस्माद् विमानगहनो महान् यत्राहं कृष्ण देवानाम् ऐन्द्रे विनिहितः पदे

devalokaḥ paras tasmād vimānagahano mahān yatrāhaṃ kṛṣṇa devānām aindre vinihitaḥ pade

हिन्दी अर्थ

भी गदद्वारा निकुम्भको बास्म्बार गहरी चोट पहुँचायी जेपुर्मुनिगणास्तत्र कृष्णस्य हितकाम्यया। तुष्टवुश्च महात्मानं वेदप्रोक्तैस्तथा स्तवैः ततः प्रत्यागतप्राणो भगवान् केशवस्तदा। दानवश्च पुनर्वीरावुद्यती समर प्रति शालावृकाविव क्रुद्धौ प्रहरन्तौ रणोत्कटौ अथ कृष्णं तदोवाच नृप वागशरीरिणी। चक्रेण शमयस्वैनं देवब्राह्मणकण्टकम्

English

²⁷⁵ The six acts of a king in his military character, or peace, war, marching, halting, sowing, dissension, seeking potection.

अध्याय ६२

श्लोक 27

त्वया हि लोकनाथेन विष्णुना प्रभविष्णुना ।स्वर्गाद् ऊर्ध्वं ब्रह्मलोको ब्रह्मर्षिगणसेवितः तत्र सोमगतिश् चैव ज्योतिषां च महात्मनाम्

tvayā hi lokanāthena viṣṇunā prabhaviṣṇunā | svargād ūrdhvaṃ brahmaloko brahmarṣigaṇasevitaḥ tatra somagatiś caiva jyotiṣāṃ ca mahātmanām

हिन्दी अर्थ

इति होवाच भगवान् देवो बिल्वोदके श्वरः । धर्म यशश्च विपुलं प्राप्रुहि त्व॑ं महाबल तथेत्युक्त्वा नमस्कृत्वा लोकनाथ: सतां गति:। सुदर्शन मुमोचाथ चक्र देत्यकुलान्तकम् निकुम्भे निहते तस्मिन् देवो बिल्वोदके श्वरः । तुतोष च नरव्याप्र जगल्लासकरे विभु: देवदुन्दुभयश्चैव प्रणेदुररिनाशने

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 28

तस्योपरि गवां लोकः साध्यास् तं पालयन्ति हि स हि सर्वगतः कृष्ण महाकाशगतो महान्

tasyopari gavāṃ lokaḥ sādhyās taṃ pālayanti hi sa hi sarvagataḥ kṛṣṇa mahākāśagato mahān

हिन्दी अर्थ

हैत्यकन्याश्र भगवान् यदुभ्य: शतशो ददौ क्षत्रियाणां च भगवान् सान्त्वयित्वा पुनः पुनः । रल्लानिच विचित्राणि वासांसि प्रवराणि च रथानां वाजियुक्तानां षघट् सहसत्राणि केशव: । अददात् पाण्डवेभ्यश्व प्रीतात्मा गदपूर्वज: तब एक-दूसरेके द्वारा अच्छी तरह किये गये प्रहारोंस आहत होकर वे दोनों ही मू्च्छित हो गये। इससे पाण्डवों और यादवोंको अत्यन्त व्यथित हुआ देख वहाँ खड़े हुए मुनिगण श्रीकृष्णके हितकी कामनासे “जप' करने लगे तथा उन्होंने वेदोक्त स्तुतियोंद्वारा परमात्मा श्रीकृष्णका स्तवन किया॥ ५५-५६ ॥ तब भगवान् केशव सजग हो उठे, मानो उनमें पुनः प्राण लौट आये हों। तदनन्तर वह दानव भी होशमें आ गया। फिर वे दोनों

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 29

उपर्युपरि तत्रापि गतिस् तव तपोमयी यां न विद्मो वयं सर्वे पृच्छन्तो ऽपि पितामहम्

uparyupari tatrāpi gatis tava tapomayī yāṃ na vidmo vayaṃ sarve pṛcchanto 'pi pitāmaham

हिन्दी अर्थ

वीर युद्धके लिये उच्चयत हो गये॥ ५७॥ भारत! वे दोनों रणोन्मत्त वीर साँड़ोंक समान हँकड़ते, हाथियोंके समान चिग्घाड़ते और भेड़ियोंके समान दहाड़ते हुए क्रोधपूर्वक परस्पर प्रहार करने लगे॥५८॥ नरेश्रर! उस समय आकाशवाणीने भगवान् श्रीकृष्ससे कहा--'जनार्दन! यह अपने चक्रद्वारा इसको नष्ट कर दो'॥ ५९॥ यह बात स्वयं भगवान् बिल्वोदकेश्वरदेवने कही थी। फिर उन्होंने इस प्रकार कहा--'महाबली श्रीकृष्ण ! तुम (इस हैत्यको मारकर) महान् धर्म और विशाल यश प्राप्त करो' तब “जो आज्ञा' कहकर सत्पुरुषोंके आश्रयदाता जगदी श्वर श्रीकृष्णने भगवान् बिल्वोदकेश्वरको नमस्कार किया और हैत्यकुलका विनाश करनेवाले सुदर्शन चक्रको निकुम्भपर छोड़ दिया॥ ६१ ॥ श्रीकष्णके हाथसे छूटे हुए सूर्यमण्डलके

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 30

पितामहो ऽपि भगवांस् त्वत्प्रसादाद् यदृच्छया ।यां योगनिरता विष्णो भजन्ते ब्रह्मवादिनः ।लोकस् त्व् अर्वाग् दुष्कृतिनां नागलोकस् तु दारुणः पृथिवी कर्मशीलानां क्षेत्रं सर्वस्य कर्मणः

pitāmaho 'pi bhagavāṃs tvatprasādād yadṛcchayā | yāṃ yoganiratā viṣṇo bhajante brahmavādinaḥ | lokas tv arvāg duṣkṛtināṃ nāgalokas tu dāruṇaḥ pṛthivī karmaśīlānāṃ kṣetraṃ sarvasya karmaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

समान तेजस्वी चक्रने उत्तम कुण्डलोंसे अलंकृत निकुम्भका मस्तक काट डाला॥ ६२ ॥ कान्तिमान् कुण्डलोंसे अलंकृत उसका वह मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो मेघके दर्शनसे उन्मत्त हुआ कोई मोर पर्वतके शिखरसे धरतीपर आ गिरा हो॥६३॥ नरव्याप्न! जगत्को त्रास देनेवाले उस निकुम्भके मारे जानेपर सर्वव्यापी देव बिल्वोदकेश्वर बहुत संतुष्ट हुए॥६४॥ आकाशसे इन्द्रकी बरसायी हुई फूलोंकी वृष्टि होने लगी। उस देवशत्रुका नाश हो जानेपर आनन्दमग्न हो गया। ऋषि-मुनियोंको विशेष प्रसन्नता हुई! भगवान् श्रीकृष्णने यादववीरोंकों सैकड़ों हैत्य- कन्याएँ दे दीं॥ ६६॥ अन्य क्षत्रिय राजाओंको भी बास्म्बार सान्त्वना देकर भगवान्ने विचित्र रत्न और श्रेष्ठ वस्त्र प्रदान किये ॥ ६७ ॥ गदके बड़े भाई श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर पाण्डवोंको छ: हजार अश्वयुक्त रथ भेंट किये तदेव चाथ प्रवरं षट्पुरं पुरवर्द्धनः। द्विजाय ब्रह्मदत्ताय ददौ ताक्ष्यवरध्वज:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 31

खम् अस्थिराणां विषयो वायुना तुल्यवृत्तिनाम् गतिः शमदमाढ्यानां स्वर्गः सुकृतकर्मणाम्

kham asthirāṇāṃ viṣayo vāyunā tulyavṛttinām gatiḥ śamadamāḍhyānāṃ svargaḥ sukṛtakarmaṇām

हिन्दी अर्थ

बिल्वोदके श्ररस्थाथ समाजमकरोतू प्रभु: । मांससूपसमाकीर्ण बह्नन्नं व्यज्ञनाकुलम् नियुद्धकुशलान् मल्लान् देवो मल्लप्रियस्तदा । योधयित्वा ददौ भूरि वित्त वस्त्राणि चात्मवानू अभिवाद्य ब्रह्मदत्तं ययौ द्वारवरतीं पुरीम् श्राद्धेषु पठितं सम्यगक्षय्यकरणं स्मृतम्

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 32

ब्राह्मे तपसि युक्तानां ब्रह्मलोकः परा गतिः गवाम् एव हि गोलोको दुरारोहा हि सा गतिः

brāhme tapasi yuktānāṃ brahmalokaḥ parā gatiḥ gavām eva hi goloko durārohā hi sā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

नगरको वृद्धि करनेवाले भगवान् गरुड़ध्वजने वह षट्पुर नामक श्रेष्ठ नगर ब्रह्मदत्त नामक ब्राह्मणको दे दिया ॥ ६९ ॥ यज्ञ समाप्त होनेपर शद्भु, चक्र और गदा धारण करनेवाले महाबली भगवान् श्रीकृष्णने उन क्षत्रियों और पाण्डवोंको विदा करके श्रीबिल्वोदकेश्वरके लिये एक सामूहिक उत्सव किया, जिसमें फलोंके गूदे, दाल तथा अन्यान्य व्यञझनोंसे युक्त बहुत-सा अन्न लोगोंको खिलाया गया॥ ७०-७१ ॥ अपने मनको वशमें रखनेवाले मल्लप्रिय भगवान् श्रीकृष्णने युद्धकुशल मल्लोंको लड़वाकर उन्हें श्रीकृष्ण अपने माता-पिता तथा अन्य यादवोंके साथ ब्रह्मदत्तको प्रणाम करके द्वारकापुरीको चले गये ॥ ७३ ॥ मार्गमें दूसरे लोगोंका प्रणाम स्वीकार करते हुए वीर श्रीकृष्णने हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई तथा पुष्पोंके बिछाये जानेसे विचित्र पथवाली रमणीय पुरी द्वारकामें प्रवेश किया

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 33

स तु लोकस् त्वया कृष्ण सीदमानः कृतात्मना धृतो धृतिमता वीर निघ्नतोपद्रवं गवाम्

sa tu lokas tvayā kṛṣṇa sīdamānaḥ kṛtātmanā dhṛto dhṛtimatā vīra nighnatopadravaṃ gavām

हिन्दी अर्थ

जो चक्रपाणि भगवान् श्रीकृष्णके इस षट्पुरवधरूप विजयसूचक चरित्रको सुनता अथवा पढ़ता है, वह युद्धमें विजय पाता है॥ ७५॥ (इसके श्रवण अथवा पठनसे) पुत्रहीनको पुत्र और निर्धनको धन मिलता है। रोगी रोगसे और बंदी बन्धनसे छुटकारा पाता है॥ ७६॥ भारत! यह प्रसंग पुंसतन और गर्भाधानमें सहायक कहा गया है (अर्थात् इसके श्रवणसे पत्नीके गर्भाधान होता है और उस गर्भसे पुत्रकी उत्पत्ति होती है) । यदि श्राद्धोंमें इसका सम्यक् रूपसे पाठ किया जाय तो यह उसके फलको अक्षय बनानेवाला माना गया है॥ ७७ ॥भारतमें जिनका बल विख्यात है तथा जो देवताओंसे भी श्रेष्ठ हैं, उन महात्मा श्रीकृष्णकी इस विजयगाथाका जो मनुष्य यहाँ सदा पाठ करता है, वह रोग-शोकसे मुक्त हो यहाँसे परम गतिको प्राप्त होता है॥ ७८ ॥ मणि और सुवर्णक आभूषण धारण करनेसे जिनके हाथ-पैरोंकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें सूर्यके तेज आदि गुण उनसे भी बहुत अधिक मात्रामें

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 34

तद् अहं समनुप्राप्तो गवां वाक्येन चोदितः ब्रह्मनश् च महाभाग गौरवात् तव चागतः

tad ahaṃ samanuprāpto gavāṃ vākyena coditaḥ brahmanaś ca mahābhāga gauravāt tava cāgataḥ

हिन्दी अर्थ

विद्यमान हैं, जो शत्रुओंके नाशक तथा सबके आदिरक्षक हैं, चारों समुद्र जिनके शयनागार हैं तथा जो वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युवप्न और अनिरुद्ध-इन चार व्यूहोंके रूपमें विद्यमान हैं, वे जगत्के अन्तर्यामी पुरुष सहस्रों नामोंवाले श्रीकृष्ण नित्य विजयशील हैं इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वण षट्पुरवधे पञ्ञाशीतितमो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें पट्पुरवधके प्रसंगरमें पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ अन्धकासुरकी उत्पत्ति और अनाचार, उसके वधके लिये ऋषियोंका विचार, नारदजीका मन्दारपुष्पोंकी माला धारण करके अन्धकके यहाँ जाना और उससे मन्दारवनके महत्त्व बताना

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 35

अहं भूतपतिः कृष्ण देवराजः पुरंदरः अदितेर् गर्भपर्याये पूर्वजस् ते पुरातनः

ahaṃ bhūtapatiḥ kṛṣṇa devarājaḥ puraṃdaraḥ aditer garbhaparyāye pūrvajas te purātanaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रुतो5यं षट्पुरवधो रम्यो मुनिवरोत्तम। पुरोक्तमन्धकवधं वैशम्पायन कीर्तवय दितिईतेषु पुत्रेषु विष्णुना प्रभविष्णुना। तपसा कालयुक्तेन तथा शुश्रूषया मुनेः। हतपुत्रास्मि भगवन् देवैर्धर्मभूतां बर। अवध्यं पुत्रमिच्छामि देवैरमितविक्रमम्

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 36

तेजस् तेजस्विनश् चैव यत् ते दर्शितवान् अहम् मेघरूपेण तत् सर्वं क्षन्तुम् अर्हसि मे विभो

tejas tejasvinaś caiva yat te darśitavān aham megharūpeṇa tat sarvaṃ kṣantum arhasi me vibho

हिन्दी अर्थ

अवध्यस्ते सुतो देवि दाक्षायणि भवेदिति। देवानां संशयो नात्र कश्चित् कमललोचने देवदेवमृते रुद्रं तस्य न प्रभवाम्यहम्। आत्मा ततस्ते पुत्रेण रक्षितव्यो हि सर्वथधा अन्वालभत तां देवीं कश्यप: सत्यवागथ। अड्डुल्योदरदेशे तु सा पुत्र सुषुबे ततः जनमेजयने कहा--मुनिवरोंमें उत्तम वैशम्पायनजी ! षट्पुरवधका यह रमणीय प्रसंग मैंने सुन लिया। अब पहले जिसकी चर्चा हुई थी, उस अन्धकवधका वृत्तान्त मुझे बताइये ॥ १॥ वक्ताओंमें श्रेष्ठ भानुमतीके हरणका

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 37

एवं क्षान्तमनाः कृष्ण स्वेन सौम्येन तेजसा ब्रह्मणः शृणु मे वाक्यं गवां च गजविक्रम

evaṃ kṣāntamanāḥ kṛṣṇa svena saumyena tejasā brahmaṇaḥ śṛṇu me vākyaṃ gavāṃ ca gajavikrama

हिन्दी अर्थ

तथा उस अवसरपर किये गये निकुम्भवधका प्रसंग भी सुनाइये; क्योंकि वह सब सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है वैशम्पायनजी बोले--राजन्! पहलेकी बात है, प्रभावशाली भगवान् विष्णुके द्वारा जब सभी पुत्र मारे गये, तब देवी दितिने तपस्याके द्वारा मरीचिनन्दन कश्यपजीकी आराधना की॥३॥ भरतनन्दन! उनकी समयोचित तपस्या, सेवा, अनुकूल बर्ताव तथा माधुर्यसे तपोधन कश्यपजी बहुत संतुष्ट हुए और उनसे बोले--'उत्तम ब्रतका पालन करनेवाली कल्याणी। मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ, तुम कोई वर माँगो' दिति बोली-- भगवन्! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ ! देवताओंने मेरे सभी पुत्रोंकी मार डाला है; अतः मैं एक ऐसा अमित पराक्रमी पुत्र चाहती हूँ, जो देवताओंके लिये अवध्य हो

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 38

आह त्वा भगवान् ब्रह्मा गावश् चाकाशगा दिवि कर्मभिस् तोषिता दिव्यैस् तव संरक्षणादिभिः

āha tvā bhagavān brahmā gāvaś cākāśagā divi karmabhis toṣitā divyais tava saṃrakṣaṇādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

कश्यपजीने कहा--देवि ! दाक्षायणि ! कमललोचने ! तुम्हारा पुत्र देवताओंके लिये अवध्य होगा, इसमें कोई संशय नहीं है॥७॥ किंतु देवाधिदेव रुद्रको छोड़कर दूसरा कोई देवता उसे नहीं मार सकेगा, क्योंकि उनपर मेरा प्रभुत्त नहीं चल सकता। अतः तुम्हारे पुत्रको सर्वथा उनसे अपने शरीरकी रक्षा करनी चाहिए ऐसा कहकर सत्यवादी कश्यपजीने अपनी अद्जुलिसे देवी दितिके उदरका स्पर्श किया; इससे उन्होंने एक पुत्रको जन्म दिया॥९॥ कुरुनन्दन! उसके एक हजार भारत! वह अन्धा नहीं था तो भी अन्धेके समान तमन्धकोयं नाम्नेति प्रोचुस्तत्र निवासिन:॥ ११ उलता था; अतः वहाँके निवासी उसे अन्धक नामसे

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 39

भवता रक्षिता गावो गोभिर् लोकाश् च रक्षिताः यद् वयं पुंगवैः सार्धं वर्धामः प्रसवैस् तथा

bhavatā rakṣitā gāvo gobhir lokāś ca rakṣitāḥ yad vayaṃ puṃgavaiḥ sārdhaṃ vardhāmaḥ prasavais tathā

हिन्दी अर्थ

अवध्यो3स्मीति लोकान् स सर्वान् बाधति भारत। हरत्यपि च रत्रानि सर्वाण्यात्मबला श्रयात् स वेश्मन्यूजितो5त्यर्थ सर्वलोकभयंकर: चकार सततं मोहादन्धकः पापनिश्चयः त्रैलोक्यविजयं कर्तुमुद्यतः स तु भारत।

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 40

कर्षकान् पुंगवैर् वाह्यैर् मेध्येन हविषा सुरान् श्रियं शकृत्पवित्रेण तर्पयिष्याम कामगाः

karṣakān puṃgavair vāhyair medhyena haviṣā surān śriyaṃ śakṛtpavitreṇa tarpayiṣyāma kāmagāḥ

हिन्दी अर्थ

अन्धकेनेदमारब्धमीदृशं॑ मुनिसत्तम आज्ञापय विभो कार्यमस्माकं समनन्तरम्। यवीयस: कथ॑ नाम सोढव्यं स्यान्मुने मया देवेन्द्रवचनं श्रुत्वा कश्यपो5थाब्नवीन्मुनि: । वारयिष्यामि देवेन्द्र सर्वथा भद्रमस्तु ते त्रैलोक्यविजयाद् वीर कृच्छुकृच्छेण भारत बभजञ्ञज कानने वृश्षानुद्यानानि च दुर्मति:। उच्चै:भ्रवःसुतानश्वान् बलादप्यानयद् दिव:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 41

तद् अस्माकं गुरुस् त्वं हि प्राणदश् च महाबल अद्यप्रभृति नो राजा त्वम् इन्द्रो वै भविष्यसि

tad asmākaṃ gurus tvaṃ hi prāṇadaś ca mahābala adyaprabhṛti no rājā tvam indro vai bhaviṣyasi

हिन्दी अर्थ

बलाद्धरति देवानां पश्यतां वरदर्पित: देवानाप्याययन्ते तु ये यज्ैस्तपसा तथा। तेषां चकार विध्व स दुष्टात्मा देवकण्टक:ः अन्धकस्य भयाद् राजन् यज्ञविप्नानि कुर्वत: पुकारने लगे॥११॥ भरतनन्दन! मैं अवध्य हूँ, ऐसा समझकर वह सब लोगोंको सताने लगा। अपने बलके भरोसे वह (सब जगहसे) सभी रत्नोंको हर लाता था॥ १२॥ समस्त लोकोंकों भय देनेवाला वह हैत्य

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 42

तस्मात् त्वं काञ्चनैः पूर्णैर् दिव्यस्य पयसो घटैः एभिस् त्वम् अभिषिच्यस्व मया हस्तावनामितैः

tasmāt tvaṃ kāñcanaiḥ pūrṇair divyasya payaso ghaṭaiḥ ebhis tvam abhiṣicyasva mayā hastāvanāmitaiḥ

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त शक्तिशाली होनेके कारण अपने बलसे अप्सगओंको पकड़कर अपने घरमें रखता था॥ १३॥ पापपूर्ण विचार रखनेवाले अन्धकने मोहवश परस्त्रियोंक अपहरण करने और पराये धनकों लूट लानेका धंधा सदाके लिये अपना लिया॥ १४॥ भारत! एक बार अन्धक सबका तिरस्कार करनेवाले बहुत-से सहायक असुरोंके साथ तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करनेको उद्यत हुआ वह समाचार सुनकर ऐश्वर्यशाली इन्द्रने अपने पिता कश्यपसे कहा--'मुनिश्रेष्ठ! अन्धकासुरने ऐसा कार्य आरम्भ किया है॥ १६॥ प्रभो! हमलोगोंका क्या कर्तव्य है, उसके लिये आज्ञा दीजिये। मुने! छोटे भाईका यह दुराचार मुझसे कैसे सहा जायगा ?॥ १७॥ प्रभो! यह मौसीजीका प्रिय पुत्र है। इसपर मैं कैसे प्रहार कर सकता हूँ? अपने पुत्रके मेरे द्वारा मारे जानेपर पूजनीया मौसी यहाँ मुझपर क्रोध करेंगी '॥ १८ ॥ देवराजकी यह बात सुनकर कश्यप मुनिने कहा--' देवेन्द्र ! मैं अन्धकको

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 43

अहं किलेन्द्रो देवानां त्वं गवाम् इन्द्रतां गतः गोविन्द इति लोकास् त्वां स्तोष्यन्ति भुवि शाश्वतम्

ahaṃ kilendro devānāṃ tvaṃ gavām indratāṃ gataḥ govinda iti lokās tvāṃ stoṣyanti bhuvi śāśvatam

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर कश्यपजीने दितिके साथ जाकर वीर अन्धकको बड़ी कठिनाईसे त्रिभुवनविजयके उद्योगसे रोका उनके मना करनेपर भी वह दुष्टात्मा उन-उन उपायोंसे स्वर्गवासी देवताओंको मथकर सताता ही रहा उस दुर्बुद्धिने नन्दनवनके वृक्षों और उद्यानोंको उजाड़ डाला। उच्चै: श्रवांके वंशज अश्वोंको वह स्वर्गसे बलपूर्वक हाँक लाया॥ २२॥ भारत ! वरके घमंडमें भरा हुआ वह हैत्य देवताओंके देखते-देखते दिग्गजकी संतानभूत दिव्य हाथियोंको बलपूर्वक हर लाता था॥ २३॥ देवताओंके लिये कण्टकरूप वह दुष्टात्मा हैत्य जो लोग यज्ञ और तपस्याद्वारा देवताओंको पुष्ट करते थे, उनके उस अनुष्ठानमें विघ्न डाल देता था॥ २४॥ राजन्! तीनों वर्णोके लोग

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 44

ममोपरि यथेन्द्रस् त्वम् स्थापितो गोभिर् ईश्वरः उपेन्द्र इति कृष्ण त्वाम् गास्यन्ति दिवि देवताः

mamopari yathendras tvam sthāpito gobhir īśvaraḥ upendra iti kṛṣṇa tvām gāsyanti divi devatāḥ

हिन्दी अर्थ

यज्ञोंमें विघ्न डालनेवाले अन्धकासुरके भयसे न तो यज्ञ कर पाते थे और न तपस्या ही वायु उसकी इच्छाके अनुसार चलती थी। सूर्य चन्द्रमा वा सनक्षत्रो दृश्यते नेव वा पुनः ॥ २६ भी उसकी रुचिके अनुसार ही तपते थे तथा नक्षत्रोंसहित निरोड्ट्रारवषट्कारं जगद् वीर तथाभवत्। अन्धकस्यातिघोरस्य भयात् कुरुकुलोद्वह कुरूंस्तथोत्तरान् पापो द्राववामास भारत। भद्राश्वान् केतुमालां श्र जम्बूद्वीपांस्तथेव च

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 45

ये चेमे वार्षिका मासाश् चत्वारो विहिता मम एषाम् अर्धं प्रयच्छामि शरत्कालं तु पश्चिमम्

ye ceme vārṣikā māsāś catvāro vihitā mama eṣām ardhaṃ prayacchāmi śaratkālaṃ tu paścimam

हिन्दी अर्थ

मानयन्ति च तं देवा दानवाश्व दुरासदा:। भूतानि च तथान्यानि समर्थान्यपि सर्वथा ऋषयो वध्यमानास्तु समेता ब्रह्मवादिन:। अचिन्तयन्नन्धकस्य वध॑ धर्मभूतां वर विदितार्थों हि भगवानवश्यं जगतः प्रभु: । अश्रुप्रमार्जन॑ देव: करिष्यति सतां गतिः ब्रतं हि देवदेवस्थ भवस्य जगतो गुरोः। सन्तो5सदभ्यो रक्षितव्या ब्राह्मणास्तु विशेषत:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 46

वर्षार्धे च ध्वजो नित्यं ततः पूजाम् अवाप्स्यति ममाम्बुप्रभवं दर्पं तदा त्यक्ष्यन्ति बर्हिनः

varṣārdhe ca dhvajo nityaṃ tataḥ pūjām avāpsyati mamāmbuprabhavaṃ darpaṃ tadā tyakṣyanti barhinaḥ

हिन्दी अर्थ

तावद् ददृशुराकाशे प्राप्त देवर्षिसत्तमम् चन्द्रमा भी उसकी इच्छासे ही दीखते अथवा नहीं दीखते थे॥ २६॥ प्रभो! बलके घमंडमें भरे हुए खोटी बुद्धिवाले अत्यन्त घोर अन्धकासुरके भयसे आकाशमें विमान नहीं चलने पाते थे॥२७॥ कुरुकुल-धुरन्धर वीर! अत्यन्त भयानक अन्धकासुरके भयसे सारा जगत् 3»कार और वषट्कारकी ध्वनिसे शून्य हो गया भारत! वह पापी उत्तरकुरु, भद्राश्च, केतुमाल तथा जम्बूद्वीपके अन्य प्रदेशोंपप भी धावा बोला करता था॥ २९॥ दुर्जय देवता और दानव भी उसका सम्मान करते थे तथा अन्यान्य भूत सर्वथा समर्थ होनेपर भी उसका आदर करते थे॥ ३०॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश ! उसके द्वारा मारे और सताये जानेवाले ब्रह्मवादी ऋषि एकत्र हो अन्धकासुरके वधका उपाय सोचने लगे

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 47

अल्पवीर्यमदाश् चैव ये चान्ये मेघनादिनः शान्तिं सर्वे गमिष्यन्ति जलकालविचारिणः

alpavīryamadāś caiva ye cānye meghanādinaḥ śāntiṃ sarve gamiṣyanti jalakālavicāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

उन कऋषियोंमें बुद्धिमान् बृहस्पति भी थे। उन्होंने इस प्रकार कहा--'इस असुरकी मृत्यु रुद्रदेवके सिवा दूसरेके हाथसे किसी तरह नहीं हो सकती। दितिको वर देते समय महर्षि कश्यपने भी यह बात कह दी थी। मैं भगवान् रुद्रसे इसकी रक्षा नहीं कर सकता। यही बुद्धिमान् कश्यपजीका वचन है॥ ३२-३३॥ अतः हमलोग उस उपायपर विचार करें, जिससे दुष्टोंका संहार करनेवाले सनातनदेव भगवान् शझ्लूरको यह पता लग जाय कि अन्धकासुरके अत्याचारसे समस्त प्राणी पीड़ित हो रहे हैं॥३४॥ भगवान् रुद्रदेव इस जगत्के स्वामी और सत्पुरुषोंके आश्रय हैं। जब उन्हें इस बातका पता चल जायगा, तब वे अवश्य सबके आँसू पोंछेंगे (अन्धकासुरको मारकर जगत्का दुःख दूर कर देंगे) ॥ ३५॥ उन देवाधिदेव जगद्गुरु भगवान् शिवका यह ब्रत है कि दुष्टोंस साधु पुरुषोंकी, विशेषतः ब्राह्मणोंकी अवश्य रक्षा करनी चाहिए॥३६॥ अतः

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 48

त्रिशङ्क्वगस्त्यचरिताम् आशां च विचरिष्यति सहस्ररश्मिर् आदित्यस् तापयन् स्वेन तेजसा

triśaṅkvagastyacaritām āśāṃ ca vicariṣyati sahasraraśmir ādityas tāpayan svena tejasā

हिन्दी अर्थ

हम सब लोग नारद बाबाकी शरणमें चलें। वे ही इसका उपाय जानते होंगे; क्योंकि वे भगवान् शड्डूरके मित्र हैं'॥ ३७॥ बृहस्पतिजीकी बात सुनकर उन सभी तपोधनोंने जब आकाशमें दृष्टि डाली तो देखा देवर्षि- शिरोमणि नारद स्वयं आ पहुँचे हैं 'पूजयित्वा यथान्यायं सत्कृत्य विधिवन्मुनिम्। देवर्ष भगवन् साधो कैलासं ब्रज सत्वरम् विज्ञप्तुमहसे देवमन्धकस्य वधे हरम्। त्राणार्थ नारदं प्रोचुस्तांस्तथेति स चोक्तवान् ऋषिष्वथ प्रयातेषु तत्कार्य नारदो मुनिः। विचार्य मनसा विद्वानिति कार्य स दृष्टवान्

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 49

ततः शरदि युक्तानां मौनमूकेषु बर्हिषु यावत् सुखतरैस् तोयैर् विप्लुतेषु प्लुतेषु च

tataḥ śaradi yuktānāṃ maunamūkeṣu barhiṣu yāvat sukhatarais toyair vipluteṣu pluteṣu ca

हिन्दी अर्थ

स देवदेवं भगवान् द्रष्टुं मुनिरथाययौ। मन्दारवनमध्यस्थो यत्र नित्यो वृषध्वज: स॒तत्र रजनीमेकामुषित्वा मुनिसत्तम:। मन्दाराणां बने रम्ये दयित: शूलपाणिन: आययावन्धको यत्र दुरात्मा बलदर्पितः संतानकानां स्त्रडमालां महागन्धां महामुने। कुत्रायं पुष्पजातिर्वां कमनीया तपोधन

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 50

हंससारसपूर्णेषु नदीनां पुलिनेषु च ।मत्तक्रौञ्चप्रणादेषु मत्तेषु वृषभेषु च गोषु चैव प्रहृष्टासु क्षरन्तीषु पयो बहु

haṃsasārasapūrṇeṣu nadīnāṃ pulineṣu ca | mattakrauñcapraṇādeṣu matteṣu vṛṣabheṣu ca goṣu caiva prahṛṣṭāsu kṣarantīṣu payo bahu

हिन्दी अर्थ

आचक्ष्व यद्यनुग्राह्या वयं ते देवतातिथे तमुवाच मुनिश्रेष्ठ: प्रहसन्निव भारत। आदाय दक्षिणे हस्ते महतस्तपसो निधि: उन्होंने नारद मुनिका यथोचित रीतिसे पूजन और विधिवत् सत्कार करके कहा--'देवर्षे ! भगवन् साधो। आप शीघ्र कैलासपर्वतको चले जाइये और अन्धकासुरका वध करनेके लिये भगवान् शट्लडरको आवश्यक सूचना दीजिये। आप ही इस कार्यके योग्य हैं।' उन ऋषियोंने नारदजीसे कहा--आप जगत्की रक्षाके लिये प्रयत्शील हों।' तब नारदमुनिने 'तथास्तु' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। ऋषियोंके चले जानेपर उन विद्वान् मुनिने उस कार्यके विषयमें मन-ही-मन विचार करके यह देख और समझ लिया कि इस विषयमें अपनेको क्या करना है?॥ ३९--४१॥ तत्पश्चात् भगवान् नारद मुनि देवाधिदेव महादेवजीका दर्शन करनेके लिये उस

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 51

निवृत्तेषु च मेघेषु निर्यात्य जगतो जलम् आकाशे शस्त्रसंकाशे हंसेषु विचरत्सु च

nivṛtteṣu ca megheṣu niryātya jagato jalam ākāśe śastrasaṃkāśe haṃseṣu vicaratsu ca

हिन्दी अर्थ

स्थानपर आये, जहाँ नित्य भगवान् वृषध्वज मन्दारवनमें विराजमान होते हैं॥४२॥ भगवान् शूलपाणिके प्रिय सखा मुनिश्रेष्ठ नारद वहाँ मन्दारोंक उस रमणीय बनमें एक रात रहकर भगवान् शिवसे आज्ञा ले पुनः स्वर्गलोकको लौट आये। भरतनन्दन।! उन्होंने अपने गलेमें मन्दार- पुष्पोंद्दारा अच्छी तरह बनायी गयी और विशेष कलाके साथ गूँथी गयी माला धारण कर रखी थी, जिसकी सुगन्ध सभी श्रेष्ठ सुगन्धोंमें परम उत्तम थी। नरेश्वर! उन्होंने संतान-मालाकी लड़ियाँ भी गलेमें डाल रखी थीं, जो उन्हीं संतान-कुसुमोंसे बनी हुई थीं। उससे भी बड़ी सुगन्ध फैल रही थी। उन मालाओंको धारण करके वे उस स्थानपर आये, जहाँ बलके घमंडमें भरा हुआ दुरात्मा अन्धकासुर रहता था ॥ ४३--४६ ॥ अन्धकासुरने नारदजीको देखकर उस उत्तम सुगन्धका अनुभव करके महान् गन्धसे भरी हुई संतान-पुष्पोंकी मालापर भी दृष्टि डाली और पूछा--'महामुने! तपोधन! यह कमनीय

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 52

जातपद्मेषु तोयेषु वापीषु च सरित्सु च तडागेषु च कान्तेषु तोयेषु विमलेषु च ।कलमावनताग्रासु पक्वकेदारपङ्क्तिषु

jātapadmeṣu toyeṣu vāpīṣu ca saritsu ca taḍāgeṣu ca kānteṣu toyeṣu vimaleṣu ca | kalamāvanatāgrāsu pakvakedārapaṅktiṣu

हिन्दी अर्थ

पुष्पोंकी जाति कहाँ उपलब्ध होती है ?॥ ४७॥ अजी ! यह तो बारम्बार अपने सुन्दर वर्णों और मनोहर गन्धोंकी पुष्टि कर रही है। स्वर्गमें जो संतानपुष्प उपलब्ध होते हैं, उनसे तो ये पुष्प सर्वथा बढ़-चढ़कर हैं ॥ ४८ ॥ मुने ! है? क्‍या यह पुष्प वहाँसे लाया जा सकता है? यदि मैं आपका कृपापात्र होऊँ तो आप मुझे इसका पता बताइये ' ॥ ४९॥ भरतनन्दन! तब महान् तपकी निधि मुनिश्रेष्ठ नारदने अन्धकासुरका दाहिना हाथ पकड़कर हँसते हुए-से कहा-- मन्दरे पर्वतश्रेष्ठे वीर कामगम वनम्। तत्र चेवंविध॑ पुष्पं भो: सृष्टि: शूलपाणिन: अवध्या: सर्वभूतानां महादेवाभिरक्षिता:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 53

मध्यस्थं सलिलारम्भं कुर्वन्तीषु नदीषु च ससस्यायां च सीमायां मनोहर्यां मुनेर् अपि

madhyasthaṃ salilārambhaṃ kurvantīṣu nadīṣu ca sasasyāyāṃ ca sīmāyāṃ manoharyāṃ muner api

हिन्दी अर्थ

काइश्षितानि फलन्ति सम ते द्रमा हरवललभा: तरुभ्यः स्त्रवते तेभ्यो विविध॑ मनसेप्सितम् अतीव हि जयेल्लोकान् समहेद्धान् न संशय: । एकाहमपि यस्तत्र वसेच्य दितिजोत्तम चलनेवाला वन है। उसीमें इस तरहके फूल हैं। अजी ! वह वन साक्षात् शूलपाणि भगवान् शड्डूरकी सृष्टि है

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 54

पृथिव्यां पृथुराष्ट्रायां रमायां वर्षसंक्षये श्रामत्सु पङ्क्तिमार्गेषु फलवत्सु तृणेषु च इक्षुमत्सु च देशेषु प्रवृत्तेषु मखेषु च

pṛthivyāṃ pṛthurāṣṭrāyāṃ ramāyāṃ varṣasaṃkṣaye śrāmatsu paṅktimārgeṣu phalavatsu tṛṇeṣu ca ikṣumatsu ca deśeṣu pravṛtteṣu makheṣu ca

हिन्दी अर्थ

वहाँ उस वनमें महात्मा शिवजीकी इच्छाके बिना कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि उनके श्रेष्ठ पार्षद उसकी रक्षा करते हैं ॥ ५२॥ वे नाना प्रकारके वेष धारण किये भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र लिये रहते हैं। उनका स्वरूप बड़ा भयंकर है तथा उनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। महादेवजीसे सुरक्षित होनेके कारण वे सभी प्राणियोंके लिये अवध्य हैं॥ ५३॥ वहाँ मन्दार-वक्षोंके बगीचोंमें उमासहित सर्वात्मा सर्वभावन महादेवजी नित्य क्रीड़ा करते और अपने पार्षदोंके साथ रहते हैं कश्यपकुमार! विशेष तपस्याके द्वारा तीनों लोकोंके स्वामी भगवान् शिवकी आराधना करके ही ये मन्दारपुष्प प्राप्त किये जा सकते हैं॥५५॥ वे सभी वृक्ष भगवान् शह्डरके प्रिय हैं और स्त्रीरत्न, मणिरत्न तथा अन्य जो- जो अभिलषित पदार्थ हैं, उन सबको वे फलरूपसे प्रस्तुत करते हैं॥५६॥ अतुल पराक्रमी हैत्य! वहाँ मन्दारवनमें न तो सूर्य तपते हैं और न चन्द्रमा ही प्रकाश करते हैं। मन्दार-वृक्षोंसे भरा हुआ वह वन स्वयं अपनी ही प्रभासे

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 55

ततः प्रवर्त्स्यते पुण्या शरत्सुप्तोत्थिते त्वयि लोके ऽस्मिन् कृष्ण निखिले यथैव त्रिदिवे तथा

tataḥ pravartsyate puṇyā śaratsuptotthite tvayi loke 'smin kṛṣṇa nikhile yathaiva tridive tathā

हिन्दी अर्थ

प्रकाशित होता है। वहाँ दुःख-शोकका प्रवेश नहीं है महाबली अन्धक ! वहाँ कुछ वृक्ष ऐसे हैं, जो उत्तम सुगन्ध उत्पन्न करते हैं, दूसरे विशाल वृक्ष जल प्रकट करते हैं तथा अन्य वृक्ष नाना प्रकारके सुगन्धित वस्त्र प्रदान करते हैं॥५८॥ इतना ही नहीं, उन वृक्षोंसे भाँति-भाँतिके पदार्थ प्राप्त होते हैं ॥ ५९ ॥ निष्पाप वीर! तुम यह समझ लो कि उस मन्दारवनमें भूख-प्यास, ग्लानि अथवा चिन्ता भी नहीं फटकने पाती है॥६०॥ वहाँ स्वर्गसे कई गुने उत्तम जो गुण दिनोंदिन बढ़ते हैं, उनका सैकड़ों वर्षोमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता। हैत्यप्रवर ! जो वहाँ एक दिन भी निवास कर लेगा, वह महेन्द्रसहित सम्पूर्ण लोकोंपर अतिशय विजय प्राप्त कर लेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ ६१-६२ ॥ वह स्वर्गका भी स्वर्ग और समस्त सुखोंका

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 56

नरास् त्वां चैव मां चैव ध्वजाकारासु यष्टिषु महेन्द्रश् चाप्य् उपेन्द्रश् च महीयेतां महीतले

narās tvāṃ caiva māṃ caiva dhvajākārāsu yaṣṭiṣu mahendraś cāpy upendraś ca mahīyetāṃ mahītale

हिन्दी अर्थ

भी सुख है। मेरे मनका तो ऐसा विश्वास है कि वही सम्पूर्ण जगत्का सर्वस्व-सार है' इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अन्धकवधे षडशीतितमो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अन्धकवधविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ मन्दराचलपर गये हुए अन्धकासुरका महादेवजीद्वारा वध अन्धको नारदवच: श्रुत्वा तत्त्वेन भारत। मन्दरं पर्वत गन्तुं मनो दश्ले महासुर:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 57

ये चावयोः स्थिता वृत्ते महेन्द्रोपेन्द्रसंज्ञिते मानवाः प्रणमिष्यन्ति तेषां नास्त्य् अनयागमः

ye cāvayoḥ sthitā vṛtte mahendropendrasaṃjñite mānavāḥ praṇamiṣyanti teṣāṃ nāsty anayāgamaḥ

हिन्दी अर्थ

जगाम मन्दरं क्रुद्धो महादेवालयं तदा नानासिद्धसमाकीर्ण महर्षिगणसेवितम् हंस: शुचिपदेः कीर्ण सम्पतद्धिरितस्तत: मृगराजसमाकीर्ण मृगवृन्दनिषेवितम् । स मन्दरं गिरिं प्राह रूपिणं बलदर्पित:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 58

स्वर्गलोकादयानीय मणिपीठं सुराधिपः ।निवेश्य कृष्णं रत्नैः प्राङ्+ +मुक्ताद्यैर् अभिषेचयत् ।कृत्वा नीराजनं दिव्यैर् अलंकृत्य च भूषणैः ।ततः शक्रस् तु तान् गृह्य घटान् दिव्यपयोधरान् अभिषेकेण गोविन्दं योजयामास योगवित्

svargalokādayānīya maṇipīṭhaṃ surādhipaḥ | niveśya kṛṣṇaṃ ratnaiḥ prāṅ+ +muktādyair abhiṣecayat | kṛtvā nīrājanaṃ divyair alaṃkṛtya ca bhūṣaṇaiḥ | tataḥ śakras tu tān gṛhya ghaṭān divyapayodharān abhiṣekeṇa govindaṃ yojayāmāsa yogavit

हिन्दी अर्थ

मम चैव वशे सर्व त्रैलोक्यं सचराचरम् सर्वकामप्रदेः पुष्पैर्भूषितं रत्नमुत्तमम् वैशम्पायनजी कहते हैं-- भारत ! नारदजीकी बातको ठीकसे सुनकर महान् असुर अन्धकने मन्दराचलपर जानेका विचार किया॥ १॥ वह महातेजस्वी, महाबली हैत्य बहुत-से असुरोंको एकत्र करके कुपित हो उस समय महादेवजीके निवासस्थान मन्दरपर्वतपर गया वह पर्वत बड़े-बड़े मेघोंसे आच्छादित, महौषधियोंसे सम्पन्न, नाना प्रकारके सिद्धोंसे भरा हुआ और महर्षियोंके समुदायसे सेवित था॥ ३॥ वहाँ सब ओर चन्दन और अगुरुके वृक्ष शोभा पाते थे। सरल (चीड़)-के वृक्ष

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 59

दृष्ट्वा तम् अभिषिच्यन्तं गावस् ताः सह यूथपैः स्तनैः प्रस्नवसंयुक्तैः सिषिचुः कृष्णम् अव्ययम्

dṛṣṭvā tam abhiṣicyantaṃ gāvas tāḥ saha yūthapaiḥ stanaiḥ prasnavasaṃyuktaiḥ siṣicuḥ kṛṣṇam avyayam

हिन्दी अर्थ

सर्वत्र फैले हुए थे। किन्नरोंके उच्च स्वरसे गाये जानेवाले मधुर गीतोंसे उसकी रमणीयता बढ़ गयी थी। वह बहुत- से नागकुलों (हाथियों अथवा सर्पों)-से व्याप्त था कहीं वायुके वेगसे कम्पित हुए प्रफुल्ल काननोंद्वारा वह नृत्य करता-सा जान पड़ता था। कहीं पिघलकर बहे हुए विचित्र धातुओंके कारण वह चन्दन आदिसे चचित हुआ-सा प्रतीत होता था॥५॥ कहीं पक्षियोंके अत्यन्त मधुर शब्दोंसे वह पर्वत गरजता या कोलाहल करता-सा जान पड़ता था। पवित्र स्थानोंपर बैठनेवाले हंस वहाँ इधर-उधर उड़ते-फिरते थे; जिनसे सारा पर्वत व्याप्त प्रतीत होता था॥ ६॥ वहाँ हैत्योंका विनाश करनेमें समर्थ महाबली भेंसे विचरण करते थे। चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल कान्तिवाले सिंह उस पर्वतकी शोभा बढ़ाते थे। वह समस्त शैल सुवर्णकी राशिरूप था॥७॥ वहाँ बहुत-से मृगराज (सिंह) सब ओर बिखरे हुए थे। झुंड-

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 60

मेघाश् च दिवि मुक्ताभिः सामृताभिः समन्ततः सिषिचुस् तोयधाराभिर् अभिषिच्यन्तम् अव्ययम्

meghāś ca divi muktābhiḥ sāmṛtābhiḥ samantataḥ siṣicus toyadhārābhir abhiṣicyantam avyayam

हिन्दी अर्थ

के-झुंड मृग उस पर्वतका सेवन करते थे। वह मन्दरपर्वत हुआ। उसे देखकर बलके घमंडमें भरे हुए अन्धकासुरने कहा-- ॥ ८ ॥ “महागिरे! यह तो तुम जानते ही होगे कि मैं किस प्रकार अपने पिताके वरदानसे सबके लिये अवध्य हूँ। चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी इस समय मेरे वशमें है। कोई भी भयके कारण मुझसे युद्ध करना नहीं चाहता। मुझे पता लगा है कि तुम्हारे शिखर- पर सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले पुष्पोंसे विभूषित एक पारिजात वन है, जो यहाँका उत्तम रत्र है' कि करिष्यसि ऋद्धस्त्वं मनो हि त्वरते मम ततोन्धको5तिरुषितो वरदानेन दर्पितः। मुमोच नादं॑ सुमहदिदं वचनमन्रवीतू

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 61

वनस्पतीनां सर्वेषां सुस्रावेन्दुनिभं पयः ववर्षुः पुष्पवर्षं च नेदुस् तूर्याणि चाम्बरे

vanaspatīnāṃ sarveṣāṃ susrāvendunibhaṃ payaḥ vavarṣuḥ puṣpavarṣaṃ ca nedus tūryāṇi cāmbare

हिन्दी अर्थ

मया वै त्वं याच्यमानो यस्मान्न बहु मन्यसे। अहं चूर्णीकरोमि त्वां बल॑ पर्वत पश्य मे विदित्वा भगवान् रुद्रश्चकारानुग्रह गिरे:। सविशेषतरं वीर मत्तद्विपमृगायुतम् नदीजालैर्बहुतरैराचितं.. चित्रकाननम्। नभश्च्युतेः पुरा यद्वत् तद्ददेव विराजते अथ देवप्रभावेण श्रृट्ठाण्युत्पाटितानि तु। क्षिप्तानि चासुरानेव घ्नन्ति घोराणि भारत

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 62

स्तुवन्ति मुनयः सर्वे वाग्भिर् मन्त्रपरायणाः वसिष्ठो वामदेवश् च जाबालिर् अथ काश्यपः ।विश्वामित्रो भरद्वाजः कण्वो ऽत्रिर् भगवान् प्रभुः ।एते च मुनयः सर्वे सिद्धाश् च परमर्षयः ।एकार्णवविमुक्तं च दधार वसुधा वपुः

stuvanti munayaḥ sarve vāgbhir mantraparāyaṇāḥ vasiṣṭho vāmadevaś ca jābālir atha kāśyapaḥ | viśvāmitro bharadvājaḥ kaṇvo 'trir bhagavān prabhuḥ | ete ca munayaḥ sarve siddhāś ca paramarṣayaḥ | ekārṇavavimuktaṃ ca dadhāra vasudhā vapuḥ

हिन्दी अर्थ

ततो5न्धकस्तदा दृष्टा सेनां तां मर्दितां तथा। रुषितः सुमहानादं नर्दित्वैव॑ं तदाब्रवीत् एवमुक्ते त्वन्थकेन वृषभेण महेश्वरः। सम्प्राप्त: शूलमुद्यम्य देवो उन्धकजिघांसया “वह कहाँ है, उसे बताओ? मैं तुम्हारे शिखरपर उत्पन्न हुए उस वनका उपभोग करूँगा। मेरा मन उसमें जानेके लिये उतावला हो उठा है। तुम कुपित होकर मेरा क्या कर लोगे ? मुझे ऐसा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता, जो मेरे द्वारा पीड़ित होनेपर तुम्हारी निश्चितरूपसे रक्षा कर सके।' उसके ऐसा कहनेपर मन्दराचलका वह अधिष्ठाता देव वहीं अन्तर्धान हो गया॥ ११-१२॥ तब वरदानसे घमंडमें भरा हुआ अन्धक अत्यन्त रुष्ट हो बड़े जोरसे सिंहनाद करने लगा और इस प्रकार बोला-- “अरे पर्वत! मेरे याचना करनेपर भी जो तू मुझे अधिक सम्मान नहीं दे रहा है, इससे कुपित होकर मैं तुझे अभी

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 63

प्रसादं सागरा जग्मुर् ववुर् वाता जगद्धिताः ईतयः प्रशमं जग्मुर् जग्मुर् निर्वैरतां नृपाः

prasādaṃ sāgarā jagmur vavur vātā jagaddhitāḥ ītayaḥ praśamaṃ jagmur jagmur nirvairatāṃ nṛpāḥ

हिन्दी अर्थ

कहकर वरदानसे दर्पमें भरे हुए उस पराक्रमी हैत्यने उन सब असुरोंके साथ मन्दराचलके एक शिखरको, जो अनेक योजन विस्तृत था, उखाड़ लिया और उसे उसी पर्वतके दूसरे शिखरोंपर पटककर पीस डाला। उस महान् पर्वतने अपनी नदियोंके समुदायको भी छिपा लिया। उसकी परिस्थितिको समझकर भगवान् रुद्रने उस पर्वतपर अनुग्रह किया। वीर! भगवान्के अनुग्रहसे पारिजात आदि विशेषतर वनोंसे युक्त, मतवाले हाथियों और मृगोंसे सम्पन्न तथा आकाशसे गिरे हुए बहुसंख्यक नदी समूहोंसे व्याप्त वह विचित्र काननोंवाला पर्वत जैसा पहले था, उसी रूपमें प्रकाशित होने लगा॥ १५--१८ ॥ भरतनन्दन ! उन महादेवजीके प्रभावसे असुरोंद्वारा उखाड़कर फेंके गये उसके घोर शिखर उन असुरोंको ही मार डालते थे॥ १९ ॥ जनेश्वर ! जो महान् असुर मन्दराचलके शिखरोंको फेंककर भागते थे, वे उन्हीं शिखरोंद्वारा मारे जाते थे॥ २० ॥ जो असुर वहाँ पर्वत-शिखरोंपर स्वस्थभावसे खड़े थे, वे महागिरि

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 64

कृष्णे ऽभिषित एतानि सर्वाणि कुरुनन्दन ।निर्वैराण्यभवंस् तात क्रूराण्य् अपि निसर्गतः ।मार्गस्थो विबभौ भानुः सोमो योगेन संगतः प्रवालपुष्पशबलाः फलवन्तश् च पादपाः

kṛṣṇe 'bhiṣita etāni sarvāṇi kurunandana | nirvairāṇyabhavaṃs tāta krūrāṇy api nisargataḥ | mārgastho vibabhau bhānuḥ somo yogena saṃgataḥ pravālapuṣpaśabalāḥ phalavantaś ca pādapāḥ

हिन्दी अर्थ

मन्दरके उन शिखरोंद्वारा नहीं मारे जाते थे॥ २१॥ तब अन्धकने अपनी उस सेनाको कुचली गयी देख उस समय रोषपूर्वक महान् सिंहनाद करके इस प्रकार कहा-- ॥ २२॥ “अचल! तेरे साथ युद्ध करनेसे क्‍या लाभ ? तूने रणभूमिमें हैत्योंकोी छलसे मारा है। अब मैं उस पुरुषको ललकारता हूँ, जिसका यह वन है। वह युद्धके लिये मेरे सामने उपस्थित हो '॥ २३॥ अन्धका- सुरके ऐसा कहनेपर उसे मार डालनेकी इच्छासे भगवान् महे श्वरदेव त्रिशूल उठाये अपने वृषभके द्वारा वहाँ आ पहुँचे ॥ २४॥ भूतगणोंके स्वामी बुद्धिमान् भगवान् त्रिलोचन प्रमथगणों तथा भूत-समूहोंसे घिरे हुए थे प्रचकम्पे ततः कृत्ख्न॑ त्रैलोक्यं रुषिते हरे। सिन्धवश्च प्रतिस्त्रोतमूहु: प्रजजलितोदका: चेलुश्व गिरयस्तत्र काले कुरुकुलोद्वह। प्रववर्षाथ पर्जन्य: सधूमाडुगरवृष्टय:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 65

मदं प्रसुस्रुवुर् नागा यातास् तोषं वने मृगाः अलंकृता गात्ररुहैर् वातुभिर् भान्ति पर्वताः

madaṃ prasusruvur nāgā yātās toṣaṃ vane mṛgāḥ alaṃkṛtā gātraruhair vātubhir bhānti parvatāḥ

हिन्दी अर्थ

न ब्रह्म विविदुस्तत्र मुनयो ब्रह्मवादिन: विपरीतं जगद् दृष्ठा महादेवस्तथागतम्। मुमोच भगवाज्छूलं प्रदीप्ताग्रिसमप्रभम् ततू पपात हरोत्सृष्टमन्थकोरसि दुर्द्धरम्। भस्मसाच्चाकरोद् रौद्रमन्धक॑ साधुकण्टकम् ततो देवगणाः सर्वे मुनयश्च॒ तपोधना:। शंकरं तुष्ठवुक्षेव जगच्छत्रौ निबर्हिते

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 66

देवलोकोपमो लोकस् तृप्तो ऽमृतसुतर्पितः आसीत् कृष्णाभिषेके हि दिव्यस्वर्गरसोक्षितः

devalokopamo lokas tṛpto 'mṛtasutarpitaḥ āsīt kṛṣṇābhiṣeke hi divyasvargarasokṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टि: पपात ह। त्रैलोक्यं निर्व॒तं चासीन्नरेन्द्र विगतज्वरम् प्रजगुर्देवगन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणा: जेपुश्च ब्राह्मणा वेदानीजुश्च क्रतुभिस्तदा न जज्वाल जले वह्निराशाः सर्वाः प्रसेदिरि रेमे सोमश्न भगवान् पारिजातवने हरः। सुप्रचारान् सुरान् कृत्वा शक्रादीन् धर्मतः प्रभु; भगवान् शड्डूरके रुष्ट होनेपर सारी त्रिलोकी काँप उठी। नदियाँ अपने प्रवाहके विपरीत उद्मस्थानकी ओर बहने लगीं। उनका जल खौल उठा॥ २६॥ जनेश्वर! महादेवजीके तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंमें अग्नरिदाह फैल

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 67

अभिषिक्तं तु तं गोभिः शक्रो गोविन्दम् अव्ययम् दिव्यशुक्लाम्बरधरम् देवराजो ऽब्रवीद् इदम्

abhiṣiktaṃ tu taṃ gobhiḥ śakro govindam avyayam divyaśuklāmbaradharam devarājo 'bravīd idam

हिन्दी अर्थ

गये और समस्त ग्रह विपरीत होकर परस्पर जूझने लगे और उनके ऊपर मेघ धूमयुक्त अज्भारोंकी वर्षा करने लगे॥ २८॥ चन्द्रमाकी शीतल किरणें गरम हो गयीं। सूर्यकी प्रभा ठंडी पड़ गयी। ब्रह्मवादी मुनियोंका सारा ब्रह्मज्षान भूल गया॥ २९॥ निष्पाप नरेश्वर! घोड़ियोंके पेटसे गायके बछड़े पैदा होने लगे और गौएँ घोड़ोंको जन्म देने लगीं। पृथ्वीपर बिना काटे ही बहुत-से वृक्ष भस्म होकर गिर पड़े॥ ३० ॥ साँड़ गौओंको सताने लगे। पिशाच--ये सब-के-सब (प्राणियोंको कष्ट देने लगे)

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 68

एष मे प्रथमः कृष्ण नियोगो गोषु यः कृतः श्रूयतामपरं चापि ममागमनकारणम्

eṣa me prathamaḥ kṛṣṇa niyogo goṣu yaḥ kṛtaḥ śrūyatāmaparaṃ cāpi mamāgamanakāraṇam

हिन्दी अर्थ

संसारकी इस प्रकार विपरीत अवस्था देख भगवान् शट्डरने प्रज्जलित अग्निके समान तेजस्वी अपना त्रिशूल छोड़ा ॥ ३२॥ भगवान् शट्ढजूरका छोड़ा हुआ वह दुःसह अस्त्र अन्धकासुरकी छातीपर गिरा। उसने साधुओंके लिये कण्टकरूप भयंकर अन्धकासुरको जलाकर भस्म कर दिया॥ ३३ ॥ तदनन्तर समस्त देवगण और तपोधन मुनि जगत्के शत्रु अन्धकासुरके मारे जानेपर भगवान् शड्डूरकी स्तुति करने लगे॥ ३४॥ नरेन्द्र! देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और तीनों लोकोंके प्राणियोंने निश्चित्त होकर संतोषकी साँस ली॥ ३५॥ उस समय देवगन्धर्व गाने और अप्सराएँ नाचने लगीं। ब्राह्मणलोग वेदोंका जप, स्वाध्याय तथा यज्ञोंका अनुष्ठान करने लगे॥ ३६॥ ग्रह स्वाभाविक स्थितिमें आ गये। नदियाँ पहलेके समान बहने लगीं। जलमें आगका जलना बंद हो गया और सारी दिशाएँ प्रसन्न हो गयीं ॥ ३७॥ पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचल अपने सम्पूर्ण तेजकी वृद्धि होनेके कारण परम शोभासे सम्पन्न हो पुनः पूर्ववत् प्रकाशित होने लगा॥ ३८ ॥ सबके प्रभु उमासहित भगवान् शट्डूर इन्द्र आदि देवताओंको धर्मतः सर्वत्र घूमने-फिरने योग्य बनाकर पारिजातवनमें विहार करने लगे

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 69

क्षिप्रं संसाध्यतां कंसः केशी च तुरगाधमः अरिष्टश् च मदाविष्टो राजराज्यं ततः कुरु

kṣipraṃ saṃsādhyatāṃ kaṃsaḥ keśī ca turagādhamaḥ ariṣṭaś ca madāviṣṭo rājarājyaṃ tataḥ kuru

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वण अन्धकवथे सप्ताशीतितमो5ध्याय: इस प्रकार श्रीयहाभारतके खिलभाय हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अन्धकवधविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ पिण्डारकतीर्थके अन्तर्गत समुद्रमें श्रीकृष्ण तथा अन्य यादवोंका जलविहार शान्तिस्त्रयाणां लोकानां कृता देवेन धीमता

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 70

पितृष्वसरि जातस् ते ममांशो ऽहम् इव स्थितः स ते रक्ष्यश् च मान्यश् च सख्ये च विनियुज्यताम्

pitṛṣvasari jātas te mamāṃśo 'ham iva sthitaḥ sa te rakṣyaś ca mānyaś ca sakhye ca viniyujyatām

हिन्दी अर्थ

चरितं लोकनाथस्य हरेरमिततेजसः समुद्रयात्रा सम्प्राप्ता तीर्थे पिण्डारके नृप उग्रसेनो नरपतिर्वसुदेवश्ष भारत। निक्षिप्ती नगराध्यक्षौ शेषा: सर्वे विनिर्गता: पृथग्बल: पृथग्धीमाँल्लोकनाथो जनार्दन:। गोष्ठयः पृथक्कुमाराणां नृदेवामिततेजसाम् गणिकानां सहस्त्राणि नि:ःसृतानि नराधिप।

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 71

त्वया ह्य् अनुगृहीतः स तव वृत्तानुवर्तकः त्वद्वशे वर्तमानः स प्राप्स्यते विपुलं यशः

tvayā hy anugṛhītaḥ sa tava vṛttānuvartakaḥ tvadvaśe vartamānaḥ sa prāpsyate vipulaṃ yaśaḥ

हिन्दी अर्थ

हैत्याधिवासं निर्जित्य यदुभिर्दृढविक्रमै:। वेश्या निवेशिता वीर द्वारवत्यां सहस्त्रश: स्थितिरिषा हि भमानां कृता कृष्णेन धीमता। स्त्रीनिमित्तं भवेद वैरं मा यदूनामिति प्रभो चअक्रवाकानुरागेण यदुश्रेष्ठ: प्रतापवान् जनमेजय बोले--मुने! अन्धकवधका प्रसंग अवश्य सुनने योग्य है। मैंने उसे अच्छी तरह सुना है। अन्धकासुरका वध करके बुद्धिमान् महादेवजीने तीनों लोकोंमें शान्ति फैला दी॥१॥ अब मैं यह जानना

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 72

भारतस्य च वंशस्य स वरिष्ठो धनुर्धरः भविष्यत्य् अनुरूपश् च त्वाम् ऋते न च रंस्यते

bhāratasya ca vaṃśasya sa variṣṭho dhanurdharaḥ bhaviṣyaty anurūpaś ca tvām ṛte na ca raṃsyate

हिन्दी अर्थ

चाहता हूँ कि चक्रपाणि भगवान् श्रीकृष्णने निकुम्भके दूसरे शरीरका किसलिये और किस प्रकार वध किया था। आप उसे बतानेकी कृपा करें वैशम्पायनजी कहते हैं--निष्पाप राजेन्द्र! तुम श्रद्धालु हो; इसलिये तुमसे अमित तेजस्वी जगन्नाथ श्रीहरिके चरित्रका वर्णन करना उचित है॥ ३॥ नरेथर ! एक समयकी बात है, द्वारकामें रहते समय अतुल तेजस्वी श्रीकृष्णको पिण्डारकतीर्थमें समुद्रयात्राका अवसर प्राप्त हुआ॥ ४॥ भरतनन्दन ! राजा उग्रसेन तथा बसुदेव-- इन दोनोंको नगरका अध्यक्ष बनाकर द्वारकापुरीमें ही छोड़ दिया गया। शेष सब लोग यात्राके लिये निकले नरदेव! बलरामजी अपने परिवारके साथ अलग थे, सम्पूर्ण जगत॒के स्वामी बुद्धिमान् भगवान् जनार्दनका दल अलग था तथा अमित तेजस्वी कुमारोंकी मण्डलियाँ भी अलग-अलग थीं॥ ६ ॥ नरेश्वर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत तथा रूप-सौन्दर्यसे सम्पन्न वृष्णिवंशी कुमारोंके साथ सहस्रों गणिकाएँ भी यात्राके लिये निकलीं ॥ ७॥ वीर! सुदृढ़ पराक्रमी यादववीरोंने हैत्योंके निवास-स्थान समुद्रको जीतकर वहाँ द्वारकापुरीमें सहस्नों वेश्याओंको

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 73

भारतं त्वयि चासक्तं तस्मिंश् च पुरुषोत्तमे उभाभ्याम् अपि संयोगे यास्यन्ति निधनं नृपाः

bhārataṃ tvayi cāsaktaṃ tasmiṃś ca puruṣottame ubhābhyām api saṃyoge yāsyanti nidhanaṃ nṛpāḥ

हिन्दी अर्थ

बसा दिया था॥८॥ विविध वेश धारण करनेवाली वे युवतियाँ महामनस्वी यादवकुमारोंके लिये सामान्य क्रीड़ानारियाँ थीं। वे अपने गुणोंद्वार सभी कुमारोंकी इच्छाके अनुसार उनके उपभोगमें आनेवाली थीं। राजकुमारोंकी उपभोग्या होनेके कारण वे राजन्या कहलाती थीं॥ ९॥ प्रभो! बुद्धिमान् श्रीकृष्णने भीमवंशी यादवोंके लिये ऐसी व्यवस्था कर दी थी, जिससे यादवोंमें स्त्रीके कारण परस्पर वैर न हो ॥ १० ॥ प्रतापी यदुश्रेष्ठ बलरामजी सदा अपने अनुकूल रहनेवाली एकमात्र रेवतीदेवीके साथ चकवा-चकवीके समान परस्पर अनुरागपूर्वक रमण करते थे कादम्बरीपानकलो भूषितो वनमालया। चिक्रीड सागरजले रेवत्या सहितो बल:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 74

प्रतिज्ञातं च मे कृष्ण ऋषिमध्ये सुरेषु च मम पुत्रो ऽर्जुनो नाम जातः कुन्त्यां कुरूद्वहः

pratijñātaṃ ca me kṛṣṇa ṛṣimadhye sureṣu ca mama putro 'rjuno nāma jātaḥ kuntyāṃ kurūdvahaḥ

हिन्दी अर्थ

अहमिष्टा मया सार्द्ध जले वसति केशव: । इति ता मेनिरे सर्वा रात्रौ नारायणस्त्रियः करजद्विजचिह्लानि कुचाधरगतानि ताः। दृष्ठा दृष्ठा जहषिरे दर्पणे कमलेक्षणा: गोत्रमुद्दिश्य कृष्णस्य जगिरे कृष्णयोषित: । पिबन्त्य इव कृष्णस्य नयनैर्वदनाम्बुजम् कृष्णार्पितमनोदूष्य: कान्‍्ता नारायणस्त्रिय: । मनोहरतरा राजन्नभवन्नेकनिश्चया: एकार्पितमनोदूष्ठधो नेष्ष्या ताश्नक्रिरेउड्रना: । नारायणेन देवेन तर्प्पमाणमनोरथा:

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²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 75

सो ऽस्त्राणां पारतन्त्रज्ञः श्रेष्ठश् चापविकर्षणे तं प्रवेक्ष्यन्ति वै सर्वे राजानः शस्त्रयोधिनः

so 'strāṇāṃ pāratantrajñaḥ śreṣṭhaś cāpavikarṣaṇe taṃ pravekṣyanti vai sarve rājānaḥ śastrayodhinaḥ

हिन्दी अर्थ

वाल्लभ्यं केशवमयं वहन्त्यश्लारुदर्शना: तोयं विलवणं मृष्टे वासुदेवस्थ शासनात् नार्यस्ता: स्तनद॒घ्न॑ वा जल॑ समभिकाइक्षितम् वे कादम्बरी (मधु)-का पान करके मस्त रहते थे। वनमालासे विभूषित हुए बलराम वहाँ रेवतीके साथ समुद्रजलमें क्रीडा करने लगे॥१२॥ सबके द्रष्टा कमलनयन गोविन्द सर्वरूपसे अर्थात् जितनी स्त्रियाँ थीं,

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²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 76

अक्षौहिण्यश् च शूराणां राज्ञां संग्रामशालिनाम् समरे राजधर्मेण योजयिष्यन्ति मृत्युना

akṣauhiṇyaś ca śūrāṇāṃ rājñāṃ saṃgrāmaśālinām samare rājadharmeṇa yojayiṣyanti mṛtyunā

हिन्दी अर्थ

उतने ही रूप धारण करके जलमें अपनी सोलह हजार स्त्रियोंको रमाते थे॥१३॥ उस रातमें नारायणस्वरूप श्रीकृष्णकी वे सारी रानियाँ यही मानती थीं कि मैं ही इन्हें अधिक प्रिय हूँ; अत: केशव मेरे ही साथ जलमें विहार कर रहे हैं॥ १४॥ सभीके अज्जोंमें सुरतके चिह्न थे। सभी सुरत-सुखका अनुभव करके तृप्त हो गयी थीं; अतः वे सब-की-सब गोविन्दके प्रति बहुमानजनित सम्मानका भाव धारण करती थीं॥ १५॥ श्रीकृष्णकी वे सभी सुन्दरी रानियाँ अपने स्नेही परिजनोंके समीप प्रसन्नतापूर्वक अपने भाग्यकी सराहना करती हुई कहती थीं कि मैं ही अपने प्राणनाथको अधिक प्रिय हूँ। मैं दर्पणमें अपने कुचोंपर श्रीकृष्णके नखक्षत और अधरोंपर दन्तक्षतके चिह्न देख-देखकर हर्षमें भर जाती थीं श्रीकृष्णकी वे सुन्दरी पत्नियाँ उनके नाम ले-लेकर गीत गातीं और अपने नेत्रपुटोंसे उनके मुखारविन्दका रस पान करती थीं॥ १८ ॥ राजन्! उनके मन और नेत्र श्रीकृष्णमें ही लगे रहते थे। नारायणकी वे कमनीय भार्याएँ अत्यन्त

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²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 77

तस्यास्त्रचरितं मार्गं धनुषो लाघवेन च नानुयास्यन्ति राजानो देवा वा त्वां विना प्रभो

tasyāstracaritaṃ mārgaṃ dhanuṣo lāghavena ca nānuyāsyanti rājāno devā vā tvāṃ vinā prabho

हिन्दी अर्थ

नारायणदेव उनके सारे मनोरथ पूर्ण करके उन्हें तृत्त रखते थे; अत: वे अड़नाएँ एकको ही अपना हृदय और दृष्टि अर्पित करके भी आपसमें कभी ईर्ष्या नहीं करती मनोहर दिखायी देनेवाली) सुन्दरियाँ केशवकी वल्लभा होनेका अथवा केशवको प्राणबल्लभके रूपमें प्राप्त करनेका सौभाग्य वहन करती हुई अपने सिरको बड़े गर्वसे ऊँचा किये रहती थीं॥२१॥ अपने मनको वशमें रखनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण समुद्रके निर्मल जलमें पूर्वोक्त विश्वरूप विधिसे उन सबके साथ क्रौड़ा करते थे॥ २२॥ भगवान् वासुदेवके शासनसे उस समय महासागर समस्त सुगन्धोंसे करता था॥ २३॥ समुद्रका वह जल कहीं घुट्टदीभर था

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अध्याय ६२

श्लोक 78

स ते बन्धुः सहायश् च संग्रामेषु भविष्यति तस्य योगो विधातव्यस् त्वया गोविन्द मत्कृते

sa te bandhuḥ sahāyaś ca saṃgrāmeṣu bhaviṣyati tasya yogo vidhātavyas tvayā govinda matkṛte

हिन्दी अर्थ

उन नारियोंको इतना ही जल अभीष्ट था सिधिचु: केशवं पत्यो धारा इव महोदधिम्। सिषेच ताश्च गोविन्दो मेघ: फुछलता इब कश्रित् कराष््रमयैस्तेरु: प्लवै: सर्वाड्रशोभना:। क्रौक्चबर्हिणनागानामाकारसदूशै: स्त्रिय: मकराकृतिभिश्चान्या मीनाभेरपि चापरा:। येनैव कार्ययोगेन रमते5मरसत्तम:

English

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अध्याय ६२

श्लोक 79

द्रष्टव्यः स यथाहं वै त्वया मान्यश् च नित्यशः ज्ञाता त्वम् एव लोकानाम् अर्जुनस्य च नित्यशः

draṣṭavyaḥ sa yathāhaṃ vai tvayā mānyaś ca nityaśaḥ jñātā tvam eva lokānām arjunasya ca nityaśaḥ

हिन्दी अर्थ

तत् तदेव हि ताश्चक्रुर्मुदा नारायणस्त्रिय: । चिक्रीडुर्वासुदेवस्य जले जलजलोचना: यस्या यस्यास्तु यो भावस्तां तां तेनेव केशव: । अनृप्रविश्य भावज्ञों निनायात्मवशं वशी हषीकेशो5पि भगवान् हषीकेश: सनातन: । बभूव देशकालेन कान्तावशगत: प्रभु:

English

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अध्याय ६२

श्लोक 80

त्वया हि नित्यं रक्ष्यः स आहवेषु महत्सु च रक्षितस्य त्वया तस्य न मृत्युः प्रभविष्यति

tvayā hi nityaṃ rakṣyaḥ sa āhaveṣu mahatsu ca rakṣitasya tvayā tasya na mṛtyuḥ prabhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

कृष्णं भार्याश्चकमिरे भक्त्या च बहु मेनिरे पृथग्गोष्ठयः कुमाराणां प्रकाशं स्त्रीगणै: सह। अलंचक्रुर्जलं वीरा: सागरस्य गुणाकरा: श्रीकृष्णकी वे रानियाँ उनपर सब ओरसे जल उलीचने लगीं, जैसे नदियोंकी अनेक धाराएँ महासागरको सींचती हैं। भगवान् गोविन्द भी उनपर जल छिड़कने हो॥ २५॥ कितनी ही मृगनयनी नारियाँ श्रीहरिके कण्ठमें अपनी बाँहें डालकर कहने लगीं--'बीर! मुझे हृदयसे लगा लो, अपनी भुजाओंमें कस लो; अन्यथा मैं जलमें क्रौद्ध, मोर तथा नागोंके आकारमें बनी हुई काठकी नौकाओंद्वार जलपर तैरने लगीं॥ २७॥ दूसरी-दूसरी स्त्रियाँ मगर, मत्स्य तथा अन्यान्य विविध प्राणियोंकी आकृति धारण करनेवाली नौकाओंद्वारा तैरने लगीं।

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 81

अर्जुनं विद्धि मां कृष्ण मां चैवात्मानम् आत्मना आत्मा ते ऽहं यथा शश्वत् तथैव तव सो ऽर्जुन

arjunaṃ viddhi māṃ kṛṣṇa māṃ caivātmānam ātmanā ātmā te 'haṃ yathā śaśvat tathaiva tava so 'rjuna

हिन्दी अर्थ

कितनी ही रानियाँ समुद्रके रमणीय जलनमें श्रीकृष्णको हर्ष प्रदान करती हुई घटोंके समान अपने स्तनकुम्भोंद्वारा तैर रही थीं॥२८-२९॥ अमरशिरोमणि श्रीकृष्ण उस जलमें आनन्दपूर्वक महारानी रुक्मिणीके साथ रमण करते थे। वे जिस-जिस कार्य या उपायसे आनन्द मानते, उनकी वे सुन्दरी स्त्रियाँ प्रशंसापूर्वक वही-वही कार्य या उपाय करती थीं। महीन वस्त्रोंसे ढकी हुई दूसरी तन्वड्री एवं कमलनयनी स्त्रियाँ भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करती हुई जलमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ा करती थीं॥३०-३१॥ जिस-जिस रानीके मनमें जो-जो भाव था, सबके भावोंको जानने और मनको वशमें रखनेवाले श्रीकृष्ण उसी-उसी भावसे उस स्त्रीके अन्तरमें प्रवेश करके उसे अपने वशमें कर लेते थे॥ ३२॥ इन्द्रियोंके प्रेक और सबके स्वामी होकर भी सनातन भगवान् हृषीकेश देश-कालके अनुसार अपनी प्रेयसी पत्नियोंक वशमें हो गये थे॥३३॥ वे

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 82

त्वया लोकान् इमाञ् जित्वा बलेर् हस्तात् त्रिभिः क्रमैः देवतानां कृतो राजा पुरा ज्येष्ठक्रमाद् अहम्

tvayā lokān imāñ jitvā baler hastāt tribhiḥ kramaiḥ devatānāṃ kṛto rājā purā jyeṣṭhakramād aham

हिन्दी अर्थ

समस्त वनिताएँ अपने कुलके अनुरूप बर्ताव करनेवाले जनार्दनको ऐसा समझती थीं कि ये कुल और शीलमें समान होनेके कारण हमारे ही योग्य हैं॥ ३४ ॥ मुसकराकर बात करनेवाले तथा औदार्य-गुणसे सम्पन्न उन प्राणवल्लभ श्रीकृष्मको उस समय उनकी वे पत्नियाँ हृदयसे चाहने लगीं तथा भक्ति एवं अनुरागके कारण उनका बहुत सम्मान करने लगीं॥३५॥ यादवकुमारोंकी गोष्टियाँ अलग थीं। वे वीर यादवकुमार उत्तम गुणोंकी खान थे और प्रकाशरूपसे स्त्रीसमुदायोंक साथ समुद्रके जलकी शोभा बढ़ा रहे थे पञ्जञचूडां ततः कृष्ण: कौबेर्यश्व वराप्सरा:। माहेन्द्रीश्रानयामास विश्वरूपेण हेतुना एवं कृते विधास्यामि श्रेयो वो मनसेप्सितम्। मच्छरीरसमा होते सर्वे निरवशेषतः

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 83

त्वां च सत्यमयं ज्ञात्वा सत्येष्टं सत्यविक्रमम् सत्येनोपेत्य देवा वै योजयन्ति रिपुक्षये

tvāṃ ca satyamayaṃ jñātvā satyeṣṭaṃ satyavikramam satyenopetya devā vai yojayanti ripukṣaye

हिन्दी अर्थ

कटाक्षैरिड्रितैर्हास्यै: केलिरोषै: प्रसादितेः । मनो5नुकूलै्भंमानां समाजहुर्मनांसि ताः उद्ष्षिप्योत्षिप्प चाकाशं वातस्कश्धान् बहूंश्॒ तान्। मदिरावशगा भेमा मानयन्ति वराप्सरा: जनेश्वर! वे स्त्रियाँ गीत और नृत्यकी क्रियाको जाननेवाली थीं तथा उन कुमारोंके तेजसे स्वयं ही उनकी ओर आदकृष्ट हुई थीं तो भी वे कुमार उदारताके कारण उनके वशमें स्थित थे॥ ३७॥ उन उत्तम नारियोंके मनोहर गीत और वाद्य सुनते तथा उनके सुन्दर अभिनय देखते हुए वे यदुपुड्भववीर उनपर लट्टू हो रहे थे॥ ३८॥ तदनन्तर श्रीकृष्णने विश्वरूप होनेके कारण स्वयं ही प्रेरणा देकर पश्नचूड़ा नामवाली अप्सराको

English

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अध्याय ६२

श्लोक 84

सो ऽर्जुनो नाम मे पुत्रः पितुस् ते भगिनीसुतः इह सौहृदतां यातु भूत्वा सहचरः पुरा

so 'rjuno nāma me putraḥ pitus te bhaginīsutaḥ iha sauhṛdatāṃ yātu bhūtvā sahacaraḥ purā

हिन्दी अर्थ

तथा कुबेरभवन और इन्द्रभवनकी भी सुन्दरी अप्सराओंको वहाँ बुला मँगाया॥ ३९ ॥ अप्रमेयस्वरूप जगदीश्वर श्रीकृष्णने हाथ जोड़कर चरणोंमें पड़ी हुई उन अप्सराओंको उठाया और सान्त्वना देकर कहा--॥४०॥ “सुन्दरियो! तुम निःशड्ड होकर भीमवंशी यादवकुमारोंकी क्रीडायुवतियोंमें प्रविष्ट हो जाओ और मेरा प्रिय करनेके लिये इन यादवोंको सुख पहुँचाओ॥ ४१॥ नाच, गान, एकान्त- परिचर्या, अभिनय-योग तथा नाना प्रकारके बाजे बजानेकी कलामें तुमलोगोंके पास जितने गुण हों, उन सबको दिखाओ॥ ४२॥ ऐसा करनेपर मैं तुम्हें मनोवाज्छित कल्याण प्रदान करूँगा; क्योंकि ये सब-के-सब यादव मेरे शरीरके ही समान हैं '॥ ४३॥ उस समय श्रीहरिकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके वे सब श्रेष्ठ अप्सराएँ यादवकुमारोंकी क्रीडा-युवतियोंमें सम्मिलित हो गयीं निष्पाप नरेश! उनके प्रवेश करते ही वह महासागर दिव्य प्रभासे उद्दीपत हो उठा। ठीक उसी तरह, जैसे आकाशमें मेघोंका समुदाय बिजलियोंके चमकनेसे प्रकाशित हो उठता है॥४५॥ वे दिव्य अड्भनाएँ जलमें भी

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 85

तस्य ते युध्यतः कृष्ण स्वस्थाने ऽथ गृहे ऽपि वा वोढव्या पुंगवेनेव धूः सर्वा रणवाहिनी

tasya te yudhyataḥ kṛṣṇa svasthāne 'tha gṛhe 'pi vā voḍhavyā puṃgaveneva dhūḥ sarvā raṇavāhinī

हिन्दी अर्थ

स्थलकी ही भाँति खड़ी हो स्वर्गलोककी ही भाँति गीत गाने, बाजे बजाने तथा सुन्दर अभिनय करने माल्य तथा वस्त्रोंसे सुशोभित हो अपनी विविध लीलाओं तथा हास्ययुक्त हाव-भावोंसे यादवकुमारोंके चित्त चुराने लगीं ॥ ४७॥ कटाक्षों, संकेतों, क्रीडाजनित रोषों तथा प्रसन्नतासूचक मनो5नुकूल भावोंके द्वारा वे भीमवंशियोंके मन मोहने लगीं॥ ४८ ॥ वे अप्सराएँ उन यादवकुमारोंको ऊपर-ऊपर आकाशमें प्रवह आदि वायुके मार्गोमें ले जाकर उनके साथ विहार करती थीं, अतः वे मदमत्त हुए भीमवंशीकुमार उन सुन्दरी अप्सराओंका बड़ा कृष्णो5पि तेषां प्रीत्यर्थ विजह्डे वियति प्रभु: । सर्वे: षोडशभि: सार्द्ध स्त्रीसहस्त्र्मुदान्वित:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 86

कंसे विनिहते कृष्ण त्वया भाव्यर्थदर्शिना अभितस् तन् महद्युद्धं भविष्यति महीक्षिताम्

kaṃse vinihate kṛṣṇa tvayā bhāvyarthadarśinā abhitas tan mahadyuddhaṃ bhaviṣyati mahīkṣitām

हिन्दी अर्थ

प्रभावज्ञास्तु ते वीरा: कृष्णस्यामिततेजसः । नजम्मुर्विस्मयं भैमा गाम्भीर्य परमास्थिता: केचिद् रैवतकं गत्वा पुनरायान्ति भारत। गुहान्यन्ये वनान्यन्ये काड्क्षितान्यरिमर्दन आज्ञया लोकनाथस्य विष्णोरतुलतेजसः बहुप्रकारं मनसा ध्याते तेषां भवत्युत रहःसु रमयांचक्रुः स्वर्गे देवरतानुगा:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 87

तत्र तेषां नृवीराणाम् अतिमानुषकर्मणाम् विजयस्यार्जुनो भोक्ता यशसा त्वं तु योक्ष्यसे

tatra teṣāṃ nṛvīrāṇām atimānuṣakarmaṇām vijayasyārjuno bhoktā yaśasā tvaṃ tu yokṣyase

हिन्दी अर्थ

नौभिर्गृहप्रकाराभिश्चिक्रीडुरपराजिता: । स््रातानुलिप्तमुदिता: सायाह्वेन्‍्धकवृष्णय: आयताश्चतुरस्त्राश्न वृत्ताश्न स्वस्तिकास्तथा। प्रासादा नौषु कौरव्य विहिता विश्वकर्मणा आक्रीडगरुडच्छन्दाश्लित्रा: कनकरीतिभि: । ऋद्नच्छन्दा: शुकच्छन्दा गजच्छन्दास्तथापरे भगवान् श्रीकृष्ण भी उन यादवोंकी प्रसन्नताके लिये आकाशमें स्थित हो अपनी सोलह हजार स्त्रियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वकत विहार करते थे॥५०॥ वे वीर यादव अमित तेजस्वी श्रीकृष्णका प्रभाव जानते थे; अतः

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 88

एतन् मे कृष्ण कार्त्स्न्येन कर्तुम् अर्हसि भाषितम् यद्य् अहं ते सुराश् चैव सत्यं च प्रियम् अच्युत

etan me kṛṣṇa kārtsnyena kartum arhasi bhāṣitam yady ahaṃ te surāś caiva satyaṃ ca priyam acyuta

हिन्दी अर्थ

आकाशमें क्रीडा करनेके कारण उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ। वे उस दशामें भी अत्यन्त गम्भीर बने रहे शत्रुमर्दन! भरतनन्दन ! कुछ यादव रैवतक पर्वतपर जाकर फिर लौट आते थे। दूसरे घरोंमें जाकर आ जाते तथा अन्य लोग अभिलषित बनोंमें घृूम-फिर्कर लौटते थे उस समय अतुल तेजस्वी लोकनाथ भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) -की आज्ञासे अपेय समुद्रका जल भी पीनेयोग्य होती, तब जलमें भी स्थलकी भाँति दौड़ती थीं और जब चाहतीं परस्पर हाथ पकड़कर एक साथ ही गोता लगा लेती थीं॥ ५४॥ यादवोंके मनसे चिन्तन करते ही उनके लिये नाना प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्य नहीं थी, ऐसी माला धारण करनेवाली वे दिव्य अप्सराएँ स्वर्गमें देवताओंके साथ की गयी रतिक्रीडाका अनुसरण करती हुई उन श्रेष्ठ यादवकुमारोंको एकान्तमें रमणका अवसर देती थीं॥५६॥ किसीसे पराजित न होनेवाले

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 89

शक्रस्य वचनं श्रुत्वा कृष्णो गोविन्दतां गतः प्रीतेन मनसा युक्तः प्रतिवाक्यं जगाद ह

śakrasya vacanaṃ śrutvā kṛṣṇo govindatāṃ gataḥ prītena manasā yuktaḥ prativākyaṃ jagāda ha

हिन्दी अर्थ

अन्धक और वृष्णिवंशके वीर सायंकालमें स्नानके पश्चात् अनुलेपन धारण करके आनन्दमग्र हो गृहाकार बनी हुई नौकाओंद्वारा क्रीडा करने लगे॥ ५७॥ कुरुनन्दन विश्वकर्मानि नौकाओंमें अनेक प्रकारके महल बनाये थे, जिनमेंसे कुछ लम्बे थे और कुछ चौकोर कुछ गोलाकार थे और कुछ स्वस्तिकाकार ॥ ५८॥ वे महल कैलास, मन्दराचल और मेरुपर्वतकी भाँति इच्छानुसार रूप धारण कर लेते थे। कई नाना प्रकारके पक्षियों और ईहामृगों (भेड़ियों)- के समान रूप धारण करनेवाले थे॥ ५९ ॥ उनमें वैदूर्यमणिके तोरण लगे थे, जिनसे उन महलोंकी विचित्र शोभा होती थी। वे विचित्र मणिमय शय्याओंसे सुसज्जित थे। मरकत, चन्द्रकान्त और सूर्यकान्तमणिमय विचित्र रागोंसे वे रञ्लित थे तथा नाना प्रकारके सैकड़ों आस्तरण (बिस्तर) उनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ६० ॥ खेलके लिये बनाये गये गरुड़के समान भी उन भवनोंकी आकृति थी। वे विचित्र भवन सुवर्णकी धाराओंसे शोभा पाते थे। कोई क्रौद्धके समान,

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 90

प्रीतो ऽस्मि दर्शनाद् एव तव शक्र शचीपते यत् त्वयाभिहितं चेदं न किंचित् परिहास्यते

prīto 'smi darśanād eva tava śakra śacīpate yat tvayābhihitaṃ cedaṃ na kiṃcit parihāsyate

हिन्दी अर्थ

कोई तोतेके तुल्य और कितने ही भवन हाथियोंकी-सी आकृति धारण करते थे कर्णधारैर्गुहीतास्ता नाव: कार्तस्वरोज्चला: । सलिलंशोभयामासु: सागरस्य महोरमिमत् नौभिश्व झिल्किकाभिश्च शुशुभे वरुणालय: पुराण्याकाशगानीव गन्धर्वाणामितस्ततः। बश्रमु:ः सागरजले भेमयानानि सर्वतः नन्दनप्रतिमं॑ सर्व विहितं॑ विश्वकर्मणा

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 91

जानामि भवतो भावं जानाम्य् अर्जुनसंभवम् जाने पितृष्वसा दत्ता पाण्डोर् वसुमतीपतेः

jānāmi bhavato bhāvaṃ jānāmy arjunasaṃbhavam jāne pitṛṣvasā dattā pāṇḍor vasumatīpateḥ

हिन्दी अर्थ

उद्यानानि सभावक्षा दीर्घिकाः स्यन्दनानि च। निवेशितानि शिल्पानि तादृशान्येव सर्वथा नारायणाज्ञया वीर विहिता विश्वकर्मणा देवलोकोद्धवा: श्वेता विलेपु: कोकिलास्तदा। मधुराणि विचित्राणि यदूनां काड्क्षितानि च पताका यानपात्राणां सर्वा: पक्षिगणायुता: । भ्रमररुपगीताश्च॒ स्त्रग्दामासक्तवासिभि:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 92

युधिष्ठिरं च जानामि कुमारं धर्मनिर्मितम् भीमसेनं च जानामि वायोः संतानजां तनुम्

yudhiṣṭhiraṃ ca jānāmi kumāraṃ dharmanirmitam bhīmasenaṃ ca jānāmi vāyoḥ saṃtānajāṃ tanum

हिन्दी अर्थ

वासुदेवप्रसादेन भेमानां क्रीडतां तदा सुवर्णसे प्रकाशित होनेवाली वे नौकाएँ कर्णधारोंके नियन्त्रणमें रहकर उत्ताल तरंगोंसे युक्त सागरकी जलराशिको सुशोभित कर रही थीं ॥ ६२ ॥ सफेद जलपोतों, यात्रोपयोगी बड़ी-बड़ी नावों, वेगवती नौकाओं और महल आदिसे युक्त विशाल जहाजोंसे उस वरुणालय (समुद्र )-की बड़ी शोभा हो रही थी॥६३॥ यादवोंके वे जलयान समुद्रके जलमें सब ओर चक्कर लगा रहे थे। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो गन्धवोंके नगर आकाशमें विचर रहे हों भारत ! नन्दनवनकी आकृति और समृद्धियोंसे युक्त यानपात्रोंमें विश्वकर्माने सब कुछ नन्दन-जैसा ही बना दिया था शिल्प सर्वथा वैसे ही उनमें समाविष्ट किये गये थे

English

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अध्याय ६२

श्लोक 93

नागायुतसमप्राणम् अनेकासुरमर्दनम् ।अश्विभ्यां साधु जानामि सृष्टं पुत्रद्वयं शुभम् नकुलं सहदेवं च माद्र्याः कुक्षिभवाव् उभौ

nāgāyutasamaprāṇam anekāsuramardanam | aśvibhyāṃ sādhu jānāmi sṛṣṭaṃ putradvayaṃ śubham nakulaṃ sahadevaṃ ca mādryāḥ kukṣibhavāv ubhau

हिन्दी अर्थ

वीर! स्वर्ग-जैसे बने हुए दूसरे जलयानोंमें विश्वकर्माने भगवान् नारायणकी आज्ञासे स्वर्गकी-सी सारी वस्तुएँ संक्षेपसे रच दी थीं॥ ६७॥ वहाँके वनोंमें पक्षी हृदयको प्रिय लगनेवाली मधुर बोली बोलते थे। उनकी वह बोली उन अत्यन्त तेजस्वी यादवोंको बहुत ही मनोहर प्रतीत होती थी॥६८॥ देवलोकमें उत्पन्न हुए सफेद कोकिल उस समय यादववीरोंकी इच्छाके अनुसार विचित्र एवं मधुर आलाप छेड़ रहे थे॥६९॥ चन्द्रमाकी किरणोंके समान रूपवाली श्रेत अद्टालिकाओंपर मीठी बोली बोलनेवाले मोर दूसरे मोरोंसे घिरकर नृत्य करते थे॥ ७० ॥ विशाल जलयानोंपर लगी हुई सारी पताकाओंपर पक्षियोंके समुदाय बैठे थे। उनमें जो पुष्पमालाओंकी लड़ियाँ बँधी थीं, उनपर आसक्त होकर रहनेवाले भ्रमर वहाँ गुज्लारव फैला रहे थे॥ ७१ ॥ नारायण (श्रीकृष्ण)-की आज्ञासे वृक्ष तथा ऋतुएँ आकाशमें स्थित हो मनोहर रूपवाले पुष्पोंकी अधिक वर्षा करने लगीं॥ ७२॥ रतिजनित खेद अथवा श्रमको

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 94

कानीनं चापि जानामि सवितुः प्रथमं सुतम् पितृष्वसरि कर्णं वै प्रसूतं सूततां गतम्

kānīnaṃ cāpi jānāmi savituḥ prathamaṃ sutam pitṛṣvasari karṇaṃ vai prasūtaṃ sūtatāṃ gatam

हिन्दी अर्थ

जो सब प्रकारके फूलोंके परागसे संयुक्त तथा चन्दनकी शीतलताको धारण करनेवाली थी॥७३॥ पृथ्वीपते! क्रीड़ामें तत्पर होकर सर्दी-गर्मीकी इच्छा रखनेवाले यादवोंको उस समय वहाँ भगवान् वासुदेवकी कृपासे वह सब उनकी रुचिके अनुकूल प्राप्त होती थी ॥ ७४ ॥ भगवान् चक्रपाणिके प्रभावसे उस समय उन भीम-वंशियोंके भीतर न तो भूख-प्यास, न ग्लानि, न चिन्ता और न शोकका ही प्रवेश होता था॥७५॥ अत्यन्त तेजस्वी यादवोंकी समुद्रके जलमें होनेवाली वे क्रीड़ाएँ निरन्तर चल रही थीं। उनमें बड़े-बड़े वाद्योंकी ध्वनि शान्त नहीं होती थी तथा गीत और नृत्य उनकी शोभा बढ़ा रहे थे एकोननवतितमो5ध्याय:ः रुद्धा चिक्रीडुरिद्राभा भेमा: कृष्णाभिरक्षिता:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 95

धार्तराष्ट्राश् च मे सर्वे विदिता युद्धकाङ्क्षिणः दुर्योधनमुखाः शक्र कौरवाणां महाबलाः ।पाण्डोर् उपरमं चैव शापाशनिनिपातजम्

dhārtarāṣṭrāś ca me sarve viditā yuddhakāṅkṣiṇaḥ duryodhanamukhāḥ śakra kauravāṇāṃ mahābalāḥ | pāṇḍor uparamaṃ caiva śāpāśaninipātajam

हिन्दी अर्थ

नारायणस्य देवस्य विहितं विश्वकर्मणा रलानि यानि त्रैलोक्ये विशिष्टानि विशाम्पते। कृष्णस्यतानिसर्वाणियानपात्रेडतितेजस: पृथक्पृथड्ननिवासाश्च स्त्रीणां कृष्णस्य भारत। मणिवैडूर्यचित्रास्ता: कार्तस्वरविभूषिता: सर्वर्तुकुसुमाकीर्णा: सर्वगन्धाधिवासिता: । यदुसिंहैः शुभेर्जुष्टा: शकुनै: स्वर्गवासिभि:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 96

तद् गच्छ त्रिदिवं शक्र सुखाय त्रिदिवौकसाम् नार्जुनस्य रिपुः कश्चिन् ममाग्रे प्रभविष्यति

tad gaccha tridivaṃ śakra sukhāya tridivaukasām nārjunasya ripuḥ kaścin mamāgre prabhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी यादव अनेक योजन विस्तृत समुद्रके जलाशयको रोककर क्रीड़ा कर रहे थे॥७७॥ विश्वकर्माने महात्मा भगवान् नारायणदेवके लिये उनके विशाल परिवार (सोलह हजार रानियोंके समुदाय)-के अनुरूप ही जहाज बना रखा था॥ ७८ ॥ प्रजानाथ ! तीनों लोकोंमें जो विशिष्ट रत्र थे, वे सभी अत्यन्त तेजस्वी श्रीकृष्णके उस यानपात्रमें लगे थे॥ ७९॥ भारत! श्रीकृष्णकी स्त्रियोंके लिये उसमें पृथक्-पृथक् निवासस्थान बने थे, जो मणि और वैदूर्यसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभासे सम्पन्न तथा सुवर्णसे विभूषित थे॥ ८० ॥ उन गृहोंमें सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले फूल लगाये गये थे। वहाँ सभी तरहके उत्तम सुगन्ध 'फैलकर उन भवनोंको सुवासित कर रहे थे। श्रेष्ठ यादव-वीर तथा स्वर्गवासी पक्षी उन निवासस्थानोंका सेवन करते थे इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वण भानुमतीहरणे अष्टाशीतितमो5ध्याय:

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 97

अर्जुनार्थे च तान् सर्वान् पाण्डवान् अक्षतान् युधि कुन्त्या निर्यातयिष्यामि निवृत्ते भारते मृधे

arjunārthe ca tān sarvān pāṇḍavān akṣatān yudhi kuntyā niryātayiṣyāmi nivṛtte bhārate mṛdhe

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें भावुमतीहरणविषयक अट्डासीवाँ अध्याय पूरा हुआ एकोननवतितमो5ध्यायः बलराम और श्रीकृष्ण आदि यादवोंकी जलक्रीड़ा एवं गान आदिका वर्णन कादम्बरीपानकलः पृथुश्री:।

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 98

यच् च वक्ष्यति मां शक्र तनूजस् तव सो ऽर्जुनः भृत्यवत् तत् करिष्यामि तव स्नेहेन यन्त्रितः

yac ca vakṣyati māṃ śakra tanūjas tava so 'rjunaḥ bhṛtyavat tat kariṣyāmi tava snehena yantritaḥ

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्णबिम्बो भगवानिवेन्दु: वामैककर्णामलकुण्डल श्री: वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! बलरामजी अपने अड्ोंमें चन्दरसे चर्चित थे। मधु पीकर वे बड़े मनोहर लग रहे थे। उनकी शोभा बहुत बढ़ी हुई थी। रेबतीदेवीका सहारा लेकर सुललित गतिसे चल रहे थे॥ १॥ उन्होंने श्याम मेघके समान कान्तिवाले दो नील वस्त्र धारण कर रखे थे। उनकी अड्जगकान्ति चन्द्रमाकी किरणोंके समान गौर थी और मधुमाती आँखें अलसायी- सी जान पड़ती थीं। समुद्रके बीचमें आकर भगवान् बलरामजी सम्पूर्ण विम्बवाले चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे॥ २॥ उनके एकमात्र बायें कानमें निर्मल कुण्डलकी शोभा फैल रही थी। उन्होंने दूसरे कानमें मनोहर कमलको

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

अध्याय ६२

श्लोक 99

सत्यसंधस्य तच् छ्रुत्वा प्रियं प्रीतस्य भाषितम् प्रणम्य देवदेवस्य मूर्ध्ना शक्रः पदाम्बुजम् ।कृष्णस्य साक्षात् त्रिदिवं जगाम त्रिदशेश्वरः

satyasaṃdhasya tac chrutvā priyaṃ prītasya bhāṣitam praṇamya devadevasya mūrdhnā śakraḥ padāmbujam | kṛṣṇasya sākṣāt tridivaṃ jagāma tridaśeśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

ही कर्णभूषणके रूपमें धारण कर रखा था। उनको प्रिया रेवती मन्द मुसकान और बाँकी चितवनके साथ उनकी ओर सुखपूर्वक निहार रही थीं तथा बलरामजी उनके चक्करुस्तथेव्राभिनयेन रड्ढं संकर्षणाधोक्षजनन्दनानि संकीर्तयन्त्यो5थ च मड्भलानि। तथारिष्टकधेनुकाभ्यां

English

²⁷⁶ The seven calamities are gambling, sleeping in a day, calumny, whoring, playing, idle roaming, drinking and hunting.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 62
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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