अध्याय १०
श्लोक 1
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्र्यां संहितायां पूर्वविभागे नवमो ऽध्यायः श्रीकूर्म उवाच गते महेश्वरे देवे स्वाधिवासं पितामहः ।तदेव सुमहत् पद्मं भेजे नाभिसमुत्थितम्
iti śrīkūrmapurāṇe ṣaṭsāhastryāṃ saṃhitāyāṃ pūrvavibhāge navamo 'dhyāyaḥ śrīkūrma uvāca gate maheśvare deve svādhivāsaṃ pitāmahaḥ / tadeva sumahat padmaṃ bheje nābhisamutthitam
हिन्दी अर्थ
रहित विविध भूतोंसे घिरे हुए आपको नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेवको नमस्कार है । ब्रह्माधिपतिके लिये नमस्कार है । त्रिलोचन परमेष्ठी देवको नमस्कार है ॥ ४७--४९ ॥ दिगम्बर! आपको नमस्कार है। मुण्ड (की माला) एवं दण्ड धारण करनेवालेको नमस्कार है। अनादि तथा मलरहित (शुद्धरूप), ज्ञानगम्य आपको नमस्कार हैं। तारक एवं तीर्थरूप तथा योगविभूतियोंके मूल
English
He assumed the refulgent form of the divine Boar for sports within the waters. It was unthwartable, even mentally.