अध्याय ६४
श्लोक 1
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवादिसृष्टिकथनं नाम त्रिषष्टितमो ऽध्यायः कथं हि रक्षसा शक्तिर् भक्षितः सो ऽनुजैः सह वासिष्ठो वदतां श्रेष्ठ सूत वक्तुमिहार्हसि
iti śrīliṅgamahāpurāṇe pūrvabhāge devādisṛṣṭikathanaṃ nāma triṣaṣṭitamo 'dhyāyaḥ kathaṃ hi rakṣasā śaktir bhakṣitaḥ so 'nujaiḥ saha vāsiṣṭho vadatāṃ śreṣṭha sūta vaktumihārhasi
हिन्दी अर्थ
रुधिरकी गन्धवाले वे राजर्षि इधर-उधर भागने लगे। नगरवासियोंने उनका परित्याग कर दिया और उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिल सकी। जब दुःखसे संतप्त उनको कहीं भी ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका, तब वे व्यथित होकर शौनक ऋषिकी शरणमें गये। उदार बुद्धिवाले वे मुनि इन्द्रेति नामसे विख्यात थे। है श्रेष्ठ द्विजो! इन्द्रेतिने उन राजा जनमेजयको पवित्र करनेके लिये उनसे अशवमेधयज्ञका यजन कराया॥ ७०--७६ ॥
English
O Suta, O best sjieakcr, it behoves you to recount how Sakti the son of Vasistha was devoured by a demon along with