Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
18
अध्याय 18 / 90

Adhyaya 18

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अध्याय १८

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेपुराणे पितापुत्रसंवादे दत्तात्रेयोत्पत्तिर्नाम सप्तदशो ऽध्यायः अष्टादशो ऽध्यायः पुत्र उवाच कस्यचित्त्वथ कालस्य कृतवीर्यात्मजोर्ऽजुनः ।कृतवीर्ये दिवं याते मन्त्रिभिः सपुरोहितैः

iti śrīmārkaṇḍepurāṇe pitāputrasaṃvāde dattātreyotpattirnāma saptadaśo 'dhyāyaḥ aṣṭādaśo 'dhyāyaḥ putra uvāca kasyacittvatha kālasya kṛtavīryātmajor'junaḥ / kṛtavīrye divaṃ yāte mantribhiḥ sapurohitaiḥ

हिन्दी अर्थ

अड्से हीन न हो, जिसकी नासिका सुन्दर हो तथा जो सभी उत्तम लक्षणोंसे सुशोभित हो, वैसी ही कनन्‍्याके साथ कल्याणकामी पुरुषको विवाह करना चाहिए। पुरुषको उचित है कि स्त्रीकी रक्षा करे, दिनमें शयन और मैथुन न करे। दूसरोंको कष्ट देनेवाला कार्य न करे, किसी जीवको पीड़ा न दे। रजस्वला स्त्री

English

His two sons and the king’s son respectfully attended tin

अध्याय १८

श्लोक 2

पौरैश्चात्माभिषेकार्थं समाहूतो ऽब्रवीदिदम् ।नाहं राज्यं करिष्यामि मन्त्रिणो नरकोत्तरम्

pauraiścātmābhiṣekārthaṃ samāhūto 'bravīdidam / nāhaṃ rājyaṃ kariṣyāmi mantriṇo narakottaram

हिन्दी अर्थ

चार रातोंतक सभी वर्णके पुरुषोंके लिये त्याज्य है। यदि कनन्‍्याका जन्म रोकना हो तो पाँचवीं रातमें भी स्त्री-सहवास न करे। छठी रात आनेपर स्त्रीके पास जाय; क्योंकि युग्म रात्रियाँ ही इसके लिये श्रेष्ठ हैं। युग्म रात्रियोंमें स्त्री-लहवाससे पुत्रका जन्म होता है और अयुग्म रात्रियोंमें गर्भाधान करनेसे कन्या उत्पन्न होती

English

high souled king of the N6gas, after he had banquetted. Tin high-souled Ndga manifested kindly regard towards his sod^

अध्याय १८

श्लोक 3

यदर्थं गृह्यते शुल्कं तदनिष्पादयन् वृथा ।पण्यानां द्वादशं भागं भूपालाय वणिग्जनः

yadarthaṃ gṛhyate śulkaṃ tadaniṣpādayan vṛthā / paṇyānāṃ dvādaśaṃ bhāgaṃ bhūpālāya vaṇigjanaḥ

हिन्दी अर्थ

है; अतः पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुरुष युग्म रात्रियोंमें ही सत्रीके साथ शयन करे। पूर्वाह्निमें मैथुन करनेसे विधर्मी और सन्ध्याकालमें करनेसे नपुंसक पुत्र उत्पन्न होता है।

English

friend with suitable conversation, and said, " Declare, Stfi what pleasure I must do thoe who hast entered my koun*'

अध्याय १८

श्लोक 4

दत्त्वार्थरक्षिभिर्मार्गे रक्षितो याति दस्युतः ।गोपाश्च घृततक्रादेः षड्भागञ्च कृषीबलाः

dattvārtharakṣibhirmārge rakṣito yāti dasyutaḥ / gopāśca ghṛtatakrādeḥ ṣaḍbhāgañca kṛṣībalāḥ

हिन्दी अर्थ

बेटा! हजामत बनवाने, वमन होने, स्त्री-प्रसक़ करने तथा श्मशानभूमिमें जानेपर वस्त्रसहित स्नान करे। देवता, वेद, द्विज, साधु, सच्चे महात्मा, गुरु, पतिव्रता, यज्ञकर्ता और तपस्वी--इनकी निनन्‍्दा अथवा परिहास न करे। यदि कोई उद्ण्ड मनुष्य ऐसा करता हो तो उसकी बात सुने भी नहीं। अपनेसे श्रेष्ठ

English

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अध्याय १८

श्लोक 5

दत्त्वान्यद्भूभुजे दद्युर्यदि भागं ततो ऽधिकम् ।पण्यादीनामशेषाणां वणिजो गृह्णतस्ततः

dattvānyadbhūbhuje dadyuryadi bhāgaṃ tato 'dhikam / paṇyādīnāmaśeṣāṇāṃ vaṇijo gṛhṇatastataḥ

हिन्दी अर्थ

और अपनेसे नीचे व्यक्तियोंकी शय्या और आसनपर न बैठे। अमड़लमय वेश न धारण करे और मुखसे अमाड्रलिक वचन भी न बोले। स्वच्छ वस्त्र पहने और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करे। उद्दण्ड, उन्मत्त, अविनीत, शीलहीन, चोरी आदिसे दूषित, अधिक अपव्ययी, लोभी, वैरी, कुलटाके पति, अधिक बलवान,

English

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अध्याय १८

श्लोक 6

इष्टापूर्तविनाशाय तद्राज्ञश्चौरधर्मिणः ।यद्यन्यैः पाल्यते लोकस्तद्वृत्तयन्तरसंश्रितैः

iṣṭāpūrtavināśāya tadrājñaścauradharmiṇaḥ / yadyanyaiḥ pālyate lokastadvṛttayantarasaṃśritaiḥ

हिन्दी अर्थ

अधिक दुर्बल, लोकमें निन्दित तथा सबपर सन्देह करनेवाले लोगोंसे कभी मित्रता न करे। साधु, सदाचारी, विद्वान, चुगली न करनेवाले, सामर्थ्यवान् तथा

English

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अध्याय १८

श्लोक 7

गृह्णतो बलिषड्भागं नृपतेर्नरको ध्रुवम् ।निरूपितमिदं राज्ञः पूर्वै रक्षणवेतनम्

gṛhṇato baliṣaḍbhāgaṃ nṛpaternarako dhruvam / nirūpitamidaṃ rājñaḥ pūrvai rakṣaṇavetanam

हिन्दी अर्थ

उद्योगी पुरुषोंसे मित्रता स्थापित करे। विद्वान् पुरुष वेद-विद्या एवं व्रतमें निष्णात पुरुषोंके साथ बैठे। मित्र, दीक्षाप्राप्त पुरुष, राजा, स्नातक, श्वशुर तथा ऋत्विक् --इन छः: पूजनीय पुरुषोंका घर आनेपर पूजन करे। जो द्विज संवत्सरव्रतको पूरा करके घरपर आवें, उनकी अपने वैभवके अनुसार यथासमय आलस्य त्याग

English

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अध्याय १८

श्लोक 8

अरक्षंश्चौरतश्चौर्यं तदेनो नृपतेर्भवेत् ।तस्माद्यदि तपस्तप्त्वा प्राप्तो योगित्वमीप्सितम्

arakṣaṃścaurataścauryaṃ tadeno nṛpaterbhavet / tasmādyadi tapastaptvā prāpto yogitvamīpsitam

हिन्दी अर्थ

करके पूजा करे और कल्याणकामी पुरुष उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सदा उद्यत रहे। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिए कि उन ब्राह्मणोंके फटकारनेपर भी कभी उनके साथ विवाद न करे।

English

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अध्याय १८

श्लोक 9

भुवः पालनसामर्थ्य-युक्त एको महीपतिः ।पृथिव्यां शस्त्रधृङ्मान्यस्त्वहमेवर्धिसंयुतः ।ततो भविष्ये नात्मानं करिष्ये पापभागिनम्

bhuvaḥ pālanasāmarthya-yukta eko mahīpatiḥ / pṛthivyāṃ śastradhṛṅmānyastvahamevardhisaṃyutaḥ / tato bhaviṣye nātmānaṃ kariṣye pāpabhāginam

हिन्दी अर्थ

घरके देवताओंका यथास्थान भलीभाँति पूजन करके अग्नि-स्थापनपूर्वक उसमें आहुति दे। पहली आहुति ब्रह्माको, दूसरी प्रजापतिको, तीसरी गुह्म॒कोंको, चौथी कश्यपको तथा पाँचवीं अनुमतिको दे। फिर पूर्वकथनानुसार गृहबलि देकर वैश्वदेवबलि दे। देवताओंके लिये पृथक्ू-पृथक् स्थानका विभाग करके

English

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अध्याय १८

श्लोक 10

पुत्र उवाच तस्य तन्निश्चयं ज्ञात्वा मन्त्रिमध्यस्थितो ऽब्रवीत् ।गर्गो नाम महाबुद्धिर्मुनिश्रेष्ठो वयो ऽतिगः

putra uvāca tasya tanniścayaṃ jñātvā mantrimadhyasthito 'bravīt / gargo nāma mahābuddhirmuniśreṣṭho vayo 'tigaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके लिये बलि अर्पित करे। उसका क्रम बतलाती हूँ, सुनो। एक पात्रमें पहले पर्जन्य, जल और पृथ्वीको तीन बलि दे। फिर प्राची आदि प्रत्येक दिशामें वायुको बलि देकर क्रमशः उन-उन दिशाओंके नामसे भी बलि समर्पित करे। तत्पश्चात् ब्रह्मा, अन्तरिक्ष, सूर्य, विश्वेदेव, विश्वभूत, उषा तथा भूतपतिको क्रमशः

English

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अध्याय १८

श्लोक 11

यद्येवं कर्तुकामस्त्वं राज्यं सम्यक् प्रशासितुम् ।ततो शृणुष्व मे वाक्यं कुरुष्व च नृपात्मज

yadyevaṃ kartukāmastvaṃ rājyaṃ samyak praśāsitum / tato śṛṇuṣva me vākyaṃ kuruṣva ca nṛpātmaja

हिन्दी अर्थ

बलि दे। फिर 'पितृभ्य: स्वधा नमः” कहकर दक्षिण दिशामें अपसव्य होकर पितरोंके निमित्त बलि दे। फिर पात्रसे अन्नका शेष भाग और जल लेकर 'यक्ष्मैतत्ते निर्णेजनम्” इस मन्त्रसे वायव्य दिशामें उसे विधिपूर्वक छोड़ दे। तदनन्तर रसोईके अन्नसे अग्राशन तथा हन्तकार निकालकर उन्हें विधिपूर्वक

English

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अध्याय १८

श्लोक 12

दत्तात्रेयं महाभागं सह्यद्रोणीकृताश्रयम् ।तमाराधय भूपाल ! पाति यो भुवनत्रयम्

dattātreyaṃ mahābhāgaṃ sahyadroṇīkṛtāśrayam / tamārādhaya bhūpāla ! pāti yo bhuvanatrayam

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणगको दे। देवता आदिके सब कर्म उन-उनके तीर्थसे ही करने चाहिए। ब्राह्मतीर्थसमी आचमन करना चाहिए, दाहिने हाथमें अँगूठेके उत्तर ओर जो एक रेखा होती है, वह ब्राह्मतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। उसीसे आचमन करना उचित है। तर्जजी और अँगूठेके बीचका भाग पितृतीर्थ कहलाता है। नान्दीमुख

English

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अध्याय १८

श्लोक 13

योगयुक्तं महाभागं सर्वत्र समदर्शिनम् ।विष्णोरंशं जगद्धातुरवतीर्णं महीतले

yogayuktaṃ mahābhāgaṃ sarvatra samadarśinam / viṣṇoraṃśaṃ jagaddhāturavatīrṇaṃ mahītale

हिन्दी अर्थ

पितरोंको छोड़कर अन्य सब पितरोंको उसी तीर्थसे जल आदि देना चाहिए। अँगुलियोंके अग्रभागमें देवतीर्थ है। उससे देवकार्य करनेका विधान है। कनिष्लिकाके मूल भागमें कायतीर्थ है। उससे प्रजापतिका कार्य किया जाता है।

English

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अध्याय १८

श्लोक 14

यमाराध्य सहस्राक्षः प्राप्तवान् पदमात्मनः ।हृतं दुरात्मभिर्दैत्यैर्जघान च दितेः सुतान्

yamārādhya sahasrākṣaḥ prāptavān padamātmanaḥ / hṛtaṃ durātmabhirdaityairjaghāna ca diteḥ sutān

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार इन तीर्थोंसे सदा देवताओं और पितरोंके कार्य करने चाहिए, अन्य तीर्थोंसे कदापि नहीं। ब्राह्मतीर्थमेी आचमन उत्तम माना गया है। पितरोंका तर्पण पितृतीर्थसे, देवताओंका देवतीर्थसे और प्रजापतिका कायतीर्थसे करना श्रेष्ठ बताया गया है। नानदीमुखके पितरोंके लिये पिण्डदान और तर्पण प्राजापत्य

English

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अध्याय १८

श्लोक 15

अर्जुन उवाच कथमाराधितो देवैर्दत्तात्रेयः प्रतापवान् ।कथञ्चापहृतं दैत्यैरिन्द्रत्वं प्राप वासवः

arjuna uvāca kathamārādhito devairdattātreyaḥ pratāpavān / kathañcāpahṛtaṃ daityairindratvaṃ prāpa vāsavaḥ

हिन्दी अर्थ

तीर्थसे करना चाहिए। विद्वान् पुछष एक साथ जल और अग्नि न ले। गुरुजनों तथा देवताओंकी ओर पाँव न फैलाये। बछड़ेको दूध पिलाती हुई गायको न छेड़े। अज्जलिसे पानी न पिये। शौचके समय विलम्ब न करे। मुखसे आग न

English

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अध्याय १८

श्लोक 16

गर्ग उवाच देवानां दानवानाञ्च युद्धमासीत् सुदारुणम् ।दैत्यानामीश्वरो जम्भो देवानाञ्च शचीपतिः

garga uvāca devānāṃ dānavānāñca yuddhamāsīt sudāruṇam / daityānāmīśvaro jambho devānāñca śacīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

फूँके। बेटा! जहाँ ऋण देनेवाला धनी, वैद्य, श्रोत्रिय ब्राह्मण तथा जलपूर्ण नदी --ये चार न हों, वहाँ निवास नहीं करना चाहिए। जहाँ शत्रुविजयी, बलवान् और धर्मपरायण राजा हो, वहीं विद्वान् पुरुषको निवास करना चाहिए। दुष्ट राजाके राज्यमें सुख कहाँ। जहाँ दुर्धर्ष राजा, उपजाऊ भूमि, संयमी एवं न्‍्यायशील

English

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अध्याय १८

श्लोक 17

तेषाञ्च युध्यमानानां दिव्यः संवत्सरो गतः ।ततो देवाः पराभूता दैत्या विजयिनो ऽभवन्

teṣāñca yudhyamānānāṃ divyaḥ saṃvatsaro gataḥ / tato devāḥ parābhūtā daityā vijayino 'bhavan

हिन्दी अर्थ

पुरवासी और ईर्ष्या न करनेवाले लोग हों, वहींका निवास भविष्यमें सुखदायक होता है। जिस राष्ट्रमें किसान बहुत हों, किन्तु वे अधिक भोगपरायण न हों तथा जहाँ सब तरहके अन्न पैदा होते हों, वहीं बुद्धिमान् पुरुषको रहना चाहिए। बेटा! जहाँ विजयका इच्छुक, पहलेका शत्रु तथा सदा उत्सव मनानेमें ही लगे

English

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अध्याय १८

श्लोक 18

विप्रचित्तिमुखैर्देवा दानवैस्ते पराजिताः ।पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये

vipracittimukhairdevā dānavaiste parājitāḥ / palāyanakṛtotsāhā nirutsāhā dviṣajjaye

हिन्दी अर्थ

रहनेवाले लोग--ये तीन सदा रहते हों, वहाँ निवास न करे। विद्वान् पुरुषको ऐसे ही स्थानोंपर सदा निवास करना चाहिए, जहाँके सहवासी सुशील हों।

English

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अध्याय १८

श्लोक 19

बृहस्पतिमुपागम्य दैत्यसैन्यवधेप्सवः ।अमन्त्रयन्त सहिता बालखिल्यैस्तथर्षिभिः

bṛhaspatimupāgamya daityasainyavadhepsavaḥ / amantrayanta sahitā bālakhilyaistatharṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वां सन्ध्यां सनक्षत्रां पश्चिमां सदिवाकराम् । उपासीत यथान्यायं नैनां जह्यादनापदि ।।

English

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अध्याय १८

श्लोक 20

बृहस्पतिरुवाच दत्तात्रेयं महात्मानमत्रेः पुत्रं तपोधनम् ।विकृताचरणं भक्त्या सन्तोषयितुमर्हथ

bṛhaspatiruvāca dattātreyaṃ mahātmānamatreḥ putraṃ tapodhanam / vikṛtācaraṇaṃ bhaktyā santoṣayitumarhatha

हिन्दी अर्थ

कर्तव्याकर्तव्यका वर्णन

English

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अध्याय १८

श्लोक 21

स वो दैत्यविनाशाय वरदो दास्यते वरम् ।ततो हनिष्यथ सुरा सहिता दैत्यदानवान्

sa vo daityavināśāya varado dāsyate varam / tato haniṣyatha surā sahitā daityadānavān

हिन्दी अर्थ

मदालसा कहती है--बेटा! अब त्याज्य और ग्राह्म वस्तुओंका प्रकरण आरम्भ करती हूँ, सुनो। घी अथवा तेलमें पका हुआ अन्न बहुत देरका बना हुआ अथवा बासी भी हो तो वह भोजन करने योग्य है। गेहूँ, जौ तथा गोरसकी बनी हुई वस्तुएँ तेल-घीमें न बनी हों तो भी वे पूर्ववत् ग्राह्म हैं।- शड्ख, पत्थर,

English

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अध्याय १८

श्लोक 22

गर्ग उवाच इत्युक्तास्ते तदा जग्मुर्दत्तात्रेयाश्रमं सुराः ।ददृशुश्च महात्मानं तं ते लक्ष्म्या समन्वितम्

garga uvāca ityuktāste tadā jagmurdattātreyāśramaṃ surāḥ / dadṛśuśca mahātmānaṃ taṃ te lakṣmyā samanvitam

हिन्दी अर्थ

सोना, चाँदी, रस्सी, कपड़ा, साग, मूल, फल, विदल (बाँसके बने हुए टोकरे आदि), मणि, हीरा, मूँगा, मोती तथा मनुष्योंके शरीरकी शुद्धि जलसे होती है। लोहेके हथियारोंकी शुद्धि पानीसे धोने तथा पत्थर या सानपर रगड़नेसे होती है। जिस पात्रमें तेल या घी रखा गया हो, उसकी सफाई गरम जलसे होती है। सूप,

English

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अध्याय १८

श्लोक 23

उद्गीयमानं गन्धर्वैः सुरापानरतं मुनिम् ।ते तस्य गत्वा प्रणतिमवदन् साध्यसाधनम्

udgīyamānaṃ gandharvaiḥ surāpānarataṃ munim / te tasya gatvā praṇatimavadan sādhyasādhanam

हिन्दी अर्थ

धान्यराशि, मृगचर्म, मूसल, ओखली तथा कपड़ोंके ढेरकी शुद्धि जल छिड़कनेमात्रसे हो जाती है। वल्कल वस्त्र जल और मिट्टीसे शुद्ध होते हैं। तृण, काष्ठ और ओषधियोंकी शुद्धि जल छिड़कनेसे होती है। भेड़के ऊनसे बने कपड़े और केश यदि दोषयुक्त हो गये हों तो उनकी शुद्धि सरसों अथवा तिलकी खली

English

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अध्याय १८

श्लोक 24

चक्रुः स्तवञ्चोपजह्रुर्भक्ष्यभोज्यस्त्रगादिकम् ।तिष्ठन्तमनुतिष्ठन्ति यान्तं यान्ति दिवौकसः

cakruḥ stavañcopajahrurbhakṣyabhojyastragādikam / tiṣṭhantamanutiṣṭhanti yāntaṃ yānti divaukasaḥ

हिन्दी अर्थ

और जलसे होती है। इसी प्रकार रूईके बने कपड़े पानी और क्षारसे शुद्ध होते हैं। मिट्टीके बर्तन दुबारा पकानेसे शुद्ध होते हैं। भिक्षामें प्राप्त अन्न, कारीगरका हाथ, बाजारमें बिकनेके लिये आयी हुई शाक आदि वस्तुएँ, स्त्रियोंका मुख, गलीसे आयी हुई वस्तु, जिसके गुण-दोषका ज्ञान न हो-ऐसी वस्तु और

English

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अध्याय १८

श्लोक 25

आराधयामासुरधः स्थितास्तिष्ठन्तमासने ।स प्राह प्रणतान् देवान् दत्तात्रेयः किमिष्यते ।मत्तो भवद्भिर्येनेयं शुश्रूषा क्रियते मम

ārādhayāmāsuradhaḥ sthitāstiṣṭhantamāsane / sa prāha praṇatān devān dattātreyaḥ kimiṣyate / matto bhavadbhiryeneyaṃ śuśrūṣā kriyate mama

हिन्दी अर्थ

सेवकोंकी लायी हुई चीज सदा शुद्ध मानी गयी है। जिसके शिशुने अभी दूध पीना नहीं छोड़ा हो, ऐसी स्त्री तथा दुर्गन्ध और बुदबुदोंसे रहित बहता हुआ जल स्वाभाविक शुद्ध है। समयानुसार अग्निसे तपाने, बुहारने, गायोंके चलने-फिरने, लीपने, जोतने और सींचनेसे भूमिकी शुद्धि होती है। बुहारनेसे और देवताओंकी

English

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अध्याय १८

श्लोक 26

देवा ऊचुः दानवैर्मुनिशार्दूल ! जम्भाद्यैर्भूर्भुवादिकम् ।हृतं तैलोक्यमाक्रम्य क्रतुभागाश्च कृत्स्नशः

devā ūcuḥ dānavairmuniśārdūla ! jambhādyairbhūrbhuvādikam / hṛtaṃ tailokyamākramya kratubhāgāśca kṛtsnaśaḥ

हिन्दी अर्थ

पूजा करनेसे घर शुद्ध होता है। जिस पात्रमें बाल या कीड़े पड़े हों, जिसे गायने सूँघ लिया हो तथा जिसमें मक्खियाँ पड़ी हों, उसकी शुद्धि राख और मिट्टीसे मलकर जललद्दारा धोनेसे होती है। ताँबेका बर्तन खटाईसे, राँगा और सीसा राखसे और काँसेके बर्तनोंकी शुद्धि राख और जलसे होती है। जिस पात्रमें कोई

English

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अध्याय १८

श्लोक 27

तद्वधे कुरु बुद्धिं त्वं परित्राणाय नो ऽनघ ।त्वत्प्रसादादभीप्सामः पुनः प्राप्तं त्रिविष्टपम्

tadvadhe kuru buddhiṃ tvaṃ paritrāṇāya no 'nagha / tvatprasādādabhīpsāmaḥ punaḥ prāptaṃ triviṣṭapam

हिन्दी अर्थ

अपवित्र वस्तु पड़ गयी हो, उसे मिट्टी और जलसे तबतक धोये, जबतक कि उसकी दुर्गन्‍न्ध दूर न हो जाय। इससे वह शुद्ध होता है। पृथ्वीपर प्राकृतिक रूपसे वर्तमान जल, जिससे एक गायकी प्यास बुझ सके, शुद्ध माना गया है। गलीमें पड़ा हुआ वस्त्र वायुके लगनेसे शुद्ध होता है। धूल, अग्नि, घोड़ा, गाय,

English

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अध्याय १८

श्लोक 28

दत्तात्रेय उवाच मद्यासक्तो ऽहमुच्छिष्टो न चैवाहं जितेन्द्रियः ।कथमिच्छथ मत्तो ऽपि देवाः शत्रुपराभवम्

dattātreya uvāca madyāsakto 'hamucchiṣṭo na caivāhaṃ jitendriyaḥ / kathamicchatha matto 'pi devāḥ śatruparābhavam

हिन्दी अर्थ

छाया, किरणें, वायु, जलके छींटे और मक्खी आदि--ये सब अशुद्ध वस्तुके

English

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अध्याय १८

श्लोक 29

देवा ऊचुः अनघस्त्वं जगन्नाथ न लेपस्तव विद्यते ।विद्याक्षालनशुद्धान्तर्निविष्टज्ञानदीधिते !

devā ūcuḥ anaghastvaṃ jagannātha na lepastava vidyate / vidyākṣālanaśuddhāntarniviṣṭajñānadīdhite !

हिन्दी अर्थ

संसर्गमें आनेपर भी शुद्ध ही रहते हैं। बकरे और घोड़ेका मुख शुद्ध माना गया है; किन्तु गायका नहीं। बछड़ेका मुख तथा माताका स्तन भी पवित्र बताया गया है। फल गिरानेमें पक्षीकी चोंच भी शुद्ध मानी गयी है। आसन, शय्या, सवारी, नाव और मार्गके तृण--ये सब बाजारमें बिकनेवाली वस्तुओंकी तरह सूर्य और

English

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अध्याय १८

श्लोक 30

दत्तात्रेय उवाच सत्यमेतत् सुरा विद्या ममास्ति समदर्शिनः ।अस्यास्तु योषितः सङ्गादहमुच्छिष्टतां गतः

dattātreya uvāca satyametat surā vidyā mamāsti samadarśinaḥ / asyāstu yoṣitaḥ saṅgādahamucchiṣṭatāṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाकी किरणों तथा वायुके स्पर्शसे शुद्ध होते हैं। गलियोंमें घूमने-फिरने, स्नान करने, छींक आने, पानी पीने, भोजन करने तथा वस्त्र बदलनेपर विधिपूर्वक आचमन करना चाहिए। अस्पृश्य वस्तुओंसे जिनका स्पर्श हो गया हो उनकी, रास्तेके कीचड़ और जलकी तथा ईंटकी बनी हुई वस्तुओंकी वायुके

English

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अध्याय १८

श्लोक 31

स्त्रीसम्भोगो हि दोषाय सातत्येनोपसेवितः ।एवमुक्तास्ततो देवाः पुनर्वचनमब्रुवन्

strīsambhogo hi doṣāya sātatyenopasevitaḥ / evamuktāstato devāḥ punarvacanamabruvan

हिन्दी अर्थ

संसर्गसे शुद्धि होती है।

English

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अध्याय १८

श्लोक 32

देवा ऊचुः अनघेयं द्विजश्रेष्ठ जगन्माता न दुष्यते ।यथांशुमाला सूर्यस्य द्विज-चाण्डालसङ्गिनी

devā ūcuḥ anagheyaṃ dvijaśreṣṭha jaganmātā na duṣyate / yathāṃśumālā sūryasya dvija-cāṇḍālasaṅginī

हिन्दी अर्थ

अनजानमें यदि दूषित अन्न भोजन कर ले तो तीन रात उपवास करे और यदि जान-बूझकर किया हो तो उसके दोषकी शान्तिके लिये प्रायश्चित्त करे। मनुष्यकी गीली हड्डीका स्पर्श करके स्नान करनेसे शुद्धि होती है और सूखी हड्डीका स्पर्श कर लेनेपर केवल आचमन करके गायका स्पर्श या सूर्यका दर्शन

English

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अध्याय १८

श्लोक 33

गर्ग उवाच एवमुक्तस्ततो देवैर्दत्तात्रेयो ऽब्रवीदिदम् ।प्रहस्य त्रिदशान् सर्वान् यद्येतद्भवतां मतम्

garga uvāca evamuktastato devairdattātreyo 'bravīdidam / prahasya tridaśān sarvān yadyetadbhavatāṃ matam

हिन्दी अर्थ

करनेसे मनुष्य शुद्ध हो सकता है। बुद्धिमान् पुरुष रक्त, खेँखार तथा उबटनको न लाँधे और असमयमें उद्यान आदिके भीतर कदापि न ठहरे। लोकनिन्दित विधवा स्त्रीसे वार्तालाप न करे। जूँठन, मल-मूत्र और पैरोंके धोवनको घरसे बाहर फेंके। दूसरेके खुदाये हुए पोखरे आदिके जलमें पाँच लोंदा मिट्टी निकाले

English

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अध्याय १८

श्लोक 34

तदाहूयासुरान् सर्वान् युद्धाय सुरसत्तमाः ।इहानयत मद्दृष्टिगोचरं मा विलम्बतः

tadāhūyāsurān sarvān yuddhāya surasattamāḥ / ihānayata maddṛṣṭigocaraṃ mā vilambataḥ

हिन्दी अर्थ

बिना स्नान न करे। देवतासम्बन्धी सरोवरों तथा गड़ा आदि नदियोंमें सदा ही स्नान करे। देवता, पितर, उत्तम शास्त्र, यज्ञ और मन्त्र आदिकी निन्दा करनेवाले पुरुषोंसे स्पर्श और वार्तालाप करनेपर सूर्यके दर्शनसे शुद्धि होती है। रजस्वला स्त्री, अन्त्यज, पतित, मृतक, विधर्मी, प्रसूता स्त्री, नपुंसक, वस्त्रहीन, चाण्डाल,

English

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अध्याय १८

श्लोक 35

मद्दृष्टिपातहुतभुक्-प्रक्षीणबलतेजसः ।येन नाशमशेषास्ते प्रयान्ति मम दर्शनात्

maddṛṣṭipātahutabhuk-prakṣīṇabalatejasaḥ / yena nāśamaśeṣāste prayānti mama darśanāt

हिन्दी अर्थ

मुर्दा ढोनेवाले तथा परस्त्रीगामी पुरुषोंको देखकर विद्वान् पुरुषोंको इसी प्रकार सूर्यके दर्शनसे आत्मशुद्धि करनी चाहिए। अभक्ष्य पदार्थ, नवप्रसूता स्त्री,

English

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अध्याय १८

श्लोक 36

गर्ग उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा देवैर्दैत्या महाबलाः ।आहवाय समाहूता जग्मुर्देवगणान् रुषा

garga uvāca tasya tadvacanaṃ śrutvā devairdaityā mahābalāḥ / āhavāya samāhūtā jagmurdevagaṇān ruṣā

हिन्दी अर्थ

ढोनेवाले, रजस्वला स्त्री, ग्रामीण सूअर तथा अशौचदूषित मनुष्योंको छू लेनेपर स्नान करनेसे शुद्धि होती है। जिसके घरमें प्रतिदिन नित्यकर्मकी अवहेलना होती हो तथा जिसे ब्राह्मणोंने त्याग दिया हो, वह नराधम महापापी है। नित्यकर्मका त्याग कभी न करे। उसे न करनेका बन्धन तो केवल जननाशौच

English

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अध्याय १८

श्लोक 37

ते हन्यमाना दैतेयैर्देवा शीघ्रं भयातुराः ।दत्तात्रेयाश्रमं जग्मुः समेताः शरणार्थिनः

te hanyamānā daiteyairdevā śīghraṃ bhayāturāḥ / dattātreyāśramaṃ jagmuḥ sametāḥ śaraṇārthinaḥ

हिन्दी अर्थ

और मरणाशौचमें ही है।- अशौच प्राप्त होनेपर ब्राह्मण दस दिन, क्षत्रिय बारह दिन तथा वैश्य पंद्रह दिनोंतक दान-होम आदि कर्मोंसे अलग रहे। शूद्र एक मासतक अपना कर्म बंद रखे। तदनन्तर सब लोग अपने-अपने शास्त्रोक्त कर्मोका अनुष्ठान करें।

English

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अध्याय १८

श्लोक 38

तमेव विविशुर्दैत्याः कालयन्तो दिवौकसः ।ददृशुश्च महात्मानं दत्तात्रेयं महाबलम्

tameva viviśurdaityāḥ kālayanto divaukasaḥ / dadṛśuśca mahātmānaṃ dattātreyaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

मृतकको गाँवसे बाहर ले जाकर उसका दाह-संस्कार करनेके बाद समान गोत्रवाले भाई-बन्धुओंको पहले, चौथे, सातवें और नवें दिन प्रेतके लिये जल देना चाहिए तथा चौथे दिन उसकी चितासे राख और हड्डियोंका सजचय करना चाहिए। अस्थिसञ्चयके बाद उनका अड़-स्पर्श किया जा सकता है। फिर

English

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अध्याय १८

श्लोक 39

वामपार्श्वस्थितामिष्टामशेषजगतां शुभाम् ।भार्याञ्चास्य सुचार्वङ्गीं लक्ष्मीमिन्दुनिभाननाम्

vāmapārśvasthitāmiṣṭāmaśeṣajagatāṃ śubhām / bhāryāñcāsya sucārvaṅgīṃ lakṣmīmindunibhānanām

हिन्दी अर्थ

समानोदक पुरुष अपने सब कर्म कर सकते हैं, किन्तु सपिण्ड लोग केवल स्पर्शके अधिकारी होते हैं। जिस दिन मृत्यु हुई हो, उस दिन समानोदक और सपिण्ड दोनोंका स्पर्श किया जा सकता है। वृक्ष, सर्प, गौ, दाढ़ोंवाले जीव, शस्त्र, जल, फाँसी, अग्नि, विष, पर्वत गिरने तथा उपवास आदिके द्वारा मृत्यु

English

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अध्याय १८

श्लोक 40

नीलोत्पलाभनयनां पीनश्रोणिपयोधराम् ।गदन्तीं मधुरां भाषां सर्वैर्योषिद्गुणैर्युताम्

nīlotpalābhanayanāṃ pīnaśroṇipayodharām / gadantīṃ madhurāṃ bhāṣāṃ sarvairyoṣidguṇairyutām

हिन्दी अर्थ

होनेपर अथवा बालक, परदेशी एवं परिव्राजककी मृत्यु होनेपर तत्काल अशौच निवृत्त हो जाता है तथा कुछ लोगोंका मत है कि तीन दिनोंतक अशौच रहता है। यदि सपिण्डोंमेंसे एककी मृत्यु होनेके बाद थोड़े ही दिनोंमें दूसरेकी भी मृत्यु हो जाय तो पहलेके अशौचमें जितने दिन बाकी हों उतने ही दिनोंके भीतर दूसरेका

English

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अध्याय १८

श्लोक 41

ते तां दृष्ट्वाग्रतो दैत्याः साभिलाषा मनोभवम् ।न शेसुरुद्धतं धैर्यान्मनसा वोढुमातुराः

te tāṃ dṛṣṭvāgrato daityāḥ sābhilāṣā manobhavam / na śesuruddhataṃ dhairyānmanasā voḍhumāturāḥ

हिन्दी अर्थ

भी श्राद्ध आदि कर्म पूर्ण कर देना चाहिए। जननाशौचमें भी यही विधि देखी जाती है। सपिण्ड तथा समानोदक व्यक्तियोंमें एकके बाद दूसरेका जन्म होनेपर पहलेके ही साथ दूसरेका भी अशौच निवृत्त हो जाता है।

English

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अध्याय १८

श्लोक 42

त्यक्त्वा देवान् स्त्रियं तां तु हर्तुकामा हतौजसः ।तेन पापेन मुह्यन्तः संशक्तास्ते ततो ऽब्रुवन्

tyaktvā devān striyaṃ tāṃ tu hartukāmā hataujasaḥ / tena pāpena muhyantaḥ saṃśaktāste tato 'bruvan

हिन्दी अर्थ

पुत्रका जन्म होनेपर पिताको वस्त्रसहित स्नान करना चाहिए। उसमें भी यदि एकके जन्मके बाद दूसरेका जन्म हो जाय तो पहले जन्मे हुए बालकके दिनपर ही दूसरेकी भी शुद्धि बतायी गयी है।£ लोकमें जो-जो वस्तु अधिक प्रिय हो तथा घरमें भी जो वस्तु अत्यन्त प्रिय जान पड़े, उसको अक्षय बनानेकी

English

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अध्याय १८

श्लोक 43

स्त्रोरत्नमेतत् त्रैलोक्ये सारं नो यदि वै भवेत् ।कृतकृत्यास्ततः सर्व इति नो भावितं मनः

stroratnametat trailokye sāraṃ no yadi vai bhavet / kṛtakṛtyāstataḥ sarva iti no bhāvitaṃ manaḥ

हिन्दी अर्थ

इच्छा रखनेवाले पुरुषको उचित है कि वह उसे गुणवान् व्यक्तिको दे। अशौचके दिन पूरे हो जानेपर जल, वाहन, आयुध, चाबुक और दण्डका स्पर्श करके सब वर्णोके लोग पवित्र हो अपने-अपने वर्णधर्मका अनुष्ठान करें, क्योंकि वह इस लोक और परलोकमें भी कल्याण देनेवाला है। तीनों वेदोंका सर्वदा स्वाध्याय

English

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अध्याय १८

श्लोक 44

तस्मात् सर्वे समुत्क्षिप्य शिविकायां सुरार्दनाः ।आरोप्य स्वमधिष्ठानं नयाम इति निश्चिताः

tasmāt sarve samutkṣipya śivikāyāṃ surārdanāḥ / āropya svamadhiṣṭhānaṃ nayāma iti niścitāḥ

हिन्दी अर्थ

करे, विद्वान् बने। धर्मानुसार धनका उपार्जन करे और उसे यत्नपूर्वक यजञ्ञमें लगावे। जिस कर्मको करते समय अपने मनमें घृणा न हो और जिसे महापुरुषोंके सामने प्रकट करनेमें कोई संकोच न हो, ऐसा कर्म निःशड्क होकर करना चाहिए। बेटा! ऐसे आचरणवाले गृहस्थ पुरुषको धर्म, अर्थ और कामकी

English

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अध्याय १८

श्लोक 45

गर्ग उवाच सानुरागास्ततस्ते तु प्रोक्ताश्चेत्त्थं परस्परम् ।तस्य तां योषितं साध्वीं समुत्क्षिप्य स्मरार्दिताः

garga uvāca sānurāgāstataste tu proktāścettthaṃ parasparam / tasya tāṃ yoṣitaṃ sādhvīṃ samutkṣipya smarārditāḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्ति होती है तथा इस लोक और परलोकमें भी उसका कल्याण होता है।

English

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अध्याय १८

श्लोक 46

शिविकायां समारोप्य सहिता दैत्यदानवाः ।शिरः सु शिविकां कृत्वा स्वस्थानाभिमुखं ययुः

śivikāyāṃ samāropya sahitā daityadānavāḥ / śiraḥ su śivikāṃ kṛtvā svasthānābhimukhaṃ yayuḥ

हिन्दी अर्थ

मातासे इस प्रकार उपदेश ग्रहण करके राजा ऋतध्वजके पुत्र अलर्कने युवावस्थामें विधिपूर्वक अपना विवाह किया। उससे अनेक पुत्र उत्पन्न हुए। उसने यज्ञोंद्वारा भगववानका यजन किया और हर समय वह पिताकी आज्ञाका पालन करनेमें संलग्न रहता था। तदनन्तर बहुत समयके बाद बुढ़ापा आनेपर

English

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अध्याय १८

श्लोक 47

दत्तात्रेयस्ततो देवान् विहस्येदमथाब्रवीत् ।दिष्ट्या वर्धथ दैत्यानामेषा लक्ष्मीः शिरोगता ।सप्त सथानान्यतिक्रान्ता नवमन्यमुपैष्यति

dattātreyastato devān vihasyedamathābravīt / diṣṭyā vardhatha daityānāmeṣā lakṣmīḥ śirogatā / sapta sathānānyatikrāntā navamanyamupaiṣyati

हिन्दी अर्थ

धर्मपरायण महाराज ऋतध्वजने अपनी पत्नीके साथ तपस्याके लिये वनमें जानेका विचार किया और पुत्रका राज्याभिषिक कर दिया। उस समय मदालसाने अपने पुत्रकी विषयभोगविषयक आसक्तिको हटानेके लिये उससे यह अन्तिम वचन कहा--“बेटा! गृहस्थ-धर्मका अवलम्बन करके राज्य करते

English

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अध्याय १८

श्लोक 48

देवा ऊचुः कथयस्व जगन्नाथ ! केषु स्थानेष्वस्थिता ।पुरुषस्य फलं किं वा प्रयच्छत्यथ नश्यति

devā ūcuḥ kathayasva jagannātha ! keṣu sthāneṣvasthitā / puruṣasya phalaṃ kiṃ vā prayacchatyatha naśyati

हिन्दी अर्थ

समय यदि तुम्हारे ऊपर प्रिय बन्धुके वियोगसे, शत्रुओंकी बाधासे अथवा धनके नाशसे होनेवाला कोई असहा दुःख आ पड़े तो मेरी दी हुई इस अँगूठीसे यह उपदेशपत्र निकालकर, जो रेशमी वस्त्रपर बहुत सूक्ष्म अक्षरोंमें लिखा गया है, तुम अवश्य पढ़ना; क्योंकि ममतामें बँधा रहनेवाला गृहस्थ दु:खोंका केन्द्र होता

English

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अध्याय १८

श्लोक 49

दत्तात्रेय उवाच नृणां पदे स्थिता लक्ष्मीर्निलयं सम्प्रयच्छति ।सक्थ्न्योश्च संस्थिता वस्त्रं तथा नानाविधं वसु

dattātreya uvāca nṛṇāṃ pade sthitā lakṣmīrnilayaṃ samprayacchati / sakthnyośca saṃsthitā vastraṃ tathā nānāvidhaṃ vasu

हिन्दी अर्थ

सुमति कहते हैं--यों कहकर मदालसाने अपने पुत्रको सोनेकी अँगूठी दी और गृहस्थ पुरुषके योग्य अनेकानेक आशीर्वाद भी दिये। तत्पश्चात् पुत्रको राज्य सौंपकर महाराज कुवलयाश्व और महारानी मदालसा तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये।

English

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अध्याय १८

श्लोक 50

कलात्रञ्च गुह्यसंस्था क्रोडस्थापत्यदायिनी ।मनोरथान् पूरयति पुरुषाणां हृदि स्थिता

kalātrañca guhyasaṃsthā kroḍasthāpatyadāyinī / manorathān pūrayati puruṣāṇāṃ hṛdi sthitā

हिन्दी अर्थ

- नित्यस्य कर्मणो हानिं न कुर्वीत कदाचन । तस्य त्वकरणे बन्धः केवलं मृतजन्मसु ।।

English

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अध्याय १८

श्लोक 51

लक्ष्मीर्लक्ष्मीवतां श्रेष्ठा कण्ठस्था कण्ठभूषणम् ।अभीष्टबन्धुदारैश्च तथाश्लेषं प्रवासिभिः

lakṣmīrlakṣmīvatāṃ śreṣṭhā kaṇṭhasthā kaṇṭhabhūṣaṇam / abhīṣṭabandhudāraiśca tathāśleṣaṃ pravāsibhiḥ

हिन्दी अर्थ

+ सपिण्डानां सपिण्डस्तु मृते5न्यास्मिन् मृतो यदि । पूर्वाशौचसमाख्यातै: कार्या तस्य दिनैः

English

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अध्याय १८

श्लोक 52

सृष्टानुवाक्यलावण्यमाज्ञामवितथां तथा ।मुखसंस्था कवित्वञ्च यच्छत्युदधिसम्भवा

sṛṣṭānuvākyalāvaṇyamājñāmavitathāṃ tathā / mukhasaṃsthā kavitvañca yacchatyudadhisambhavā

हिन्दी अर्थ

एष एव विधिर्दृष्टो जन्मन्यपि हि सूतके सपिण्डानां सपिण्डेषु यथावत्सोदकेषु च ।।

English

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अध्याय १८

श्लोक 53

शिरोगता सन्त्यजति ततो ऽन्यं याति चाश्रयम् ।सेयं शिरोगता चैतान् परित्यक्ष्यति साम्प्रतम्

śirogatā santyajati tato 'nyaṃ yāti cāśrayam / seyaṃ śirogatā caitān parityakṣyati sāmpratam

हिन्दी अर्थ

सुबाहुकी प्रेरणासे काशिराजका अलर्कपर आक्रमण, अलर्कका दत्तात्रेयजीकी शरणमें जाना आऔर उनसे योगका उपदेश लेना

English

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अध्याय १८

श्लोक 54

प्रगृह्यास्त्राणि बध्यन्तां तस्मादेते सुरारयः ।न भेतव्यं भृशञ्चैते मया निस्तेजसः कृताः ।परदारावमर्षाच्च दग्धपुण्या हतौजसः

pragṛhyāstrāṇi badhyantāṃ tasmādete surārayaḥ / na bhetavyaṃ bhṛśañcaite mayā nistejasaḥ kṛtāḥ / paradārāvamarṣācca dagdhapuṇyā hataujasaḥ

हिन्दी अर्थ

सुमति कहते हैं--पिताजी! धर्मात्मा राजा अलर्कने भी पुत्रकी भाँति प्रजाका न्यायपूर्वक पालन किया। उनके राज्यमें प्रजा बहुत प्रसन्न थी और सब लोग अपने-अपने कर्मोमें लगे रहते थे। वे दुष्ट पुरुषोंको दण्ड देते और सज्जन पुरुषोंकी भलीभाँति रक्षा करते थे। राजाने बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान भी किया।

English

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अध्याय १८

श्लोक 55

ततस्ते विविधैरस्त्रैर्वध्यमानाः सुरारयः ।मूध्नि लक्ष्म्या समाक्रान्ता विनेशुरिति नः श्रुतम्

tataste vividhairastrairvadhyamānāḥ surārayaḥ / mūdhni lakṣmyā samākrāntā vineśuriti naḥ śrutam

हिन्दी अर्थ

इन सब कार्यामें उन्हें बड़ा आनन्द मिलता था। महाराजको अनेक पुत्र हुए, जो महान् बलवान, अत्यन्त पराक्रमी, धर्मात्मा, महात्मा तथा कुमार्गके विरोधी थे। उन्होंने धर्मपूर्वक धनका उपार्जन किया और धनसे धर्मका अनुष्ठान किया तथा धर्म और धन दोनोंके अनुकूल रहकर ही विषयोंका उपभोग किया। इस प्रकार

English

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अध्याय १८

श्लोक 56

लक्ष्मीश्चीत्पत्य सम्प्राप्ता दत्तात्रेयं महामुनिम् ।स्तूयमाना सुरैः सर्वैर्दैत्यनाशान्मुदान्वितैः

lakṣmīścītpatya samprāptā dattātreyaṃ mahāmunim / stūyamānā suraiḥ sarvairdaityanāśānmudānvitaiḥ

हिन्दी अर्थ

धर्म, अर्थ और काममें आसक्त हो पृथ्वीका पालन करते हुए राजा अलर्कको अनेक वर्ष बीत गये; किन्तु उन्हें वे एक दिनके समान ही जान पड़े। मनको प्रिय लगनेवाले विषयोंका भोग करते हुए उन्हें कभी भी उनकी ओरसे वैराग्य नहीं हुआ। उनके मनमें कभी ऐसा विचार नहीं उठा कि अब धर्म और धनका

English

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अध्याय १८

श्लोक 57

प्रणिपत्य ततो देवा दत्तात्रेयं मनीषिणम् ।नाकपृष्ठमनुप्राप्ता यथापूर्वं गतज्वराः

praṇipatya tato devā dattātreyaṃ manīṣiṇam / nākapṛṣṭhamanuprāptā yathāpūrvaṃ gatajvarāḥ

हिन्दी अर्थ

उपार्जन पूरा हो गया। उनकी ओरसे उन्हें अतृप्ति ही बनी रही।

English

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अध्याय १८

श्लोक 58

तथा त्वमपि रोजेन्द्र ! यदीच्छसि यथेप्सितम् ।प्राप्तुमैश्वर्यमतुलं तूर्णमाराधयस्व ताम्

tathā tvamapi rojendra ! yadīcchasi yathepsitam / prāptumaiśvaryamatulaṃ tūrṇamārādhayasva tām

हिन्दी अर्थ

उनके इस प्रकार भोगमें आसक्त, प्रमादी और अजितेन्द्रिय होनेका समाचार उनके भाई सुबाहुने भी सुना, जो वनमें निवास करते थे। अलर्कको किसी तरह ज्ञान प्राप्त हो, इस अभिलाषासे उन्होंने बहुत देरतक विचार किया। अन्तमें उन्हें यही ठीक मालूम हुआ कि अलर्कके साथ शत्रुता रखनेवाले किसी राजाका

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 18
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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