Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
19
अध्याय 19 / 90

Adhyaya 19

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पूर्ण अध्याय पाठ37 श्लोक

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अध्याय १९

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणेठगर्गवाक्यम्ऽ नामाष्टादशो ऽध्यायः एकोनविंशो ऽध्यायः पुत्र उवाच इत्यृषेर्वचनं श्रुत्वा कार्तवीर्यो नरेश्वरः ।दत्तात्रेयाश्रमं गत्त्वा तं भक्त्या समपूजयत्

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇeṭhagargavākyam' nāmāṣṭādaśo 'dhyāyaḥ ekonaviṃśo 'dhyāyaḥ putra uvāca ityṛṣervacanaṃ śrutvā kārtavīryo nareśvaraḥ / dattātreyāśramaṃ gattvā taṃ bhaktyā samapūjayat

हिन्दी अर्थ

सहारा लिया जाय। ऐसा निश्चय करके वे अपना राज्य प्राप्त करनेका उद्देश्य लेकर असंख्य बल-वाहनोंसे सम्पन्न काशिराजकी शरणमें आये। काशिराजने अपनी सेनाके साथ अलर्कपर आक्रमण करनेकी तैयारी की और दूत भेजकर यह कहलाया कि अपने बड़े भाई सुबाहुको राज्य दे दो। अलर्क राजधर्मके ज्ञाता

English

Reaching then his city he narrated the whole story fully his parents, how he had regained his slender-limbed one wl,2 had died. And the beautiful, slender-limbed lady bowed i

अध्याय १९

श्लोक 2

पादसंवाहनाद्येन मध्वाद्याहरणेन च ।स्त्रक्चन्दनादिगन्धाम्बु-फलाद्यनयनेन च

pādasaṃvāhanādyena madhvādyāharaṇena ca / strakcandanādigandhāmbu-phalādyanayanena ca

हिन्दी अर्थ

थे। उन्हें शत्रुके इस प्रकार आज्ञापूर्वक सन्देश देनेपर सुबाहुको राज्य देनेकी इच्छा नहीं हुई। उन्होंने काशिराजके दूतको उत्तर दिया कि "मेरे बड़े भाई मेरे ही पास आकर प्रेमपूर्वक राज्य माँग लें। मैं किसीके आक्रमणके भयसे थोड़ी-सी भी भूमि नहीं दूँगा।' बुद्धिमान् सुबाहुने भी अलर्कके पास याचना नहीं की।

English

before to her kindred with obeisance, embraces andsn{

अध्याय १९

श्लोक 3

तथान्नसाधनैस्तस्य उच्छिष्टापोहनेन च ।परितुष्टो मुनिर्भूतं तमुवाच तथैव सः

tathānnasādhanaistasya ucchiṣṭāpohanena ca / parituṣṭo munirbhūtaṃ tamuvāca tathaiva saḥ

हिन्दी अर्थ

उन्होंने सोचा, “याचना क्षत्रियका धर्म नहीं है। क्षत्रिय तो पराक्रमका ही धनी होता है।” तब काशिराजने अपनी समस्त सेनाके साथ राजा अलर्कके राज्यपर चढ़ाई करनेके लिये यात्रा की। उन्होंने अपने समीपवर्ती राजाओंसे मिलकर

English

before to her kindred with obeisance, embraces andsn{

अध्याय १९

श्लोक 4

यथैवोक्ताः पुरा देवा मद्यभोगादिकुत्सनम् ।स्त्री चेयं मम पार्श्वस्थेत्येतद्भोगाच्च कुत्सितम्

yathaivoktāḥ purā devā madyabhogādikutsanam / strī ceyaṃ mama pārśvasthetyetadbhogācca kutsitam

हिन्दी अर्थ

उनके सैनिकोंद्वारा आक्रमण किया और अलर्कके सीमावर्ती नरेशको अपने अधीन कर लिया। फिर अलर्कके राज्यपर घेरा डालकर उनके सामन्त राजाओंको सताना आरम्भ किया। दुर्ग और दुर्गके रक्षकोंको भी काबूमें कर लिया। किन्हींको धन देकर, किन्हींको फूट डालकर और किन्हींको समझा-

English

greetingsy according to propriety, and their ages. Then tl citizens held a great festival there in the city.

अध्याय १९

श्लोक 5

सदैवाहं न मामेवमुपरोद्धुं त्वमर्हसि ।अशक्तमुपकाराय शक्तमाराधयस्व भोः

sadaivāhaṃ na māmevamuparoddhuṃ tvamarhasi / aśaktamupakārāya śaktamārādhayasva bhoḥ

हिन्दी अर्थ

बुझाकर ही अपना वशवर्ती बना लिया। इस प्रकार शत्रुमण्डलीसे पीड़ित राजा अलर्कके पास बहुत थोड़ी-सी सेना रह गयी। खजाना भी घटने लगा और शत्रुने उनके नगरपर घेरा डाल दिया। इस तरह प्रतिदिन कष्ट पाने और कोश क्षीण होनेसे राजाको बड़ा खेद हुआ। उनका चित्त व्याकुल हो उठा। जब वे अत्यन्त

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 6

जड उवाच तेनैवमुक्तो मुनिना स्मृत्वा गर्गवचश्च तत् ।प्रत्युवाच प्रणम्यैनं सार्तवीर्यार्जुनस्तदा

jaḍa uvāca tenaivamukto muninā smṛtvā gargavacaśca tat / pratyuvāca praṇamyainaṃ sārtavīryārjunastadā

हिन्दी अर्थ

वेदनासे व्यथित हो उठे, तब सहसा उन्हें उस अँगूठीका स्मरण हो आया, जिसे ऐसे ही अवसरोंपर उपयोग करनेके लिये उनकी माता मदालसाने दिया था। तब स्नान करके पवित्र हो उन्होंने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया और अँगूठीसे वह उपदेशपत्र निकालकर देखा। उसके अक्षर बहुत स्पष्ट थे। राजाने उसमें लिखे

English

enjoyed herself with him, her greatly-beloved, inpleasa places.

अध्याय १९

श्लोक 7

अर्जुन उवाच किं मां मोहयसे देव ! स्वां मायां समुपाश्रितः ।अनघस्त्वं तथैवेयं देवी सर्वभवारणिः

arjuna uvāca kiṃ māṃ mohayase deva ! svāṃ māyāṃ samupāśritaḥ / anaghastvaṃ tathaiveyaṃ devī sarvabhavāraṇiḥ

हिन्दी अर्थ

हुए माताके उपदेशको पढ़ा, जिससे उनके समस्त शरीरमें रोमाउच हो आया और आँखें प्रसन्नतासे खिल उठीं। वह उपदेश इस प्रकार था--

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 8

इत्युक्तः प्रीतिमान् देवस्ततस्तं प्रत्युवाच ह ।कार्तवीर्यं महाभागं वशीकृतमहीतलम्

ityuktaḥ prītimān devastatastaṃ pratyuvāca ha / kārtavīryaṃ mahābhāgaṃ vaśīkṛtamahītalam

हिन्दी अर्थ

स सद्धि: सह कर्तव्य: सतां सज़्ो हि भेषजम् ।।

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 9

वरं वृणीष्व गुह्यं मे यत् त्वया समुदीरितम् ।तेन तुष्टिः परा जाता त्वय्यद्य मम पार्थिव

varaṃ vṛṇīṣva guhyaṃ me yat tvayā samudīritam / tena tuṣṭiḥ parā jātā tvayyadya mama pārthiva

हिन्दी अर्थ

काम: सर्वात्मना हेयो हातुं चेच्छक्यते न सः ।

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 10

ये च मां पूजयिष्यन्ति गन्धमाल्यादिभिर्नराः ।मांसमद्योपहारैश्च मिष्टान्नैश्चाज्यसंयुतैः

ye ca māṃ pūjayiṣyanti gandhamālyādibhirnarāḥ / māṃsamadyopahāraiśca miṣṭānnaiścājyasaṃyutaiḥ

हिन्दी अर्थ

मुमुक्षां प्रति तत्कार्य सैव तस्यापि भेषजम् ।।

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 11

लक्ष्मीसमेतं गीतैश्च ब्राह्मणानां तथार्च्चनैः ।वाद्यैर्मनोरमैर्वोणा-वेणु-शङ्कादिभिस्तथा

lakṣmīsametaṃ gītaiśca brāhmaṇānāṃ tathārccanaiḥ / vādyairmanoramairvoṇā-veṇu-śaṅkādibhistathā

हिन्दी अर्थ

'सड़ (आसक्ति)-का सब प्रकारसे त्याग करना चाहिए; किन्तु यदि उसका त्याग न किया जा सके तो सत्पुरुषोंका सड़ करना चाहिए; क्योंकि सत्पुरुषोंका सड़ ही उसकी ओषधि है। कामनाको सर्वथा छोड़ देना चाहिए; परन्तु यदि वह छोड़ी न जा सके तो मुमुक्षा (मुक्तिकी इच्छा)-के प्रति कामना करनी चाहिए;

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 12

तेषामहं परां तुष्टिं पुत्रदारधनादिकम् ।प्रदास्याम्यवघातञ्च हनिष्याम्यवमन्यताम्

teṣāmahaṃ parāṃ tuṣṭiṃ putradāradhanādikam / pradāsyāmyavaghātañca haniṣyāmyavamanyatām

हिन्दी अर्थ

क्योंकि मुमुक्षा ही उस कामनाको मिटानेकी दवा है।'

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 13

स त्वं वरय भद्रं ते वरं यन्मसेप्सितम् ।प्रसादसुमुखस्ते ऽहं गुह्यनामप्रकीर्तनात्

sa tvaṃ varaya bhadraṃ te varaṃ yanmasepsitam / prasādasumukhaste 'haṃ guhyanāmaprakīrtanāt

हिन्दी अर्थ

इस उपदेशको अनेक बार पढ़कर राजाने सोचा, “मनुष्योंका कल्याण कैसे होगा? मुक्तिकी इच्छा जाग्रत् करनेपर। और मुक्तिकी इच्छा जाग्रत् होगी सत्सड़से।” ऐसा निश्चय करके वे सत्सड़के लिये चिन्तित हुए और अत्यन्त आर्तभावसे आसक्तिरहित, पापशून्य तथा परम सौभाग्यशाली महात्मा

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 14

कार्तवीर्य उवाच यदि देव प्रसन्नस्त्वं तत् प्रयच्छर्धिमुत्तमाम् ।यया प्रजाः पालये ऽहं न चाधर्ममवाप्नुयाम्

kārtavīrya uvāca yadi deva prasannastvaṃ tat prayacchardhimuttamām / yayā prajāḥ pālaye 'haṃ na cādharmamavāpnuyām

हिन्दी अर्थ

दत्तात्रयजीकी शरणमें गये। उनके चरणोंमें प्रणाम करके राजाने उनका पूजन किया और न्यायके अनुसार कहा--'ब्रह्मन! आप शरणार्थियोंको शरण देनेवाले हैं। मुझपर कृपा कीजिये। मैं भोगोंमें अत्यन्त आसक्त एवं दुःखसे आतुर हूँ, आप मेरा दुःख दूर कीजिये।'

English

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अध्याय १९

श्लोक 15

परानुसरणे ज्ञानमप्रतिद्वन्द्वतां रणे ।सहस्रमाप्तुमिच्छामि बाहूनां लघुतागुणम्

parānusaraṇe jñānamapratidvandvatāṃ raṇe / sahasramāptumicchāmi bāhūnāṃ laghutāguṇam

हिन्दी अर्थ

दत्तात्रेयजी बोले--राजन! मैं अभी तुम्हारा दुःख दूर करता हूँ। सच-सच बताओ. तुम्हें किसलिये दुःख हुआ है?

English

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अध्याय १९

श्लोक 16

असङ्गा गतयः सन्तु शैलाकाशाम्बु-भूमिषु ।पातालेषु च सर्वेषु वधश्चाप्यधिकान्नरात्

asaṅgā gatayaḥ santu śailākāśāmbu-bhūmiṣu / pātāleṣu ca sarveṣu vadhaścāpyadhikānnarāt

हिन्दी अर्थ

अलर्कने कहा--भगवन्! इस शरीरके बड़े भाई यदि राज्य लेनेकी इच्छा रखते हैं तो यह शरीर तो पाँच भूतोंका समुदायमात्र है। गुणकी ही गुणोंमें प्रवृत्ति हो रही है; अतः मेरा उसमें क्या है। शरीरमें रहकर भी वे और मैं दोनों ही शरीरसे भिन्न हैं। यह हाथ आदि कोई भी अज़ जिसका नहीं है, मांस, हड्डी और

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 17

तथोन्मार्गप्रवृत्तस्य चास्तु सन्मार्गदेशकः ।सन्तु मे ऽतिथयः श्लाघ्या वित्तदाने तथाक्षये

tathonmārgapravṛttasya cāstu sanmārgadeśakaḥ / santu me 'tithayaḥ ślāghyā vittadāne tathākṣaye

हिन्दी अर्थ

नाड़ियोंके विभागसे भी जिसका कोई सम्पर्क नहीं है, उस पुरुषका इस राज्यमें हाथी, घोड़े, रथ और कोश आदिसे किज्चित् भी क्या सम्बन्ध है। इसलिये न तो मेरा कोई शत्रु है, न मुझे दुःख या सुख होता और न नगर तथा कोशसे ही मेरा कोई सम्बन्ध है। यह हाथी-घोड़े आदिकी सेना न सुबाहुकी है, न दूसरे किसीकी

English

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अध्याय १९

श्लोक 18

अनष्टद्रव्यता राष्ट्रे ममानुस्मरणेन च ।त्वयि भक्तिर्ममैवास्तु नित्यमव्यभिचारिणी

anaṣṭadravyatā rāṣṭre mamānusmaraṇena ca / tvayi bhaktirmamaivāstu nityamavyabhicāriṇī

हिन्दी अर्थ

है और न मेरी ही है। जैसे कलसी, घट और कमण्डलुमें एक ही आकाश है तो भी पात्रभेदसे अनेक-सा दिखायी देता है, उसी प्रकार सुबाहु, काशिराज और मैं भिन्न-भिन्न शरीरोंमें रहकर भी एक ही हैं। शरीरोंके भेदसे ही भेदकी प्रतीति होती है। पुरुषकी बुद्धि जिस-जिस वस्तुमें आसक्त होती है, वहाँ-वहाँसे वह

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 19

दत्तात्रेय उवाच यत्र ते कीर्तिताः सर्वे तान् वरान् समवाप्स्यसि ।मत्प्रसादाच्च भविता चक्रवर्तो त्वमीश्वरः

dattātreya uvāca yatra te kīrtitāḥ sarve tān varān samavāpsyasi / matprasādācca bhavitā cakravarto tvamīśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

दुःख ही लाकर देती है। मैं तो प्रकृतिसे परे हूँ; अतः न दुःखी हूँ, न सुखी।

English

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अध्याय १९

श्लोक 20

जड उवाच प्रणिपत्य ततस्तस्मै दत्तात्रेयाय सो ऽर्जुनः ।आनाय्य प्रकृतीः सम्यगभिषेकमगृह्णत

jaḍa uvāca praṇipatya tatastasmai dattātreyāya so 'rjunaḥ / ānāyya prakṛtīḥ samyagabhiṣekamagṛhṇata

हिन्दी अर्थ

प्राणियोंका भूतोंके द्वारा जो पराभव होता है, वही दुःखमय है। तात्पर्य यह कि जो भौतिक भोगोंमें ममताके कारण आसक्त है, वही सुख-दुःखका अनुभव

English

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अध्याय १९

श्लोक 21

आघोषयामास तदा स्थितो राज्ये स हैहयः ।दत्तात्रेयात् परामृद्धिमवाप्यातिबलान्वितः

āghoṣayāmāsa tadā sthito rājye sa haihayaḥ / dattātreyāt parāmṛddhimavāpyātibalānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

दत्तात्रेयजी बोले--नरश्रेष्ठ! वास्तवमें ऐसी ही बात है। तुमने जो कुछ कहा है, ठीक है; ममता ही दुःखका और ममताका अभाव ही सुखका कारण है। मेरे प्रश्न करनेमात्रसे तुम्हें यह उत्तम ज्ञान प्राप्त हो गया, जिसने ममताकी प्रतीतिको सेमरकी रूईकी भाँति उड़ा दिया। मनुष्यके हृदयदेशमें अज्ञानरूपी महान् वृक्ष

English

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अध्याय १९

श्लोक 22

अद्यप्रभृति यः शस्त्रं मामृते ऽन्यो ग्रहीष्यति ।हन्तव्यः स मया दस्युः परिहंसारतो ऽपि वा

adyaprabhṛti yaḥ śastraṃ māmṛte 'nyo grahīṣyati / hantavyaḥ sa mayā dasyuḥ parihaṃsārato 'pi vā

हिन्दी अर्थ

खड़ा है। वह अहंतारूपी अड्कुरसे उत्पन्न हुआ है। ममता ही उसका तना है। गृह और क्षेत्र उसकी ऊँची-ऊँची शाखाएँ हैं। स्त्री और पुत्र आदि पल्‍्लव हैं। धन-धान्यरूप बड़े-बड़े पत्ते हैं। वह अनादिकालसे बढ़ता चला आ रहा है। पुण्य और पाप उसके आदि पुष्प हैं। सुख और दुःख महान् फल हैं। वह मोक्षके

English

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अध्याय १९

श्लोक 23

इत्याज्ञप्तेन तद्राष्ट्रे कश्चिदायुधधृङ्नरः ।तमृते पुरुषव्याघ्रं बभूवोरुपराक्रमः

ityājñaptena tadrāṣṭre kaścidāyudhadhṛṅnaraḥ / tamṛte puruṣavyāghraṃ babhūvoruparākramaḥ

हिन्दी अर्थ

मार्गको रोककर खड़ा है। अज्ञानियोंका सड़ ही उस वृक्षके लिये सिंचाईका काम देता है। सकाम कर्म करनेकी प्रबल इच्छा ही उस वृक्षपर भ्रमरोंकी भाँति मँड़राती रहती है। जो लोग संसार-मार्गकी यात्रासे थककर उस वृक्षका आश्रय लेते हैं, वे भ्रमपूर्ण ज्ञान एवं मिथ्या सुखके वशीभूत हो जाते हैं। ऐसे लोगोंको

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 24

स एव ग्रामपालो ऽभूत् पशुपालः स एव च ।क्षेत्रपालः स एवासीद् द्विजातीनाञ्च रक्षिता

sa eva grāmapālo 'bhūt paśupālaḥ sa eva ca / kṣetrapālaḥ sa evāsīd dvijātīnāñca rakṣitā

हिन्दी अर्थ

आत्यन्तिक सुख (मोक्ष) कैसे मिल सकता है। परन्तु जो सत्सड्ररूपी पत्थरपर घिसकर तेज किये हुए विद्यारूपी कुठारसे उस ममतारूपी वृक्षको काट डालते हैं, वे विद्वान् पुरुष ही उस मोक्षमार्गसे जाते हैं और धूल तथा काँटोंसे रहित शीतल ब्रह्मवनमें पहुँचकर सब प्रकारकी वृत्तियोंसे रहित हो परमानन्दको प्राप्त

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 25

तपस्विनां पालयिता सार्थपालस्तु सो ऽभवत् ।द्स्यु-व्यालाग्रि-शस्त्रादि-भयेष्वब्धौ निमज्जताम्

tapasvināṃ pālayitā sārthapālastu so 'bhavat / dsyu-vyālāgri-śastrādi-bhayeṣvabdhau nimajjatām

हिन्दी अर्थ

अलर्कने कहा--भगवन्! आपकी कृपासे मुझे ऐसा उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ, जो जड प्रकृति और चेतन-शक्तिका विवेक करनेवाला है; किन्तु मेरा मन

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 26

अन्यासु चैव मग्रानामापत्सु परवीरहा ।स एव संस्मृतः सद्यः समुद्धर्ताभवन्नृणाम्

anyāsu caiva magrānāmāpatsu paravīrahā / sa eva saṃsmṛtaḥ sadyaḥ samuddhartābhavannṛṇām

हिन्दी अर्थ

कि इस प्रकृतिके बन्धनसे कैसे छूट सकूँगा। कैसे मेरा इस संसारमें फिर जन्म न हो? किस प्रकार मैं निर्गुण भावको प्राप्त होऊँ और कैसे सनातन ब्रह्मके साथ एकता प्राप्त करूँ? ब्रह्मन्! मुझे ऐसा ही उत्तम योग बताइये, जिससे मैं मुक्त हो सकूँ। इसके लिये आपके चरणोंमें मस्तक रखकर याचना करता हूँ; क्योंकि

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 27

अनष्टद्रव्यता चासीत् तस्मिन् शासति पार्थिवे ।तेनेष्टं बहुभिर्यज्ञैः समाप्तवरदक्षिणैः

anaṣṭadravyatā cāsīt tasmin śāsati pārthive / teneṣṭaṃ bahubhiryajñaiḥ samāptavaradakṣiṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

आप-जैसे संतोंका सड़ ही मनुष्योंका परम उपकार करनेवाला है।

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 28

तेनैव च तपस्तप्तं संग्रामेष्वभिचेष्टितम् ।तस्यार्धिमतिमानञ्च दृष्ट्वा प्राहाङ्गिरा मुनिः

tenaiva ca tapastaptaṃ saṃgrāmeṣvabhiceṣṭitam / tasyārdhimatimānañca dṛṣṭvā prāhāṅgirā muniḥ

हिन्दी अर्थ

दत्तात्रेयजी बोले--राजन्! योगीको ज्ञानकी प्राप्ति होकर जो उसका अज्ञानसे वियोग होता है, वही मुक्ति है और वही ब्रह्मके साथ एकता एवं प्राकृत गुणोंसे पृथक होना है। मुक्ति होती है योगसे। योग प्राप्त होता है सम्यक् ज्ञानसे, सम्यक् ज्ञान होता है वैराग्यजनक दुःखसे और दुःख होता है ममताके कारण

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 29

न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः ।यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा संग्रामे चातिचेष्चितैः

na nūnaṃ kārtavīryasya gatiṃ yāsyanti pārthivāḥ / yajñairdānaistapobhirvā saṃgrāme cāticeṣcitaiḥ

हिन्दी अर्थ

स्त्री, पुत्र, धन आदिमें चित्तकी आसक्ति होनेसे। अतः मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 30

दत्तात्रेयाद्दिन् यस्मिन् स प्रापर्धि नरेश्वरः ।तस्मिंस्तस्मिन् दिने यागं दत्तात्रेयस्य सो ऽकरोत्

dattātreyāddin yasmin sa prāpardhi nareśvaraḥ / tasmiṃstasmin dine yāgaṃ dattātreyasya so 'karot

हिन्दी अर्थ

पुरुष आसक्तिको दुःखका मूल समझकर यत्नपूर्वक त्याग दे। आसक्ति न होनेपर “यह मेरा है” ऐसी धारणा दूर हो जाती है। ममताका अभाव सुखका ही साधक है। वैराग्यसे सांसारिक विषयोंमें दोषका दर्शन होता है। ज्ञानसे वैराग्य और वैराग्यसे ज्ञान होता है। जहाँ रहना हो, वही घर है। जिससे जीवन चले,

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 31

तत्रैव च प्रजाः सर्वास्तस्मिन्नहनि भूपतेः ।तस्यर्धि परमां दृष्ट्वा यागं चक्रुः समाधिना

tatraiva ca prajāḥ sarvāstasminnahani bhūpateḥ / tasyardhi paramāṃ dṛṣṭvā yāgaṃ cakruḥ samādhinā

हिन्दी अर्थ

वही भोजन है और जिससे मोक्ष मिले, वही ज्ञान बताया गया है। इसके सिवा सब अज्ञान है। राजन! पुण्य और पापोंको भोग लेनेसे, नित्यकर्मोंका निष्कामभावसे अनुष्ठान करनेसे, अपूर्वका संग्रह न होनेसे तथा पूर्वजन्मके किये हुए कर्मोका क्षय हो जानेसे मनुष्य बारंबार देहके बन्धनमें नहीं पड़ता। राजन!

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 32

इत्येतत् तस्य माहात्म्यं दत्तात्रेयस्य धीमतः ।विष्णोश्चराचरगुरोरनन्तस्य महात्मनः

ityetat tasya māhātmyaṃ dattātreyasya dhīmataḥ / viṣṇoścarācaraguroranantasya mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

यह तुमसे ज्ञानके विषयमें कुछ बातें बतलायी गयीं। अब उस योगका वर्णन सुनो, जिसे प्राप्त कर योगी पुरुष सनातन ब्रह्मसे कभी पृथक् नहीं होता।

English

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अध्याय १९

श्लोक 33

प्रादुर्भावाः पुराणेषु कथ्यन्ते शार्ड्गधन्विनः ।अनन्तस्याप्रमेयस्य शङ्ख-चक्र-गदाभृतः

prādurbhāvāḥ purāṇeṣu kathyante śārḍgadhanvinaḥ / anantasyāprameyasya śaṅkha-cakra-gadābhṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

योगियोंको पहले आत्मा (बुद्धि)-के द्वारा आत्मा (मन)-को जीतनेकी चेष्टा करनी चाहिए; क्योंकि उसको जीतना बहुत कठिन है। अतः: उसपर विजय पानेके लिये सदा ही यत्न करना चाहिए। इसका उपाय बतलाता हूँ, सुनो। प्राणायामके द्वारा राग आदि दोषोंका, धारणाके द्वारा पापका, प्रत्याहारके३

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 34

एतस्य परमं रूपं यश्चिन्तयति मानवः ।स सुखी स च संसारात् समुत्तीर्णो ऽचिराद्भवेत्

etasya paramaṃ rūpaṃ yaścintayati mānavaḥ / sa sukhī sa ca saṃsārāt samuttīrṇo 'cirādbhavet

हिन्दी अर्थ

द्वारा विषयोंका और ध्यानके द्वारा ईश्वरविरोधी गुणोंका निवारण करे। जैसे पर्ववीय धातुओंको आगमें तपानेसे उनके दोष जल जाते हैं, उसी प्रकार प्राणायाम करनेसे इन्द्रियजनित दोष दूर हो जाते हैं। अत: योगके ज्ञाता पुरुषको पहले प्राणायामका ही साधन करना चाहिए। प्राण और अपानवायुको रोकनेका

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 35

सदैव वैष्णवानाञ्च भक्त्याहं सुलभो ऽस्मि भोः ।इत्येवं यस्य वै वाचस्तं कथं नाश्रयेज्जनः

sadaiva vaiṣṇavānāñca bhaktyāhaṃ sulabho 'smi bhoḥ / ityevaṃ yasya vai vācastaṃ kathaṃ nāśrayejjanaḥ

हिन्दी अर्थ

नाम ही प्राणायाम है। यह लघु, मध्य और उत्तरीयके भेदसे तीन प्रकारका बताया गया है। अलर्क! अब मैं उसकी मात्रा बतलाता हूँ, सुनो। लघु प्राणायाम बारह मात्राका होता है। इससे दूनी मात्राका मध्यम और तिगुनी मात्राका उत्तरीय अथवा उत्तम बताया गया है। पलकोंको उठाने और गिरानेमें जितना समय

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 36

अधर्मस्य विनाशाय धर्माचारार्थमेव च ।अनादिनिधनो देवः करोति स्थिति-पालनम्

adharmasya vināśāya dharmācārārthameva ca / anādinidhano devaḥ karoti sthiti-pālanam

हिन्दी अर्थ

लगता है, वही प्राणायामकी संख्याके लिये मात्रा कहा गया है। ऐसी ही बारह मात्राओंका लघुनामक प्राणायाम होता है। प्रथम प्राणायामके द्वारा स्वेद (पसीने)-को, मध्यमके द्वारा कम्पको और तृतीय प्राणायामके द्वारा विषादको जीते। इस प्रकार क्रमश: इन तीनों दोषोंपर विजय प्राप्त करे। जैसे सिंह, व्याप्र

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

अध्याय १९

श्लोक 37

तथैव जन्म चाख्यातमलर्कं कथयामि ते ।तथा च योगः कथितो दत्तात्रेयेण तस्य वै ।पितृभक्तस्य राजर्षेरलर्कस्य महात्मनः

tathaiva janma cākhyātamalarkaṃ kathayāmi te / tathā ca yogaḥ kathito dattātreyeṇa tasya vai / pitṛbhaktasya rājarṣeralarkasya mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

और हाथी सेवाके द्वारा कोमल हो जाते हैं, उनकी कठोरता दब जाती है, उसी प्रकार प्राणायाम करनेसे प्राण योगीके वशमें हो जाता है। जैसे हाथीवान मतवाले हाथीको भी वशमें करके उसे इच्छानुसार चलाता है, उसी प्रकार योगी वशमें किये हुए प्राणको अपनी इच्छाके अधीन रखता है। जैसे वशमें किया

English

A long time afterwards the kingS'atru-jit, having ruled tl earth worthily, underwent the law of Death. Then the cil

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 19
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.