Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
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अध्याय 20 / 90

Adhyaya 20

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पूर्ण अध्याय पाठ57 श्लोक

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अध्याय २०

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे दत्तात्रेयीये ऊनविंशो ऽध्यायः विंशो ऽध्यायः जड उवाच प्राग्बभूव महावीर्यः शत्रुजिन्नाम पार्थिवः ।तुतोष यस्य यज्ञेषु सोमावाप्त्या पुरन्दरः

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe dattātreyīye ūnaviṃśo 'dhyāyaḥ viṃśo 'dhyāyaḥ jaḍa uvāca prāgbabhūva mahāvīryaḥ śatrujinnāma pārthivaḥ / tutoṣa yasya yajñeṣu somāvāptyā purandaraḥ

हिन्दी अर्थ

हुआ सिंह केवल मृगोंको ही मारता है, मनुष्योंको नहीं, उसी प्रकार प्राणायामके द्वारा वशमें किया हुआ प्राण केवल पापोंका नाश करता है, मनुष्यके शरीरका नहीं। इसलिये योगी पुरुषको सदा प्राणायाममें संलग्न रहना चाहिए।

English

Now the queen trained up that son, as he grew day by di|

अध्याय २०

श्लोक 2

तस्यात्मजो महावीर्यो बभूवारिविदारणः ।बुद्धि-विक्रम-लावण्यैर्गुरुशक्राश्विभिः समः

tasyātmajo mahāvīryo babhūvārividāraṇaḥ / buddhi-vikrama-lāvaṇyairguruśakrāśvibhiḥ samaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन! ध्वस्ति, प्राप्ति, संवित् और प्रसाद--ये मोक्षरूपी फल प्रदान करनेवाली प्राणायामकी चार अवस्थाएँ हैं। अब क्रमश: इनके स्वरूपका वर्णन सुनो। जिस अवस्थामें शुभ और अशुभ सभी कर्मोका फल क्षीण हो जाय और चित्तकी वासना नष्ट हो जाय, उसका नाम ध्वस्ति” है। जब योगी इस लोक और

English

to unselfish thought by talking and other means. As \ regularly gained strength, as he gained his father’s intcli gence, even so he acquired knowledge of himself through li

अध्याय २०

श्लोक 3

स समानवयो-बुद्धि-सत्त्व-विक्रम-चेष्टितैः ।नृपपुत्रो नृपसुतैर्नित्यमास्ते समावृतः

sa samānavayo-buddhi-sattva-vikrama-ceṣṭitaiḥ / nṛpaputro nṛpasutairnityamāste samāvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

परलोकके भोगोंके प्रति लोभ और मोह उत्पन्न करनेवाली समस्त कामनाओंको रोककर सदा अपने-आपमें ही संतुष्ट रहता है, वह निरन्तर रहनेवाली “प्राप्ति' नामक अवस्था है। जिस समय योगी सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र तथा ग्रहोंके समान प्रभावशाली होकर उत्तम ज्ञान-सम्पत्ति प्राप्त करता है और उस ज्ञान-सम्पत्तिसे

English

mother’s talk. So the youth, instructed by her from li " birth, having understanding and being unselfish, did nti

अध्याय २०

श्लोक 4

कदाचिच्छास्त्रसम्भार-विवेककृतनिश्चयः ।कदाचित् काव्यसंलाप-गीत-नाटकसम्भवैः

kadācicchāstrasambhāra-vivekakṛtaniścayaḥ / kadācit kāvyasaṃlāpa-gīta-nāṭakasambhavaiḥ

हिन्दी अर्थ

भूत-भविष्यकी बातोंको तथा दूर स्थित एवं अदृश्य वस्तुओंको भी जान लेता है, उस समय प्राणायामकी 'संवित्” नामक अवस्था होती है। जिस प्राणायामसे मन, पाँच प्राणवायु, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके विषय प्रसादको प्राप्त होते हैं, वह उसकी “प्रसाद” अवस्था है।

English

A second son was bom to her. His father named hini

अध्याय २०

श्लोक 5

तथैवाक्षविनोदैश्च शस्त्रास्त्रविनयेषु च ।योग्यानि युद्धनागाश्व-स्यन्दनाभ्यासतत्परः

tathaivākṣavinodaiśca śastrāstravinayeṣu ca / yogyāni yuddhanāgāśva-syandanābhyāsatatparaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन! अब प्राणायामका लक्षण तथा योगाभ्यासमें निरन्तर प्रवृत्त रहनेवाले योगीके लिये विहित आसन बतलाता हूँ, सुनो। पद्मासन, अर्धासन, स्वस्तिकासन आदि आसनोंसे बैठकर मन-ही-मन प्रणवका चिन्तन करते हुए योगाभ्यास करे। शरीरको समभावसे रखे, आसन भी सम हो। दोनों पैरोंको

English

When the king named the third-bom son S'atru-mardai# she the beautiful-browed laughed again very long thereai

अध्याय २०

श्लोक 6

रेमे नरेन्द्रपुत्रो ऽसौ नरेन्द्रतनयैः सह ।यथैव हि दिवा तद्वद्रात्रवपि मुदा युतः

reme narendraputro 'sau narendratanayaiḥ saha / yathaiva hi divā tadvadrātravapi mudā yutaḥ

हिन्दी अर्थ

समेटकर दोनों जाँघोंको आगेकी ओर स्थिर करे। मुँहको बंद किये रहे। एड़ियोंको इस प्रकार रखे, जिससे वे लिड़ और अण्डकोषका स्पर्श न कर सकें। मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए स्थिर रहे। मस्तकको कुछ ऊँचा किये रहे। दाँतोंका दाँतोंसे स्पर्श न होने दे। अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि रखते

English

When the king named the third-bom son S'atru-mardai# she the beautiful-browed laughed again very long thereai

अध्याय २०

श्लोक 7

तेषां तु क्रीडतां तत्र द्विज-भूप-विशां सुताः ।समानवयसः प्रीत्या रन्तुमायान्त्यनेकशः

teṣāṃ tu krīḍatāṃ tatra dvija-bhūpa-viśāṃ sutāḥ / samānavayasaḥ prītyā rantumāyāntyanekaśaḥ

हिन्दी अर्थ

हुए अन्य दिशाओंकी ओर न देखे। रजोगुणसे तमोगुणकी और सत्त्वगुणसे रजोगुणकी वृत्तिको भलीभाँति आच्छादित करके निर्मल सत्त्वमें स्थित हो योगवेत्ता पुरुष योगका अभ्यास करे। इन्द्रिय, प्राण आदि और मनको उनके

English

The slender-limbed mother similarly instructed him alsofnffl childhood. Devoid of desire he performed ceremonies, not anything beneficial.

अध्याय २०

श्लोक 8

कस्यचित्त्वथ कालस्य नागलोकान्महीतलम् ।कुमारावागतौ नागौ पुत्रावश्वतरस्य तु

kasyacittvatha kālasya nāgalokānmahītalam / kumārāvāgatau nāgau putrāvaśvatarasya tu

हिन्दी अर्थ

लेता है, उसी प्रकार जो समस्त कामनाओंको संकुचित कर लेता है, वह निरन्तर आत्मामें ही रमण करनेवाला और एकमात्र परमात्मामें स्थित हुआ पुरुष अपने आत्मामें ही आत्माका साक्षात्कार करता है। विद्वान् पुरुष बाहर-भीतरकी शुद्धिका सम्पादन करके कण्ठसे लेकर नाभितक शरीरको प्राणवायुसे परिपूर्ण

English

separate existence of anger and the other Ifl

अध्याय २०

श्लोक 9

ब्रह्मरूपप्रतिच्छन्नौ तरुणौ प्रियदर्शनौ ।तौ तैर्नृपसुतैः सार्धं तथैवान्यैर्द्विजन्मभिः

brahmarūpapraticchannau taruṇau priyadarśanau / tau tairnṛpasutaiḥ sārdhaṃ tathaivānyairdvijanmabhiḥ

हिन्दी अर्थ

करते हुए प्राणायाम आरम्भ करे। प्राणायाम बारह हैं। उनन्‍्हींको धारणा भी कहते हैं। तत्त्वदर्शी योगियोंने योगमें दो धारणाएँ बतलायी हैं। उनके अनुसार योगमें प्रवृत्त हुए नियतात्मा योगीके सभी दोष नष्ट हो जाते हैं तथा वह स्वस्थ भी हो जाता है। वह परब्रह्म परमात्माको और प्राकृत गुणोंको पृथक्-पृथक् देखता है,

English

Being thus excellently addressed by the queen, the having great understanding, assented to his loved wife win

अध्याय २०

श्लोक 10

विनोदैर्विविधैस्तत्र तस्थतुः प्रीतिसंयुतौ ।सर्व च ते नृपसुतास्ते च ब्रह्मविशां सुताः

vinodairvividhaistatra tasthatuḥ prītisaṃyutau / sarva ca te nṛpasutāste ca brahmaviśāṃ sutāḥ

हिन्दी अर्थ

व्योमसे लेकर परमाणुतकका साक्षात्कार करता है तथा निष्पाप आत्माका भी

English

spoke correctly. And the fine-brewed lady spoke to that son, just as to the elder sons, what would arouse the intellect

अध्याय २०

श्लोक 11

नागराजात्मजौ तौ च स्त्रानसंवाहनादिकम् ।वस्त्रगन्धानुसयुक्तां चक्रुर्भागभुजिक्रियाम्

nāgarājātmajau tau ca strānasaṃvāhanādikam / vastragandhānusayuktāṃ cakrurbhāgabhujikriyām

हिन्दी अर्थ

दर्शन कर लेता है। इस प्रकार प्राणायामपरायण एवं मिताहारी योगी पुरुष धीरे- धीरे एक-एक भूमिको वशमें करके दूसरीपर पैर बढ़ाये, जैसे महलमें जाते समय एक-एक सीढ़ीको पार करके दूसरीपर चढ़ा जाता है। जो भूमि अपने वशमें नहीं हुई है, उसमें जानेसे वह दोष, रोग आदि दुःख तथा मोहको बढ़ाती

English

The king'said. to her. " Why dost thou deal thus, 0 fool one, with the tempeitoent of ray child, by giving him a mis-

अध्याय २०

श्लोक 12

अहन्यहन्यनुप्राप्ते तौ च नागकुमारकौ ।आजग्मतुर्मुदा युक्तौ प्रीत्या सूनोर्महीपतेः

ahanyahanyanuprāpte tau ca nāgakumārakau / ājagmaturmudā yuktau prītyā sūnormahīpateḥ

हिन्दी अर्थ

है; अतः उसपर न चढ़े। प्राणवायुके निरोधको प्राणायाम कहते हैं। अपने मनको संयममें रखनेवाले योगी पुरुष शब्दादि विषयोंकी ओर जानेवाली इन्द्रियोंको उनकी ओरसे योगद्वारा प्रत्याहृत--निवृत्त करते हैं, इसलिये यह प्रत्याहार

English

chievous education as tJbon didst before to my other song. K

अध्याय २०

श्लोक 13

स च ताभ्यां नृपसुतः परं निर्वाणमाप्तवान् ।विनोदैर्विविधैर्हास्य-संलापादिभिरेव च

sa ca tābhyāṃ nṛpasutaḥ paraṃ nirvāṇamāptavān / vinodairvividhairhāsya-saṃlāpādibhireva ca

हिन्दी अर्थ

योगी महर्षियोंने इस विषयमें ऐसा उपाय भी बताया है, जिससे योगाभ्यासी पुरुषको रोग आदि दोष नहीं होते। जैसे जलार्थी मनुष्य यन्त्र और नली आदिकी सहायतासे धीरे-धीरे जल पीते हैं, उसी प्रकार योगी पुरुष श्रमको जीतकर धीरे- धीरे वायुका पान करे। पहले नाभिमें, फिर हृदयमें, तदनन्तर तीसरे स्थान--

English

cepted, then restrain this son within the path 6^ activity. So and so the pinda offering to the pitfis will not cease, 0

अध्याय २०

श्लोक 14

विना ताभ्यां न बुभुजे न सस्त्रौ न पपौ मधु ।न रराम न जग्राह शास्त्राण्यात्मगुणर्धये

vinā tābhyāṃ na bubhuje na sastrau na papau madhu / na rarāma na jagrāha śāstrāṇyātmaguṇardhaye

हिन्दी अर्थ

वक्ष:स्थलमें। उसके बाद क्रमश: कण्ठ, मुख, नासिकाके अग्रभाग, नेत्र, भौंहोंके मध्यभाग तथा मस्तकमें प्राणवायुकी धारण करे। उसके बाद परब्रह्म परमात्मामें उसकी धारणा करनी चाहिए। यह सबसे उत्तम धारणा मानी गयी है। इन दसों धारणाओंको प्राप्त होकर योगी अविनाशी ब्रह्मकी सत्ताको प्राप्त होता है।

English

one. The pitris dwell in the Deva-loka, they are also bdP^i brutes, they become men likewise, and they reside within

अध्याय २०

श्लोक 15

रसातले च तौ रात्रिं विना तेन महात्मना ।निश्वासपरमौ नीत्वा जग्मतुस्तं दिने दिने

rasātale ca tau rātriṃ vinā tena mahātmanā / niśvāsaparamau nītvā jagmatustaṃ dine dine

हिन्दी अर्थ

राजन! सिद्धिकी इच्छा रखनेवाला योगी पुरुष बड़े आदरके साथ योगमें प्रवृत्त हो। वह अधिक खाये हुए अथवा खाली पेट, थका और व्याकुलचित्त न हो। जब अधिक सर्दी या अधिक गर्मी पड़ती हो, सुख-दुःख आदि द्वद्धोंकी प्रबलता हो अथवा बड़े जोरकी आँधी चलती हो, ऐसे अवसरोंपर ध्यानपरायण होकर

English

class of elements. By offering the pin^a and water a busied in the ceremonies, ever nourishes them, 0 fine-bra’*

अध्याय २०

श्लोक 16

मर्त्यलोके परा प्रीतिर्भवतोः केन पुत्रकौ ।सहेति पप्रच्छ पिता तावुभौ नागदारकौ

martyaloke parā prītirbhavatoḥ kena putrakau / saheti papraccha pitā tāvubhau nāgadārakau

हिन्दी अर्थ

योगका अभ्यास नहीं करना चाहिए। कोलाहलपूर्ण स्थानमें, आग और पानीके समीप, पुरानी गोशालामें, चौराहेपर, सूखे पत्तोंके ढेरपर, नदीमें, श्मशानभूमिमें, जहाँ सर्पोका निवास हो वहाँ, भयपूर्ण स्थानमें, कुएँके तटपर, मन्दिरमें तथा दीमकोंकी मिट्टीके ढेरपर--इन सब स्थानोंमें तत्त्वज्ञ पुरुष योगाभ्यास न करे।

English

one, both the righteous and the unrighteous, those wornl*^ with hunger, those harassed by thirst; he nourishes the w likewise and guests. The gods, mankind, the pitris, depa^

अध्याय २०

श्लोक 17

दृष्टयोरत्र पाताले बहूनि दिवसानि मे ।दिवा रजन्यामेवोभौ पश्यामि प्रियदर्शनौ

dṛṣṭayoratra pātāle bahūni divasāni me / divā rajanyāmevobhau paśyāmi priyadarśanau

हिन्दी अर्थ

जहाँ सात्विकभावकी सिद्धि न हो, ऐसे देश-कालका परित्याग करे। योगमें असत् वस्तुका दर्शन भी निषिद्ध है; अतः उसे भी छोड़ दे। जो मूर्खतावश उक्त स्थानोंकी परवा न करके वहीं योगाभ्यास आरम्भ करता है, उसके कार्यमें विघ्न डालनेके लिये बहरापन, जडता, स्मरणशक्तिका नाश, गूँगापन, अंधापन और

English

spirits, goblins, and guhyakas, birds, worms and insects Ij^ upon man indeed. Therefore, 0 slender-limbed, cause my

अध्याय २०

श्लोक 18

जड उवाच इति पित्रा स्वयं पृष्टौ प्रणिपत्य कृताञ्जली ।प्रत्यूचतुर्महाभागावुरगाधिपतेः सुतौ

jaḍa uvāca iti pitrā svayaṃ pṛṣṭau praṇipatya kṛtāñjalī / pratyūcaturmahābhāgāvuragādhipateḥ sutau

हिन्दी अर्थ

ज्वर आदि अनेक दोष तत्काल प्रकट होते हैं।

English

to acquire thoroughly the whole duty of kshatriyas, as r gards this life and life in the next world."

अध्याय २०

श्लोक 19

पुत्रावूचतुः पुत्रः शत्रुजितस्तात नाम्ना ख्यात ऋतध्वजः ।रूपवानार्जवोपेतः शूरो मानी प्रियंवदः

putrāvūcatuḥ putraḥ śatrujitastāta nāmnā khyāta ṛtadhvajaḥ / rūpavānārjavopetaḥ śūro mānī priyaṃvadaḥ

हिन्दी अर्थ

यदि प्रमादवश योगीके सामने ये दोष प्रकट हों तो उनका नाश करनेके लिये जिस चिकित्साकी आवश्यकता है, उसे सुनो। यदि वातरोग, गुल्मरोग, उदावर्त (गुदा-सम्बन्धी रोग) तथा और कोई उदरसम्बन्धी रोग हो जाय तो उसकी शान्तिके लिये घी मिलायी हुई जौकी गरम-गरम लप्सी खा ले अथवा केवल

English

band, apoko to her son Alarka, with prattling word " Thrive my son! rejoice my husband’s mind with thy de^d

अध्याय २०

श्लोक 20

अनापृष्टकथो वाग्ग्मी विद्वान् मैत्रो गुणाकरः ।मान्यमानयिता धीमान् ह्रीमान् विनयभूषणः

anāpṛṣṭakatho vāggmī vidvān maitro guṇākaraḥ / mānyamānayitā dhīmān hrīmān vinayabhūṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

उसकी धारणा करे। वह रुकी हुई वायुको निकालती और वायुगोलाको दूर करती है। इसी प्रकार जब शरीरमें कम्प पैदा हो तो मनमें बड़े भारी पर्वतकी धारणा करे। बोलनेमें रुकावट होनेपर वाग्देवीकी और बहरापन आनेपर श्रवणशक्तिकी धारणा करे। इसी प्रकार प्याससे पीड़ित होनेपर ऐसी धारणा करे

English

in order to benefit friends and destroy enemies. Happy hi thou, my son, who alone, with never an enemy, wilt long pr( tect the earth: from protecting it mayest thou have fu! enjoyment of happiness, and from righteousness thou shal

अध्याय २०

श्लोक 21

तस्योपचारसम्प्रीति-सम्बोगापहृतं मनः ।नागलोके भुवर्लोके न रतिं विन्दते पितः

tasyopacārasamprīti-sambogāpahṛtaṃ manaḥ / nāgaloke bhuvarloke na ratiṃ vindate pitaḥ

हिन्दी अर्थ

कि जिह्वापर आमका फल रखा हुआ है और उससे रस मिल रहा है। तात्पर्य यह कि जिस-जिस अड्में रोग पैदा हो, वहाँ-वहाँ उसमें लाभ पहुँचानेवाली धारणा करे। गर्मीमें सर्दीकी और सर्दीमें गर्मीकी धारणा करे। धारणाके द्वारा ही अपने मस्तकपर काठकी कील रखकर दूसरे काष्ठके द्वारा उसे ठोंकनेकी

English

OAKTO xirr.

अध्याय २०

श्लोक 22

तद्वियोगेन नस्तात ! न पातालञ्च शीतलम् ।परितापाय तत्सङ्गादाह्लादाय रविर्दिवा

tadviyogena nastāta ! na pātālañca śītalam / paritāpāya tatsaṅgādāhlādāya ravirdivā

हिन्दी अर्थ

भावना करे। इससे योगीकी लुप्त हुई स्मरणशक्तिका तत्काल ही आविर्भाव हो जाता है। इसके सिवा सर्वत्र व्यापक झुलोक, पृथ्वी, वायु और अग्निकी भी धारणा करे। इससे अमानवीय शक्तियों तथा जीव-जन्तुओंसे होनेवाली बाधाओंकी चिकित्सा होती है। यदि कोई मानवेतर जीव योगीके भीतर प्रवेश

English

Creatures are crashed by creatures; how can the inootp- real be crushed? This fancy is meaningless because of tjJ

अध्याय २०

श्लोक 23

पितोवाच पुत्रः पुण्यवतो धन्यः स यस्यैवं भविद्विधैः ।परोक्षस्यापि गुणिभैः क्रियते गुणकीर्तनम्

pitovāca putraḥ puṇyavato dhanyaḥ sa yasyaivaṃ bhavidvidhaiḥ / parokṣasyāpi guṇibhaiḥ kriyate guṇakīrtanam

हिन्दी अर्थ

कर जाय तो वह वायु और अग्निकी धारणा करके उसे अपने शरीरके भीतर ही जला डाले। राजन! इस प्रकार योगवेत्ता पुरुषको सब प्रकारसे अपनी रक्षा करनी चाहिए। क्योंकि यह शरीर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष--चारों पुरुषार्थोंका

English

separate existence of anger and the other Ifl

अध्याय २०

श्लोक 24

सन्ति शास्त्रविदो ऽशीलाः सन्ति मूर्खाः सुशीलिनः ।शास्त्रशीले समं मन्ये पुत्रौ धन्यतरन्तु तम्

santi śāstravido 'śīlāḥ santi mūrkhāḥ suśīlinaḥ / śāstraśīle samaṃ manye putrau dhanyatarantu tam

हिन्दी अर्थ

योग-प्रवृत्तिके लक्षणोंको बतलाने तथा उनपर गर्व करनेसे योगीका विज्ञान लुप्त हो जाता है; इसलिये उन प्रवृत्तियोंको गुप्त ही रखना चाहिए। चज्चलताका न होना, नीरोग रहना, निछ्लुरता न धारण करना, उत्तम सुगन्धका आना, मल-मूत्र कम होना, शरीरमें कान्ति, मनमें प्रसन्नता और वाणीके स्वरमें

English

Being thus excellently addressed by the queen, the having great understanding, assented to his loved wife win

अध्याय २०

श्लोक 25

तस्य मित्रगुणान् मित्राण्यमित्राश्च पराक्रमम् ।कथयन्ति सदा सत्सु पुत्रवांस्तेन वै पिता

tasya mitraguṇān mitrāṇyamitrāśca parākramam / kathayanti sadā satsu putravāṃstena vai pitā

हिन्दी अर्थ

कोमलताका उदय होना--ये सब योगप्रवृत्तिके प्रारम्भिक चिह्न हैं। यदि योगीको देखकर लोगोंके मनमें अनुराग हो, परोक्षमें सब लोग उसके गुणोंका बखान करने लगें और कोई भी जीव-जन्तु उससे भयभीत न हो तो यह योगमें सिद्धि प्राप्त होनेकी उत्तम पहचान है। जिसे अत्यन्त भयानक सर्दी-गर्मी आदिसे कोई

English

spoke correctly. And the fine-brewed lady spoke to that son, just as to the elder sons, what would arouse the intellect

अध्याय २०

श्लोक 26

तस्योपकारिणः कच्चिद् भवद्भ्यामभिवाञ्छितम् ।किञ्चिन्निष्पादितं वत्सौ परितोषाय चेतसः

tasyopakāriṇaḥ kaccid bhavadbhyāmabhivāñchitam / kiñcinniṣpāditaṃ vatsau paritoṣāya cetasaḥ

हिन्दी अर्थ

कष्ट नहीं होता तथा जो दूसरोंसे भयभीत नहीं होता, सिद्धि उसके निकट खड़ी

English

The king'said. to her. " Why dost thou deal thus, 0 fool one, with the tempeitoent of ray child, by giving him a mis-

अध्याय २०

श्लोक 27

स धन्यो जीवितं तस्य तस्य जन्म सुजन्मनः ।यस्यार्थिनो न विमुखा मित्रार्थो न च दुर्बलः

sa dhanyo jīvitaṃ tasya tasya janma sujanmanaḥ / yasyārthino na vimukhā mitrārtho na ca durbalaḥ

हिन्दी अर्थ

धनधान्यमहापत्रो नैककालप्रवर्धितः । पुण्यापुण्याग्रपुष्पश्चन सुखदु:खमहाफल: ।। तत्र मुक्तिपथव्यापी मूढसम्पर्कसेचन: । विधित्सा भूड़मालाढ्यो हद्यज्ञानमहातरु: ।।

English

chievous education as tJbon didst before to my other song. K

अध्याय २०

श्लोक 28

मद्गृहे यद् सुवर्णादि रत्नं वाहनमासनम् ।यच्चान्यत् प्रीतये तस्य तद्देयमविशङ्कया

madgṛhe yad suvarṇādi ratnaṃ vāhanamāsanam / yaccānyat prītaye tasya taddeyamaviśaṅkayā

हिन्दी अर्थ

प्राप्य ब्रह्मवनं शीत॑ं नीरजस्कमकण्टकम् । प्राप्तुवन्ति परां प्राज्ञा निर्वृतिं वृत्तिवर्जिता: ।।

English

cepted, then restrain this son within the path 6^ activity. So and so the pinda offering to the pitfis will not cease, 0

अध्याय २०

श्लोक 29

धिक् तस्य जीवितं पुंसो मित्राणामुपकारिणाम् ।प्रतिरूपमकुर्वन् यो जीवामीत्यवगच्छति

dhik tasya jīvitaṃ puṃso mitrāṇāmupakāriṇām / pratirūpamakurvan yo jīvāmītyavagacchati

हिन्दी अर्थ

३. देशबन्धश्रित्तस्य धारणा--किसी एक स्थानमें चित्तको बाँधना अर्थात् परमात्मामें मनको स्थापित करना “धारणा” है। २. इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटाकर चित्तमें लीन करना 'प्रत्याहार' कहलाता है।

English

one. The pitris dwell in the Deva-loka, they are also bdP^i brutes, they become men likewise, and they reside within

अध्याय २०

श्लोक 30

उपकारं सुहृद्वर्गे यो ऽपकारञ्च शत्रुषु ।नृमेघो वर्षति प्राज्ञास्तस्येच्छन्ति सदोन्नतिम्

upakāraṃ suhṛdvarge yo 'pakārañca śatruṣu / nṛmegho varṣati prājñāstasyecchanti sadonnatim

हिन्दी अर्थ

योगके विघ्न, उनसे बचनेके उपाय, सात धारणा, आठ ऐश्वर्य तथा योगीकी मुक्ति

English

class of elements. By offering the pin^a and water a busied in the ceremonies, ever nourishes them, 0 fine-bra’*

अध्याय २०

श्लोक 31

पुत्रावूचतुः किं तस्य कृतकृत्यस्य कर्तुं शक्येत केनचित् ।यस्य सर्वार्थिनो गेहे सर्वकामैः सदार्च्चिताः

putrāvūcatuḥ kiṃ tasya kṛtakṛtyasya kartuṃ śakyeta kenacit / yasya sarvārthino gehe sarvakāmaiḥ sadārccitāḥ

हिन्दी अर्थ

दत्तात्रेयजी कहते हैं--आत्मसाक्षात्कारके समय योगी पुरुषके समक्ष जो विधघ्न उपस्थित होते हैं, उनका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ; सुनो। उस समय वह सकाम कर्म करना चाहता है और मानवीय भोगोंकी अभिलाषा करता है। दानके उत्तमोत्तम फल, स्त्री, विद्या, माया, सोना-चाँदी आदि धन, सोने आदिके अतिरिक्त वैभव, स्वर्गलोक, देवत्व, इन्द्रत्व,

English

one, both the righteous and the unrighteous, those wornl*^ with hunger, those harassed by thirst; he nourishes the w likewise and guests. The gods, mankind, the pitris, depa^

अध्याय २०

श्लोक 32

यानि रत्नानि तद्गेहे पाताले तानि नः कुतः ।वाहनासनयानानि भूषणान्यम्बराणि च

yāni ratnāni tadgehe pātāle tāni naḥ kutaḥ / vāhanāsanayānāni bhūṣaṇānyambarāṇi ca

हिन्दी अर्थ

रसायनसंग्रह, उसे बनानेकी क्रियाएँ, हवामें उड़नेकी शक्ति, यज्ञ, जल और अम्निमें प्रवेश करना, श्राद्धों तथा समस्त दानोंका फल तथा नियम, व्रत, इष्ट, पूर्त एवं देव-पूजा आदिसे मिलनेवाले फलोंकी इच्छा करता है। जब चित्तकी ऐसी अवस्था हो तो योगी उसे कामनाओंकी ओरसे हटाये और परब्रह्मके चिन्तनमें लगाये। ऐसा करनेपर उसे विषध्नोंसे

English

spirits, goblins, and guhyakas, birds, worms and insects Ij^ upon man indeed. Therefore, 0 slender-limbed, cause my

अध्याय २०

श्लोक 33

विज्ञानं तत्र यच्चास्ति तदन्यत्र न विद्यते ।प्राज्ञानामप्यसौ तात सर्वसन्देहहृत्तमः

vijñānaṃ tatra yaccāsti tadanyatra na vidyate / prājñānāmapyasau tāta sarvasandehahṛttamaḥ

हिन्दी अर्थ

छुटकारा मिल जाता है।

English

to acquire thoroughly the whole duty of kshatriyas, as r gards this life and life in the next world."

अध्याय २०

श्लोक 34

एकं तस्यास्ति कर्तव्यमसाध्यं तच्च नौ मतम् ।हिरण्यगर्भ-गोविन्द-शर्वादीनीश्वरादृते

ekaṃ tasyāsti kartavyamasādhyaṃ tacca nau matam / hiraṇyagarbha-govinda-śarvādīnīśvarādṛte

हिन्दी अर्थ

इन विघ्नोंपर विजय पा लेनेके बाद योगीके सामने फिर दूसरे-दूसरे सात््विक, राजस और तामस विध्न उपस्थित होते हैं। प्रातिभ, श्रावण, हैव, भ्रम और आवर्त-ये पाँच उपसर्ग योगियोंके योगमें विघ्न डालनेके लिये प्रकट होते हैं। इनका परिणाम बड़ा कटु होता है। जब सम्पूर्ण वेदोंके अर्थ, काव्य और शास्त्रोंके अर्थ, सम्पूर्ण विद्याएँ और शिल्पकला

English

band, apoko to her son Alarka, with prattling word " Thrive my son! rejoice my husband’s mind with thy de^d

अध्याय २०

श्लोक 35

पितोवाच पथापि श्रोतुमिच्छामि तस्य यद् कार्यमुत्तमम् ।असाध्यमथवा साध्यं किं वासाध्यं विपश्चिताम्

pitovāca pathāpi śrotumicchāmi tasya yad kāryamuttamam / asādhyamathavā sādhyaṃ kiṃ vāsādhyaṃ vipaścitām

हिन्दी अर्थ

आदि अपने-आप योगीकी समझमें आ जायाँ तो प्रतिभासे सम्बन्ध रखनेके कारण वह “प्रातिभ” उपसर्ग कहलाता है। जब योगी सहस्रों योजन दूरसे भी सम्पूर्ण शब्दोंको सुनने और उनके अभिप्रायको समझने लगता है, तब वह श्रवण-शक्तिसे सम्बन्ध रखनेके कारण “श्रावण” उपसर्ग कहा जाता है। जब वह देवताओंकी भाँति आठों दिशाओंकी वस्तुओंको

English

in order to benefit friends and destroy enemies. Happy hi thou, my son, who alone, with never an enemy, wilt long pr( tect the earth: from protecting it mayest thou have fu! enjoyment of happiness, and from righteousness thou shal

अध्याय २०

श्लोक 36

देवत्वममरेशत्वं तत्पूज्यत्वञ्च मानवाः ।प्रयान्ति वाञ्छितं वान्यद् दृढं ये व्यवसायिनः

devatvamamareśatvaṃ tatpūjyatvañca mānavāḥ / prayānti vāñchitaṃ vānyad dṛḍhaṃ ye vyavasāyinaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रत्यक्ष देखने लगता है, तब उसे 'हैव” उपसर्ग कहते हैं। जब योगीका मन दोषके कारण सब प्रकारके आचारोंसे भ्रष्ट हो निराधार भटकने लगता है, तब वह “भ्रम” कहलाता है। जलमें उठती हुई भँवरकी तरह जब ज्ञानका आवर्त सब ओर व्याप्त होकर चित्तको नष्ट कर देता है, तब वह “आवर्त” नामक उपसर्ग कहा जाता है। इन महाघोर उपसर्गोंसे योगका नाश

English

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अध्याय २०

श्लोक 37

नाविज्ञातं न चागम्यं नाप्राप्यं दिवि चेह वा ।उद्यतानां मनुष्याणां यतचित्तेन्द्रियात्मनाम्

nāvijñātaṃ na cāgamyaṃ nāprāpyaṃ divi ceha vā / udyatānāṃ manuṣyāṇāṃ yatacittendriyātmanām

हिन्दी अर्थ

हो जानेके कारण सम्पूर्ण योगी देवतुल्य होकर भी बारंबार आवागमनके चक्रमें घूमते हैं। इसलिये योगी पुरुष शुद्ध मनोमय उज्ज्वल कंबल ओढ़कर परब्रह्म परमात्मामें मनको लगाकर सदा उन्हींका चिन्तन करे।

English

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अध्याय २०

श्लोक 38

योजनानां सहस्राणि व्रजन् याति पितीलिकः ।अगच्छन् वैनतेयो ऽपि पादमेकं न गच्छति

yojanānāṃ sahasrāṇi vrajan yāti pitīlikaḥ / agacchan vainateyo 'pi pādamekaṃ na gacchati

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी आदि सात प्रकारकी सूक्ष्म धारणाएँ हैं, जिन्हें योगी मस्तकमें धारण करे। सबसे पहले पृथ्वीकी धारणा है। उसे धारण करनेसे योगीको सुख प्राप्त होता है। वह अपनेको साक्षात् पृथ्वी मानता है, अतः पार्थिव विषय गन्धका त्याग कर देता है। इसी प्रकार वह जलकी धारणासे सूक्ष्म रसका, तेजकी धारणासे सूक्ष्म रूपका, वायुकी धारणासे स्पर्शका

English

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अध्याय २०

श्लोक 39

क्व भूतलं क्व च ध्रौव्यं स्थानं यत् प्राप्तवान् ध्रुवः ।उत्तानपादनृपतेः पुत्रः सन् भूमिगोचरः

kva bhūtalaṃ kva ca dhrauvyaṃ sthānaṃ yat prāptavān dhruvaḥ / uttānapādanṛpateḥ putraḥ san bhūmigocaraḥ

हिन्दी अर्थ

तथा आकाशकी धारणासे सूक्ष्म प्रवृत्ति तथा शब्दका त्याग करता है। जब अपने मनसे

English

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अध्याय २०

श्लोक 40

तत् कथ्यतां महाभाग कार्यवान् येन पुत्रकौ ।स भूपालसुतः साधुर्येनानृण्यं भवेत वाम्

tat kathyatāṃ mahābhāga kāryavān yena putrakau / sa bhūpālasutaḥ sādhuryenānṛṇyaṃ bhaveta vām

हिन्दी अर्थ

धारणाके द्वारा सम्पूर्ण भूतोंके मनमें प्रवेश करता है, तब उस मानसी धारणाको धारण करनेके कारण उसका मन अत्यन्त सूक्ष्म हो जाता है। इसी प्रकार योगवेत्ता पुरुष सम्पूर्ण जीवोंकी बुद्धिमें प्रवेश करके परम उत्तम सूक्ष्म बुद्धिको प्राप्त करता और फिर उसे त्याग देता है। अलर्क! जो योगी इन सातों सूक्ष्म धारणाओंका अनुभव करके उन्हें त्याग देता है,

English

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अध्याय २०

श्लोक 41

पुत्रावूचतुः तेनाख्यातमिदं तात पूर्ववृतं महात्मना ।कौमारके यथा तस्य वृतं सद्वृत्तशालिनः

putrāvūcatuḥ tenākhyātamidaṃ tāta pūrvavṛtaṃ mahātmanā / kaumārake yathā tasya vṛtaṃ sadvṛttaśālinaḥ

हिन्दी अर्थ

उसको इस संसारमें फिर नहीं आना पड़ता। जितात्मा पुरुष क्रमश: इन सातों धारणाओंके सूक्ष्म रूपको देखे और त्याग करता जाय। ऐसा करनेसे वह परम सिद्धिको प्राप्त होता है। राजन! योगी पुरुष जिस-जिस भूतमें राग करता है, उसी-उसीमें आसक्त होकर नष्ट हो जाता है। इसलिये इन समस्त सूक्ष्म भूतोंको परस्पर संसक्त जानकर जो इन्हें त्याग देता है,

English

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अध्याय २०

श्लोक 42

तन्तु शत्रुजितं तात पूर्वं कश्चिदिद्वजोत्तमः ।गालवो ऽभ्यागमद्धीमान् गृहीत्वा तुरगोत्तमम्

tantu śatrujitaṃ tāta pūrvaṃ kaścididvajottamaḥ / gālavo 'bhyāgamaddhīmān gṛhītvā turagottamam

हिन्दी अर्थ

उसे परमपदकी प्राप्ति होती है। पाँचों भूत और मन-बुद्धिके इन सातों सूक्ष्म रूपोंका विचार कर लेनेपर उनके प्रति वैराग्य होता है, जो सद्धावका ज्ञान रखनेवाले पुरुषकी मुक्तिका कारण बनता है। जो गन्ध आदि विषयोंमें आसक्त होता है, उसका विनाश हो जाता है और उसे बारंबार संसारमें जन्म लेना पड़ता है। योगी पुरुष इन सातों धारणाओंको जीत लेनेके

English

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अध्याय २०

श्लोक 43

प्रत्युवाच च राजानं समुपेत्याश्रमं मम ।को ऽपि दैत्याधमो राजन् विध्वंसयति पापकृत्

pratyuvāca ca rājānaṃ samupetyāśramaṃ mama / ko 'pi daityādhamo rājan vidhvaṃsayati pāpakṛt

हिन्दी अर्थ

बाद यदि चाहे तो किसी भी सूक्ष्म भूतमें लीन हो सकता है। देवता, असुर, गन्धर्व, नाग और राक्षसोंके शरीरमें भी वह लीन हो जाता है, किन्तु कहीं भी आसक्त नहीं होता।

English

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अध्याय २०

श्लोक 44

तत्तद्रूपं समास्थाय सिंहेभ-वनचारिणाम् ।अन्येषाञ्चाल्पकायानामहर्निशमकारणात्

tattadrūpaṃ samāsthāya siṃhebha-vanacāriṇām / anyeṣāñcālpakāyānāmaharniśamakāraṇāt

हिन्दी अर्थ

अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और कामावसायित्व--इन आठ ईश्वरीय गुणोंको जो निर्वाणकी सूचना देनेवाले हैं, योगी प्राप्त करता है। सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म रूप धारण करना “अणिमा' है और शीतघ्र-से-शीघ्र कोई काम कर लेना “लघिमा' नामक गुण है। सबके लिये पूजनीय हो जाना “महिमा” कहलाता है। जब कोई भी वस्तु

English

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अध्याय २०

श्लोक 45

समाधिध्यानयुक्तस्य मौनव्रतरतस्य च ।तथा करोति विघ्रानि यथा चलति मे मनः

samādhidhyānayuktasya maunavrataratasya ca / tathā karoti vighrāni yathā calati me manaḥ

हिन्दी अर्थ

अप्राप्य न रहे तो वह 'प्राप्ति' नामक सिद्धि है। सर्वत्र व्यापक होनेसे योगीको “प्राकाम्य/ नामक सिद्धिकी प्राप्ति मानी जाती है। जब वह सब कुछ करनेमें समर्थ--ईश्वर हो जाता है तो उसकी वह सिद्धि “ईशित्व” कहलाती है। सबको वशमें कर लेनेसे “वशित्व” की सिद्धि होती है। यह योगीका सातवाँ गुण है। जिसके द्वारा इच्छाके अनुसार कहीं भी रहना आदि

English

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अध्याय २०

श्लोक 46

दग्धं कोपाग्निना सद्यः समर्थस्त्वं वयं न तु ।दुः खार्जितस्य तपसो व्ययमिच्छामि पार्थिव

dagdhaṃ kopāgninā sadyaḥ samarthastvaṃ vayaṃ na tu / duḥ khārjitasya tapaso vyayamicchāmi pārthiva

हिन्दी अर्थ

सब काम हो सके, उसका नाम “कामावसायित्व' है। ये ऐश्वर्यके साधनभूत आठ गुण हैं।

English

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अध्याय २०

श्लोक 47

एकदा तु मया राजन्नतिनिर्विण्णचेतसा ।तत् क्लेशितेन निश्वासो निरीक्ष्यासुरमुज्झितः

ekadā tu mayā rājannatinirviṇṇacetasā / tat kleśitena niśvāso nirīkṣyāsuramujjhitaḥ

हिन्दी अर्थ

मुक्त होनेसे उसका कभी जन्म नहीं होता। वह वृद्धि और नाशको भी नहीं प्राप्त होता। न तो उसका क्षय होता है और न परिणाम। पृथ्वी आदि भूतसमुदायसे न तो वह काटा जाता है, न भीगकर गलता है, न जलता है और न सूखता ही है। शब्द आदि विषय भी उसको लुभा नहीं सकते। उसके लिये शब्द आदि विषय हैं ही नहीं। न तो वह उनका भोक्ता

English

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अध्याय २०

श्लोक 48

ततो ऽम्बरतलात् सद्यः पतितो ऽयं तुरङ्गमः ।वाक् चाशरीरिणी प्राह नरनाथ शृणुष्व ताम्

tato 'mbaratalāt sadyaḥ patito 'yaṃ turaṅgamaḥ / vāk cāśarīriṇī prāha naranātha śṛṇuṣva tām

हिन्दी अर्थ

है और न उनसे उसका संयोग होता है। जैसे अन्य खोटे द्रव्योंसे मिला और खण्ड-खण्ड हुआ सुवर्ण जब आगमें तपाया जाता है, तब उसका दोष जल जाता है और वह शुद्ध होकर अपने दूसरे टुकड़ोंसे मिलकर एक हो जाता है, उसी प्रकार यत्नशील योगी जब योगाग्निसे तपता है, तब अन्तःकरणके समस्त दोष जल जानेके कारण ब्रह्मके साथ एकताको प्राप्त

English

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अध्याय २०

श्लोक 49

अश्रान्तः सकलं भूमेर्वलयं तुरगोत्तमः ।समर्थः क्रान्तुमर्केण तवायं प्रतिपादितः

aśrāntaḥ sakalaṃ bhūmervalayaṃ turagottamaḥ / samarthaḥ krāntumarkeṇa tavāyaṃ pratipāditaḥ

हिन्दी अर्थ

हो जाता है। फिर वह किसीसे पृथक् नहीं रहता। जैसे आगमें डाली हुई आग उसमें मिलकर एक हो जाती है, उसका वही नाम और वही स्वरूप हो जाता है, फिर उसको

English

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अध्याय २०

श्लोक 50

पातालाम्बरतोयेषु न चास्य विहता गतिः ।समस्तदिक्षु व्रजतो न भङ्गः पर्वतेष्वपि

pātālāmbaratoyeṣu na cāsya vihatā gatiḥ / samastadikṣu vrajato na bhaṅgaḥ parvateṣvapi

हिन्दी अर्थ

विशेष रूपसे पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी तरह जिसके पाप दग्ध हो गये हैं, वह योगी परब्रह्मके साथ एकताको प्राप्त होनेपर फिर कभी उनसे पृथक् नहीं होता। जैसे जलमें डाला हुआ जल उसके साथ मिलकर एक हो जाता है, उसी प्रकार योगीका आत्मा परमात्मामें मिलकर तदाकार हो जाता है।

English

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अध्याय २०

श्लोक 51

यतो भूवलयं सर्वमश्रान्तो ऽयं चरिष्यति ।अतः कुवलयो नाम्ना ख्यातिं लोके प्रयास्यति

yato bhūvalayaṃ sarvamaśrānto 'yaṃ cariṣyati / ataḥ kuvalayo nāmnā khyātiṃ loke prayāsyati

हिन्दी अर्थ

योगचर्या, प्रणवकी महिमा तथा अरिष्टोंका वर्णन और उनसे सावधान होना

English

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अध्याय २०

श्लोक 52

क्लिश्यत्यहर्निशं पापो यश्च त्वां दानवाधमः ।तमप्येनं समारुह्य द्विजश्रेष्ठ हनिष्यति

kliśyatyaharniśaṃ pāpo yaśca tvāṃ dānavādhamaḥ / tamapyenaṃ samāruhya dvijaśreṣṭha haniṣyati

हिन्दी अर्थ

अलर्क बोले--भगवन्! अब मैं योगीके आचार-व्यवहारका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ। वह किस प्रकार ब्रह्मके मार्गकका अनुसरण करके कभी क्लेशमें नहीं पड़ता?

English

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अध्याय २०

श्लोक 53

शत्रुजिन्नाम भूपालस्तस्य पुत्र ऋतध्वजः ।प्राप्यैतदश्वरत्नञ्च ख्यातिमेतेन यास्यति

śatrujinnāma bhūpālastasya putra ṛtadhvajaḥ / prāpyaitadaśvaratnañca khyātimetena yāsyati

हिन्दी अर्थ

दत्तात्रयजीने कहा--राजन्! ये जो मान और अपमान हैं, ये साधारण मनुष्योंको प्रसन्नता और उद्धेग देनेवाले होते हैं। उन्हें मानसे प्रसन्नता और अपमानसे उद्वेग होता है किन्तु योगी उन दोनोंको ही ठीक उलटे अर्थमें ग्रहण करता है। अतः वे उसकी सिद्धिमें सहायक होते हैं। योगीके लिये मान और अपमानको विष एवं अमृतके रूपमें बताया गया

English

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अध्याय २०

श्लोक 54

सो ऽहं त्वां समनुप्राप्तस्तपसो विघ्रकारिणम् ।तं निवारय भूपाल भागभाङ्नृपतिर्यतः

so 'haṃ tvāṃ samanuprāptastapaso vighrakāriṇam / taṃ nivāraya bhūpāla bhāgabhāṅnṛpatiryataḥ

हिन्दी अर्थ

है। इनमें अपमान तो अमृत है और मान भयंकर विष। योगी मार्गको भलीभाँति देखकर पैर रखे। वस्त्रसे छानकर जल पीये, सत्य वचन बोले और बुद्धिसे विचार करके जो ठीक जान

English

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अध्याय २०

श्लोक 55

तदेतश्वरत्नं ते मया भूप निवेदितम् ।पुत्रमाज्ञापय तथा यथा धर्मो न लुप्यते

tadetaśvaratnaṃ te mayā bhūpa niveditam / putramājñāpaya tathā yathā dharmo na lupyate

हिन्दी अर्थ

पड़े, उसीका चिन्तन करे।- योगवेत्ता पुरुष आतिथ्य, श्राद्ध, यज्ञ, देवयात्रा तथा उत्सवोंमें न जाय। कार्यकी सिद्धिके लिये किसी बड़े आदमीके यहाँ भी कभी न जाय। जब गृहस्थके यहाँ रसोई-घरसे धुआँ न निकलता हो, आग बुझ गयी हो और घरके सब लोग खा-पी चुके हों, उस समय योगी भिक्षाके लिये जाय; परन्तु प्रतिदिन एक ही घरपर न जाय। योगमें

English

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अध्याय २०

श्लोक 56

स तस्य वचनाद्राजा तं वै पुत्रमृतध्वजम् ।तमश्वरत्नमारोप्य कृतकौतुकमङ्गलम्

sa tasya vacanādrājā taṃ vai putramṛtadhvajam / tamaśvaratnamāropya kṛtakautukamaṅgalam

हिन्दी अर्थ

प्रवृत्त रहनेवाला पुरुष सत्पुरुषोंके मार्गको कलड्कित न करते हुए प्राय: ऐसा व्यवहार करे, जिससे लोग उसका सम्मान न करें, तिरस्कार ही करें। वह गृहस्थोंके यहाँसे अथवा घूमते- फिरते रहनेवाले लोगोंके घरोंसे भिक्षा ग्रहण करे; इनमें भी पहली अर्थात् गृहस्थके घरकी भिक्षा ही सर्वश्रेष्ठ एवं मुख्य है। जो गृहस्थ विनीत, श्रद्धालु, जितेन्द्रिय, श्रोत्रिय एवं उदार

English

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अध्याय २०

श्लोक 57

अप्रेषयत धर्मात्मा गालवेन समं तदा ।स्वमाश्रमपदं सो ऽपि तमादाय ययौ मुनिः

apreṣayata dharmātmā gālavena samaṃ tadā / svamāśramapadaṃ so 'pi tamādāya yayau muniḥ

हिन्दी अर्थ

हृदयवाले हों, उन्हींके यहाँ योगीको सदा भिक्षाके लिये जाना चाहिए। इनके बाद जो दुष्ट और पतित न हों, ऐसे अन्य लोगोंके यहाँ भी वह भिक्षाके लिये जा सकता है; परन्तु छोटे वर्णके लोगोंके यहाँ भिक्षा माँगना निकृष्ट वृत्ति मानी गयी है। योगीके लिये भिक्षाप्राप्त अन्न, जौकी लप्सी, छाछ, दूध, जौकी खिचड़ी, फल, मूल, कँगनी, कण, तिलका चूर्ण और सत्तू

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 20
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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