Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
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अध्याय 8 / 90

Adhyaya 8

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पूर्ण अध्याय पाठ89 श्लोक

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अध्याय ८

श्लोक 182

हा नाथ ! राजन् ! भवता मामनाश्वास्य दुः खिताम् ।क्वापि सन्तिष्ठता स्थाने विश्रब्धं स्थीयते कथम्

hā nātha ! rājan ! bhavatā māmanāśvāsya duḥ khitām / kvāpi santiṣṭhatā sthāne viśrabdhaṃ sthīyate katham

हिन्दी अर्थ

आदि यज्ञोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया है; अतः आपके दर्शनसे यमलोकके यन्त्र, शस्त्र, अग्नि और कौए आदि पक्षी, जो पीड़न, छेदन और जलन आदि महान् दुःखके कारण हैं, कोमल हो गये हैं। आपके तेजसे इनका क्रूर स्वभाव दब गया है।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 183

राज्यनाशः सुहृत्त्यागो भार्यातनयविक्रयः ।हरिश्चन्द्रस्य राजर्षेः किं विधे ! न कृतं त्वया

rājyanāśaḥ suhṛttyāgo bhāryātanayavikrayaḥ / hariścandrasya rājarṣeḥ kiṃ vidhe ! na kṛtaṃ tvayā

हिन्दी अर्थ

राजा बोले--भद्रमुख! मेरा तो ऐसा विचार है कि पीड़ित प्राणियोंको दुःखसे मुक्त करके उन्हें शान्ति प्रदान करनेसे जो सुख मिलता है, वह मनुष्योंको स्वर्गलोक अथवा ब्रह्मलोकमें भी नहीं प्राप्त होता। यदि मेरे समीप रहनेसे इन दुःखी जीवोंको नरकयातना वष्ट नहीं पहुँचाती तो मैं सूखे काठकी तरह अचल होकर यहीं रहूँगा।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 184

इति तस्या वचः श्रुत्वा राजा स्वस्थानतश्च्युतः ।प्रत्यभिज्ञाय दयितां पुत्रञ्च निधनं गतम्

iti tasyā vacaḥ śrutvā rājā svasthānataścyutaḥ / pratyabhijñāya dayitāṃ putrañca nidhanaṃ gatam

हिन्दी अर्थ

यमदूतने कहा--राजन्! आइये, अब यहाँसे चलें। आप पापियोंकी इन यातनाओंको यहीं छोड़कर अपने पुण्यसे प्राप्त हुए दिव्य भोगोंका उपभोग कीजिये।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 185

कष्टं शैव्येयमेषा हि स बालो ऽयमितीरयन् ।रुरोद दुः खसन्तप्तो मूर्च्छामभिजगाम च

kaṣṭaṃ śaivyeyameṣā hi sa bālo 'yamitīrayan / ruroda duḥ khasantapto mūrcchāmabhijagāma ca

हिन्दी अर्थ

राजा बोले--जबतक ये लोग अत्यन्त दुःखी रहेंगे तबतक तो मैं यहाँसे नहीं जाऊँगा; क्योंकि मेरे निकट रहनेसे इन नरकवासियोंको सुख मिलता है। जो शरणमें आनेकी इच्छा रखनेवाले आतुर एवं पीड़ित मनुष्यपर, भले ही वह शत्रुपक्षका ही क्‍यों न हो, कृपा नहीं करता, उस पुरुषके जीवनको धिक्‍्कार है। जिसका मन सड्कटमें पड़े हुए प्राणियोंकी रक्षा

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 186

सा च तं प्रत्यभिज्ञाय तामवस्थामुपागतम् ।मूर्च्छिता निपपातार्ता निश्चेष्टा धरणीतले

sā ca taṃ pratyabhijñāya tāmavasthāmupāgatam / mūrcchitā nipapātārtā niśceṣṭā dharaṇītale

हिन्दी अर्थ

करनेमें नहीं लगता, उसके यज्ञ, दान और तप इहलोक और परलोकमें भी कल्याणके साधन नहीं होते। जिसका हृदय बालक, वृद्ध तथा आतुर प्राणियोंके प्रति ककोरता धारण करता है, मैं उसे मनुष्य नहीं मानता; वह तो निरा राक्षस है। माना, इनके निकट रहनेसे अग्निजनित संतापका कष्ट सहना होगा, नरककी भयानक दुर्गन्‍्धका भोग करना पड़ेगा,

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 187

चेतः सम्प्राप्य राजेन्द्रो राजपत्नी च तै समम् ।विलेपतुः सुसन्तप्तौ शोकभारावपीडितौ

cetaḥ samprāpya rājendro rājapatnī ca tai samam / vilepatuḥ susantaptau śokabhārāvapīḍitau

हिन्दी अर्थ

भूख-प्यासका महान् दुःख, जो मूर्च्छित कर देनेवाला है, भोगना पड़ेगा; तथापि इन दुखियोंकी रक्षा करनेमें जो सुख है, उसे मैं स्वर्गीय सुखसे भी बढ़कर मानता हूँ। यदि अकेले मेरे दुःखी होनेसे बहुत-से आर्त्त मनुष्योंको सुख प्राप्त होता है तो मुझे कौन-सा सुख नहीं मिला? इसलिये दूत! अब तुम शीघ्र लौट जाओ, मैं यहीं रहूँगा।-

English

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अध्याय ८

श्लोक 188

राजोवाच हा वत्स ! सुकुमारं ते स्वक्षिभ्रूनासिकालकम् ।पश्यतो मे मुखं दीनं हृदयं किं न दीर्यते

rājovāca hā vatsa ! sukumāraṃ te svakṣibhrūnāsikālakam / paśyato me mukhaṃ dīnaṃ hṛdayaṃ kiṃ na dīryate

हिन्दी अर्थ

यमदूतने कहा--महाराज! ये धर्मराज और इन्द्र आपको लेनेके लिये आये हैं। यहाँसे आपको अवश्य जाना है, अतः चले चलिये।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 189

तात ! तातेति मधुरं ब्रुवाणं स्वयमागतम् ।उपगुह्य वदिष्ये कं वत्स ! वत्सेति सौहृदात्

tāta ! tāteti madhuraṃ bruvāṇaṃ svayamāgatam / upaguhya vadiṣye kaṃ vatsa ! vatseti sauhṛdāt

हिन्दी अर्थ

9), बह पा ऑयत का पा

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 190

कस्य जानुप्रणीतेन पिङ्गेन क्षितिरेणुना ।ममोत्तरीयमुत्सङ्गं तथाङ्गं मलमेष्यति

kasya jānupraṇītena piṅgena kṣitireṇunā / mamottarīyamutsaṅgaṃ tathāṅgaṃ malameṣyati

हिन्दी अर्थ

धर्मराज बोले--राजन्! तुमने मेरी भलीभाँति उपासना की है, अतः मैं तुम्हें स्वर्गलोकमें ले चलता हूँ। इस विमानपर चढ़कर चलो, विलम्ब न करो।

English

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अध्याय ८

श्लोक 191

अङ्गप्रत्यङ्गसम्भूतो मनोहृदयनन्दनः ।मया कुपित्रा हा वत्स ! विक्रीतो येन वस्तुवत्

aṅgapratyaṅgasambhūto manohṛdayanandanaḥ / mayā kupitrā hā vatsa ! vikrīto yena vastuvat

हिन्दी अर्थ

राजाने कहा--धर्मराज! यहाँ नरकमें हजारों मनुष्य कष्ट भोगते हैं और मुझे लक्ष्य करके आर्त्तभावसे त्राहि-त्राहि पुकार रहे हैं, इसलिये मैं यहाँसे नहीं जाऊँगा। देवराज इन्द्र! और धर्म! यदि आप दोनों जानते हों कि मेरा पुण्य कितना है तो उसे बतानेकी कृपा करें।

English

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अध्याय ८

श्लोक 192

हृत्वा राज्यमशेषं मे ससाधनधनं महत् ।दैवाहिना नृशंसेन दष्टो मे तनयस्ततः

hṛtvā rājyamaśeṣaṃ me sasādhanadhanaṃ mahat / daivāhinā nṛśaṃsena daṣṭo me tanayastataḥ

हिन्दी अर्थ

धर्म बोले--महाराज! जिस प्रकार समुद्रके जलबिन्दु, आकाशके तारे, वर्षाकी धाराएँ, गड़ाकी बालुकाके कण तथा जलकी बूँदें आदि असंख्य हैं, उसी प्रकार तुम्हारे पुण्यकी भी कोई नियत संख्या नहीं हो सकती। आज यहाँ इन नरकमें पड़े हुए जीवोंपर कृपा करनेसे तुम्हारा पुण्य लाखोंगुना बढ़ गया। नृपश्रेष्ठी अपने इस पुण्यका फल भोगनेके लिये अब

English

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अध्याय ८

श्लोक 193

अहं दैवाहिदष्टस्य पुत्रस्याननपङ्कजम् ।निरीक्षन्नपि घोरेण विषेणान्धीकृतो ऽधुना

ahaṃ daivāhidaṣṭasya putrasyānanapaṅkajam / nirīkṣannapi ghoreṇa viṣeṇāndhīkṛto 'dhunā

हिन्दी अर्थ

देवलोकमें चलो और ये पापी जीव भी नरकमें रहकर अपने कर्मौंका फल भोगें।

English

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अध्याय ८

श्लोक 194

एकमुक्त्तवा तमादाय बालकं बाष्पगद्गदः ।परिष्वज्य च निश्चेष्टो मूर्च्छया निपपात ह

ekamukttavā tamādāya bālakaṃ bāṣpagadgadaḥ / pariṣvajya ca niśceṣṭo mūrcchayā nipapāta ha

हिन्दी अर्थ

राजाने कहा--देवराज! यदि मेरे समीपमें आनेपर भी इन दुःखी जीवोंको कोई ऊँचा पद नहीं प्राप्त हुआ तो मनुष्य मेरे सम्पर्कमें रहनेकी अभिलाषा क्‍यों करेंगे? अतः मेरा जो

English

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अध्याय ८

श्लोक 195

राजपत्न्युवाच अयं स पुरुषव्याघ्रः स्वरेणैवोपलक्ष्यते ।विद्वज्जनमनश्चन्द्रो हरिश्चन्द्रो न संशयः

rājapatnyuvāca ayaṃ sa puruṣavyāghraḥ svareṇaivopalakṣyate / vidvajjanamanaścandro hariścandro na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

कुछ भी पुण्य है, उसके द्वारा ये यातनामें पड़े हुए पापी जीव नरकसे छुटकारा पा जायेँ।

English

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अध्याय ८

श्लोक 196

तथास्य नासिका तुङ्गा अग्रतो ऽधोमुखं गता ।दन्ताश्च मुकुलप्रख्याः ख्यातकीर्तेर्महात्मनः

tathāsya nāsikā tuṅgā agrato 'dhomukhaṃ gatā / dantāśca mukulaprakhyāḥ khyātakīrtermahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्र बोले--राजन्! इस उदारताके कारण तुमने और भी ऊँचा स्थान प्राप्त कर लिया। देखो, ये पापी जीव भी नरकसे मुक्त हो गये।

English

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अध्याय ८

श्लोक 197

श्मशानमागतः कस्मादद्यैष स नरेश्वरः ।अपहाय पुत्रशोकं सापश्यत् पतितं पतिम्

śmaśānamāgataḥ kasmādadyaiṣa sa nareśvaraḥ / apahāya putraśokaṃ sāpaśyat patitaṃ patim

हिन्दी अर्थ

पुत्र कहता है--पिताजी! तदनन्तर राजा विपश्चितके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी और स्वयं भगवान् विष्णु उन्हें विमानमें बिठाकर दिव्यधाममें ले गये।- उस समय मैं तथा और भी जितने पापी जीव थे, वे सब नरकयातनासे छूटकर अपने-अपने कर्मफलके अनुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें चले गये। द्विजश्रेष्ठ इस प्रकार मैंने इन नरकोंका वर्णन

English

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अध्याय ८

श्लोक 198

प्रकृष्टा विस्मिता दीना भर्तृपुत्राधिपीडिता ।वीक्षन्ती सा ततो ऽपश्यद् भर्तृदण्डं जुगुप्सितम्

prakṛṣṭā vismitā dīnā bhartṛputrādhipīḍitā / vīkṣantī sā tato 'paśyad bhartṛdaṇḍaṃ jugupsitam

हिन्दी अर्थ

किया; साथ ही पूर्वकालमें मैंने जैसा अनुभव किया था, उसके अनुसार जिस-जिस पापके कारण मनुष्य जिस-जिस योनिमें जाता है, वह सब भी बतला दिया।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 199

श्वपाकार्हमतो मोहं जगामायतलोचना ।प्राप्य चेतश्च शनकैः सगद्गदमभाषत

śvapākārhamato mohaṃ jagāmāyatalocanā / prāpya cetaśca śanakaiḥ sagadgadamabhāṣata

हिन्दी अर्थ

नैष्ठर्य्य निर्धणत्वं च परदारोपसेवनम् परस्वहरणाशौचं देवतानां च कुत्सनम् ।। निकृत्या वज्चनं नृणां कार्पण्यं च नृणां वध: । यानि च प्रतिषिद्धानि तत्प्रवृत्तिश्व संतता ।। उपलक्ष्याणि जानीयान्मुक्तानां नरकादनु । दया भूतेषु सदवाद: परलोकप्रतिक्रिया ।। सत्यं भूतहितार्थिक्तिवेंदप्रामाण्यदर्शनम् । गुरुदेवर्षिसिद्धर्षिपूजनं साधुसड़रम: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 200

धिक् त्वां दैवातिकरुणां निर्मर्यादं जुगुप्सितम् ।येनायममरप्रख्यो नीतो राजा श्वपाकताम्

dhik tvāṃ daivātikaruṇāṃ nirmaryādaṃ jugupsitam / yenāyamamaraprakhyo nīto rājā śvapākatām

हिन्दी अर्थ

सत्क्रियाभ्यसनं मैत्रीमिति बुध्येत पण्डित: । अन्यानि चैव सद्धर्मक्रियाभूतानि यानि च ॥। स्वर्गच्युतानां लिड्रानि पुरुषाणामपापिनाम्

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 201

राज्यनाशं सुहृत्त्यागं भार्या-तनयविक्रयम् ।प्रापयित्वापि नो कुक्तश्चण्डालो ऽयं कृतो नृपः

rājyanāśaṃ suhṛttyāgaṃ bhāryā-tanayavikrayam / prāpayitvāpi no kuktaścaṇḍālo 'yaṃ kṛto nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

ततस्तमग्रतः कृत्वा स राजा गन्तुमुद्यत: । ततश्न सर्वैर्त्क्रृष्टं यातनास्थायिभिनृभि: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 202

हा राजन् ! जातसन्तापामित्थं मां धरणीतलात् ।उत्थाप्य नाद्य पर्यङ्कमारोहेति किमुच्यते

hā rājan ! jātasantāpāmitthaṃ māṃ dharaṇītalāt / utthāpya nādya paryaṅkamāroheti kimucyate

हिन्दी अर्थ

किं मया कर्म तत् पुण्य॑ मर्त्लोके महत् कृतम् आह्लाददायिनी वृष्टियेनेयं तदुदीरय ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 203

नाद्य पश्यामि ते छत्रं भृङ्गारमथवा पुनः ।चामरं व्यजनञ्चापि को ऽयं विधिविपर्ययः

nādya paśyāmi te chatraṃ bhṛṅgāramathavā punaḥ / cāmaraṃ vyajanañcāpi ko 'yaṃ vidhiviparyayaḥ

हिन्दी अर्थ

पितृदेवातिथिप्रैष्यशिष्टेनान्नेन ते तनु: । पुष्टिमभ्यागता यस्मात् तद्गतं च मनो यतः ।। ततस्त्वद्वात्रसंसर्गी पवनो ह्वाददायक: । पापकर्मकृतो राजन् यातना न प्रबाधते ।। अश्वमेधादयो यज्ञास्त्वयेष्टा विधिवद् यतः । ततस्त्वद्टर्शनद्याम्या यन्त्रशस्त्राग्निवायसा: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 204

यस्याग्रे व्रजतः पूर्वं राजानो भृत्यतां गताः ।स्वोत्तरीयैरकुर्वन्त नीरजस्कं महीतलम्

yasyāgre vrajataḥ pūrvaṃ rājāno bhṛtyatāṃ gatāḥ / svottarīyairakurvanta nīrajaskaṃ mahītalam

हिन्दी अर्थ

न स्वर्गे ब्रह्मलोके वा तत् सुख प्राप्यते नरैः । यदार्त्तजन्तुनिर्वाणदानोत्थमिति मे मति: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 205

सो ऽयं कपालसंलग्न-घटीघटनिरन्तरे ।मृतनिर्माल्यसूत्रान्तर्गूग्केशे सुदारुणे

so 'yaṃ kapālasaṃlagna-ghaṭīghaṭanirantare / mṛtanirmālyasūtrāntargūgkeśe sudāruṇe

हिन्दी अर्थ

एहि राजन् प्रगच्छामो निजपुण्यसमर्जितान् । भुड़क्ष्व भोगानपास्येह यातना: पापकर्मणाम् ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 206

वसानिस्यन्दसंशुष्क-महीपुटकमण्डिते ।भस्माङ्गारार्धदग्धास्थि-मज्जासङ्घट्टभीषणे

vasānisyandasaṃśuṣka-mahīpuṭakamaṇḍite / bhasmāṅgārārdhadagdhāsthi-majjāsaṅghaṭṭabhīṣaṇe

हिन्दी अर्थ

यज्ञदानतपांसीह परत्र च न भूतये । भवन्ति तस्य यस्यार्त्तपरित्राणे न मानसम् ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 207

गृध्र-गोमायुनादार्तनष्टक्षुद्रविहङ्गमे ।चिताधूमाततिरुचा नीलीकृतदिगन्तरे

gṛdhra-gomāyunādārtanaṣṭakṣudravihaṅgame / citādhūmātatirucā nīlīkṛtadigantare

हिन्दी अर्थ

एतेषां संनिकर्षात् तु यद्यग्निपरितापजम् तथोग्रगन्धजं वापि दु:खं नरकसम्भवम् ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 208

कुणपास्वादनमुदा सम्प्रहृष्टनिशाचरे ।चरत्यमेध्ये राजेन्द्रः श्मशाने दुः खपीडितः

kuṇapāsvādanamudā samprahṛṣṭaniśācare / caratyamedhye rājendraḥ śmaśāne duḥ khapīḍitaḥ

हिन्दी अर्थ

यमपुरुष उवाच--एष धर्मश्न शक्रश्न त्वां नेतुं समुपागतौ । अवश्यमस्माद्ून्तव्यं तस्मात् पार्थिव गम्यताम् ।। धर्म उवाच--नयामि त्वामहं स्वर्ग त्वया सम्यगुपासित: । विमानमेतदारुह्मु मा विलम्बस्व गम्यताम् ।। राजोवाच--नरके मानवा धर्म पीड्यन्ते5त्र सहस्रशः । त्राहीति चार्त्ता: क्रन्दन्ति मामतो न व्रजाम्यहम् ।। यदि जानासि धर्म त्वं त्वं वा शक्र शचीपते । मम यावत्प्रमाणं तु शुभं तद्वक्तुमर्हथ: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 209

एवमुक्त्वा समाश्लिष्य कण्ठं राज्ञो नृपात्मजा ।कष्टशोकशताधारा विललापार्तया गिरा

evamuktvā samāśliṣya kaṇṭhaṃ rājño nṛpātmajā / kaṣṭaśokaśatādhārā vilalāpārtayā girā

हिन्दी अर्थ

धर्म उवाच--अब्बिन्दवो यथाम्भोधौ यथा वा दिवि तारका: । यथा वा वर्षतो धारा गड़ायां सिकता यथा ॥।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 210

राजपत्न्युवाच राजन् ! स्वप्नो ऽथ तथ्यं वा यदेतन्मन्यते भवान् ।तत् कथ्यतां महाभाग मनो वै मुह्यते मम

rājapatnyuvāca rājan ! svapno 'tha tathyaṃ vā yadetanmanyate bhavān / tat kathyatāṃ mahābhāga mano vai muhyate mama

हिन्दी अर्थ

अनकुम्पामिमामद्य नारकेष्विह कुर्वत: तदेव शतसाहस्र॑ संख्यामुपगतं तव ।। तद् गच्छ त्वं नृपश्रेष्ठ तद्भोक्तुममरालयम् एते5पि पाप॑ नरके क्षपयन्तु स्वकर्मजम् ।। राजोवाच--क थं स्पृहां करिष्यन्ति मत्सम्पर्केषु मानवा: । यदि मत्संनिधावेषामुत्कर्षो नोपजायते ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 211

यद्येतदेवं धर्मज्ञ नास्ति धर्मे सहायता ।तथैव विप्रदेवादिपूजने पालने भुवः

yadyetadevaṃ dharmajña nāsti dharme sahāyatā / tathaiva vipradevādipūjane pālane bhuvaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्माद् यत् सुकृतं किज्चिन्ममास्ति त्रिदशाधिप । तेन मुच्यन्तु नरकात् पापिनो यातनां गताः ।। इन्द्र उवाच--एवमूदर्ध्वतरं स्थानं त्वयावाप्त॑ महीपते । एतांश्व नरकात् पश्य विमुक्तान् पापकारिण: ।। पुत्र उवाच--ततोपतत् पुष्पवृष्टिस्तस्योपरि महीपते: । विमान चाधिरोप्यैनं स्वलोकमनयद्धरि: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 212

नास्ति धर्मः कुतः सत्यमार्जवं चानृशंसता ।यत्र त्वं धर्मपरमः स्वराज्यादवरोपितः

nāsti dharmaḥ kutaḥ satyamārjavaṃ cānṛśaṃsatā / yatra tvaṃ dharmaparamaḥ svarājyādavaropitaḥ

हिन्दी अर्थ

दत्तात्रेयजीके जन्म-प्रसड्रमें एक पतिव्रता ब्राह्मणी तथा अनसूयाजीका चरित्र

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 213

इति तस्या वचः श्रुत्वा निश्वस्योष्णं सगद्गदम् ।कथयामास तन्वङ्ग्या यथा प्राप्ता श्वपाकता

iti tasyā vacaḥ śrutvā niśvasyoṣṇaṃ sagadgadam / kathayāmāsa tanvaṅgyā yathā prāptā śvapākatā

हिन्दी अर्थ

पिता बोले--बेटा! तुमने अत्यन्त हेय संसारके व्यवस्थित स्वरूपका वर्णन किया, जो घटी-यन्त्रकी भाँति निरन्तर आवागमनशील और प्रवाहरूपसे अविनाशी है। इस प्रकार मैंने इसके स्वरूपको भलीभाँति समझ लिया है। ऐसी स्थितिमें अब मुझे क्या करना चाहिए? यह बताओ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 214

रुदित्वा सापि सुचिरं निश्वस्योष्णञ्च दुः खिता ।स्वपुत्रमरणं भीरुर्यथावृत्तं न्यवेदयत्

ruditvā sāpi suciraṃ niśvasyoṣṇañca duḥ khitā / svaputramaraṇaṃ bhīruryathāvṛttaṃ nyavedayat

हिन्दी अर्थ

पुत्र (सुमति) ने कहा--पिताजी! यदि आप शड्का छोड़कर मेरे वचनोंमें पूर्ण श्रद्धा रखते हैं तो मेरी राय यह है कि आप गृहस्थाश्रमका परित्याग करके वानप्रस्थके नियमोंका पालन कीजिये। वानप्रस्थ आश्रमके कर्तव्यका भलीभाँति अनुष्ठान करके फिर आहवनीय आदि अग्नियोंका संग्रह भी छोड़ दीजिये और

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 215

राजोवाच प्रिये ! न रोचये दीर्घं कालं क्लेशमुपासितुम् ।नात्मायत्तश्च तन्वङ्गि पश्य मे मन्दभाग्यताम्

rājovāca priye ! na rocaye dīrghaṃ kālaṃ kleśamupāsitum / nātmāyattaśca tanvaṅgi paśya me mandabhāgyatām

हिन्दी अर्थ

आत्मा (बुद्धि)-को आत्मामें लगाकर द्वन्द्धरहित एवं परिग्रहशून्य हो जाइये। एकान्तमें रहते हुए अपने मनको वशमें कीजिये और आलस्य छोड़कर भिक्षु (संन्यासी)-का जीवन व्यतीत कीजिये। संन्यासाश्रममें योगपरायण होकर बाहा

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 216

चण्डालेनाननुज्ञातः प्रवेक्ष्ये ज्वलनं यदि ।चण्डालदासतां यास्ये पुनरप्यन्यजन्मनि

caṇḍālenānanujñātaḥ pravekṣye jvalanaṃ yadi / caṇḍāladāsatāṃ yāsye punarapyanyajanmani

हिन्दी अर्थ

जो दुःख-संयोगको दूर करनेकी ओषधि, मोक्षका साधन, तुलनारहित, अनिर्वचनीय एवं असड़ है और जिसका संयोग प्राप्त होनेपर आपको फिर संसारी जीवोंके सम्पर्कमें नहीं आना पड़ेगा।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 217

नरके च तपिष्यामि कोटकः कृमिभोजनः ।वैतरण्यां महापूय-वसासृक्-स्नायुपिच्छिले

narake ca tapiṣyāmi koṭakaḥ kṛmibhojanaḥ / vaitaraṇyāṃ mahāpūya-vasāsṛk-snāyupicchile

हिन्दी अर्थ

पिता बोले--बेटा! अब तुम मुझे मोक्षके साधनभूत उस उत्तम योगका उपदेश दो, जिससे मैं फिर संसारी जीवोंके सम्पर्कमें आकर ऐसा दुःख न उठाऊँ। यद्यपि आत्मा स्वभावत: सब प्रकारके योगसे रहित है तो भी जिस योगमें आसक्त होनेपर मेरे आत्माका सांसारिक बन्धनोंसे योग न हो, उसी

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 218

असिपत्रवने प्राप्य छेदं प्राप्स्यामि दारुणम् ।तापं प्राप्स्यामि वा प्राप्य महारौरवरौरवौ

asipatravane prāpya chedaṃ prāpsyāmi dāruṇam / tāpaṃ prāpsyāmi vā prāpya mahārauravarauravau

हिन्दी अर्थ

योगको इस समय मुझे बताओ। संसाररूपी सूर्यके प्रचण्ड तापकी पीड़ासे मेरे शरीर और मन दोनों सूख रहे हैं। तुम ब्रह्मज्षामरूपी जलकी शीतलतासे युक्त अपने वचनरूपी सलिलसे इन्हें सींच दो। मुझे अविद्यारूपी काले नागने डस लिया है। मैं उसके विषसे पीड़ित होकर मर रहा हूँ। तुम अपने वचनामृतसे मुझे

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 219

मग्नस्य दुः खजलधौ पारः प्राणवियोजनम् ।एको ऽपि बालको यो ऽयमासीद्वंशकरः सुतः

magnasya duḥ khajaladhau pāraḥ prāṇaviyojanam / eko 'pi bālako yo 'yamāsīdvaṃśakaraḥ sutaḥ

हिन्दी अर्थ

पुनः जीवित कर दो। मैं स्त्री-पुत्र, घर-द्वार, खेती-बारीकी ममतारूपी बेड़ीमें जकड़ा जाकर वष्ट पा रहा हूँ; तुम प्रिय एवं उत्तम भावसे युक्त विज्ञानद्वारा इस बन्धनको खोलकर मुझे शीघ्र मुक्त करो।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 220

मम दैवाम्बुवेगेन मग्नः सो ऽपि बलीयसा ।कथं प्राणान् विमुञ्चामि परायत्तो ऽस्मि दुर्गतः

mama daivāmbuvegena magnaḥ so 'pi balīyasā / kathaṃ prāṇān vimuñcāmi parāyatto 'smi durgataḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्रने कहा-पिताजी! पूर्वकालमें परम बुद्धिमान् दत्तात्रेयजीने राजा अलर्कको उनके पूछनेपर जिस योगका भलीभाँति विस्तारपूर्वक उपदेश किया था, वही आपको बता रहा हूँ; सुनिये।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 221

अथवा नार्तिना क्लिष्टो नरः पापमवेक्षते ।तिर्यक्त्वे नास्ति तद्दुः शं नासिपत्रवने तथा

athavā nārtinā kliṣṭo naraḥ pāpamavekṣate / tiryaktve nāsti tadduḥ śaṃ nāsipatravane tathā

हिन्दी अर्थ

पिता बोले--दत्तात्रेयजी किसके पुत्र थे? उन्होंने किस प्रकार योगका उपदेश किया था और महाभाग अलर्क कौन थे, जिन्होंने योगके विषयमें प्रश्न

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 222

वैतरण्याङ्कुतस्तादृग् यादृशं पुत्रविप्लवे ।सो ऽहं सुतशिरीरेण दीप्यमाने हुताशने

vaitaraṇyāṅkutastādṛg yādṛśaṃ putraviplave / so 'haṃ sutaśirīreṇa dīpyamāne hutāśane

हिन्दी अर्थ

पुत्रने कहा--प्रतिष्ठानपुरमें एक कौशिक नामक ब्राह्मण था। वह पूर्वजन्ममें किये हुए पापोंके कारण कोढ़के रोगसे व्याकुल रहने लगा। ऐसे घृणित रोगसे युक्त होनेपर भी उसे उसकी पत्नी देवताकी भाँति पूजती थी। वह अपने पतिके पैरोंमें तेल मलती, उसका शरीर दबाती, अपने हाथसे उसे

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 223

निपतिष्यामि तन्वङ्गि क्षन्तव्यं कुकृतं मम ।अनुज्ञाता च गच्छ त्वं विप्रवेश्म सुछिस्मिते

nipatiṣyāmi tanvaṅgi kṣantavyaṃ kukṛtaṃ mama / anujñātā ca gaccha tvaṃ vipraveśma suchismite

हिन्दी अर्थ

नहलाती, कपड़े पहनाती और भोजन कराती थी; इतना ही नहीं, उसके थूक, खँखार, मल-मूत्र और रक्त भी वह स्वयं ही धोकर साफ करती थी। वह एकान्तमें भी पतिकी सेवा करती और उसे मीठी वाणीसे प्रसन्न रखती थी। इस प्रकार अत्यन्त विनीत भावसे वह सदा अपने मीकी पूजा किया करती तो भी

English

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अध्याय ८

श्लोक 224

मम वाक्यञ्च तन्वङ्गि निबोधादृतमानसा ।यदि दत्तं यदि हुतं गुरवो यदि तोषिताः

mama vākyañca tanvaṅgi nibodhādṛtamānasā / yadi dattaṃ yadi hutaṃ guravo yadi toṣitāḥ

हिन्दी अर्थ

अधिक क्रोधी स्वभावका होनेके कारण वह निष्ठछुर प्रायः अपनी पत्नीको फटकारता ही रहता था। इतनेपर भी वह उसके पैरों पड़ती और उसे देवताके समान समझती थी। यद्यपि उसका शरीर अत्यन्त घृणाके योग्य था तो भी वह साध्वी उसे सबसे श्रेष्ठ मानती थी। कौशिकसे चला-फिरा नहीं जाता था तो भी

English

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अध्याय ८

श्लोक 225

परत्र सङ्गमो भूयात् पुत्रेण सह च त्वया ।इह लोके कुतस्त्वेतद् भविष्यति ममेङ्गितम्

paratra saṅgamo bhūyāt putreṇa saha ca tvayā / iha loke kutastvetad bhaviṣyati mameṅgitam

हिन्दी अर्थ

एक दिन उसने अपनी पत्नीसे कहा--:धर्मज्ञे! उस दिन मैंने घरपर बैठे-बैठे ही सड़कपर जिस वेश्याको जाते देखा था, उसके घरमें आज मुझे ले चलो। मुझे उससे मिला दो। वही मेरे हृदयमें बसी हुई है। जबसे मैंने उसे देखा है, तबसे वह मेरे मनसे दूर नहीं होती। यदि वह आज मेरा आलिड्रन नहीं करेगी तो कल तुम

English

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अध्याय ८

श्लोक 226

त्वया सह मम श्रेयो गमनं पुत्रमार्गणे ।यन्मया हसता किञ्चिद्रहस्ये वा शुचिस्मिते

tvayā saha mama śreyo gamanaṃ putramārgaṇe / yanmayā hasatā kiñcidrahasye vā śucismite

हिन्दी अर्थ

मुझे मरा हुआ देखोगी। मनुष्योंके लिये कामदेव प्राय: टेढ़ा होता है। उस वेश्याको बहुत लोग चाहते हैं और मुझमें उसके पासतक जानेकी शक्ति नहीं है; इसलिये आज मुझे बड़ा सड्कट प्रतीत होता है।'

English

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अध्याय ८

श्लोक 227

अश्लीलमुक्तं तत् सर्वं क्षन्तव्यं मम याचतः ।राजपत्नीति गर्वेण नावज्ञेयः स ते द्विजः ।सर्वयत्नेन ते तोष्यः स्वामिदैवतवच्छुभे

aślīlamuktaṃ tat sarvaṃ kṣantavyaṃ mama yācataḥ / rājapatnīti garveṇa nāvajñeyaḥ sa te dvijaḥ / sarvayatnena te toṣyaḥ svāmidaivatavacchubhe

हिन्दी अर्थ

अपने कामातुर स्वामीका यह वचन सुनकर उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई इस

English

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अध्याय ८

श्लोक 228

राजपत्न्युवाच अहमप्यत्र राजर्षे दीप्यमाने हुताशने ।दुः खभारासहाद्यैव सह यास्यामि वै त्वया

rājapatnyuvāca ahamapyatra rājarṣe dīpyamāne hutāśane / duḥ khabhārāsahādyaiva saha yāsyāmi vai tvayā

हिन्दी अर्थ

शुल्क लेकर पतिको कंधेपर चढ़ा लिया। फिर धीरे-धीरे वेश्याके घरकी ओर प्रस्थान किया। रात्रिका समय था, आकाश मेघोंसे आच्छन्न हो रहा था। केवल बिजलीके चमकनेसे मार्ग दिखायी दे जाता था। ऐसी बेलामें वह ब्राह्मणी अपने पतिका अभीष्ट साधन करनेके लिये राजमार्गसे जा रही थी। मार्गमें सूली थी,

English

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अध्याय ८

श्लोक 229

पक्षिण ऊचुः ततः कृत्वा चितां राजा आरोप्य तनयं स्वकम् ।भार्यया सहितश्चासौ बद्धाञ्जलिपुटस्तदा

pakṣiṇa ūcuḥ tataḥ kṛtvā citāṃ rājā āropya tanayaṃ svakam / bhāryayā sahitaścāsau baddhāñjalipuṭastadā

हिन्दी अर्थ

जिसके ऊपर चोर न होते हुए भी चोरके सन्देहसे माण्डव्य नामक ब्राह्मणको चढ़ा दिया गया था। वे दुःखसे आतुर हो रहे थे। कौशिक पत्नीके कंधेपर बैठा था, उस अन्धकारमें देख न सकनेके कारण उसने अपने पैरोंसे छूकर सूलीको हिला दिया। इससे कुपित होकर माण्डव्यने कहा--“जिसने पैरसे हिलाकर मुझे

English

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अध्याय ८

श्लोक 230

चिन्तयन् परमात्मानमीशं नारायणं हरिम् ।हृत्कोटरगुहासीनं वासुदेवं सुरेश्वरम् ।अनादिनिधनं ब्रह्म कृष्णं पीताम्बरं शुभम्

cintayan paramātmānamīśaṃ nārāyaṇaṃ harim / hṛtkoṭaraguhāsīnaṃ vāsudevaṃ sureśvaram / anādinidhanaṃ brahma kṛṣṇaṃ pītāmbaraṃ śubham

हिन्दी अर्थ

इस कष्टकी दशामें पहुँचा दिया और मुझे अत्यन्त दुःखी कर दिया, वह पापात्मा

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 231

तस्य चिन्तयमानस्य सर्वे देवाः सवासवाः ।धर्मं प्रमुखतः कृत्वा समाजग्मुस्त्वरान्विताः

tasya cintayamānasya sarve devāḥ savāsavāḥ / dharmaṃ pramukhataḥ kṛtvā samājagmustvarānvitāḥ

हिन्दी अर्थ

नराधम सूर्योदय होनेपर विवश हो निस्सन्देह अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठेगा। सूर्यका दर्शन होते ही उसका विनाश हो जायगा।” इस अत्यन्त दारुण शापको सुनकर उसकी पत्नी व्यथित होकर बोली--“अब सूर्यका उदय ही नहीं होगा।'- तदनन्तर सूर्योदय न होनेके कारण बराबर रात ही रहने लगी। कितने ही दिनोंके

English

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अध्याय ८

श्लोक 232

आगत्य सर्वे प्रोचुस्ते भो भो राजन् ! शृणु प्रभो ।अयं पितामहः साक्षाद्धर्मश्च भगवान् स्वयम्

āgatya sarve procuste bho bho rājan ! śṛṇu prabho / ayaṃ pitāmahaḥ sākṣāddharmaśca bhagavān svayam

हिन्दी अर्थ

बराबर समय रातभरमें ही बीत गया। इससे देवताओंको बड़ा भय हुआ। वे सोचने लगे--स्वाध्याय, वषट्कार, स्वधा (श्राद्ध) तथा स्वाहा (यज्ञ)-से रहित होकर यह सारा जगत् नष्ट हुए बिना कैसे रह सकता है। दिन-रातकी व्यवस्था हुए बिना मास और ऋतुका भी लोप हो जायगा। उनके लोप होनेसे दक्षिणायन

English

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अध्याय ८

श्लोक 233

साध्याश्च विश्वे मरुतो लोकपालाः सवाहनाः ।नागाः सिद्धाः सगन्धर्वा रुद्राश्चैव तथाश्विनौ

sādhyāśca viśve maruto lokapālāḥ savāhanāḥ / nāgāḥ siddhāḥ sagandharvā rudrāścaiva tathāśvinau

हिन्दी अर्थ

और उत्तरायणका भी ज्ञान नहीं होगा। अयनका ज्ञान हुए बिना वर्ष कैसे हो सकता है, और वर्षके बिना कालका ज्ञान होना असम्भव है। पतिव्रताके वचनसे सूर्यका उदय ही नहीं होता; उसके बिना स्नान, दान आदि क्रियाएँ बंद हो गयीं। अग्नि-होत्र और यज्ञका अभाव भी दृष्टिगोचर होने लगा है। होमके बिना

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 234

एते चान्ये च बहवो विश्वामित्रस्तथैव च ।विश्वत्रयेण यो मित्रं कर्तुं न शकितः पुरा

ete cānye ca bahavo viśvāmitrastathaiva ca / viśvatrayeṇa yo mitraṃ kartuṃ na śakitaḥ purā

हिन्दी अर्थ

हमलोगोंकी तृप्ति नहीं होती। जब मनुष्य यज्ञका यथोचित भाग देकर हमें तृप्त करते हैं, तब हम खेतीकी उपजके लिये वर्षा करके मनुष्योंपर अनुग्रह करते हैं। नया अन्न पैदा होनेपर मनुष्य फिर हमारे लिये यज्ञ करते हैं और हमलोग यज्ञादिद्वारा पूजित होनेपर उन्हें मनोवाज्छित भोग प्रदान करते हैं। हम नीचेकी

English

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अध्याय ८

श्लोक 235

विश्वामित्रस्तु ते मैत्रीमिष्टञ्चाहर्तुमिच्छति ।आरुरोह ततः प्राप्तो धर्मः शक्रो ऽथ गाधिजः

viśvāmitrastu te maitrīmiṣṭañcāhartumicchati / āruroha tataḥ prāpto dharmaḥ śakro 'tha gādhijaḥ

हिन्दी अर्थ

ओर वर्षा करते हैं और मनुष्य ऊपरकी ओर। हम जलकी वर्षासे मनुष्योंको और मनुष्य हविष्यकी वर्षसे हमलोगोंको तृप्त करते हैं। जो दुरात्मा लोभवश हमारा यज्ञभाग स्वयं खा लेते हैं, उन अपकारी पापियोंके नाशके लिये हम जल, सूर्य, अग्नि, वायु तथा पृथ्वीको भी दूषित कर देते हैं। उन दूषित वस्तुओंका

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 236

धर्मि उवाच मा राजन् ! साहसं कार्षोर्धर्मो ऽहं त्वामुपागतः ।तितिक्षा-दम-सत्याद्यैः स्वगुणैः परितोषितः

dharmi uvāca mā rājan ! sāhasaṃ kārṣordharmo 'haṃ tvāmupāgataḥ / titikṣā-dama-satyādyaiḥ svaguṇaiḥ paritoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

उपभोग करनेसे उन कुकर्मियोंकी मृत्युके लिये भयडूकर महामारी आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं। जो हमें तृप्त करके शेष अन्न अपने उपभोगमें लाते हैं, उन महात्माओंको हम पुण्यलोक प्रदान करते हैं। किन्तु इस समय प्रभातकाल हुए बिना इन मनुष्योंके लिये वह सब पुण्यकर्म असम्भव हो रहा है। अब दिनकी

English

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अध्याय ८

श्लोक 237

इन्द्र उवाच हरिश्चन्द्र माहभाग ! प्राप्तः शक्रो ऽस्मिते ऽन्तिकम् ।त्वया सभार्यपुत्रेण जिता लोकाः सनातनाः

indra uvāca hariścandra māhabhāga ! prāptaḥ śakro 'smite 'ntikam / tvayā sabhāryaputreṇa jitā lokāḥ sanātanāḥ

हिन्दी अर्थ

सृष्टि कैसे हो?” इस प्रकार सब देवता आपसमें बात करने लगे। यज्ञोंके विनाशकी आशडूकासे वहाँ एकत्रित हुए देवताओंके वचन सुनकर प्रजापति ब्रह्माजीने कहा--'पतिव्रताके माहात्म्यसे इस समय सूर्यका उदय नहीं हो रहा है और सूर्योदय न होनेसे मनुष्यों तथा तुम देवताओंकी भी हानि है; अतः तुमलोग

English

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अध्याय ८

श्लोक 238

आरोह त्रिदिवं राजन् ! भार्यापुत्रसमन्वितः ।सुदुष्प्राप्तं नरैरन्यैर्जितमात्मीयकर्मभिः

āroha tridivaṃ rājan ! bhāryāputrasamanvitaḥ / suduṣprāptaṃ narairanyairjitamātmīyakarmabhiḥ

हिन्दी अर्थ

महर्षि अत्रिकी पतिव्रता पत्नी तपस्विनी अनसूयाके पास जाओ और सूर्योदयकी कामनासे उन्हें प्रसन्न करो।'+

English

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अध्याय ८

श्लोक 239

पक्षिण ऊचुः ततो ऽमृतमयं वर्षमपमृत्युविनाशनम् ।इन्द्रः प्रासृजदाकाशाच्चितास्थानगतः प्रभुः

pakṣiṇa ūcuḥ tato 'mṛtamayaṃ varṣamapamṛtyuvināśanam / indraḥ prāsṛjadākāśāccitāsthānagataḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

तब देवताओंने जाकर अनसूयाजीको प्रसन्न किया। वे बोलीं--“तुम क्या चाहते हो, बतलाओ।' देवताओंने याचना की कि 'पूर्ववत् दिन होने लगे।'

English

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अध्याय ८

श्लोक 240

पुष्पवर्षञ्च सुमहद्देवदुन्दुभिनिस्वनम् ।ततस्ततो वर्तमाने समाजे देवसंकुले

puṣpavarṣañca sumahaddevadundubhinisvanam / tatastato vartamāne samāje devasaṃkule

हिन्दी अर्थ

अनसूयाने कहा--देवताओ! पतिव्रताका महत्त्व किसी प्रकार कम नहीं हो सकता; इसलिये मैं उस साध्वीको मनाकर दिनकी सृष्टि करूँगी। मुझे ऐसा उपाय करना है, जिससे फिर पहलेकी ही भाँति दिन-रातकी व्यवस्था चलती रहे और उस पतिव्रताके पतिका भी नाश न हो।+

English

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अध्याय ८

श्लोक 241

समुत्तस्थौ ततः पुत्रो राज्ञस्तस्य महात्मनः ।सुकुमारतनुः सुस्थः प्रसन्नेन्द्रियमानसः

samuttasthau tataḥ putro rājñastasya mahātmanaḥ / sukumāratanuḥ susthaḥ prasannendriyamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्रने कहा--देवताओंसे यों कहकर अनसूया देवी उस ब्राह्मणीके घर गयीं और उसके कुशल पूछनेपर उन्होंने अपनी, अपने स्वामीकी तथा अपने धर्मकी

English

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अध्याय ८

श्लोक 242

ततो राजा हरिश्चन्द्रः परिष्वज्य सुतं क्षणात् ।सभार्यः स श्रिया युक्तो दिव्यमाल्याम्बरान्वितः

tato rājā hariścandraḥ pariṣvajya sutaṃ kṣaṇāt / sabhāryaḥ sa śriyā yukto divyamālyāmbarānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

अनसूया बोलीं--कल्याणी! तुम अपने स्वामीके मुखका दर्शन करके प्रसन्न तो रहती हो न? पतिको सम्पूर्ण देवताओंसे बड़ा मानती हो न? पतिकी सेवासे ही मुझे महान् फलकी प्राप्ति हुई है तथा सम्पूर्ण कामनाओं एवं फलोंकी प्राप्तिके साथ ही मेरे सारे विघ्न भी दूर हो गये। साध्वी! मनुष्यको पाँच ऋण

English

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अध्याय ८

श्लोक 243

सुस्थः सम्पूर्णहृदयो मुदा परमया युतः ।बभूव तत्क्षणादिन्द्रो भूयश्चैनमभाषत

susthaḥ sampūrṇahṛdayo mudā paramayā yutaḥ / babhūva tatkṣaṇādindro bhūyaścainamabhāṣata

हिन्दी अर्थ

सदा ही चुकाने चाहिए। अपने वर्णधर्मके अनुसार धनका संग्रह करना

English

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अध्याय ८

श्लोक 244

सभार्यस्त्वं सपुत्रश्च प्राप्स्यसे सद्गतिं पराम् ।समारोह माहभाग निजानां कर्मणां फलैः

sabhāryastvaṃ saputraśca prāpsyase sadgatiṃ parām / samāroha māhabhāga nijānāṃ karmaṇāṃ phalaiḥ

हिन्दी अर्थ

आवश्यक है। उसके प्राप्त होनेपर शास्त्रविधिके अनुसार उसका सत्पात्रको दान करना चाहिए। सत्य, सरलता, तपस्या, दान और दयासे सदा युक्त रहना चाहिए। राग-द्वेषका परित्याग करके शास्त्रोक्त कर्मोका अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करना चाहिए। ऐसा करनेसे मनुष्य अपने वर्णके

English

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अध्याय ८

श्लोक 245

हरिश्चन्द्र उवाच देवराजाननुज्ञातः स्वामिना श्वपचेन वै ।अगत्वा निष्कृतिं तस्य नारोक्ष्ये ऽहं सुरालयम्

hariścandra uvāca devarājānanujñātaḥ svāminā śvapacena vai / agatvā niṣkṛtiṃ tasya nārokṣye 'haṃ surālayam

हिन्दी अर्थ

लिये विहित उत्तम लोकोंको प्राप्त होता है। पतिव्रते! इस प्रकार महान् क्लेश उठानेपर पुरुषोंको प्राजापत्य आदि लोकोंकी प्राप्ति होती है; परन्तु स्त्रियाँ केवल पतिकी सेवा करनेमात्रसे पुरुषोंके दुःख सहकर उपार्जित किये हुए पुण्यका आधा भाग प्राप्त कर लेती हैं। स्त्रियोंक लिये अलग यज्ञ, श्राद्ध या

English

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अध्याय ८

श्लोक 246

धर्म उवाच तवैनं भाविनं क्लेशमवगम्यात्ममायया ।आत्मा श्वपाकतां नीतो दर्शितं तच्च चापलम्

dharma uvāca tavainaṃ bhāvinaṃ kleśamavagamyātmamāyayā / ātmā śvapākatāṃ nīto darśitaṃ tacca cāpalam

हिन्दी अर्थ

उपवासका विधान नहीं है। वे पतिकी सेवामात्रसे ही उन अभीष्ट लोकोंको प्राप्त कर लेती हैं। अतः महाभागे! तुम्हें सदा पतिकी सेवामें अपना मन लगाना चाहिए; क्योंकि स्त्रीके लिये पति ही परम गति है। पति जो देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंकी सत्कारपूर्वक पूजा करता है, उसके भी पुण्यका आधा भाग

English

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अध्याय ८

श्लोक 247

इन्द्र उवाच प्रार्थ्यते यत् परं स्थानं समस्तैर्मनुजैर्भुवि ।तदारोह हरिश्चन्द्र स्थानं पुण्यकृतां नृणाम्

indra uvāca prārthyate yat paraṃ sthānaṃ samastairmanujairbhuvi / tadāroha hariścandra sthānaṃ puṇyakṛtāṃ nṛṇām

हिन्दी अर्थ

स्त्री अनन्यचित्तसे पतिकी सेवा करनेमात्रसे प्राप्त कर लेती है।

English

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अध्याय ८

श्लोक 248

हरिश्चन्द्र उवाच देवाराज ! नमस्तुभ्यं वाक्यञ्चैतन्निबोध मे ।प्रसादसुमुखं यत् त्वां ब्रवीमि प्रश्रयान्वितः

hariścandra uvāca devārāja ! namastubhyaṃ vākyañcaitannibodha me / prasādasumukhaṃ yat tvāṃ bravīmi praśrayānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

अनसूयाजीका वचन सुनकर पतित्रता ब्राह्मणीने बड़े आदरके साथ उनका पूजन किया और इस प्रकार कहा--'स्वभावतः सबका कल्याण करनेवाली देवी! स्वयं आप यहाँ पधारकर पतिकी सेवामें मेरी पुनः श्रद्धा बढ़ा रही हैं। इससे मैं धन्य हो गयी। यह आपका मुझपर बहुत बड़ा अनुग्रह है। इसीसे

English

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अध्याय ८

श्लोक 249

मच्छोकमग्नमनसः कोशलानगरे जनाः ।तिष्ठन्ति तानपोह्याद्य कथं यास्याम्यहं दिवम्

macchokamagnamanasaḥ kośalānagare janāḥ / tiṣṭhanti tānapohyādya kathaṃ yāsyāmyahaṃ divam

हिन्दी अर्थ

पतिके समान दूसरी कोई गति नहीं है। पतिमें किया हुआ प्रेम इहलोक और परलोकमें भी उपकार करनेवाला होता है। यशस्विनि! पतिके प्रसादसे ही नारी इस लोक और परलोकमें भी सुख पाती है; क्योंकि पति ही नारीका देवता है। महाभागे! आज आप मेरे घरपर पधारी हैं। मुझसे अथवा मेरे इन पतिदेवसे

English

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अध्याय ८

श्लोक 250

ब्रह्महत्या गुरोर्घातो गोवधः स्त्रीवधस्तथा ।तुल्यमेभिर्महापापं भक्तत्यागे ऽप्युदाहृतम्

brahmahatyā gurorghāto govadhaḥ strīvadhastathā / tulyamebhirmahāpāpaṃ bhaktatyāge 'pyudāhṛtam

हिन्दी अर्थ

आपको जो भी कार्य हो, उसे बतानेकी कृपा करें।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 251

भजन्तं भक्तमत्याज्यमदुष्टं त्यजतः सुखम् ।नेह नामुत्र पश्यामि तस्माच्छक्र ! दिवं व्रज

bhajantaṃ bhaktamatyājyamaduṣṭaṃ tyajataḥ sukham / neha nāmutra paśyāmi tasmācchakra ! divaṃ vraja

हिन्दी अर्थ

एते देवा: सहेन्द्रेण मामुपागम्य दुःखिता: । त्वद्वाक्यापास्तसत्कर्मदिननक्तनिरूपणा: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 252

यदि ते सहिताः स्वर्गं मया यान्ति सुरेश्वर ।ततो ऽहमपि यास्यामि नरकं वापि तैः सह

yadi te sahitāḥ svargaṃ mayā yānti sureśvara / tato 'hamapi yāsyāmi narakaṃ vāpi taiḥ saha

हिन्दी अर्थ

दिनाभावात् समस्तानामभावो यागकर्मणाम्

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 253

इन्द्र उवाच बहूनि पुण्यपापानि तेषां भिन्नानि वै पृथक् ।कथं सङ्घातभोग्यं त्वं भूयः स्वर्गमवाप्स्यसि

indra uvāca bahūni puṇyapāpāni teṣāṃ bhinnāni vai pṛthak / kathaṃ saṅghātabhogyaṃ tvaṃ bhūyaḥ svargamavāpsyasi

हिन्दी अर्थ

अद्नश्चैव समुच्छेदादुच्छेद: सर्वकर्मणाम् ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 254

हरिश्चन्द्र उवाच शक्र भुङ्क्ते नृपो राज्यं प्रभावेण कुटुम्बिनाम् ।यजते च महायज्ञैः कर्म पौर्तं करोति च

hariścandra uvāca śakra bhuṅkte nṛpo rājyaṃ prabhāveṇa kuṭumbinām / yajate ca mahāyajñaiḥ karma paurtaṃ karoti ca

हिन्दी अर्थ

प्रसीद साध्वि लोकानां पूर्ववद्धर्तततां रवि: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 255

तच्च तेषां प्रभावेण मया सर्वमनुष्ठितम् ।उपकर्तॄन् न सन्त्यक्ष्ये तानहं स्वर्गलिप्सया

tacca teṣāṃ prabhāveṇa mayā sarvamanuṣṭhitam / upakartṝn na santyakṣye tānahaṃ svargalipsayā

हिन्दी अर्थ

अनसूया बोलीं--देवि! तुम्हारे वचनसे दिन-रातकी व्यवस्थाका लोप हो जानेके कारण शुभ कर्मोका अनुष्ठान बंद हो गया है; इसलिये ये इन्द्र आदि

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 256

तस्माद्यन्मम देवेश किञ्चिदस्ति सुचेष्टितम् ।दत्तमिष्टमथो जप्तं सामान्यं तैस्तदस्तु नः

tasmādyanmama deveśa kiñcidasti suceṣṭitam / dattamiṣṭamatho japtaṃ sāmānyaṃ taistadastu naḥ

हिन्दी अर्थ

व्यवस्था पहलेकी तरह अखण्डरूपसे चलती रहे। मैं इसीके लिये तुम्हारे पास आयी हूँ। मेरी यह बात सुनो। दिन न होनेसे समस्त यज्ञकर्मोंका अभाव हो गया है और यज्ञोंके अभावसे देवताओंकी पुष्टि नहीं हो पाती है; अतः तपस्विनि! दिनके नाशसे समस्त शुभ कर्मोका नाश हो जायगा और उनके नाशसे वृष्टिमें

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 257

बहुकालोपभोग्यं हि फलं यन्मम कर्मणः ।तदस्तु दिनमप्येकं तैः समं त्वत्प्रसादतः

bahukālopabhogyaṃ hi phalaṃ yanmama karmaṇaḥ / tadastu dinamapyekaṃ taiḥ samaṃ tvatprasādataḥ

हिन्दी अर्थ

बाधा पड़नेके कारण इस संसारका ही उच्छेद हो जायगा। अतः यदि तुम इस जगत्को आपपत्तिसे बचाना चाहती हो तो सम्पूर्ण लोकोंपर दया करो, जिससे पहलेकी भाँति सूर्योदय हो।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 258

पक्षिण ऊचुः एवं भविष्यतीत्युक्त्वा शक्रस्त्रिभुवनेश्वरः ।प्रसन्नचेता धर्मश्च विश्वामित्रश्च गाधिजः

pakṣiṇa ūcuḥ evaṃ bhaviṣyatītyuktvā śakrastribhuvaneśvaraḥ / prasannacetā dharmaśca viśvāmitraśca gādhijaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणीने कहा--महाभागे! माण्डव्य ऋषिने अत्यन्त क्रोधमें भरकर मेरे स्वामी--मेरे ईश्वरको शाप दिया है कि सूर्योदय होते ही तेरी मृत्यु हो जायगी।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 259

विमानकोटिसम्बद्धं स्वर्गलोकान्महीतलम् ।गत्वायोध्याजनं प्राह दिवमारुह्यतामिति

vimānakoṭisambaddhaṃ svargalokānmahītalam / gatvāyodhyājanaṃ prāha divamāruhyatāmiti

हिन्दी अर्थ

करोमि पूर्ववद्देहं भर्तारें च नवं तव ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 260

तदिन्द्रस्य वचः श्रुत्वा प्रीत्या तस्य च भूपतेः ।आनीय रोहिताश्चञ्च विश्वामित्रो महातपाः

tadindrasya vacaḥ śrutvā prītyā tasya ca bhūpateḥ / ānīya rohitāścañca viśvāmitro mahātapāḥ

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे पतिको पूर्ववत् शरीर एवं नयी स्वस्थ अवस्थाका कर दूँगी। सुन्दरी! मुझे पतिव्रता स्त्रियोंके माहात्म्यका सर्वथा आदर करना है, इसीलिये तुम्हें मनाती हूँ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 261

अयोध्याख्ये पुरे रम्ये सो ऽभ्यसिञ्चन्नृपात्मजम् ।देवैश्च मुनिभिः सिद्धैरभिषिच्य नराधिपम्

ayodhyākhye pure ramye so 'bhyasiñcannṛpātmajam / devaiśca munibhiḥ siddhairabhiṣicya narādhipam

हिन्दी अर्थ

ततो विवस्वान् भगवान् फुल्लपदड्मारुणाकृति: ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 262

राज्ञा सह तदा सर्वे हृष्टपुष्टसुहृज्जनाः ।सपुत्रभृत्यदारास्ते दिवमारुरुहुर्जनाः

rājñā saha tadā sarve hṛṣṭapuṣṭasuhṛjjanāḥ / saputrabhṛtyadārāste divamāruruhurjanāḥ

हिन्दी अर्थ

शैलराजानमुदयमारुरोहोरुमण्डल: ।।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 263

पदे पदे विमानात् ते विमानमगमन् नराः ।तदा सम्भूतहर्षो ऽसौ हरिश्चन्द्रश्च पार्थिवः

pade pade vimānāt te vimānamagaman narāḥ / tadā sambhūtaharṣo 'sau hariścandraśca pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्र (सुमति) कहता है-ब्राह्मणीके “तथास्तु” कहकर स्वीकार करनेपर तपस्विनी अनसूयाने अर्घ्य हाथमें लेकर सूर्यदेवका आवाहन किया। उस समयतक दस दिनोंके बराबर रात बीत चुकी थी। तदनन्तर भगवान् सूर्य खिले हुए कमलके समान अरुण आकृति धारण किये अपने महान् मण्डलके साथ

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 264

सम्प्राप्य भूतिमतुलां विमानैः स महीपतिः ।आसाञ्चक्रे पुराकारे वप्रप्राकारसंवृते

samprāpya bhūtimatulāṃ vimānaiḥ sa mahīpatiḥ / āsāñcakre purākāre vapraprākārasaṃvṛte

हिन्दी अर्थ

गिरिराज उदयाचलपर आखरूढ़ हुए। सूर्यदेवके प्रकट होते ही ब्राह्मणीका पति प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिरा; किन्तु उसकी पत्नीने गिरते समय उसे पकड़

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 265

ततस्तस्यर्धिमालोक्य श्लोकं तत्रोशना जगौ ।दैत्याचार्यो महाभागः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित्

tatastasyardhimālokya ślokaṃ tatrośanā jagau / daityācāryo mahābhāgaḥ sarvaśāstrārthatattvavit

हिन्दी अर्थ

न विषादस्त्वया भद्रे कर्तव्य: पश्य मे बलम्

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 266

शुक्र उवाच हरिश्चन्द्रसमो राजा न भूतो न भविष्यति ।यः शृणोति स्वदुः खार्तः स सुखं महदाप्नुयात्

śukra uvāca hariścandrasamo rājā na bhūto na bhaviṣyati / yaḥ śṛṇoti svaduḥ khārtaḥ sa sukhaṃ mahadāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

यथा भर्तसमं नान्यमहं पश्यामि हैवतम् ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 267

स्वर्गार्थोप्राप्नुयात् स्वर्गं पुत्रार्थो पुत्रमाप्नुयात् ।भार्यार्थो प्राप्नुयाद्भार्यां राज्यार्थो राज्यमाप्नुयात्

svargārthoprāpnuyāt svargaṃ putrārtho putramāpnuyāt / bhāryārtho prāpnuyādbhāryāṃ rājyārtho rājyamāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

कर्मणा मनसा वाचा भर्तुराराधनं प्रति ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 268

अहो तितिक्षामाहात्म्यमहो दानफलं महत् ।यदागतो हरिश्चन्द्रः पुरीञ्चेन्द्रत्वमाप्तवान्

aho titikṣāmāhātmyamaho dānaphalaṃ mahat / yadāgato hariścandraḥ purīñcendratvamāptavān

हिन्दी अर्थ

अनसूया बोलीं--भटद्रे! तुम विषाद न करना। पतिकी सेवासे जो तपोबल मुझे प्राप्त हुआ है, उसे तुम अभी देखो; विलम्बकी क्या आवश्यकता? मैंने जो रूप, शील, बुद्धि एवं मधुर भाषण आदि सदगुणोंमें अपने पतिके समान दूसरे किसी पुरुषको कभी नहीं देखा है, उस सत्यके प्रभावसे यह ब्राह्मण रोगसे मुक्त

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 269

पक्षिण ऊचुः एतत् ते सर्वमाख्यातं हरिश्चन्द्रविचेष्टितम् ।अतः परं कथाशेषः श्रूयतां मुनिसत्तम

pakṣiṇa ūcuḥ etat te sarvamākhyātaṃ hariścandraviceṣṭitam / ataḥ paraṃ kathāśeṣaḥ śrūyatāṃ munisattama

हिन्दी अर्थ

हो फिरसे तरुण हो जाय और अपनी स्त्रीके साथ सौ वर्षोतक जीवित रहे। यदि मैं स्‍्वामीके समान और किसी देवताको नहीं समझती तो उस सत्यके प्रभावसे यह ब्राह्मण रोगमुक्त होकर पुनः जीवित हो जाय। यदि मन, वाणी एवं क्रियाद्वारा मेरा सारा उद्योग प्रतिदिन स्वामीकी सेवाके ही लिये होता हो तो यह

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

अध्याय ८

श्लोक 270

विपाको राजसूयस्य पृथिवीक्षयकारणम् ।तद्विपाकनिमित्तञ्च युद्धमाडिबकं महत्

vipāko rājasūyasya pṛthivīkṣayakāraṇam / tadvipākanimittañca yuddhamāḍibakaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

ततो5पतत् पुष्पवृष्टिदेववाद्यादिनि:स्वन: ।

English

" Ho! ho! citizens, listen ye all to my word. Why do ye agk me, ‘ ho! who art thou?’ I am mischievous, inhuman’

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 8
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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