अध्याय २६
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण २६ समापितव्रतं तं तु विसृष्टं गुरुणा तदा प्रस्थितं त्रिदशावासं देवयानीदमब्रवीत्
matsya-purāṇa 26 samāpitavrataṃ taṃ tu visṛṣṭaṃ guruṇā tadā prasthitaṃ tridaśāvāsaṃ devayānīdamabravīt
हिन्दी अर्थ
ययाति बोले-नरदेव! जो अपने मुखसे अपने पुण्यकर्मोका बखान करते हैं, वे सभी इस भौम नरकमें आ गिरते हैं । यहाँ वे गीधों, गीदड़ों और कौओं आदिके खानेयोग्य इस शरीरके लिये पृथ्वीपर पुत्र-पौत्रादिरूपसे बहुधा विस्तारको प्राप्त होते हैं। इसलिये नरेन्द्र! इस लोकमें जो दुष्ट और निन्दनीय कर्म हो, उसे सर्वथा त्याग देना चाहिए। भूपाल! मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया; बोलो, अब तुम्हें क्या बताऊँ
English
Iaunakassid: — On the fnifilmentof his vow when Kacha, after taking leave of lukra, was about to start for heaven, DevayAnf addressed the following Words to him: — I,