अध्याय ७५
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण ७५ विशोकसप्तमीं तद्वद् वक्ष्यामि मुनिपुंगव यामुपोष्य नरः शोकं न कदाचिदिहाश्नुते
matsya-purāṇa 75 viśokasaptamīṃ tadvad vakṣyāmi munipuṃgava yāmupoṣya naraḥ śokaṃ na kadācidihāśnute
हिन्दी अर्थ
ऋपुझ्माय सफलाः फलाः ॥ ७२ है, प्रधान देवताओंके उपयोगमें आनेके कारण वहाँके सदोपगीतभ्रमरसुरस्त्रीसेकितं परम्। वृक्षोंके फल भी सफलताको प्राप्त करते रहते हैं। वह सर्वपापक्षयकरं शैलस्येव प्रहारकम्॥ ७३ श्रेष्ठ आश्रम सदा भ्रमरोंको गुंजारसे गुंजायमान एवं देवाङ्गनाओंसे सुसेवित तथा उस पर्वतके प्रहरीकी तरह आ लवा देशाद् uss ल सम्पूर्ण पापोंका विनाशक था। नरेश्वर! एक स्थानसे ह “विता याड गीर जोड दूसरे स्थानपर क्रीडा करते हुए बन्दरोंने वहाँकी बर्फराशिको तदाश्रमं समंताच्च हिमसंरुद्धकन्दरेः । चाँदनीके समान उज्वल बना दिया था। वह आश्रम शैलवाटे: परिवृतमगम्यं मनुजैः सदा॥ ७५ चारों ओरसे हिमाच्छादित कन्दराओं और कँकरीले-
English
The Saptarsis (the great Hear) exist above Saturn: and above tlie groat Bear exists the Polo (DhruvaJ 'riic three worlds arc tied on to this Dhruva. — 74:.