Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
115
अध्याय 115 / 232

Adhyaya 115

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अध्याय ११५

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे अयोनिसम्भवतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुर्दशाधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ११५ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महाराज तीर्थम् अङ्गारकं परम् ।रूपदं सर्वलोकानां विश्रुतं नर्मदातटे

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe ayonisambhavatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma caturdaśādhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 115 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahārāja tīrtham aṅgārakaṃ param / rūpadaṃ sarvalokānāṃ viśrutaṃ narmadātaṭe

हिन्दी अर्थ

रहित, कृश उदरयुत, नखधारी लालवर्ण के कंधोवाला था। ऐसे महाभीषण कनिष्ठ पुत्र को खाने उत्पन्न किया ।5०-५३। ये दोनों पुत्र उत्पन्न होते ही अपने प्रमाण से बहुत अधिक बढ़ गये, और तुरन्त ही उपभोग में समर्थ शरीर से सम्पन्न होकर उपस्थित हुए । इस प्रकार अति ज्षीघअ्र लंबे शरीर एवं अंग्ोंवाले उन दोनों ने अपनी माता को अलंकृत किया । इन दोनों पुत्रों में से जो ज्येष्ठ था, वह बडी क्रर प्रकृति का था उसने

English

There were other sons of Khasa who be came Raksasas who could assume forms as they pleased. Listen to and under¬ stand the important ones among them as they are being enumerated.

अध्याय ११५

श्लोक 2

अङ्गारकेण राजेन्द्र पुरा तप्तं तपः किल ।अर्बुदं च निखर्वं च प्रयुतं वर्षसंख्यया

aṅgārakeṇa rājendra purā taptaṃ tapaḥ kila / arbudaṃ ca nikharvaṃ ca prayutaṃ varṣasaṃkhyayā

हिन्दी अर्थ

अपनी माता को ही घसीटना प्रारम्भ किया और बोला, मात: ! मैं क्षुध्रा से पीड़ित हें मेरे भक्षण के लिये तुम यहाँ आओ । अपने ज्येष्ठ भाई के इस दुग्यंबहार को देखकर छोटे भाई ने निषेध किया, और अनेक बार कहा कि भरे, मेरी माता खदा को तू छोड़ दे । इस प्रकार की बातें करते हुए उसने अपनी दोनों बाहुओं से पकड़कर अपनी माता को छड़ा दिया ६४-८६। ठीक इसी अवसर पर उन दोनों के पिता (कश्यप) वहाँ उपस्थित हो गये, और उनक्री यह करतूत देख बोले, है दूुराचारी पुत्रों! ठहरो। इस प्रकार उन दोनों बलवारनों ने पिता को आया देख अपनी माया के बल से (अल्पकाय हो) शीघ्र ही माता की गोद में पुनः लिपट गये ।५७-८८। तब ऋषि अपनी पत्नी से बोले, ' दमें सब करे दहिले यह सच-सच बललाओं

English

They were—Lalavi, Kuthana, Bhlma, Sumali, Madhu, Visphurjita, Vidyujjihva, Matanga, Dhumrita, Cand- rarka, Sukara, Budhna, Kapiloman, Prahasaka, Krida, Paras'u- nabha, Cakraksa, Nisacara, Trisiras, Satadamstra, the Raksasa Tundakesa, the Yaksa Akampana, Durmukha and Silimukha. These excellent Raksasas were valorous. In the form of groups, they move about in all the worlds. They have the ability to move on equal footing with the Devas.

अध्याय ११५

श्लोक 3

ततस्तुष्टो महादेवः परया कृपया नृप ।प्रत्यक्षदर्शी भगवान् उवाच क्षितिनन्दनम्

tatastuṣṭo mahādevaḥ parayā kṛpayā nṛpa / pratyakṣadarśī bhagavān uvāca kṣitinandanam

हिन्दी अर्थ

मातुल भजते पुत्र: पितुग्भजति कन्यका यथाशीला भवेन्माता तथाशीलो भवेत्सुतः (१६०

English

She (Khasa) had seven otherdaughters. Listen to them (their enumeration) in order, their progeny and the groups formed by them.

अध्याय ११५

श्लोक 4

वरदो ऽस्मि महाभाग दुर्लभं त्रिदशैर् अपि ।वरं दास्याम्यहं वत्स ब्रूहि यत्ते विवक्षितम्

varado 'smi mahābhāga durlabhaṃ tridaśair api / varaṃ dāsyāmyahaṃ vatsa brūhi yatte vivakṣitam

हिन्दी अर्थ

धर्मशीलादिभिश्चेव प्रबोधबलशालिनी (६२ गोतशोला तथारिष्टा मायाशीला दनुः स्मृता । विनता तु पुनर्देवी बेहायसगतिप्रिया ॥॥६ ३ तयोमयेन शीलेन सुरभिः समलंकृता । क्रोधशीला तथा कद्रः क्रोघेनासुखशीलका ॥€४ दनायुषायाः शीलं वे वेरानुग्रहलणक्षम् । त्वं च देवि महाभागे क्रोधशीला मता5इसि से इत्येतानि स्वशीलानि स्वभावालोकनाज्नूर्णां । कमंतो यत्नतो बुद्धचा रूपतो बलतस्तथा ॥

English

Alarhba, Utkaca, Krena, Nirrta, Kapila, Siva and the blessed KesinI are the seven sisters remembered.

अध्याय ११५

श्लोक 5

अङ्गारक उवाच: तव प्रसादाद्देवेश सर्वलोकमहेश्वर ।ग्रहमध्यगतो नित्यं विचरामि नभस्तले

aṅgāraka uvāca: tava prasādāddeveśa sarvalokamaheśvara / grahamadhyagato nityaṃ vicarāmi nabhastale

हिन्दी अर्थ

कि तुम्हारे इन दोनों पुत्रों ने तुम से क्‍या द्वुव्यंयहार अथवा कैसी अनीतिपूर्ण बातें की हैं, भर तुमने इन्हें क्या उत्तर दिया है।! पुत्र अपने मामा के स्ब॒भाव एवं गुणों का अनृप्तरण करता है, कन्या अपने पिता के स्वभाव एवं गुणादि को प्राप्त करती है, जिश्व प्रकार की माता होती है, उसका पुत्र भी उसी प्रकार का होता है, क्योंकि जैसा पृथ्वी का रंग होता है उस पर रहनेवाला जल निश्चय ही

English

The following auspicious groups of Raksasas were born of them. They are the devourers of people, meat-eaters, killers and invincible in war.

अध्याय ११५

श्लोक 6

यावद्धराधरो लोके यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।नद्यो नदाः समुद्राश्च वरो मे चाक्षयो भवेत्

yāvaddharādharo loke yāvaccandradivākarau / nadyo nadāḥ samudrāśca varo me cākṣayo bhavet

हिन्दी अर्थ

उसी रंग का होता है। माता के शील सदाचार मत अबगुणों के तथा ग्रुणों के कारण ही भिन्न भिन्न प्रकार की सम्ततियाँ उत्पन्न होती हैं, प्रशंसा के वश होकर भी लोगों के स्वभाव में कुछ अन्तर हो जाता है ।5€-६ १। हमारी सभी पत्नियों में अदिति बल, शील आदि सद्गुणों से युक्त क्ञथा धर्म में सवंदा निरत रहने बाली है। गन्धयुक्त दिति भी नित्य तपस्या एवं अध्ययव आदि में निरत रहती है, धर्म शीलादि सदगुणों भे उसका जान एवं पराक्रम--दोनों बहुत बढ़े-चढ़े हैं। बरिष्टा गीतों को भली-भाँति जानती है, दनु का लोग माया छल आदि की भी जानकार बतलाते हैं, देवी विनता आकाश में उड़ने को बहुत पसन्द करती है, सुरभि अपने तपोंमय जीवन से बहुत अधिक शोभा पाती है, कद्ू बड़ी क्रोध करने बाली है, उसे क्रोध करने में ही सुख मिलता है। दनायुषा का आचरण बेर, एवं अनुग्रह - दोनों प्रकार के विपरीत स्वभावों से संयुक्त है; भर्थाश्र्

English

The group called Alambeya was cruel. Similarly the group Utkaceya was also cruel. The groups of excellent Raksa¬ sas were the Karsneyas and Saiveyas.

अध्याय ११५

श्लोक 7

एवमस्त्विति देवेशो दत्त्वा वरमनुत्तमम् ।जगामाकाशमाविश्य वन्द्यमानः सुरासुरैः

evamastviti deveśo dattvā varamanuttamam / jagāmākāśamāviśya vandyamānaḥ surāsuraiḥ

हिन्दी अर्थ

समय-समय पर वह क्रोध एवं दया-दोनों का व्यवहार करती है, किन्तु है देवी ! महाभाग्य शालिनि ! तू तो मेरी राय में अधिक क्रोध करने वाली हो ।६२-९४। ये अपने आचरण मनुष्यों के जिविध स्वभावों के देखने से, कम से, यत्न करने से, बुद्धि से, रूप से, बल से क्षमा से एवं भवितव्यता के वश होकर भिन्न हो जाते हैं,

English

The group of Raksasas called Nairrta comprised the progeny created by leading Ganesvara who was the follower of Siva.

अध्याय ११५

श्लोक 8

भूमिपुत्रस्ततस्तस्मिन्स्थापयामास शङ्करम् ।गतः सुरालये लोके ग्रहभावे निवेशितः

bhūmiputrastatastasminsthāpayāmāsa śaṅkaram / gataḥ surālaye loke grahabhāve niveśitaḥ

हिन्दी अर्थ

इृदमध नास्ति क. पुस्तके । रजःसत्त्वतमोवृत्त विश्वरूपा: स्वभावतः । मातुल त्वनुयातास्ते पुूत्रका गुणवत्तिभिः ६७ इत्येबमुक्त्वा भगवान्खशामप्रतिमां तदा। पुत्रावाहुय सामना वे चक्रे सोमसभीतयः (? ) ६८ ताभ्यां च यत्कृतं तस्थास्तदाचष्ट तदा खशा। मात्रा यथा समाख्यातं कर्म ताभ्यां पृथक्पृथक् ॥

English

These Yaksas and Raksasas were procreated by the powerful (Ganesvaras). They were valorous and endowed with heroism. These Devaraksasas, the Nairftas had the renowned Virupaka as their leader.

अध्याय ११५

श्लोक 9

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम् ।हुतहोमो जितक्रोधः सो ऽश्वमेधफलं लभेत्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayetparameśvaram / hutahomo jitakrodhaḥ so 'śvamedhaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

तेन धात्वर्थयोगेन तत्त्वदर्शो चकार ह॒ ६६

English

Many hundreds of these proud and noble-souled groups mostly follow Sankara, the lord of the Universe.

अध्याय ११५

श्लोक 10

चतुर्थ्यङ्गारके यस्तु स्नात्वा चाभ्यर्चयेद्ग्रहम् ।अङ्गारकं विधानेन सप्तजन्मानि भारत

caturthyaṅgārake yastu snātvā cābhyarcayedgraham / aṅgārakaṃ vidhānena saptajanmāni bhārata

हिन्दी अर्थ

विद्व के प्राणियों के स्वभाव राजसिक, सात्तविक एवं तामसिक-प्रक्ृति के होते हैं। तेरे पुत्रणण गुणों एवं आचरणों में अपने मामा के अनुगामी हैं ।” भगवान् कश्यप ने अनृपभ सुन्दरी खशा से इस प्रकार की बातें कर सान्त्वता भरे स्वर से दोनों पुत्र को बुलाया और उन्हें भय रहित किया (१) तदनन्तर खज्ा ने अपने साथ उन दोनों पुत्रों ने जसा व्यवहार किया था, सब कह सुनाया । माता ने उनके ब्यवहारों को पृथक-पृथक् जैसा बतलाया उसी के अनुरूप धातु के अर्थ का आश्रय लेकर तत्त्वदर्शी कश्यप ने उनका नामकरण किया ।६६-६९। 'यक्ष' यह घातु भक्षण करने तथा कर्षण (खींचने) के अथे में प्रयुक्त होता है, यतः इस (ज्येष्ठ पुत्र) ने यक्षयति (भक्षण करता है अथवा खींचता है) का उच्चारण किया था अतएवं यह यक्ष के नाम से विख्यात हो । 'रक्ष यह जो धातु है वह पालन करने के भथ में प्रयुक्त एवं प्रसिद्ध है, यतः तुम्हारे इस दूसरे पृत्र ने मेरी माता खशा की रक्षा

English

TheKapileyas,.IieDaityaraksa.-as of great prowess, of huge body and of great strength and exploit were procreated by the noble-souled king of Daityas, Kumbha. The Yaksa Kam- pana begot of KesinI, very powerful Yaksas and Raksasas. Kesini's daughter Nila bore to Alambeya Surasika many Raksa¬ sas of petty mentality. They are called Nailas. They were invin¬ cible and were terrible in their exploits. Endowed with divine and worldly power, they move about on the entire earth. Since they are innumerable, the details of this creation cannot be recounted.

अध्याय ११५

श्लोक 11

दशयोजनविस्तीर्णे मण्डले रूपवान् भवेत् ।तत्रैव ता मृतो जन्तुः कामतो ऽकामतो ऽपि वा ।रुद्रस्यानुचरो भूत्वा तेनैव सह मोदते

daśayojanavistīrṇe maṇḍale rūpavān bhavet / tatraiva tā mṛto jantuḥ kāmato 'kāmato 'pi vā / rudrasyānucaro bhūtvā tenaiva saha modate

हिन्दी अर्थ

करो, ऐसा कहा था, अतः इसका नाम राक्षस होगा ।” इस प्रकार उत दोनों बालकों के पिता कश्यप ने उस समय नाम करण करने के बाद उन्हें भूखा जान, माता के साथ किये गये उनके व्यवहारों को सोच समझकर एवं भवितव्यता को वेप्ती ही जानकर तदनुकूल काये किया ।१००-१०२। उन दोतनों को क्षुधा से पीड़ित देख उनकी मतोभावनाओों का पता पाकर प्रजापति कश्यप जी परम विस्मित हुये और आहार के लिये रक्त और चर्बी

English

The same Nila had a daughter, the demoness Vikaca, naturally devoid of hair and possessing mediocre strength and exploit.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 115
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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