Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
136
अध्याय 136 / 232

Adhyaya 136

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अध्याय १३६

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे सिद्धेश्वरमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १३६ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महीपाल चाहल्येश्वरमुत्तमम् ।यत्र सिद्धा महाभागा त्वहल्या तापसी पुरा

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe siddheśvaramāhātmyavarṇanaṃ nāma pañcatriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 136 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahīpāla cāhalyeśvaramuttamam / yatra siddhā mahābhāgā tvahalyā tāpasī purā

हिन्दी अर्थ

अपने ही दोषों से तू अपने ऐश्वर्य से भ्रष्ट होकर गिर रही हो ।७०१०। इस लोक में देवगण अपने जिस दारीर से कर्मों को करते हैं, उसी से उसका फल प्राप्त करते हैं। देवयौनि में कर्मों का फल तुरन्त प्राप्त होता है और सनुष्य योचि में पर लोक ( आय. ज्न्म-) में प्राप्त होता है, इस कॉरण -तुम दूसरे: जन्म में? अमावसू को पितर) (पति ?) रूप. में प्राप्त -क़्रोमी ६ प्लेसा कहने . के उपरान्त उसने पिलरों को पूल: प्राथना आदि सें

English

Pitamahas, the deities of subtle bodies, grant the means of salvation, AiSvarya (prosperity), complete detachment and infiniteness.

अध्याय १३६

श्लोक 2

गौतमो ब्राह्मणस्त्वासीत् साक्षाद् ब्रह्मेव चापरः ।सत्यधर्मसमायुक्तो वानप्रस्थाश्रमे रतः

gautamo brāhmaṇastvāsīt sākṣād brahmeva cāparaḥ / satyadharmasamāyukto vānaprasthāśrame rataḥ

हिन्दी अर्थ

प्रसन्न किया । प्रार्थना करने पर पित्तरों नेःउसके उऊपर- बड़ी अनुक्रम्पा- कर प्रसन्नता प्रकट की । ध्यान मग्न होक्कर उन पितरों ने राजा: रूप में अमावसू और उसकी, कव्या के बारे में ये बातें! की ।ह१-१४॥ पृथ्वीललः पर मनुष्स्त योनि में उत्पन्न महात्मा अमाव्रसु की. क्या होकर तुम - पुतः इन अपने लोंकों, को-प्राप्स करोगी अदट्टाइसंवें द्वापर युग में तुम्हारी ; उत्पत्ति मत्स्य की योनि से-होगी और इसी राजा अपतावस् से -अद्विका-में तुम कन्या रूप में उत्पन्न होगी और पराश्र कषि के सुपुत्र, वेदव्यास को उत्पन्न क़रोगी । - वह तुम्हारा पृत्र ऋद्मणों में श्रेष्ठ

English

Practised Yoga is AiSvarya', and Ativarya is the excellent wealth. Without Yoga and Aisvarya liberation (from Sarhsara) is impossible (to be achieved).

अध्याय १३६

श्लोक 3

तस्य पत्नी महाभागा ह्यहल्या नाम विश्रुता ।रूपयौवनसम्पन्ना त्रिषु लोकेषु विश्रुता

tasya patnī mahābhāgā hyahalyā nāma viśrutā / rūpayauvanasampannā triṣu lokeṣu viśrutā

हिन्दी अर्थ

होगा और एक बेद को चारसश्नागों में विभक्त करेगा ।/१४-१७। महाभिष शब्तनु- के कीति बद्धंक धर्म :विचित्रवीय॑

English

Vairajas

अध्याय १३६

श्लोक 4

अस्या अप्यतिरूपेण देवराजः शतक्रतुः ।मोहितो लोभयामास ह्यहल्यां बलसूदनः

asyā apyatirūpeṇa devarājaḥ śatakratuḥ / mohito lobhayāmāsa hyahalyāṃ balasūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

टू. 5 /छा ; में «ता ् उन्हे "के भरे के व, मी में 5. का 5 ७, आनन्दा्रेम की प्रति में यहाँ पर मूल पाठ को सन्देह में डाल दिया है। जिससे पति रूप में” प्राप्त करोगी-- ऐसा अर्थ निकलता है, परन्तु आगे चलकर पिता रूप में प्रप्त करने का उल्लेख है । खहामिषस्य पुत्रौग्दी शंत्ीः कीतिवर्धनो । विचित्रवीर्य घर्मज्ञ त्वमेबोत्पदियिष्यसि” ४« 5

English

Barhisads

अध्याय १३६

श्लोक 5

मां भजस्व वरारोहे देवराजम् अनिन्दिते ।क्रीडयस्व मया सार्द्धं त्रिषु लोकेषु पूजिता

māṃ bhajasva varārohe devarājam anindite / krīḍayasva mayā sārddhaṃ triṣu lokeṣu pūjitā

हिन्दी अर्थ

चित्रा ड्रादं च राजानं तेजोबलगुणान्वितम् ।एलानुत्पाथ प्रृत्रांस्त्व॑ पुनलोकानवाप्स्यथसि :

English

Agnisvattas

अध्याय १३६

श्लोक 6

किं करिष्यसि विप्रेण शौचाचारकृशेन तु ।तपःस्वाध्यायशीलेन क्लिश्यन्तीव सुलोचने

kiṃ kariṣyasi vipreṇa śaucācārakṛśena tu / tapaḥsvādhyāyaśīlena kliśyantīva sulocane

हिन्दी अर्थ

व्यतिक्वमात्पितर्णां त्वं फ्राष््यससे जन्म कुत्सितम् । तस्येव राज्ञरूव कन्या अद्विकायां भविष्यसि आरक़ कन्या मृत्वा ततश्रत्वभिमॉल्लोकानवाप्स्यसि । एवशुक्ता तु दासेयी जाता सत्यवत्ती तु सा. ॥२३१: अद्विकायां सुता मंत्स्प्रां जुता जाव्रा ह्वामावसों: । अडिकामत्स्प्रसंभूता गड़ायब्रुनप्नंपल्ने... २२ तस्य राज्ञो' हि'सा कल्या' राज्ो वीयें सेव हि'। बिरेजा नप्म ते लोका दिव्ि रोचून्ति ते गणाः ॥२४: अग्मिव्वात्ता: स्मृताइलत्र वितरों भास्व॒रप्रभा: ।- तान्दानवयणा यक्षा रकोगन्धर्बाकनरा: .... ॥३४:

English

Kavyas (sons of Agni and Svadha)

अध्याय १३६

श्लोक 7

एवमुक्ता वरारोहा स्त्रीस्वभावात् सुचञ्चला ।मनसाध्याय शक्रं सा कामेन कलुषीकृता

evamuktā varārohā strīsvabhāvāt sucañcalā / manasādhyāya śakraṃ sā kāmena kaluṣīkṛtā

हिन्दी अर्थ

फोगिनो योगपत्नी व योगसाता-तथैव बच भवित्ता' द्वापरं प्राप्य अष्टाविशं तदेव तु. 3, :..

English

Upahutas (sons of Angiras)

अध्याय १३६

श्लोक 8

तस्या विदित्वा तं भावं स देवः पाकशासनः ।गौतमं वञ्चयामास दुष्टभावेन भावितः

tasyā viditvā taṃ bhāvaṃ sa devaḥ pākaśāsanaḥ / gautamaṃ vañcayāmāsa duṣṭabhāvena bhāvitaḥ

हिन्दी अर्थ

पराशरकुलोद्मूतः शुकी नाम महातपा: । श्रीमान्‍्योगी महायोगी योगस्तस्माहिजोत्तमाः २८ ब्यासादरण्यां संभुतो विधूम इव पावकः । स तस्यां पितृकन्यायाँ योगांचा्न्पिरिश्रुतान् ओर परम तेजस्वी; बलवान, गुणशील राज़ा चित्रांगद इन. दो पुत्रों को तुम्हीं उत्पन्न करोगी.। इन पुत्रों को. उत्पन्न करने के बाद तुम पुनः इन लोकों को प्राप्त करोगी। पितरों के साथ पति, भावना. करके तुमने बहुत बड़ा व्यतिक्रम कर दिया है ओर डूसी,से ऐसी कुत्सित योनि में जन्म आप्त करना पड़ेगा । किन्तु उस योनि में भी तुम अद्विका क्रे. ग़्रभे में उसी राजा के (ीय॑ से जभत्पन्न होगी ।१८-२०॥ उसी कन्या होने के बाद तू इन लोछों

English

Ajyapas (sons of Pulaha)

अध्याय १३६

श्लोक 9

विदित्वा चान्तरं तस्य गृहीत्वा वेषमुत्तमम् ।अहल्यां रमयामास विश्वस्तां मन्दिरान्तिके

viditvā cāntaraṃ tasya gṛhītvā veṣamuttamam / ahalyāṃ ramayāmāsa viśvastāṃ mandirāntike

हिन्दी अर्थ

को निश्चय हो प्राप्त करोगी ।, पितूरों, के ऐसा कहने पूर वह दासों की पुत्री सत्यवत्ी के रूप में उत्पन्न हुई । अमावयु के संयोग से अद्विका नामक मछली की पुत्री के रूप में उसका जन्म हुआ, ग्रद्धा यंमुनता के संगम पर अद्विका मछली के , पेट,से ;,उसकी उत्पत्ति; हुई, वह उसी राजा अमावसु के वीये से उत्पन्न हुई थी अत उसकी कुन्या थो। स्व॒गं में श्िरज नाम पितरों से वे,लोक शोभायमान हैं ॥२१-२३। वहाँ विद्यमान. रहने वाले

English

Sukala (sons of Vasisfha

अध्याय १३६

श्लोक 10

क्षणमात्रान्तरे तत्र देवराजस्य भारत ।आजगाम मुनिश्रेष्ठो मन्दिरं त्वरयान्वितः

kṣaṇamātrāntare tatra devarājasya bhārata / ājagāma muniśreṣṭho mandiraṃ tvarayānvitaḥ

हिन्दी अर्थ

पितरगण सूर्य के समान कान्तिमात्त, हैं, वे आ नृष्वात्त! नाम॒ से विख्यात हैं। उन पित्र .गणों की समस्त दानव यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, किन्नर, भूत, सर्प एवं पिशाचों के गणुउत्तम फल की प्राप्ति की इच्छा से पूजा करते हैं । पुलह प्रजापति कै.दन पुत्रों का वर्णन क्रिया जा चुका। धर्ममूति इन पितरों के तीन गण कहे गये हैं । इनकी मानसी कन्या पीवरी नाम,से विख्यात, है, वह, बीवरी योगिनी, -योगपत्नी एवं योगमाता के रूप में भी विख्यात थी । है द्विंजवर्य बन्द ! अद्वाईसवें द्ात्तर युग के आने पर पराशर के कुल में शुक नामक महान् तपस्वी श्रीमान, योगी, एवं महान योगाभ्यासी की उन्‍पत्ति होगी, उन्हीं से पृथ्वी पर योंग का विस्तार होगा

English

It (Moksa) is as impossible as the movement of a wingless bird in the sky. il4bA/a-Dharma is the greatest of all Dharmas and eternal.

अध्याय १३६

श्लोक 11

आगतं गौतमं दृष्ट्वा भीतभीतः पुरंदरः ।निर्गतः स ततो दृष्ट्वा शक्रो ऽयमिति चिन्तयन्

āgataṃ gautamaṃ dṛṣṭvā bhītabhītaḥ puraṃdaraḥ / nirgataḥ sa tato dṛṣṭvā śakro 'yamiti cintayan

हिन्दी अर्थ

वे शुक व्यास के संयोग से अरणी में घूम रहित अग्नि.के समान तेजोमय रूप में उत्पन्न होंगे और पित्तरों

English

Pitamahas (manes) grant thousands of aerial chariots attended by groups of Apsaras-s and richly equipped with all desirable things.

अध्याय १३६

श्लोक 12

ततः शशाप देवेन्द्रं गौतमः क्रोधमूर्छितः ।अजितेन्द्रियो ऽसि यस्मात्त्वं तस्माद् बहुभगो भव

tataḥ śaśāpa devendraṃ gautamaḥ krodhamūrchitaḥ / ajitendriyo 'si yasmāttvaṃ tasmād bahubhago bhava

हिन्दी अर्थ

क्ृष्णं गोरं प्रभुं शंभूं तथा भूरिश्रुतं च बे । कन्या कोतिमतीं चेव. योगिनीं योगमातरम् ब्रह्मदत्तत्य जननो महिषी त्वणुहस्य तु । एतानुत्पाद्य धर्मात्मा पुत्रान्योगमवापष्य च

English

Intellect, nourishment, power of memory, brain, kingdom and health can be attained only through the grace of the noble-souled Pitrs.

अध्याय १३६

श्लोक 13

एवमुक्तस्तु देवेन्द्रस्तत्क्षणादेव भारत ।भगानां तु सहस्रेण तत्क्षणाद् एव वेष्टितः

evamuktastu devendrastatkṣaṇādeva bhārata / bhagānāṃ tu sahasreṇa tatkṣaṇād eva veṣṭitaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वव्यापी विनिर्मुक्तो भविष्यति महामुनिः। अमू्तिमन्‍्तः पितरो धर्ंमृतिधरास्तु ये

English

Pitamahas grant crores of gems, pearls, lapis lazuli, garments and thousands of horses and elephants.

अध्याय १३६

श्लोक 14

त्यक्त्वा राज्यं सुरैः सार्द्धं गतश्रीको जगाम ह ।तपश्चचार विपुलं गौतमेन महीतले

tyaktvā rājyaṃ suraiḥ sārddhaṃ gataśrīko jagāma ha / tapaścacāra vipulaṃ gautamena mahītale

हिन्दी अर्थ

उतपन्नास्ते स्वधायास्तु कन्या ह्ग्ने: कबेः सुता: । पितरो देवलोकेषु ज्योतिर्भासिषु भास्वराः सर्वकामसमृद्धेषु द्विजास्तात्भावयन्त्युत । एतेषां मानसी कन्या गौर्नास दिवि विश्वुता

English

Pitamahas always bestow on men chariots fitted with swans and peacocks, studded with pearls and lapis lazuli and decorated with tinkling bells and provided with perpetual flowers and fruits.

अध्याय १३६

श्लोक 15

अहल्यापि ततः शप्ता यस्मात् त्वं दुष्टचारिणी ।प्रेक्ष्य मां रमसे शक्रं तस्माद् अश्ममयी भव

ahalyāpi tataḥ śaptā yasmāt tvaṃ duṣṭacāriṇī / prekṣya māṃ ramase śakraṃ tasmād aśmamayī bhava

हिन्दी अर्थ

मरोचिगर्भास्ते लोकाः समावृत्य दिवि श्रुताः। एते ह्यद्धिरसः पुत्राः साध्य:ः सह विवधिताः

English

It is said (in Dharma-Sastra) that the vessels of (meant for) Pitrs should be made of gold, silver or copper. A silver or

अध्याय १३६

श्लोक 16

गते वर्षसहस्रान्ते रामं दृष्ट्वा यशस्विनम् ।तीर्थयात्राप्रसङ्गेन धौतपापा भविष्यसि

gate varṣasahasrānte rāmaṃ dṛṣṭvā yaśasvinam / tīrthayātrāprasaṅgena dhautapāpā bhaviṣyasi

हिन्दी अर्थ

की मानसी कन्या उस पीवरी में सुविख्यात योगाचार्य ऋष्ण, गौर, प्रभु, शंभु तथा भूरिश्रुत नामक पुत्रों को तथा परम योगिनी योगमाता कौतिमती नामक कन्या को वे उत्पन्न करेंगे । वह कीतिमती अणुह की पत्नी ओर ब्रह्मदत्त की माता होगी। धर्मात्मा शुक्र अपने महान् तप एवं योग से इन पुत्रों की उत्पत्ति करने के बाद उस परम गति को प्राप्त होंगे, जिसको प्राप्त कर पुनरावतंन नहीं होता । सूयं की किरणों के समान . परम तेज को भ्राप्त होकर वे पुनजेन्त्र को न॒प्र'प्त होंगे। इस प्रकार वे महामुनि समस्त चराचर जगतु में व्याप्त होकर सांसारिक बन्धनों से विनिमुक्त हो जायेंगे । धर्म मूति धारण करनेवाले जो पितरगण हैं वे भमूर्त हैं इसके तीन गण हैं । है द्विजश्रेष्ठ, अब मैं उन अन्य चार पितरों के बारे में बतला रहा हूँ, जो परम कान्ति- मान स्वरूपधारी हैं, उन्हें पुनिये ।२६-३४।॥ वे पितर गण कवि अग्नि को पुत्री स्वधा से उत्पन्न हुये हैं, और

English

Showing or gifting away of silver is proclaimed to be

अध्याय १३६

श्लोक 17

एवं गते ततः काले दृष्टा रामेण धीमता ।विश्वामित्रसहायेन त्यक्त्वा साश्ममयीं तनुम्

evaṃ gate tataḥ kāle dṛṣṭā rāmeṇa dhīmatā / viśvāmitrasahāyena tyaktvā sāśmamayīṃ tanum

हिन्दी अर्थ

ज्थोतिर्मास चामक देबलोको में उनका निवास स्थान है, स्वयमेव ये पितरमण बहुत तेजोमय हैं। सभी अभिला- षाओं को पूर्ण करनेवाले उन ज्योतिमेय लोकों में विराजमान पितरों की द्विजगण इसी प्रकार से भावना करते हैं। इनकी मानसो कन्या गो हैं, जो स्वर्ग लोक में विख्यात है। सनत्कुमार) ने गौ को शुक्र को सौंपा था जहाँ पर वह शुक्र की प्रिया स्त्री हुई। भृगुबंश में उत्पन्न होनेवाले परम यशस्वी इंकतीस पितरगण बहुत विख्यात हुये ।

English

O dear one, it was in silver vessel that Svadha was

अध्याय १३६

श्लोक 18

पूजयित्वा यथान्यायं गतपापा विमत्सरा ।आगता नर्मदातीरे तीर्थे स्नात्वा यथाविधि

pūjayitvā yathānyāyaṃ gatapāpā vimatsarā / āgatā narmadātīre tīrthe snātvā yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

उनके लोक मरीचिग्रभं के नाम से विख्यात हुये, जो समस्त स्वर्ग लोक को आवृत करके स्थित हैं, ऐसा उतके स्वर्ग लोक में परम तेजोमय उपहृत नामक पितरगण विर।जमान हैं उन क्षत्रियों के पितरगणों की शुभ फल की

English

Cf. V, 5 ouDh.S 79.14-15. Yajnavalkya I. 236 specially recommends silver vessels. Cf also Mt. 19-22, Bd. 3.11-1.

अध्याय १३६

श्लोक 19

कृतं चान्द्रायणं मासं कृच्छ्रं चान्यं ततः परम् ।ततस्तुष्टो महादेवो दत्त्वा वरमनुत्तमम्

kṛtaṃ cāndrāyaṇaṃ māsaṃ kṛcchraṃ cānyaṃ tataḥ param / tatastuṣṭo mahādevo dattvā varamanuttamam

हिन्दी अर्थ

१. आनन्दाश्रम की प्रति में जो पाठ है, उससे यह अर्थ भिन्‍न है।

English

Vessels made of gold, silver or copper, gingelly seeds Kutapa (i.e. the eighth muhurta of the day) or Kusa grass' sesamum seeds, garments and Tridanfi Toga (i. e. the Yoga of mind, speech and body)—all these are holy, objects.

अध्याय १३६

श्लोक 20

जगामादर्शनं भूयो रेमे चोमापतिश्चिरम् ।अहल्या तु गते देवे स्थापयित्वा जगद्गुरुम्

jagāmādarśanaṃ bhūyo reme comāpatiściram / ahalyā tu gate deve sthāpayitvā jagadgurum

हिन्दी अर्थ

राजर्षेजननी देवी खट्वाड्रस्य महात्मनः । यस्य यज्ञे पुरा गीता गाथा दिव्येमह्िभिः ॥४ १ अग्नेजेन्स तथा दुृष्ट्वा शाण्डिल्यस्य महात्मनः । यजमानं दिलोप॑ ये पश्यन्ति सुसमाहिताः. सत्यत्नतं महात्मानं ते स्वर्ग जयिनो5सरा: । आज्यपा नाम पितरः कर्दमस्य प्रजापते: ४३ समुत्पन्नस्य पुलहादुत्पन्नास्तस्य वे पुनः । लोकेष्वेतेषु वर्तन्ते कामग्रेषु विहंगमा:ः ४४

English

In the holy rite of Sraddha, the following ritual prescribed by god Brahma is the most excellent and eternal. It is conducive to increase in fame, longevity, progeny,' intellect and lineage.

अध्याय १३६

श्लोक 21

अहल्येश्वरनामानं स्वगृहे चागमत्पुनः ।तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत् परमेश्वरम्

ahalyeśvaranāmānaṃ svagṛhe cāgamatpunaḥ / tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet parameśvaram

हिन्दी अर्थ

ययातेजननी साध्वी पत्नी सा नहुषस्य तु । सुकाला नाम पितरो बसिष्ठस्य प्रजापते:

English

In the south-east direction, especially at the intermedi¬ ate point (corner) between them, (should be the place—altar inBd. P.—for Sraddha). It should be well-situated and square shaped with sides equal to an Aratni (the distance between the tip of the fist and the elbow). I shall mention the proper spot for the holy rites of Pitrs in accordance with the injunctions of the scriptures. It is conducive to the attainment of wealth, health and longevity. It enhances strength and brightness of complexion.

अध्याय १३६

श्लोक 22

स मृतः स्वर्गमाप्नोति यत्र देवो महेश्वरः ।क्रीडयित्वा यथाकामं तत्र लोके महातपाः

sa mṛtaḥ svargamāpnoti yatra devo maheśvaraḥ / krīḍayitvā yathākāmaṃ tatra loke mahātapāḥ

हिन्दी अर्थ

हिरण्यगर्भस्य सुताः शुद्रास्तान्भावयन्त्युत । मानसा नाम ते लोका बहन्ते यत्र ते दिवि (३४७ एतेषां मानसी कन्या नमंदा सरितां बरा। सा भावयति भुतानि दक्षिणापथगामिनी तस्मादिह स्वधर्मेण भ्राद्धं देयं तु शद्धया । सर्वेषां राजतेः पात्रेरपि वा रजतान्वित॑: ५१

English

At the place (intended for Sraddha), three pits (should be dug) and three sticks of Khadira wood should be placed. They (the sticks) should be an Aratni (distance between the tip of the fist and the elbow) in length and should be embellished with silver (bands). (The pits) should be a Vitasti (the span or the distance between thumb and little finger when they are extend¬ ed on either side) in depth* and the four sides should be four Angulas (fingers) each.

अध्याय १३६

श्लोक 23

गते वर्षसहस्रान्ते मानुष्यं लभते पुनः ।धनधान्यचयोपेतः पुत्रपौत्रसमन्वितः

gate varṣasahasrānte mānuṣyaṃ labhate punaḥ / dhanadhānyacayopetaḥ putrapautrasamanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्ति के द॒शछक प्राणी भावना ध्यान या पूजा करते हैं। इनकी मानसी कन्या यशोदा नाम से विख्यात है, जो विश्व महत की पत्नी, बिह्वशर्मा को पुत्र वध और उस महात्मा राजषि खट्वाज़ू की माता थी। प्राचीन काल में जिसके यज्ञ में दिव्य गुण सम्पन्न महर्षियों ने गाथाओं का गान किया था ।३८-४१। स्वर्ग के जीतने वाले समाहित चित्त वृत्ति सम्पन्न वे पितरमण यज्ञ में अग्नि का जन्म देखने के उपरान्त महात्मा शाण्डिल्य के सत्यब्रत

English

The sticks should not be hollow and they must be plac¬ ed on the ground with their faces pointing to the south-east. (The performer of Sraddha) should be pure and should wash them with holy waters or water rendered holy by the use of the ring of Darbha grass (called Pauitra ) worn by the per¬ former of Sraddha. The purification (Sodhana) may be carried out with goat's milk or cow's milk and water. By means of this Tarpana ( holy water-offering) the satisfaction (of Pitrs) will be permanent.

अध्याय १३६

श्लोक 24

वेदविद्याश्रयो धीमाञ्जायते विमले कुले ।रूपसौभाग्यसम्पन्नः सर्वव्याधिविवर्जितः ।जीवेद्वर्षशतं साग्रम् अहल्यातीर्थसेवनात्

vedavidyāśrayo dhīmāñjāyate vimale kule / rūpasaubhāgyasampannaḥ sarvavyādhivivarjitaḥ / jīvedvarṣaśataṃ sāgram ahalyātīrthasevanāt

हिन्दी अर्थ

परायण एवं महात्मा यजमान दिलीप का दर्शन करते हैं जिनके नाम आज्यपा हैं, ये प्रजापति कदंम के पि-रगण हैं जिनकी उत्पत्ति पुलह से हुई थी, उनन्‍्हों के यहाँ इनकी पुनः उत्पत्ति हुई, इन लोकों में ये आकाशचारी पितरगण अपने इच्छानुरूप भ्रमण करते हैं। शुभ फल प्राप्ति के इच्छुक वहयगण श्राद्धों में इन की भावना करते हैं । इन की मानसी कन्या विरजा नाम से विख्यात है, जो ययाति की माता और नहुष की प्रतिव्रता पत्नी थी ।४२-४५३। प्रजापति वशिष्ठ के सुकाल नामक पितरगण हैं, जो हिरण्य गर्भ के पुत्र हैं। इन पितरों की भावना शुद्र लोग करते हैं। स्वगं में मानस नामक लोक हैं, जिनमें ये निवास करते हैं। इनकी मानसी कन्या नदियों में श्रेष्ठ नमंदा है, (भारतभूमि) के दक्षिणापथ में बहती हुई वह सभी जौवों को पवित्र करती है। वह नमंदा त्रसदस्यु की भाता और पुरुकुत्स को पत्नी थी। इन्हीं उपयुक्त पितरों

English

He will be prosperous here and hereafter. He will be (blessed with the fruits of) all holy rites. If a person always takes bath three times a day and worships Pitrs with Mantras as per prescribed procedure, he gets the fruit of (performance) of a horse-sacrifice {Asvamedha ').

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 136
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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