अध्याय १३६
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे सिद्धेश्वरमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १३६ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महीपाल चाहल्येश्वरमुत्तमम् ।यत्र सिद्धा महाभागा त्वहल्या तापसी पुरा
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe siddheśvaramāhātmyavarṇanaṃ nāma pañcatriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 136 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahīpāla cāhalyeśvaramuttamam / yatra siddhā mahābhāgā tvahalyā tāpasī purā
हिन्दी अर्थ
अपने ही दोषों से तू अपने ऐश्वर्य से भ्रष्ट होकर गिर रही हो ।७०१०। इस लोक में देवगण अपने जिस दारीर से कर्मों को करते हैं, उसी से उसका फल प्राप्त करते हैं। देवयौनि में कर्मों का फल तुरन्त प्राप्त होता है और सनुष्य योचि में पर लोक ( आय. ज्न्म-) में प्राप्त होता है, इस कॉरण -तुम दूसरे: जन्म में? अमावसू को पितर) (पति ?) रूप. में प्राप्त -क़्रोमी ६ प्लेसा कहने . के उपरान्त उसने पिलरों को पूल: प्राथना आदि सें
English
Pitamahas, the deities of subtle bodies, grant the means of salvation, AiSvarya (prosperity), complete detachment and infiniteness.