Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
163
अध्याय 163 / 232

Adhyaya 163

4 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय १६३

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे गोपेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम द्विषष्ट्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १६३ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महाराज नागतीर्थमनुत्तमम् ।आश्विनस्य सिते पक्षे पञ्चम्यां नियतः शुचिः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe gopeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma dviṣaṣṭyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 163 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahārāja nāgatīrthamanuttamam / āśvinasya site pakṣe pañcamyāṃ niyataḥ śuciḥ

हिन्दी अर्थ

ध॒तेस्तु बहुलाश्वो5भुद्बहुलाश्वसुतः कृति: । तस्मिन्संतिष्ठते बंशो जनकानां महात्मनाम् ॥। इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्‍्ते मैथिलवंशानुकीतंन॑ नाम नवाशीतितमोः5्ध्याय: ॥छछे॥

English

Paradas were compelled to keep their hair dis¬ hevelled and Pahlavas were made to grow their beards. They were debarred from Vedic study and the use of Va$afkara by that noble-souled king.

अध्याय १६३

श्लोक 2

रात्रौ जागरणं कृत्वा गन्धधूपनिवेदनैः ।प्रभाते विमले स्नात्वा श्राद्धं कृत्वा यथाविधि

rātrau jāgaraṇaṃ kṛtvā gandhadhūpanivedanaiḥ / prabhāte vimale snātvā śrāddhaṃ kṛtvā yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

सूत ने कद्दा-- 'अव्वमेध यज्ञ के अवसर पर महाराज सीरध्वज ने विधिपूवंक जिस अग्निक्षेत्र का कथंण किया, उसी से सीता का जन्म हुआ । उस राजा सीरध्वज से भानुमान् का जन्म हुआ, जो मैथिल नाम से विख्यात था। उसका भाई कुशध्वज था, जो काशी का राजा हुआ। उस राजा भानुमान् का पुत्र प्रतापशाली प्रद्यम्त हुआ, उसका पुक्र मुनि था, घुनि से ऊजंवह की उत्पत्ति कही जाती है ।!७-१६। ऊर्जेवह

English

Sakas, Yavanas, Kambojas, Pahlavas, Paradas, Kelisparsas, Mahisikas, Darvas, Colas and Khasas—all these were clans of Ksatriyas. Their traditional religious rites were prohibited by the noble-souled Sagara at the instance of Vasi$tha.

अध्याय १६३

श्लोक 3

मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा ।तत्र तीर्थे तु यो राजन्प्राणत्यागं करिष्यति

mucyate sarvapāpebhyo nātra kāryā vicāraṇā / tatra tīrthe tu yo rājanprāṇatyāgaṃ kariṣyati

हिन्दी अर्थ

से सृतद्वाज की उत्पत्ति हुई, उसका पुत्र शकुनि हुआ, उस शकुति का पुत्र स्वागत हुआ, जिसका पुत्र सुवर्चा कहा जाता है। सुवर्चा का पुत्र श्रुत और श्रुत का पुत्र सुशुल हुआ ॥ सुश्रुत का पुत्र जय और जय का पुत्र विजय हुआ ।२०-३१। विजय का पुत्र ऋत और ऋत का पुत्र युनय कहा जाता है, सुनय से वीतह॒ब्य की उत्पत्ति हुई, वीतह॒व्य का पुत्र धति हुआ धृति का पुत्र बहुलाइव हुआ, बहुलाश्व का पुत्र कृति हुआ । इसी राजा कृति तक महान प्रतापी जनक नाम धारी राजाओं का वंश प्रतिष्ठित माना जाता है। मैथिल नामधारी राजाओं का वर्णन किया जा चुका अब चल्द्रमा के वंश का भी वर्णन सुनिये ।

English

Conducting his conquests righteously, the king con¬ quered the earth and took initiation for the performance of a horse-sacrifice. He let loose the horse.

अध्याय १६३

श्लोक 4

अनिवर्तिका गतिस्तस्य प्रोवाचेति शिवः स्वयम्

anivartikā gatistasya provāceti śivaḥ svayam

हिन्दी अर्थ

पिता सोमस्य बे विपध्रा जज्ञेइत्रिर्भगवानूषिः । तत्रात्रि: सर्वेलोकानां तस्थो स्वेनमये धृतः

English

As it was being taken round, it was stolen near the shore of the south-eastern sea and made to enter beneath the earth.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 163
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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