Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
173
अध्याय 173 / 232

Adhyaya 173

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अध्याय १७३

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे नर्मदामाहात्म्ये माण्डव्यतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम द्विसप्तत्यधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १७३ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र तीर्थं परमशोभनम् ।नर्मदादक्षिणे कूले सर्वपापप्रणाशनम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe narmadāmāhātmye māṇḍavyatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma dvisaptatyadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 173 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra tīrthaṃ paramaśobhanam / narmadādakṣiṇe kūle sarvapāpapraṇāśanam

हिन्दी अर्थ

कुन्तेध ष्टसुतो जज्ञे पुरो धुष्ट: प्रतापवान् । धृष्टस्य पुत्रों धर्मात्मा निव् तिः परवीरहा ३६

English

I shall recount the race of the eldest (son of Yayati) Yadu, of excellent splendour. Listen and understand, even as I recount it in detail and in the proper order.

अध्याय १७३

श्लोक 2

सिद्धेश्वरमिति ख्यातं महापातकनाशनम् ।यत्र शुद्धिं परां प्राप्तो देवदेवो महेश्वरः ।पुरा हत्यायुतः पार्थ देवदेवस् त्रिशूलधृक्

siddheśvaramiti khyātaṃ mahāpātakanāśanam / yatra śuddhiṃ parāṃ prāpto devadevo maheśvaraḥ / purā hatyāyutaḥ pārtha devadevas triśūladhṛk

हिन्दी अर्थ

में स्थापित किया ।२३-२८। रुक्मेषु अपने पिता के राज्य का अधिकारी हुआ, प्रथुरुकम उसके अधीन था । उन सभी भाइयों ने मिलाकर ज्यामघ को निर्वासित कर दिया, जिससे उसने वन में अपना आश्रम बनाया । घोर वन्य प्रान्त में मुनिवृत्ति धारण करनेवाले ज्यामघ को एक ब्राह्मण ने प्रेरणा दी, जिससे प्रभावित होकर वह रथ पर चढ़ धनुष घारण कर मध्य देश को प्रस्थित हुआ वहाँ नमंदा के तटवर्ती प्रान्त में अकेले घूमते हुए, वह मेकल पवंत के छिखरों से ऋक्षवान् नासक पवेत पर पहुँचा ओर वहाँ से शुक्तिमतीो में प्रविष्ट हुआ ज्यामघ की पत्नी शंव्या परम शक्तिमती ओर साहसी थी। उससे कोई पुत्र यद्यपि नहीं था फिर भी राजा होकर उसने दूसरी स्त्री से ब्याह नहीं किया था ।३९-३२। एक युद्ध में राजा ज्यामघ की विजय हुई, जिसमें उसने एक कन्या प्राप्त की । नरपति ने उस कन्या को लाकर अपनी स्त्रीं से यह कहा कि यह

English

Yadu had five sons, all comparable to the sons of Devas. Sahasrajit was the eldest. (The others were) Krostu, Nila, Jita and Laghu.

अध्याय १७३

श्लोक 3

पुरा पञ्चशिरा आसीद्ब्रह्मा लोकपितामहः ।तेनानृतं वचश्चोक्तं कस्मिंश्चित्कारणान्तरे

purā pañcaśirā āsīdbrahmā lokapitāmahaḥ / tenānṛtaṃ vacaścoktaṃ kasmiṃścitkāraṇāntare

हिन्दी अर्थ

तुम्हारी पुत्र वध है ।” राजा के ऐसा कहने पर दोव्या ने कहा “यह किसकी पुत्रवध् होगी। राजा ने कहा "तुम्हें जो पुत्र उत्पन्न होगा यह कन्या उसीकी स्त्री होगी ।/ राजा के इस वचन से शंव्या ने कठोर तपस्या की, जिससे उसे एक पुत्र हुआ सुम्दरी, साध्वोन्शंव्या ने वृद्धावस्था में इस प्रकार विदर्भ नामक पुत्र को उत्पन्न किया था । उसकी पुत्रवध् में विदर्भ से क्र८ और कौशिक नामक दो राजपुत्र उत्पन्न हुए, जो परम

English

Sahasrajit's son was the glorious king named Satajit. Satajit had three sons who were well known as very virtuous.

अध्याय १७३

श्लोक 4

तच्छ्रुत्वा सहसा तस्मै चुकोप परमेश्वरः ।छेदयामास भगवान्मूर्धानं करजैस्तदा

tacchrutvā sahasā tasmai cukopa parameśvaraḥ / chedayāmāsa bhagavānmūrdhānaṃ karajaistadā

हिन्दी अर्थ

विद्वान शुर-वीर और रणनिप्रण थे ।३३-२६। उन दोनों पुत्रों के पीछे राजा विदर्भ ने एक तीसरे परम धामिक लोमपाद मामक पुत्र को उत्पन्न किया । लोमपाद के पुत्र राजा वस्तु हुए, उनके पुत्र आहृति हुए। कौशिक के पुत्र चिदि हुए, जिस लिंदि से उत्पन्न होने वाले राजा लोग चंद्य नाम से विख्यात हुए। विदर्भराज के पुत्र जो क्रग थे, उनके आत्मज कुन्ति हुए । कुन्ति के पुत्र धुष्ठसुत हुए, जो परम प्रतापशाली राजा थे धृष्ट के दाता धर्मरतो नित्यं सत्यशीलपरायण: । तस्य पुत्री नवरथस्ततो दशरथः स्मृतः ॥४ २ तस्य चकादशरथः शकुनिस्तस्य चा55त्मजः । तस्मात्करम्भको धन्वी देवरातोउभवत्तत:ः ॥३४ ३ देवक्षत्रो5भवद्राजा देवरातिम हायशा: । देवक्षत्रसुतो जज्ञे देवन: क्षत्रनन्दनः (४४ देवनात्स मधुजेले यस्य मेघार्थंसम्भव:। मधोश्चापि महातेजा मनुरमंनुवशस्तथा ३४४५

English

They were Haihaya, Haya and the king Venuhaya. It is heard that Haihaya's successor was Dharmatattva.

अध्याय १७३

श्लोक 5

तस्य तत्करसंलग्नं च्यवते न कदाचन ।ततो हि देवदेवेशः पर्यटन् पृथिवीमिमाम्

tasya tatkarasaṃlagnaṃ cyavate na kadācana / tato hi devadeveśaḥ paryaṭan pṛthivīmimām

हिन्दी अर्थ

जश्ने पुरुद्गतः पुत्रों भद्रवत्यां पुरुद्हः । ऐक्वाकों त्वभवद्धार्या सत्त्वस्तस्यामजायत ॥ सत्त्वात्सत्त्वगुणोपेतः सात्त्वतः कीतिवर्धनः

English

Dharmatattva's son was Kirti and his son was Samjneya. Samjfieya's successor was the king named Mahisman.

अध्याय १७३

श्लोक 6

ततो वाराणसीं प्राप्तस्तस्यां तदपतच्छिरः ।पतिते तु कपाले च ब्रह्महत्या न मुञ्चति

tato vārāṇasīṃ prāptastasyāṃ tadapatacchiraḥ / patite tu kapāle ca brahmahatyā na muñcati

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते ज्यामघवृत्तान्तकथन नाम पत्चनवतितमोअध्याय: पुत्र धर्मा,मा निवृ ति हुए, जो छ्षत्रुओं के वीरों को नष्ठ करने वाले थे । निबति के पुत्र महान् बलशाली एवं परम पराक्रमी राजा इश्चाहें हुए, दशाहे के पुत्र व्योमा हुए, व्योमा के बाद राजा जीमूत कहे जाते हैं

English

Mahisman's son was the valorous Bhadrasrenya who was the king of Varanasi and has already been mentioned.

अध्याय १७३

श्लोक 7

ततस्तु सागरे गत्वा पूर्वे च दक्षिणे तथा ।पश्चिमे चोत्तरे पार्थ देवदेवो महेश्वरः

tatastu sāgare gatvā pūrve ca dakṣiṇe tathā / paścime cottare pārtha devadevo maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

जीमृत के पुत्र विक्ृति हुए, बिक्ृति के पुत्र राजा भीमरथ कहे जाते हैं, तदन्तर भीमरथ के पुत्र राजा रथवर प्रस्चिद्ध हुए जो सर्वदा सत्य वचन बोलनेवाले, शीलवान एवं दान कम में तत्पर रहते थे । उन राजा रथवर के पुत्र नवरथ हुए, जिनके बाद दशरथ कहे जाते हैं। उन राजा दशरथ के एकादशरथ नामक पुत्र हुए। उनके पुत्र राजा शकुति हुए। छाकुनि के बाद धनुषघारी राजा करम्भ हुए, जिनके पुत्र

English

A mountain in Nepal on the eastern bank of Gandak. Here was the hermitage of Bhygu. (De 34).

अध्याय १७३

श्लोक 8

पर्यटन्सर्वतीर्थेषु ब्रह्महत्या न मुञ्चति ।नर्मदादक्षिणे कूले सुतीर्थं प्राप्तवान् प्रभुः

paryaṭansarvatīrtheṣu brahmahatyā na muñcati / narmadādakṣiṇe kūle sutīrthaṃ prāptavān prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

देवरात हुए देवरात का पुत्र महान् यशस्वी राजा देवक्षत्र हुआ । देवक्षत्र का पुत्र क्षत्रनन्‍्दन देवन उत्पन्न हुए देवन से मधु नामक पुत्र को उत्पत्ति हुई, जिसके पुत्र का नाम मेधार्थसम्भव था ।४२-४४१। उस सधु के महान् तेजस्वी मनु, मनुवंश, नन्दन और महानपुरुवश नामक पुत्र और हुए पुरुवशा का पृत्र पुरुष श्रेष्ठ पुरुद्वान हुआ पुरुद्वान का पुत्र पुरुद्दह भद्रवती नामक स्त्री से उत्पन्न हुआ। उसकी स्त्री इक्ष्वाकुवंश्ोत्पन्न थी, उसमें उसे सत्त्व नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। उस सत्त्व से सत्वगुणसम्पन्न कीतिशाली सात््वत नामक पुत्र की उत्पत्ति हुईं। महात्मा ज्यामघ के बंश विस्तार की इस कथा को जानकर मनुष्य संतत्ियोंवाला होता है और परम बुद्धिमान् राजा चन्द्रमा का सायुज्य (सान्निष्य) प्राप्त करता है

English

This chapter describes the Haihaya line of Yadu in which the greatest ruler of the Narmada valley, Kartavirya Arjuna, was born. This chapter is captioned after that illustrious king. This chapter corresponds to Bd. 3.69 & verse-numbers in the notes refer to that chapter.

अध्याय १७३

श्लोक 9

कुलकोटिं समासाद्य प्रार्थयामास चात्मवान् ।प्रायश्चित्तं ततः कृत्वा बभूव गतकल्मषः

kulakoṭiṃ samāsādya prārthayāmāsa cātmavān / prāyaścittaṃ tataḥ kṛtvā babhūva gatakalmaṣaḥ

हिन्दी अर्थ

सात्वतोी रूपसंपन्ना कौशल्या सुषुबे सुतान्ू भजिनं भजमानं च दिव्यं देवाव्॒ध नृपम् हि अन्धकं च महाभोजं व॒ष्णि च यदुनन्‍्दनम् । तेषां हि सर्गाश्चित्वारः शुणुध्ब विस्तरेण व

English

The entire earth consisting of seven continents and many towns and surrounded by seven oceans, was conquered by him in a manner befitting a Ksatriya. 1 2

अध्याय १७३

श्लोक 10

ततो निष्कल्मषो जातो देवदेवो महेश्वरः ।हत्वा सुरेभ्यस्तत्स्थानं ततश्चान्तर्दधे प्रभुः

tato niṣkalmaṣo jāto devadevo maheśvaraḥ / hatvā surebhyastatsthānaṃ tataścāntardadhe prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

भजमानस्य शज्जय्यां बाह्मश्वोपरि बाह्यकः शूअजयस्य सुते दे तु वाह्यकस्ते उदावहत् ये बाह्यकायेशुअुजय्यां भजमानाद्विजज्ञिरे । भयुतायुतसाहल्रशतजिदथ वासकः

English

When he started fighting in a battle, banners and chariots befitting it and a thousand arms used to appear by means of the Maya of that intelligent one.

अध्याय १७३

श्लोक 11

तदाप्रभृति तत्तीर्थं शुद्धरुद्रेति कीर्तितम् ।विख्यातं त्रिषु लोके ब्रह्महत्याहरं परम्

tadāprabhṛti tattīrthaṃ śuddharudreti kīrtitam / vikhyātaṃ triṣu loke brahmahatyāharaṃ param

हिन्दी अर्थ

बाह्यकार्याभगिन्यां ये भजमानाद्विजज्षिरे । तेषां देवावधो राजा चचार परम तपः ६ पुत्र: सर्वगुणोपेतों मम भुयादिति सम ह्। संयोज्या5त्सानसेवं सा,सवर्णा जलमस्पृशत् ३७ सा चोपस्पशनात्तस्य चकार ऋषिमापगा । कल्याणं च नरपतेस्तस्य सा निम्नगोत्तमा ८

English

It is heard that without any difficulties ten thousand Yajiias had been performed by that intelligent king in all the seven continents.

अध्याय १७३

श्लोक 12

मासे मासे सिते पक्षे ऽमावास्यायां युधिष्ठिर ।स्नात्वा तत्र विधानेन तर्पयेत् पितृदेवताः

māse māse site pakṣe 'māvāsyāyāṃ yudhiṣṭhira / snātvā tatra vidhānena tarpayet pitṛdevatāḥ

हिन्दी अर्थ

विष्णु-बंश-वर्णन सूत बोले--ऋषिवृन्द ! रूपव॒ती सात्वत की स्त्री कशिल्या ने भजिन भजमान् राजा देवावध अन्धक, महाभोज तथा यदुनन्दु बुष्णि प्रभृति पुत्रों को उत्पन्त किया। इन सबों में चार वंशों का विवरण विस्तारपूृर्वकं: सुनिये। भजमान के श्ञ्जयी नामक पत्नी में धाह्य और उपरिवाह्य नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए । शइज्जय की दो पुत्रियाँ थीं, जिन्हें वाह्मयक ने पत्नी रूप में स्वीकार किया उन दोनों बहिनों ने,

English

All the Yajnas performed by that mighty-armed king were profoundly splendid. All of them were provided with golden altars with golden sacrificial posts. All of thorp were graced by the presence of blessed Devas seated in aerial

अध्याय १७३

श्लोक 13

दद्यात् पिण्डं पित्ःणां तु भावितेनान्तरात्मना ।तस्य ते द्वादशाब्दानि सुतृप्ताः पितरो नृप

dadyāt piṇḍaṃ pitḥṇāṃ tu bhāvitenāntarātmanā / tasya te dvādaśābdāni sutṛptāḥ pitaro nṛpa

हिन्दी अर्थ

वाह्यक की पत्नी होकर अनेक पुत्र उत्पन्न किए। जिनमें निमि, पणव, एवं शत्रुओं के नगरों को जीतने वाले वृष्णि प्रमुख हुए--भजमान के पुत्र वाह्मक ने अपनी ज़्येष्ठ रानी में इन पुत्रों को उत्पन्न किया। इसी प्रकार कनिष्ठ रानी में अयुतायुत-जित् सहख्नजित् शतजित् और वामक नामक पुत्र उत्परत हुए। इन सबों में राजा देवावृध ने परम तपस्या की ।१-६। उन्होंने यह संकल्प करके तपस्था की थी कि "मुझे एक सर्बंगुणसम्पन्त

English

Bd. 3.69. reads: ability to prevent one from evil the moment he plans it.

अध्याय १७३

श्लोक 14

गन्धधूपप्रदीपाद्यैरभ्यर्च्य परमेश्वरम् ।शुद्धेश्वराभिधानं तु शिवलोके महीयते

gandhadhūpapradīpādyairabhyarcya parameśvaram / śuddheśvarābhidhānaṃ tu śivaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

पुत्र प्राप्त हो ।' इस प्रकार संकल्प कर राजा ने तपस्या करते समय योगबल से पर्णाश्षा नामक नदी के जल का स्पर्श किया । स्पष्टों करते ही नदी ने राजा की, कल्याण चिसम्ता को नदियों में उत्तम पर्णाशा ने चिस्ता भवेत्सवंगुणोपेतो राज्ञो देववृधस्य हि। तस्मादस्य स्वयं चाह भवाम्यद्य सहव्ता ॥॥

English

Verses 14-37 describe the exploits, munificence, righteousness and glory of Kartavirya. The Gathas sung by Narada about him (vv. 20-22) record in a nutshell Arjuna's achievements. Generally these Gathas are quotations from ancient traditional verses. After observing the conduct and the grandeur of that saintly king, Narada and Gandharvas sang the following verse(s) of glory of that king.

अध्याय १७३

श्लोक 15

एतत्ते कथितं राजञ्छुद्धरुद्रम् अनुत्तमम् ।मया श्रुतं यथा देवसकाशाच्छूलपाणिनः ।मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति

etatte kathitaṃ rājañchuddharudram anuttamam / mayā śrutaṃ yathā devasakāśācchūlapāṇinaḥ / mucyate sarvapāpebhyo rudralokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

अथ भुत्वा कुमारी तु सावित्री परम वचः । चिन्तयामास राजानं तामियेष स पाथिवः ३११ तस्यामाधत्त गर्भ स तेजस्विनमुदारधीः । अथ सा नवसे मासि सुधुर्व सरितां बरा ११२ पुत्र सबंगुणोपेत॑ यथा वेबावृ्धेष्सितः तत्र बंशे पुराणज्ञा गाथां गायच्ति वे द्विजाः

English

"Certainly no man can emulate (none can attain) the goal or status of Kartavlrya by means of Yajnas, Danas, penances, exploits and learning.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

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पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 173
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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