Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
172
अध्याय 172 / 232

Adhyaya 172

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अध्याय १७२

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे शाण्डिलीऋषिसंवादवर्णनं नामैकसप्तत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १७२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: अथ ते ऋषयः सर्वे देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः ।माण्डव्यस्याश्रमे पुण्ये समीयुर्नर्मदातटे

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe śāṇḍilīṛṣisaṃvādavarṇanaṃ nāmaikasaptatyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 172 śrīmārkaṇḍeya uvāca: atha te ṛṣayaḥ sarve devāścendrapurogamāḥ / māṇḍavyasyāśrame puṇye samīyurnarmadātaṭe

हिन्दी अर्थ

खूत ने कद्द।(:--पिता थयाति के इस प्रकार कहने पर पुरु ने तुरन्त उत्तर दिया। तात ! आप की जैसी आज्ञा है, मैं वेसे ही करूँगा राजन् ! आपके पापकर्मों के साथ इस बुद्धता को मैं सहन करने के लिए

English

The sons of these two were very virtuous Brahmanas and Ksatriyas. They were strong, valorous and famous for their

अध्याय १७२

श्लोक 2

शङ्खदुन्दुभिनादेन दीपिकाज्वलनेन च ।अप्सरोगीतनादेन नृत्यन्त्यो वारयोषितः

śaṅkhadundubhinādena dīpikājvalanena ca / apsarogītanādena nṛtyantyo vārayoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रतिपत्स्यामि ते राजन्पाप्मानं जर्या सह । गृहाण यौवन मत्तश्नर कामान्यथेष्सितानू पुरो प्रीतो5स्मि भद्व ते प्रीतश्वेदं ददासि ते। सर्वकामसमृद्धा ते प्रजा राज्ये भविष्यति+- ४६१

English

Thus these kings of Kail have been enumerated. Now listen and understand the (descendants) of Raji. Raji had a hundred sons. Two of them were very powerful and well-known on the earth as the group of kings "Rajeya". Those Ksatriyas caused terror to Indra too.

अध्याय १७२

श्लोक 3

कथानकैः स्तुवत्यन्ये तस्य शूलाग्रधारिणः ।अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातकानां तपस्विनाम्

kathānakaiḥ stuvatyanye tasya śūlāgradhāriṇaḥ / aṣṭāśītisahasrāṇi snātakānāṃ tapasvinām

हिन्दी अर्थ

पुरोरनुमतो राजा ययातिः स्वां जरां ततः। संक्रामथामास तदा प्रसादा:द्भागंवस्प तु ६२ यौवनेनाथ वयसा ययातिनंहुषात्मजः । प्रीतियुक्तो नरश्रेष्ठश्रचार विषयान्स्वकान्

English

When a terrible war broke out between Devas and Asuras 1, both of them spoke to Pitamaha (god Brahma).

अध्याय १७२

श्लोक 4

समाजे त्रिदशैः सार्द्धं तत्र ते च दिदृक्षया ।ब्रह्मविष्णुमहेशानास्तत्र हर्षात्समागताः

samāje tridaśaiḥ sārddhaṃ tatra te ca didṛkṣayā / brahmaviṣṇumaheśānāstatra harṣātsamāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

यथाकामं यथोत्साहूं यथाकालं यथासुखम् । धर्माविरोधाद्वाजेन्द्रो यथाइहेति स एवं हि ३६४ देवानतपंयचज्ञे: पितृश्राउ्धेस्तथब च। दीनश्रानुग्रहेरिष्ट: कामे श्र द्विजसत्तमान् तैयार हूँ, मेरी यौवनावस्था ग्रहण कर आप यथेप्सित विषय भोगों का सेवन कर सकते हैं। मैं आपके स्वरूप और अवस्था--दोनों को धारण कर, स्वयं व॒द्धावस्था में रह कर अपनो योवनावस्था आपको समर्पित करूंगा और भाष ही की तरह सब कार्य करूंगा ।(८-६०।

English

"O lord of all the worlds, O great lord, who will be victorious in the battle between us. Please tell us. We all wish to hear."

अध्याय १७२

श्लोक 5

मातरो मल्लिकाद्याश्च क्षेत्रपाला विनायकाः ।दिक्पाला लोकपालाश्च गङ्गाद्याश्च सरिद्वराः

mātaro mallikādyāśca kṣetrapālā vināyakāḥ / dikpālā lokapālāśca gaṅgādyāśca saridvarāḥ

हिन्दी अर्थ

ययाति ने कहाः--प्रिय पुरु ! मैं तुम्हारे ऊपर परम प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुम्हें यह आशीर्वाद दे रहा हूँ कि धुम्हारे राज्य में प्रजाओं को सारी कामनाएँ पूर्ण होंगी, वे सबंदा समृद्ध रहेंगी ।६१। है द

English

There is no doubt in this that they on whose behalf

अध्याय १७२

श्लोक 6

ऋषिदेवसमाजे तु नित्यं हर्षप्रमोदने ।तत्र राजा समायातः पौरजानपदैः सह

ṛṣidevasamāje tu nityaṃ harṣapramodane / tatra rājā samāyātaḥ paurajānapadaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

खूत बं।छो:--इस प्रकार “चुद की अनुमति प्राप्त हो जाने पर नहुषपुत्र नरश्षेष्ठ महाराज ययाति ने अपनी बृद्धावस्था को शुक्राचायं की पा से पुरु में सबन्निविष्ट कर पुरु की योवनावस्था को स्वयं ग्रहण किया और परम प्रसन्न होकर उस यौवनावस्था द्वारा अनेक विषय भोगों का उपभोग किया । राजाधिराज ययाति ने पुत्र की यौवनावस्था द्वारा अपनी इच्छा के अनुसार, उत्साह के अनुसार समय के अनुसार, अधिकाधिक सुख प्राप्ति के उद्देश से विषय भोगों का सेवन किया, किन्तु ऐसा कोई आचरण नहीं किया, जिससे घर्म की मर्यादा नष्ट हो ।६२-६४। उसने यज्ञों द्वारा देवताओं को सन्तुध्ट किया, श्राद्धों द्वारा पितरों को सन्तृष्ट किया, अनुग्रह द्वारा दीनों गरीबों का हितचिस्तन किया, मन चाहे प दार्थों की पूर्ति से विद्वान्

English

This is the twelfth (and the last) war between Devas and Asuras as far as Puraic records are concerned.

अध्याय १७२

श्लोक 7

दृष्ट्वा कौतूहलं तत्र व्याकुलीकृतमानसम् ।वित्रस्तमनसो भूत्वा भयात्सर्वे समास्थिताः

dṛṣṭvā kautūhalaṃ tatra vyākulīkṛtamānasam / vitrastamanaso bhūtvā bhayātsarve samāsthitāḥ

हिन्दी अर्थ

+-अन्राध्यायसमाप्ति: ख. पुस्तके ।

English

Where there is Raji, there will be LakcmT if.

अध्याय १७२

श्लोक 8

तस्मिन्समागमे दिव्ये ब्रह्मविष्ण्वीशमब्रुवन् ।भो माण्डव्य महासत्त्व वरदास्ते ऽमरैः सह

tasminsamāgame divye brahmaviṣṇvīśamabruvan / bho māṇḍavya mahāsattva varadāste 'maraiḥ saha

हिन्दी अर्थ

धर्मेण च॒ प्रजा: सर्वा यथावदनुरठजयन् । ययातिः पालयामास साक्षादिन्द्र इवापरः ६७ स राजा सिह॒विक्रान्तो युवा विषयगोचरः । अविरोधेन धमंस्य चचार सुखसुत्तमम् स मार्गमाण: फकासानामन्तदोषनिदर्शनात् । विश्वाच्या सहितो रेसे वेश्राजे नन्‍्दने बने

English

On hearing about the victorious (-ness of) Raji, Devas

अध्याय १७२

श्लोक 9

अनेककष्टतपसा तव सिद्धिर्भविष्यति ।प्रार्थयस्व यथाकामं यस्ते मनसि रोचते

anekakaṣṭatapasā tava siddhirbhaviṣyati / prārthayasva yathākāmaṃ yaste manasi rocate

हिन्दी अर्थ

अपश्यत्स यदा तां बे वर्धमानां नृपस्तदा । गत्वा पुरो: सकाशं ब॑ स्वं जरां प्रत्यपद्मयत

English

With a delighted heart, all Devas and Danavas requested the king. Please take up your excellent bow for enabling us to be victorious."

अध्याय १७२

श्लोक 10

अनादित्यमयं लोकं निर्वषट्कारमाकुलम् ।नष्टधर्मं विजानीहि प्रकृतिस्थं कुरुष्व च ।अनुग्रहं तु शाण्डिल्याः प्रार्थयाम द्विजोत्तम

anādityamayaṃ lokaṃ nirvaṣaṭkāramākulam / naṣṭadharmaṃ vijānīhi prakṛtisthaṃ kuruṣva ca / anugrahaṃ tu śāṇḍilyāḥ prārthayāma dvijottama

हिन्दी अर्थ

स॒ संप्राप्य तु तान्कामांस्तृप्तः खिन्नश्व पार्थिव: । काल वर्षसहर्े वे ससस्‍्मार मनुजाधिपः ७१ परिसंख्याय काल च कलाकाष्ठास्तथंव च । पूर्ण मत्वा ततः काले पुरुं पुत्र मुवाच ह १७२ यथासु् यथोत्साहं यथाकालर्मारिदम । सेविता विषयाः पुत्र योवनेन मया तब ७३ पुरो प्रीतोइस्मि भद्ं ते गृहाण त्वं स्वयोवनम् । राज्य च त्वं गृहाणेदं त्वं हि मे प्रियकृत्सुत:.. प्रतिपेदे जरां राजा ययातिनंहुषात्मजः । यौवन प्रतिपेदे च पुरुः स्वं पुनरात्मनः ७४ अभिषेक्तुकामं च नृप॑ पुरुं पुत्र कनीयसम् । ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा इदं बचनसबुबन् ७६

English

I will defeat you all in the battle, as well as Devas led by Sakra. I shall become the righteous-souled Indra and then shall I fight in the battle.

अध्याय १७२

श्लोक 11

एष ते कष्टदो राजा समायातस्तवाग्रतः ।संभूषयस्व विप्रर्षे जनं देवासुरं गणम्

eṣa te kaṣṭado rājā samāyātastavāgrataḥ / saṃbhūṣayasva viprarṣe janaṃ devāsuraṃ gaṇam

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणों को सनन्‍्तुष्ट किया । अन्न पानादि द्वारा अतिथियों का समुचित सत्कार किया, व्यापार आदि में उपयुक्त सहायता देकर वैदयों को सन्तुष्ट किया अपनी कृपा एवं दया से शुद्रों को प्रसन्न किया, कड़े अनुझासन एवं दण्ड की व्यवस्था करके चारों को शान्‍्त किया इस प्रकार दूसरे इन्द्र की भाँति उस महाराज ययाति ने धर्मपूबंक अपनी प्रजाओं का पालन किया ।६५-६७। सिंह के समान बिक्रम शाली, युवावस्था सम्पन्न राजा

English

Our Indra is Prahlada. We shall be victorious on his behalf. O king, please stand by this agreement urged by our Lord.

अध्याय १७२

श्लोक 12

माण्डव्य उवाच: यदि प्रसन्ना मे देवाः समायाताः सुरैः सह ।त्रिकालमत्र तीर्थे च स्थातव्यम् ऋषिभिः सह

māṇḍavya uvāca: yadi prasannā me devāḥ samāyātāḥ suraiḥ saha / trikālamatra tīrthe ca sthātavyam ṛṣibhiḥ saha

हिन्दी अर्थ

ययाति ने धर्म की मर्यादा की रक्षा करते हुए विषयों का सेवन किया, उत्तम सुख का अनुभव किया । वध्राज और मन्‍्दन वन में विश्वाची के साथ उसने काम क्रीडा की, क्षन्ततः कामादि विषयों के अन्त में दुःख एवं दोष देखकर उसे विरक्ति हुई, उस समय जध उसे अपनी इस यौवनावस्था का स्मरण हुआ, जो बहुत बढ़ चुकी थी । अर्थात् जिसकी अवधि पूरी हो रही थी तब वह पुरु के पास आया और अपनी वृद्धावस्था ग्रहण की योवनावस्था में अनुभव किये गये आनन्दों एबं विषयों से उम्ले तृष्ति तो अवश्य हुई थी, किन्तु खेद भी हुआ । सुखों का अनुभव करते समय नरपति ययाति को जब एक सहख्न॒ वर्ष के समय का स्मरण हुआ तो उसने घटो पला तक की गणना की और जब देखा कि सचमुच वह अवधि समाप्त हो गई है तो पुत्र पुरु से कहा, शत्रुओं को वह में करनेवाले ! मैंने अपने मन और उत्साह भर इस एक सहख वर्ष में

English

Even as he was about to say, "So be it" he was urged by Devas also. He was invited by Devas saying, "After conquering you will become Indra."

अध्याय १७२

श्लोक 13

भवतां तु प्रसादेन रुजा मे शाम्यतां सदा ।एवमस्त्विति देवेशा यावज्जल्पन्ति पाण्डव

bhavatāṃ tu prasādena rujā me śāmyatāṃ sadā / evamastviti deveśā yāvajjalpanti pāṇḍava

हिन्दी अर्थ

तुम्हारी यौवनावस्था लेकर विषयों का सेवन किया ।७१-७३। प्रिय पुरु ! मैं तुम्हारे ऊपर परम प्रसन्न हूं, तृम्हारा कल्याण हो । बेटा ! आओ, भौर अपनी यौवनावस्था ग्रहण करो, लो, इस राज्य को भी ग्रहण करो, तुम्हीं हमारे एकमात्र शुभचिन्तक पुत्र हो।' इस प्रकार नहुषपुत्र राजा ययाति ने पुनः अपनी बुद्धावस्था ग्रहण की और पुरु ने पुनः अपनी यौवनावस्था ग्रहण की ।७४-७५। राज्य पद पर सब से छोटे पुत्र पुरु का अभिषेक करने

English

He killed all the Danavas in front of Indra (who was armed with thunderbolt). He was endowed with self-con¬ trol and the greatest prosperity. Lord Raji killed all Dana¬ vas and redeemed the lost glory of Devas. Accompanied by Devas, Satakratu (Indra) spoke to Raji, "I am Raji's son", and continued as follows, "O king, there is no doubt in this that you are Indra of all Devas. O destroyer of enemies, O, Indra, I shall become renowned as your son".

अध्याय १७२

श्लोक 14

तावद्रक्षो गृहीत्वा ऽग्रे कन्यां कामप्रमोदिनीम् ।उवाच भगवञ्छापं पुरा दत्त्वोर्वशी मम

tāvadrakṣo gṛhītvā 'gre kanyāṃ kāmapramodinīm / uvāca bhagavañchāpaṃ purā dattvorvaśī mama

हिन्दी अर्थ

कथं शुक्रस्य नप्तारं देवयान्या सुत प्रभो । श्रेष्ठ यदुमतिक्रम्य पुरो राज्यं प्रदास्यसि ७७ कं ज्येष्ठानतिक्रम्य कनीयारराज्यमह ति धर्मतो बोधयामि त्वां धर्म समनृपालय ७६

English

On hearing the words of Sakra, he was deceived by him by means of his Maya. The delighted king said, c So be it".

अध्याय १७२

श्लोक 15

यदा कन्यां हरे रक्षःशापान्तस्ते भविष्यति ।तेन मे गर्हितं कर्म शापेनाकृतबुद्धिना

yadā kanyāṃ hare rakṣaḥśāpāntaste bhaviṣyati / tena me garhitaṃ karma śāpenākṛtabuddhinā

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा: सर्वे शुण्वस्तु मे वचः । ज्येष्ठ प्रति यथा राज्य न देय वे कर्ंचन

English

When that king who was on par with Devas attain¬ ed heaven, Raji's sons took away all the legacies from Indra.

अध्याय १७२

श्लोक 16

क्षन्तव्यम् इति चोक्त्वा च गतश्चादर्शनं पुनः ।गते चैव तु सा कन्या दृष्ट्वा पद्मदलेक्षणा

kṣantavyam iti coktvā ca gataścādarśanaṃ punaḥ / gate caiva tu sā kanyā dṛṣṭvā padmadalekṣaṇā

हिन्दी अर्थ

सर्वकामः स्वकृतः पुरुणा पुत्र॒कारिणा ८४ की जब राजा ययाति ने इच्छा की तब ब्राह्मणादि चारों वर्णों के लोग उससे यह बात बोले--'प्रभुवर ! आप शक्राचार्य के नाती, देवयानी के पुत्र और अपने सबसे बड़े सुपुत्र यदु को छोड़कर पुरु को क्यों राज्य प्रदान कर रहे हैं। यदू आप के सब से बड़े पुत्र हैं, उनसे छोटे तुबेसु हैं, शर्मिष्ठा के पुत्रों में भी सब से बड़े द्वह्यम हैं, उनसे छोटे अनु हैं, तश्र पुर हैं, तों फिर यह कंप्ते हो सकता है कि ज्येष्ठ को छोड़कर सबसे छोटे को राज्य प्रदान

English

They became haters of Brahmanas. Hence they became deprived of their virility and exploit. So (Indra) regained the glory of Suras and his former excellent position (of Indra-hood).

अध्याय १७२

श्लोक 17

मन्त्रयित्वा सुरैः सर्वैर् दत्ता माण्डव्यधीमते ।तां वज्रशूलिकां प्लाव्य पवित्रैर् नर्मदोदकैः

mantrayitvā suraiḥ sarvair dattā māṇḍavyadhīmate / tāṃ vajraśūlikāṃ plāvya pavitrair narmadodakaiḥ

हिन्दी अर्थ

किया जाय । मैं धर्म की ओर आप का ध्यान आक्ृष्ट कर रहा हूँ आप राजा हैं, आपको धर्म का पालन करना चाहिए ।७९-७६। हैं

English

He killed all the sons of Raji who were overwhelmed with lust and anger. He who listens to this story of Raji or the holy rehabilitation of Satakratu will never meet with evil.

अध्याय १७२

श्लोक 18

माण्डव्यम् ऋषिमुत्तार्य जयशब्दादिमङ्गलैः ।विवाहयित्वा तां कन्यां माण्डव्यर्षिपुंगवः

māṇḍavyam ṛṣimuttārya jayaśabdādimaṅgalaiḥ / vivāhayitvā tāṃ kanyāṃ māṇḍavyarṣipuṃgavaḥ

हिन्दी अर्थ

ययाति ने कद्दाः--ज्राह्मण प्रभृति वर्णों में उत्पन्न सभी को यह मेरी बात सुननी चाहिए कि मैं अपने ज्येष्ठ पुत्र को किसी प्रकार भी अपना राज्य नहीं देना चाहता । माता ओर! पिता की आज्ञा पालन करनेवाला ही सच्चा पुत्र कहा जाता हैं, वही प्रशंसायोग्य पुत्र है, मेरे ज्येष्ठ पुत्र यदु ने मेरी आज्ञा का पालन नहीं किया है। जो पुत्र पिता की आज्ञा के प्रतिकूल चलनेवाला होता है, उस पुत्र को सज्जन लोग नहीं पसन्द करते । पिता और माता का अनुगमन करनेवाला ही सच्चा पुत्र हैं।८०-८२। यदु ने मेरी अवज्ञा कौ है, इसी प्रकार तुवंसु, द्रह्म , ओर अनु ने भी मेरो आज्ञा न मानकर अपमान किया है। पूरु ने मेरी आज्ञा ही केवल नहीं माती है; प्रत्युत विशेष सम्मान भी किया है, वही सब से छोटा होते हुए भी हमारे राज्य का उत्तराधिकारी है, क्योंकि उसी ने हमारी वृद्धावस्था को इतने दिनों तक वहन किया है। एक योग्य पुत्र की भाँति पुरु ने

English

Endowed with great splendour yet desirous of food, the king performed the sacrifice Marul-Soma to Prajesvara every month, for sixty years.

अध्याय १७२

श्लोक 19

अभिवाद्य च तान् सर्वान् दानसन्मानगौरवैः ।अथ राजा समीपस्थो रत्नैश्च विविधैरपि

abhivādya ca tān sarvān dānasanmānagauravaiḥ / atha rājā samīpastho ratnaiśca vividhairapi

हिन्दी अर्थ

मेरी सभी अभिलाषाओं और आज्ञाओं की पूर्ति की है, वही हमारा सब कुछ करने धरनेवाला है ।८५३-८४। स्वयं

English

Thereby the Marut-gods were pleased by the Marut- Soma sacrifice of that king, and granted him never-ending food with requisites for the fulfilment of all desires.

अध्याय १७२

श्लोक 20

धिग्वादैर्निन्दितः सर्वैस्तैर्जनैर्भूषितः पुनः ।राज्ञा च ब्राह्मणाः सर्वे भूषणाच्छादनाशनैः

dhigvādairninditaḥ sarvaistairjanairbhūṣitaḥ punaḥ / rājñā ca brāhmaṇāḥ sarve bhūṣaṇācchādanāśanaiḥ

हिन्दी अर्थ

शुक्रेण च वरो दत्त: काव्येनोशनसा स्वयम् । पुत्रो यस्त्वाइनुवतेंत स राजा ते महामते ८४ दिशि दक्षिणपुर्वस्यां तुबंसं तु न्‍्यवेशयत् । दक्षिणापरतों राजा यवु श्रेष्ठं न्‍्यवेशयत् ८६

English

Mitrajyoti was born of the daughter of the intelligent Maruta. From him were born (sons) of great strength, knowers of Dharma and seers of salvation.

अध्याय १७२

श्लोक 21

सुवर्णकोटिदानेन तुष्टान्कृत्वा क्षमापिताः ।वृत्ते विवाह आहूय शाण्डिलीं तामथाब्रवीत्

suvarṇakoṭidānena tuṣṭānkṛtvā kṣamāpitāḥ / vṛtte vivāha āhūya śāṇḍilīṃ tāmathābravīt

हिन्दी अर्थ

व्यभजत्पन्चधा राजा पुत्रेम्यो नाहुषस्तदा ६० तेरियं परथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना । यथाप्रदेशं धर्मज्ञेधंमेंण प्रतिपाल्यते ॥६ १

English

This chapter corresponds to Bd. 3.68. For comparison or reference only the verse number is quoted.

अध्याय १७२

श्लोक 22

मानयस्व इमान् विप्रान् मोचयस्व दिवाकरम् ।अपहृत्य तमो येन कृपा सद्यः प्रवर्तते

mānayasva imān viprān mocayasva divākaram / apahṛtya tamo yena kṛpā sadyaḥ pravartate

हिन्दी अर्थ

धनुर््यंस्य पृषत्कांश्व राज्यं चेव सुतेषु तु । प्रोतिमानभवद्राजा भारमावेश्य बन्धुपु. ॥६३- शुक्राचार्य जी ने ऐसा वरदान दे रखा है कि 'हे महामतिमन् । जो पुत्र पुम्हारा आज्ञाकारी एवं अनुगामी होगा, वही राजा होगा। मैं समझता हैं, आप लोगों की भी अनुमति इस कारें में होगी। पुरु का राज्याभिषेक करते जाइये जो "पुत्र गुणवान् है, माता और पिता के कल्याण में सवंदा निसत रहनेवाला है, वह सब से छोटा होकर भी कल्याण भाजन है और सम्पत्ति का उत्तराधिकारी है ।५५-८६। 'इस राज़्य के

English

This immortal story with a profound moral is repeated in many Puranas. The story is originally given in details in Mbh Adi. Ghs. 84 and

अध्याय १७२

श्लोक 23

ऋषीणां वचनं श्रुत्वा शाण्डिली दुःखिताब्रवीत् ।उदिते ऽर्के तु मे भर्ता मृत्युं यास्यति भो द्विजाः

ṛṣīṇāṃ vacanaṃ śrutvā śāṇḍilī duḥkhitābravīt / udite 'rke tu me bhartā mṛtyuṃ yāsyati bho dvijāḥ

हिन्दी अर्थ

योग्य पुरु ही है, जो तुम्हारा हिलकारी है, प्रिय है, वही हम सबों को भी, प्रिय है। ऐसा कहते हुए ब्राह्मणादिकों ने राजा यथाति के मत का अनुमोदन किया, शुक्राचार्य के वरदान के कारण उन लोगों को प्रत्युत्तर करने का साहस नहीं हुआ ।” राजा की बातों से सल्तुष्ट पुर नगर वासियों के इस प्रकार अनुमोदन कर देने पर नहुष पुत्र राजा ययाति ने अपने कनिष्ठ पुत्र पुर का अपने पद पर राज्याभिषेक किया, दक्षिणपु्व॑दिशा में तुर्व॑सु

English

The immortal verse uttered by Yayati:

अध्याय १७२

श्लोक 24

तं कथं मोचयामीह ह्यात्मनो ऽनिष्टसिद्धये ।क्रियाप्रवर्तनाच् चाद्य किं कार्यं मे महर्षयः

taṃ kathaṃ mocayāmīha hyātmano 'niṣṭasiddhaye / kriyāpravartanāc cādya kiṃ kāryaṃ me maharṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

को अधिकारी बनाया। दक्षिण पश्चिम दिशा में सब से बड़े पुत्र यदु को स्थापित किया। उत्तर पश्चिम दिल्ला का अधिकार दुह्म और अनु को दिया। सागर पय॑न्‍्त विस्तृत सप्तद्वीपों समेत सारी प्रथ्वी को जीत कर नहुष पुत्र महाराज ययाति ने अपने पाँचों पुत्रों में विभक्त कर दिया ।६७-६०। धर्म के तत्वों को जाननेवाले उन पाँचों ययाति के पुत्रों ने सातों ढ्ीपों एवं नगरों समेत सारे प्रथ्वी मण्डल का अपने-अपने प्रदेश तक धमंपूर्वक प्रतिपालन किया । इस प्रकार अपने पुत्रों में राज्य का विभाग कर एवं अपनी सम्पत्ति एवं श्री को पुत्र में सन्निविष्ट कर नहुष पूत्र राजा ययाति परम प्रसन्न हुए 78१-8२॥ अपने धनुष वाण एवं राज्याधिकार को पुत्रों को सौंप कर एवं समस्त कार्य भार बस्धुवर्गों को देकर राजा ययाति परम प्रसन्न हुए । इस

English

Verses 1-11 speak of Maruta and Mitrajyoti and his descendants. But they are unrelated to the main story of this chapter.

अध्याय १७२

श्लोक 25

निःपुंसी स्त्री ह्यनाथाहं भवामि भवतो मतम् ।तिष्ठ त्वमन्धकारे तु नेच्छामि रविणोदयम्

niḥpuṃsī strī hyanāthāhaṃ bhavāmi bhavato matam / tiṣṭha tvamandhakāre tu necchāmi raviṇodayam

हिन्दी अर्थ

अन्न गाथा महाराज्ञा पुरा गीता ययातिना । यो5भिप्रत्याहरन्कामान्कू्मोड्भानीव स्वेश!ः.

English

The reading jdtdmarutakanyakdh in the text tianslated above is contra¬ dictory and obscure. If emended: jdtd maruta-kanyayd (as inBd. 3.68.1) meaning '(of what heroic ability were the noble -soulcd persons) born of the daughter of Maruta\ it gives cogentness. The references to the Bd.P. are to the above-mentioned chapter. Only verse number is quoted in t ese notes.

अध्याय १७२

श्लोक 26

तेन वाक्येन ते सर्वे देवासुरमहर्षयः ।शिरःसंचालनाः सर्वे साधु साध्विति चाब्रुवन्

tena vākyena te sarve devāsuramaharṣayaḥ / śiraḥsaṃcālanāḥ sarve sādhu sādhviti cābruvan

हिन्दी अर्थ

न जातु कामः कामानासुपभोगेन शास्यति । हंविषा कृष्णवर्त्मेब भूय एवाभिवधते यदा पराश्न बिभेति यदा त्वस्मान्न बिभ्यति । यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म संपद्यते तदा १६८

English

They were Yati. Yayati, Sarhyati, Ayati and the twins Viyati, Krti, (Bd. P.) who were the fifth-born (?) Yati was the eldest of them and Yayati was the younger brother.

अध्याय १७२

श्लोक 27

पतिव्रते महाभागे शृणु वाक्यं तपोधने ।मन्यसे यदि नः सर्वान्कुरुष्व वचनं च यत्

pativrate mahābhāge śṛṇu vākyaṃ tapodhane / manyase yadi naḥ sarvānkuruṣva vacanaṃ ca yat

हिन्दी अर्थ

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीयंति जीयेतः । दोष: प्राणान्तिको राजस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥६€

English

Yati attained Ga (Gau), the daughter of Kakutstha as wife. Samyati became a sage. Attaining absolution, he became

अध्याय १७२

श्लोक 28

शाण्डिल्युवाच: येन मे न मरेद्भर्ता येन सत्यं मुनेर् वचः ।तत्कुरुध्वं विचार्याशु येन संवर्धते सुखम्

śāṇḍilyuvāca: yena me na maredbhartā yena satyaṃ muner vacaḥ / tatkurudhvaṃ vicāryāśu yena saṃvardhate sukham

हिन्दी अर्थ

यच्च कामसुख लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्येतत्कलां नाहेंति षोडशीमू सभी प्रकार के कामनाओं को कछए के अंगों की तरह समेटकर छिपा लेता है, (घही सच्चा मनुष्य है) कामनाएँ कभी इच्छित पदार्थों के उपभोग से द्ान्‍्त नहीं होती प्रत्युय वे आग में घुत पड़ने के समान उपभोग करने से उत्तरोत्तर बढ़ती जाती हैं ।६३-६५॥ समस्त पृथ्वी में जितना अन्न जौ, सुवर्ण, बशु और स्त्रियाँ हैं, वे सन मिलकर भी एक मनुष्य के लिए पर्याप्त नहीं हैं।ऐसा जो देखता

English

Among the (other) five, Yayati became a king. He attained Devayanx, the daughter of Usanas, as his wife.

अध्याय १७२

श्लोक 29

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स्वप्नावस्थाकृतो हृषिः ।अन्तर्हितो मुहूर्तं च शाण्डिल्याश्च प्रपश्य ताम्

tasyāstadvacanaṃ śrutvā svapnāvasthākṛto hṛṣiḥ / antarhito muhūrtaṃ ca śāṇḍilyāśca prapaśya tām

हिन्दी अर्थ

है, वह भज्ञान में नहीं पड़ता। जब मनुष्य सभी जीवों के कर्म से, मन से, वचन से, अग्नि की तरह समानता का ब्यवहार करने लगता है, तब उसे ब्रह्मत्व की प्राप्ति होती है ।£६-६७। जब दूसरे से डर नहीं लगता, जब दूसरे लोग अपने से नहीं डरते, जब कोई इच्छा उत्पन्न नहीं होती, जब किसी के प्रति द्वंषभाव का उदय नहीं होता, तब ब्रह्मत्व की प्राप्ति होती है ।६५। जो दुर्म तियों से नहीं छोड़ी जा सकती, जो वृद्ध होने पर

English

He married the Asura lady Sarmistha, the daughter of Vrsaparvan. Devayani gave birth to Yadu and Turvasu.

अध्याय १७२

श्लोक 30

पुनरादाय ते सर्वे कृत्वा निर्व्रणसत्तनुम् स्नापितो नर्मदातोये शाण्डिल्यायै समर्पितः

punarādāya te sarve kṛtvā nirvraṇasattanum snāpito narmadātoye śāṇḍilyāyai samarpitaḥ

हिन्दी अर्थ

भी नहीं बढ़ाती, जो प्राणों का विनाश करनेवाले रोग एवं दोष की तरह भयानक है, उस तृष्णा को छोड़ देने पर ही सुख की प्राप्ति होती है ।६९। वृद्ध हो जाने पर केश वृद्ध (सफेद) हो जाते हैं, दाँत वृद्ध हो (दूटा) जाते हैं, किन्तु जीवन की आज्ञा और धन की शभाशा वृद्ध होने पर भी वृद्ध नहीं होती। कामनाओं की पूति होने पर जो सुख्ष मिलता है, दिव्य पदार्थों एवं वस्तुओं की प्राप्ति पर जो महान सुख होता है वह सब सुख, उस सुख की सोलह॒वीं कला (अंश) की भी समानता नहीं कर सकता, जो तृष्णा के नाश हो जाने पर प्राप्त होता है ।१००-१०१।१ इस प्रकार महायदास्वी राजषि ययाति ने पृत्रों को शिक्षा देकर सत्रीसमेत बन को प्रस्थान किया भौर मृगुतुज्भ नामक स्थान में तपस्या कर, वहीं पर सो ब्रतों का विधिवत् पालन कर स्वगु प्राप्त किया ।

English

Sarmistha, the daughter of Vrsaparvan, gave birth to very powerful sons comparable to divine sons, viz. Druhyu, Anu and Puru.

अध्याय १७२

श्लोक 31

ततः सा हृष्टमनसा पतिं दृष्ट्वा तु तैजसम् ।प्रणम्य तान् ऋषीन् देवान् विमलार्कं जगत्कृतम्

tataḥ sā hṛṣṭamanasā patiṃ dṛṣṭvā tu taijasam / praṇamya tān ṛṣīn devān vimalārkaṃ jagatkṛtam

हिन्दी अर्थ

: तस्प वंशास्तु पड्चेते पुण्पा देवषिसत्कृता: । ये्व्याप्ता पृथिवी कृत्सना सुयंस्थेव गरभस्तिभिः

English

The delighted Rudra gave him a divine golden chariot that shone brilliantly and that could never get stuck up (im¬ peded). He gave him two great inexhaustible quivers also.

अध्याय १७२

श्लोक 32

क्रियाप्रवर्तिताः सर्वे देवगन्धर्वमानुषाः ।हृष्टतुष्टा गताः सर्वे स्वमाश्रमपदं महत्

kriyāpravartitāḥ sarve devagandharvamānuṣāḥ / hṛṣṭatuṣṭā gatāḥ sarve svamāśramapadaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

धन्य: प्रजावानायुष्मान्कीतिमांश्व भवेज्षरः ययातेश्ररितं सर्वे पठअशुष्बन्द्िजोत्तमः इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्‍्ते ययातिभ्रसवकोत॑न नाम त्रितवतितमो्ष्याय: ॥।द ३॥

English

That chariot was fitted with horses as fast as the mind It was in this chariot that he drove at the time of his marriage. With the same important chariot he conquered the earth.

अध्याय १७२

श्लोक 33

पतिव्रता स्वभर्त्रा सा मासमेवाश्रमे स्थिता ।माण्डव्येनाप्यनुज्ञाता ययौ नत्वा स्वमाश्रमम्

pativratā svabhartrā sā māsamevāśrame sthitā / māṇḍavyenāpyanujñātā yayau natvā svamāśramam

हिन्दी अर्थ

व्का्सेल्ीयाज़ु ननोलपचब्लिव्विव्वरणस्न्

English

Yayati was invincible in battle to Devas, Danavas and human beings. That chariot belonged to all the Paurava kings.

अध्याय १७२

श्लोक 34

गतेषु तेषु सर्वेषु स्थापयामास चाच्युतम् ।माण्डव्येश्वरनामानं नारायण इति स्मृतम्

gateṣu teṣu sarveṣu sthāpayāmāsa cācyutam / māṇḍavyeśvaranāmānaṃ nārāyaṇa iti smṛtam

हिन्दी अर्थ

यदोः पुत्रा बसुव॒ु्हि पन्च देवसुतोपमाः। सहस्नजिदथ श्रेष्ठ: कोष्ठुर्नोलो जितो लघुः सहस्नजित्सुतः श्रीमाञशतजिन्नाम पार्थिव: । शतजित्सुता विख्यातास्त्रयः परमधामिकाः

English

It remained with them upto the time ofKaurava Jana- mejaya born of a good land(?) The chariot got lost through the curse of the son of Garga, the intelligent sage, when Pariksit's son became a king.

अध्याय १७२

श्लोक 35

दिव्यं वर्षसहस्रं तु पूजयामास भारत ।गतो ऽसावृषिसङ्घैश्च सहितो ऽमरपर्वतम्

divyaṃ varṣasahasraṃ tu pūjayāmāsa bhārata / gato 'sāvṛṣisaṅghaiśca sahito 'maraparvatam

हिन्दी अर्थ

उनके देवर्षियों द्वारा सत्कार पाने वाले ये पाँच वंश हैं जो, सूर्य की क्रिरणों के समात समस्त पृथ्वी मण्डल को व्याप्त किये हुए हैं । जो उत्तम द्विज महाराज ययाति के इस उत्तम चरित्र का समग्र पाठ करता अथवा सुनता है. धन धान्य, पूजा, दीर्घायु, और कौति प्राप्त करता है ।!०२-१०४।

English

The unwise king Janamejaya (the first) who was evil- minded and was known as Loha-gandhin 1 (having the odour of iron) killed the (young) son of Gargya.

अध्याय १७२

श्लोक 36

तपस्तपन्तौ तौ तत्र ह्यद्यापि किल भारत ।भ्रातरौ संयतात्मानौ ध्यायतः परमं पदम्

tapastapantau tau tatra hyadyāpi kila bhārata / bhrātarau saṃyatātmānau dhyāyataḥ paramaṃ padam

हिन्दी अर्थ

कातंवीय॑ अर्जुन की उत्पत्ति कथा खूत बोले--अब मैं परम तेजस्वी ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदु के वंश का वर्णन विस्तारपुर्वक क्रम से कर रहा हूं, सुनिये । यदु के पाँच देवताओं के समान सुन्दर एवं प्रभावशाली पुत्र हुए, जिनमें सब से बड़े पुत्र कान सहस्नजित् था, अन्य पुत्रों के नाम क्रोष्टु, नील, जित और लघु थे ।१-२। सहस्नजित् के पुत्र परम कान्तिम/न् राजा शत्रजित् थे । शतजितु के तीन परम विख्यात एवं परम धार्मिक पुत्र हुए । जिबके

English

The saintly king with iron odour began to run here and there. He was abandoned by the citizens and the people of the land. Nowhere did he derive happiness.

अध्याय १७२

श्लोक 37

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा तर्पयेत् पितृदेवताः ।पितरस्तस्य तृप्यन्ति पिण्डदानाद्दशाब्दिकम्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā tarpayet pitṛdevatāḥ / pitarastasya tṛpyanti piṇḍadānāddaśābdikam

हिन्दी अर्थ

हैहयश्न हयश्वेब राजा वेणुहयश्न यः हैहयस्य तु दायादों धमतन्त्र इति श्रति

English

He was extremely miserable. He did not get peace anywhere. Excessively dejected, he sought refuge in the sage who was the cause of his curse. 1 2

अध्याय १७२

श्लोक 38

देवगृहे तु पक्षादौ यः करोति विलेपनम् ।गोदानशतसाहस्रे दत्ते भवति यत्फलम्

devagṛhe tu pakṣādau yaḥ karoti vilepanam / godānaśatasāhasre datte bhavati yatphalam

हिन्दी अर्थ

धर्मतन्त्रस्य कोतिस्तु संज्ेयस्तस्य चाइडत्मजः । संज्ञेयस्य तु दायादो महिष्सान्नाम पाथिवः ५ आसोन्‍्महिष्मत:ः पुत्रो भवश्नेण्यः प्रतापवान् । वाराणस्यधिपो राजा कंथितः पूष एव हि ३६ भद्रश्षेण्यस्य दायादो दुमंदो नाम पार्थिव: । दु्मंदस्य ततो धीमान्कनको नाम विश्वुतः कनकस्य तु दायादाश्रत्वारो लोकविश्वुताः । कृतवीर्य: कार्तिदीर्यः कृतवर्मा तथव च ८

English

The sage of liberal mind was famous by the name Indrota. This Indrota, the excellent Brahmana, a descendant of Sunaka, made the king perform an Asvamedha for the sake of purification.

अध्याय १७२

श्लोक 39

उपलेपनेन द्विगुणमर्चने तु चतुर्गुणम् ।दीपप्रज्वलने पुण्यमष्टधा परिकीर्तितम्

upalepanena dviguṇamarcane tu caturguṇam / dīpaprajvalane puṇyamaṣṭadhā parikīrtitam

हिन्दी अर्थ

स हि वर्षायुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम् । दत्तामाराधयामास कातंवीर्योत्रिसंभवस् ३१०

English

After reaching his abode, the iron-ore odour was quelled. 3 That divine chariot left him and reached Vasu, the king of Cedi.

अध्याय १७२

श्लोक 40

दिव्यनेत्रधरो भूत्वा त्रैलोक्ये सचराचरे ।दध्ना मधुघृतैर्देवं पयसा नर्मदोदकैः

divyanetradharo bhūtvā trailokye sacarācare / dadhnā madhughṛtairdevaṃ payasā narmadodakaiḥ

हिन्दी अर्थ

अधर्म दीयमानस्य सद्धिस्तस्मान्निवारणम् । धर्मेण पृथिवी चित्वा धर्मेणवानृपालनम् १२ सड्ग्रामांस्तु बहुड्जित्वा ह॒त्वा चारोन्सहर्रशः । सडग्रासे युध्यमानस्य बधः स्यथादधिकाद्रण. नश्म हैहय, हंय और राजा वेण हय थे हैहय का उत्तराधिकारी राजा वेणु तंत्र हुआं--ऐसा सुना जाता है । धर्मतंत्र के पुत्र कीति हुए, कीति के पुत्र संशय हुए। संजशेय के उत्तराधिकारी राजा महिष्मान् हुए

English

Emend as in Bd.P. v. 22, as syntactically the text here is obscure. Thetext: Lohagandham naradhipam is Amended as Lohagandhx naradhipah, as in Bd.P.

अध्याय १७२

श्लोक 41

स्नपनं ये प्रकुर्वन्ति पुष्पमालाविलेपनैः ।ये ऽर्चयन्ति विरूपाक्षं देवं नारायणं हरिम्

snapanaṃ ye prakurvanti puṣpamālāvilepanaiḥ / ye 'rcayanti virūpākṣaṃ devaṃ nārāyaṇaṃ harim

हिन्दी अर्थ

महिष्मान् के पुत्र प्रतापशाली राजा भद्रश्नेण्य हुए, जो वाराणसी के अधिपति थे, इनके विषय में पहले ही कहा जा चुका है। भद्रश्नेण्य का उत्तराधिकारी राजा दुदंम हुआ, दुर्दम का पुत्र परम बुद्धिमान् राजा कनक नाम से विख्यात हुआ । कनक के चार्र उत्तराधिकारी लोक विख्यात हुए, जिनके नाम कृतवी्य, कारतिवीय, कृतवर्मा और कृत थे । कृतवीर्य से अर्जून की उत्पत्ति हुईं । वह्न राजा अर्जून एक सहंख्र बाहुओं वाला था

English

The text is confusing. The king did not take resort to Gargya who cursed him (see v. 22above) but Indrota Saunaka (see the next verse). The reading in Bd. 24: sa priyicchaunakam rfim-'hc resorted to the sage Saunaka* is relevant and deserves adoption.

अध्याय १७२

श्लोक 42

ते ऽपि दिव्यविमानेन क्रीडन्ते कल्पसंख्यया ।दीपाष्टकं तु यः कुर्याद् अष्टमीं च चतुर्दशीम्

te 'pi divyavimānena krīḍante kalpasaṃkhyayā / dīpāṣṭakaṃ tu yaḥ kuryād aṣṭamīṃ ca caturdaśīm

हिन्दी अर्थ

तथा सातों द्वीपों का स्वामी था ।६-६। उस राजा कातंवीर्याजुन ने दस सहस्न वर्षों तक परम कठोर तपस्या कर अत्रि के पत्र दत्त की आभाराधना की; दत्त ने उसे परम महत्त्वपूर्ण चार बरदान प्रदान किये थे, जिनमें से उसने पहला वरदान सहस्न बाहुओं का प्राप्त किया ।१०-११। दूसरे वरदान के अनुसार अधरम में नष्ट होते हुए लोक को सदुपदेक्षों द्वारा निवारित करना, तृतीय वरदान के अनुसार धर्मपूर्वक पृथ्वी विजय करके धर्म पृवंक पालन करना, चतुर्थ वरदान के अनुसार अनेक संग्रामों में विजय प्राप्त कर, सहस्नों शत्रुओं का विनाश कर रणभूमि में अपने से अधिक बलवाले के हाथ मृत्यु प्राप्त करना । इन वरदानों को प्राप्त कर कार्तवीर्याजून ने नगरों एवं सातों द्वीपों समेत पृथ्वी को जीतकर, सातों समुद्रों तक फैली हुई वश्लुंधरा पर क्षत्रिय धर्म से अधिकार प्राप्ल किया । उस परम चतुर महाराज के युद्ध करने के समय माया से एक सहख्न बाहु हो जाते थे,

English

Bd. P. v. 26 reads avabhrtha for avasatha hereof and means, 'The king died when he reached the Avabhrtha stage of the sacrifice'. The Bd. P. reading is preferable for if the curse of iron odour was removed and the king was rehabilitated, the divine chariot should have continued with him.

अध्याय १७२

श्लोक 43

एकादश्यां तु कृष्णस्य न पश्यन्ति यमं तु ते ।फलैर्नानाविधैः शुभ्रैर् यः कुर्याल् लिङ्गपूरणम्

ekādaśyāṃ tu kṛṣṇasya na paśyanti yamaṃ tu te / phalairnānāvidhaiḥ śubhrair yaḥ kuryāl liṅgapūraṇam

हिन्दी अर्थ

दश यज्ञसहज्राणि तेषु द्वीपेषु सप्तसु । निरगलाः सम निव॒ त्ता: श्रूयन्ते तस्य धीमतः १६ सर्वे यज्ञा महाबाहोस्तस्या55सन्भुरितेजसः । सर्वे कास्चनवेदीका: सर्वे यूपेश्न काने:

English

I ha« promised to give alms to Brahmanas but have not given. That can be achieved only by exertion. (So)

अध्याय १७२

श्लोक 44

ते ऽपि यान्ति विमानेन सिद्धचारणसेविताः ।घण्टा चैव पताका च विमाने पुष्पमालिका

te 'pi yānti vimānena siddhacāraṇasevitāḥ / ghaṇṭā caiva patākā ca vimāne puṣpamālikā

हिन्दी अर्थ

सर्वे देवमंहाभागविमानस्थेरलंकृता: । गन्धर्वरप्सरोभिश्व नित्यमेवोपशोभिताः न नन॑ कातंवीयंस्यथ गति यास्यन्ति मानवाः। यज्ञदनेस्तपोभिश्च विक्रमेण श्रुतेन च २० दीपेषु सप्तसु स वे खड़गी वरशरासनी । रथी राजा5प्यनुच रोउन्यो5गाच्चवानुद्श्यते

English

In the prime of youth, Ido not wish to become a pitiable figure with white moustache and beard, shattered (in every limb) by old age, (skin) with many a wrinkle, with the body bent down, faced with a miserable state, the very form

अध्याय १७२

श्लोक 45

वादित्राणि यथार्हाणि प्रान्ते च गच्छते शिवम् ।देवालयं तु यः कुर्याद् वैष्णवं माण्डवेश्वरम्

vāditrāṇi yathārhāṇi prānte ca gacchate śivam / devālayaṃ tu yaḥ kuryād vaiṣṇavaṃ māṇḍaveśvaram

हिन्दी अर्थ

अनष्टद्रव्यश्रवाइपसीज्न शोको न च विशभ्रमः। प्रभावेण महाराज्ञः प्रजा धर्मेण रक्षतः .

English

O King, O knower of virtues, you do have many sons even more beloved than lam. May they take it up. Please request some other son".

अध्याय १७२

श्लोक 46

स्वर्गे वसति धर्मात्मा यावदाभूतसम्प्लवम् ।माण्डव्यनारायणाख्ये विप्रान् भोजयते ऽग्रतः

svarge vasati dharmātmā yāvadābhūtasamplavam / māṇḍavyanārāyaṇākhye viprān bhojayate 'grataḥ

हिन्दी अर्थ

स॒ वे बाहुसहलण ज्याघातकठिनेन च। भाति रश्मिसहरत्रण शारदेनेव भास्कर: २५ अनेक योद्धा, ध्वंजा, और रथ भी हो जाते थे सुनते हैं उस परम चतुर राजा कीतंवीये ने उन सातों द्वीपों में दस सहस्न यज्ञों का अनुष्ठान सम्पन्न किया था, और वे सब यज्ञ निविन्च समाप्त भी हो गये थे। परम- तेजस्वी महाबाहु उस कातंवीये के वे सब यज्ञ बड़े समारोह से सम्पन्न हुए थे, सब में सुबवर्ण की वेदियाँ बनी थीं, और सुवर्ण के खम्भे गड़े थे ।((२-१७। सभी महाभाग्यशाली देवगण विमानों पर सुशोभित थे । निध्य गन्धवं

English

On getting this rebuff from Yadu, (Yayati) the fore¬ most among the most eloquent ones, became infuriated. Censur¬ ing his eldest son, he said thus:

अध्याय १७२

श्लोक 47

एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिर् भवति भोजिता ।आश्विने मासि सम्प्राप्ते शुक्लपक्षे चतुर्दशीम्

ekasmin bhojite vipre koṭir bhavati bhojitā / āśvine māsi samprāpte śuklapakṣe caturdaśīm

हिन्दी अर्थ

और अप्सराएं आ आकर उनकी शोभा बढ़ाते थे । उस भहाराज की यद्योमाथा का गनन्‍्धर्वष गण गान करते थे। उस राजषि कातंवीयं की अपार महिमा एबं निर्मल चरित्र को देखकर देवधि नारद भी उसका इस प्रकार गुण गान किया करते थे कि 'यह निश्चय है कि मनुष्य योनि में पंदा होने बाले कोई भी, उस महाराज कातंबीय के यज्ञ, तपस्या, दान, पराक्रम, पाण्डित्य आदि में समानता नहीं प्राप्त कर सकते । सातों द्वीपों

English

"What other Asrama do you have? What other holy rite do you have for which you disregard me and say thus? O evil-minded one, O new instructor!" After saying this the angry king cursed Yadu: "Since you, though born of my bosom, do not pass on your (youthful) age unto me, O fool, your progeny shall not get the kingdom." (Then he said to Turvasu) "O Turvasu, accept my sin along with my old age'.

अध्याय १७२

श्लोक 48

कृतोपवासनियमो रात्रौ जागरणेन च ।दीपमालां चतुर्दिक्षु पूजां कृत्वा तु शक्तितः

kṛtopavāsaniyamo rātrau jāgaraṇena ca / dīpamālāṃ caturdikṣu pūjāṃ kṛtvā tu śaktitaḥ

हिन्दी अर्थ

में वह महाराज तलवार ओर सुन्दर धनुष, बाण धारण किये हुए रथ पर सवार, राजा होकर भी पीछे-पोछे चलने वाला देखा जाता था उसके राज्य में किसी का भी द्रव्य नष्ठ नहीं होता था, न किसी को शोक था न सन्‍्ताप था उस महाराज के शासन काल में धर्ंपुर्वक प्रजाओं की रक्षा हुई । नरपति कातंवीय इस प्रकार पचासी सहस्न वर्षों तक सातोंद्वीपों का एक मात्र चक्रवर्ती सम्राट रहा ।१८-२३। अपने राज्य में वह स्वयं पशुओं की पालन करने वाला था, स्वयं खेतों की भी देखभाल रखता था, योग्राभ्यासपरायण होने के कारण समय समय पर वह कातंवीयर्जिन वृष्टि करके मेघों का भी कार्य करता था, धनुष की डोरी खींचने से कड़े पड़े हुए एक सहन हाथों से सुशोभित वहु महाराज शरत्कालीन सहस्न किरणोंवाले सूर्य की भाँति

English

O father, I do not like old age that destroys the

अध्याय १७२

श्लोक 49

नारी वा पुरुषो वापि नृत्यगीतप्रवादनैः ।प्रभाते विमले सूर्ये स्नानादिकविधिं नृप

nārī vā puruṣo vāpi nṛtyagītapravādanaiḥ / prabhāte vimale sūrye snānādikavidhiṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

स हि नागसहस्नरेण सहिष्सत्यां नराधिपः ककोटकसभां जित्वा पुरी तत्र न्यवेशयत्

English

You, though born of my bosom, do not exchange your (youthful) age with me; O Turvasu, your progeny will meet with utter ruin.

अध्याय १७२

श्लोक 50

अभिनिर्वर्त्य मौनेन पश्यते देवमीदृशम् ।सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोके महीयते

abhinirvartya maunena paśyate devamīdṛśam / sarvapāpavinirmukto rudraloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

स थे बेग॑ समुद्रस्य प्रावुटदूकालास्बुजेक्षण: फ्रोडनिव मुखोद्विग्नः प्रावुटूकाल चकार ह पुरा स तामनुसरक्नवगाढो महाणं॑वम्। चकारोद्धृत्य बेलान्तं स काल प्रावृषोद्दनम् ३२६

English

O deluded one, you will be a king among people of mixed religious rites and practices*, born of anti-caste marriages and other mixed castes, who are meat-eaters and others. There is no doubt that you will be a ruler of the brutish Mlecchas, barbarians and oulcastes who are after outraging the modesty of their preceptors' wives and who (are destined to be) born as loweranimals.

अध्याय १७२

श्लोक 51

अथवा मार्गशीर्षे च चैत्रवैशाखयोरपि ।श्रावणे वा महाराज सर्वकाले ऽथवापि च

athavā mārgaśīrṣe ca caitravaiśākhayorapi / śrāvaṇe vā mahārāja sarvakāle 'thavāpi ca

हिन्दी अर्थ

चकार क्षोभयत्रनाजा दोःसहल्लेण सागरम् । देवासुरपरिक्षिप्तं क्षीरोदसिव सागरम् ३२

English

After cursing his own son Turvasu thus, Yayati spoke these words to his son Druhyu born of Sarmistha:

अध्याय १७२

श्लोक 52

शिवरात्रिसमं पुण्यम् इत्येवं शिवभाषितम् ।वाजपेयाश्वमेधाभ्यां फलं भवति नान्यथा

śivarātrisamaṃ puṇyam ityevaṃ śivabhāṣitam / vājapeyāśvamedhābhyāṃ phalaṃ bhavati nānyathā

हिन्दी अर्थ

शोभायमान होता था । उस महाराज नराधिपति अर्जुन ने नागों की माहिष्मती नग री में एक सहस्र सागों समेत ककॉटक नॉगराज की सभा को पराजित कर वहाँ पर अपनी पुरी बसाई थी ।२४-२६। वर्षाकालीन कमल के समान निर्मल सुन्दर नेत्रोंवाले उस महावीर अर्जून ने खेल ही खेल में समुद्र का वेग रोककर असमय में ही वर्षाकाल का सा समय कर दिया । जल क्रीड़ा करते हुए उसके कंठ से सुवर्ण की माला खिसक कर बर्मदा की धारा में गिर पड़ी थी, उससे सुशोभित एवं क्रीड़ा से आलोडित नर्मदा अपनी तरज्जूरूपी कात॑र भूकुटियों एवं तरंगों के शब्दों से शद्धिता के समान उनके अभिमुख्त गमन करती थी। प्राचीन काल में एक वार नर्मदा का अनुसरण करते हुए उस मद्दाराज अर्जुन ने महासमुद्र में जाकर उसका भवगाहन किया अपने सह बाहुओं से समुद्र के जल को आलोडित कर तटवर्ती वन प्रान्त को प्लावित कर दिया, इस प्रकार

English

"O Druhyu, you accept my old age that destroys your complexion and beauty. Give unto mein exchange your youth fora period of one thousand years.

अध्याय १७२

श्लोक 53

दुर्भगा दुःखिता वन्ध्या दरिद्रा च मृतप्रजा ।स्नाति रुद्रघटैर्या स्त्री सर्वान्कामानवाप्नुयात्

durbhagā duḥkhitā vandhyā daridrā ca mṛtaprajā / snāti rudraghaṭairyā strī sarvānkāmānavāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

उस बन में उसने असमय में वर्षाकाल ला दिया ।२७-२६। इस प्रकार सहस्रबाहुओं द्वारा आलोडित होने पर जब महासमुद्र विक्षुब्ध हो गया, तब पाताल लोक वासी महाबलवान् असुर वृन्द कितने बेहोश हो मये भोर कितने इधर उधर भय के मारे छिप गये । उसके सहस्र बाहुदण्डों से ताड़ित होकश महासमुद्र की भीषण तरंगें चूणं चर्ण हो गईं, बड़े बड़े मत्स्य एवं विषधर गण उसी में विलीनब हो गये । जल राशि में फे नों

English

When the thousand years are completed, I shall return your youth and take back again my sin along with the old age."

अध्याय १७२

श्लोक 54

कृमिकीटपतङ्गाश्च तस्मिंस्तीर्थे तु ये मृताः ।स्वर्गं प्रयान्ति ते सर्वे दिव्यरूपधरा नृप

kṛmikīṭapataṅgāśca tasmiṃstīrthe tu ye mṛtāḥ / svargaṃ prayānti te sarve divyarūpadharā nṛpa

हिन्दी अर्थ

के समूह तैरने लगे, महाभयानक भंवरें उठने लगीं। अपने सहस्र भुजदण्डों से उस महाराज अर्जुन ने समुद्र को इस प्रकार विक्षुब्ध कर दिया जैसे अमृत मंथन के समय देवताओं और दानवों ने मिलकर क्षीर- सागर को विक्षुब्ध कर दिया था।३०-३२। समुद्र में विराजमान उस भीमक्राय नरपति अजु न को देखकर जलजस्तुओं को मन्दराचल द्वारा समुद्र मत्थन को आशंका हुई ओर वे अतिशीघ्र भयभीत एवं आतंकित हो गये । द १. मूल प्रति में 'मुखोद्विग्ग:” पाठ की कोई संगति नहीं बैठती ।

English

An old man does not enjoy (a ride on) elephants, chariots and horses, nor can he enjoy a woman. He has no one to be in contact. Hence I do not like the old age.

अध्याय १७२

श्लोक 55

अनाशके जले ऽग्नौ तु ये मृता व्याधिपीडिताः ।अनिवर्तिका गतिस् तेषां रुद्रलोके ह्यसंशयम्

anāśake jale 'gnau tu ye mṛtā vyādhipīḍitāḥ / anivartikā gatis teṣāṃ rudraloke hyasaṃśayam

हिन्दी अर्थ

ततो गत्वा पुलस्त्यस्तु अर्जुन व् प्रसादयत् मुमोच राजा पोलस्त्यं पुलस्त्येनानृपालितम् ३६

English

Since you, though born out of my own bosom, do not

अध्याय १७२

श्लोक 56

नित्यं नमति यो राज शिवनारायणावुभौ ।गोदानफलमाप्नोति तस्य तीर्थप्रभावतः

nityaṃ namati yo rāja śivanārāyaṇāvubhau / godānaphalamāpnoti tasya tīrthaprabhāvataḥ

हिन्दी अर्थ

पुराणि घोषान्प्रामांश्न पत्तनानि च सर्वेश: । जज्वाल तस्य बाणेषु चित्रभानुदिधक्षया स तस्य पुरुषन्धस्य प्रतापेन महायशा: । ददाह कार्तंवीयंस्यथ शलांश्वापि वनानि च ॥४ १ स शुन्यमाश्रमं सर्व वरुणस्था55त्मजस्य वे । ददाह सवनद्वीपांश्रित्रभानुः सहैहय:ः

English

(Defective verse ) 1 2 An old man gives (the gift of age) to a child. (If I give up my youth) I shall become impure with your old age. An old man does not perform Homas at the proper time. I do not like that (type of) old age.

अध्याय १७२

श्लोक 57

देवालये तु राजेन्द्र यश्च कुर्यात् प्रदक्षिणाम् ।प्रदक्षिणीकृता तेन ससागरधरा धरा

devālaye tu rājendra yaśca kuryāt pradakṣiṇām / pradakṣiṇīkṛtā tena sasāgaradharā dharā

हिन्दी अर्थ

समुद्र में रहनेवाले भीषण विषधर सर्प उस महावीर अजु'न को देखकर इस प्रकार विनत और निईचल मस्तकवाले बन गये जसे सांयकाल की हूँवा के बन्द हो जाने पर केलों के पेड़ निश्चल और निस्तब्ध हो जाते हैं गवंपूवंक लंकापुरी में जाकर उस महावीर ने अपने कठोर घनुष से पाँच सो बाणों को छोड़कर सेना समेत रावण को बलपुवंक मोहित कर लिया था, और इस प्रकार उसे पराजित कर बन्धन

English

Since you, though born out of my own bosom do not give unto me your (youthful) age, all those defects of old age mentioned by you will visit (afflict) you. Your children will die on attaining youthful age. You will have to devote to the scattering of fire like this (after cremating your children).

अध्याय १७२

श्लोक 58

सार्द्धं शतं च तीर्थानि मल्लिकाभवनाद् बहिः ।तस्य तीर्थप्रमाणं तु विस्तरं राजसत्तम

sārddhaṃ śataṃ ca tīrthāni mallikābhavanād bahiḥ / tasya tīrthapramāṇaṃ tu vistaraṃ rājasattama

हिन्दी अर्थ

में डाल अपनी राजघानी माहिष्मती नगरी में लाकर बन्दी बनाया था ।३३-३५॥ जब महर्षि पुलस्त्य ने जाकर उसको प्रसन्न किया, तब उनके अनुरोध पर रावण को छोड़ा था। उसके सहख्र बाहुओं से उत्पन्न होनेवाले प्रत्यव्चा के टंकोर युगान्त के समय बिजली गिरने और प्रलयंकर बादलों के भयावने शब्दों के समान होते थे । खेद है कि ऐसे महाबलशाली कीतेबीयं की सहस्न बाहुओं को जमदर्ति-पृत्र परथुराम ने युद्ध क्षेत्र में हेमताल के बन की भाँति काठ डाला। कभी एक बार तृष्णा से व्याकुल होकर आदित्य ने भजु न से भिक्षा की याचना की थी, नरपति ने सूर्य को सातों द्वीपों समेत समस्त पृथ्वी को दान कर दिया । राजा के बाणों में स्थित होकर आदित्य ने जलाने की इच्छा से पृथ्वी के समस्त पुरों, ग्रामों, पशुशालाओं, एबं पतनों तक को भस्म कर दिया उस पुरुषेन्द्र कीतेंवीय के प्रभाव से महान

English

(He then spoke to Puru) O Puru, you accept my sin along with the old age. O dear one, old age, wrinkles and greyish hairs have overwhelmed me as a result of the curse of Kav-ya Usanas (Sukra). I am not satiated with the pleasures of youth. I shall enjoy the worldly pleasures with your youth. When a period of thousand years is completed I shall return you your youthful age. I shall also take back my own sin along with the old age.

अध्याय १७२

श्लोक 59

सूत्रेण वेष्टयेत् क्षेत्रमथवा शिवमन्दिरम् ।अथवा शिवलिङ्गं च तस्य पुण्यफलं शृणु

sūtreṇa veṣṭayet kṣetramathavā śivamandiram / athavā śivaliṅgaṃ ca tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

यहशस्वी आदित्य ने पृथ्वी के समस्त पव॑तों और वनों को भी भस्म कर दिया ।३६-४१। हैहय कीतंवीयें की सहायता से सूय ने इस प्रकार वनों एवं ढ्वीपों समेत पृथ्वी को भस्म करते हुए वरुण के आपएमज का एक शून्य आश्रम भी चारों ओर से भस्म कर दिया। वरुण ने अपने इस पुत्र को, जो परम तेजस्वी एवं उत्तम गुभोंवाला था, प्राचीनकाल में प्राप्त किया था, उनका वह पुत्र मुनिबर वसिष्ठ के नाम से तथा आपव के नाम से प्रसिद्ध था ।

English

Thus requested, the son immediately replied to his father, "O father, I shall do as you wish.

अध्याय १७२

श्लोक 60

जम्बूद्वीपश्च कृतस्नश्च शाल्मली कुशक्रौञ्चकौ ।शाकपुष्करगोमेदैः सप्तद्वीपा वसुंधरा

jambūdvīpaśca kṛtasnaśca śālmalī kuśakrauñcakau / śākapuṣkaragomedaiḥ saptadvīpā vasuṃdharā

हिन्दी अर्थ

तस्मात्ते दुष्करं कर्म कृतसन्‍्यों हनिष्यति । अर्जुनो नाम कौन्तेयो न च राजा भविष्यति(?) कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो यशस्विनः । श्रश्न श्रसेनश् वृष्टयायं वृष एबं च (2)

English

ardjabhrdjaoamias tvam in the text is obscure. Bd.P. v. 51 reads: ardjd rdjavamSas tvam which is better and is accepted here.

अध्याय १७२

श्लोक 61

भूषिता तेन राजेन्द्र सशैलवनकानना ।रेवायां दक्षिणे भागे शिवक्षेत्रात्समीपतः

bhūṣitā tena rājendra saśailavanakānanā / revāyāṃ dakṣiṇe bhāge śivakṣetrātsamīpataḥ

हिन्दी अर्थ

तस्य पुशत्रशतं होव तालजडूघा: इति श्रुतम् । तेषां पझच गणाः ख्याता हैहयानां महात्मनाभ्

English

yVrpaJ iiSuvaram dalle is obscure though translated above. For this Bd. read s:

अध्याय १७२

श्लोक 62

देवखातं महापुण्यं निर्मितं त्रिदशैरपि ।तस्मिन् यः कुरुते स्नानं मुच्यते सर्वपातकैः

devakhātaṃ mahāpuṇyaṃ nirmitaṃ tridaśairapi / tasmin yaḥ kurute snānaṃ mucyate sarvapātakaiḥ

हिन्दी अर्थ

वीरहोत्रा ह्मसंख्याता भोजाश्रावतंयस्तश्वा । तुण्डिकेराश्व बिक्कान्तास्तालजडघास्तथव च सर्वेक्षमर्थ आपव अपने आश्रम को भस्म देखकर बहुत क्रोधित हुए और अजुन को उन्होंने इस प्रकार शाप दिया, 'हैहय ! तुमने मेरे वन को जो नहीं छोड़ा” सो तुम्हारे इस दुष्कर कर्म को भी कोई दुसरा नष्ट करेगा, वह होगा, कुन्तीपुत्र अजुन । वह राजा भौन होगा । अजु न ! तुम्हारी इन सहस्र बाहुओं को, वीरों में श्रेष्ठ परम बलवान परशुराम काट डालेंगे ४३-४६। ब्राह्मण, तपत्वी महाबलवान् परशुराम तुम्हें पराजित कर तुम्हारा

English

O king, I shall accept your sin along with your old age. Take from me my youthful age. Enjoy the pleasures as you wish.

अध्याय १७२

श्लोक 63

पूर्णिमायाममावस्यां व्यतीपाते ऽर्कसंक्रमे ।श्राद्धं च संग्रहे कुर्यात्स गच्छेत् परमां गतिम्

pūrṇimāyāmamāvasyāṃ vyatīpāte 'rkasaṃkrame / śrāddhaṃ ca saṃgrahe kuryātsa gacchet paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

संहार करेंगे ।” परम बुद्धिमान् आपव के शापवद् परशुराम ही उस कीर्तवीय की मृत्यु के कारण बने । प्राचौनकाल में राजा ने इसी प्रकार का वरदान भी मांगा था कि मेरी मृत्यु उसके हाथों से हो, जो बल में मुझसे अधिक हो । उस राजा कात॑वीर्याजुन के सौ पुत्र थे, जिनमें पाँच महारथी थे। उनके नाम थे, शूर, शूरसेन, वृष्ट्याथ वृष और जयध्वज ये सभी पुत्र शस्त्रास्त्र घारण करने में प्रवीण, बलवान्, शूर, घर्मात्मा एवं यशस्वी थे

English

I shall become disguised by your old age, assuming your form and age. Giving up my youthful age, I shall carry out what would be suitable (to the age assumed) ".

अध्याय १७२

श्लोक 64

देवखाते त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।तिष्ठन्ति ऋषिभिः सार्द्धं पितृदेवगणैः सह

devakhāte trayo devā brahmaviṣṇumaheśvarāḥ / tiṣṭhanti ṛṣibhiḥ sārddhaṃ pitṛdevagaṇaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

इन सबों ने अवस्ति देशा में राज्य किया था । जयध्वज का पुत्र प्रतापशालों तालजंघ था, उसके सौ पुत्र हुए, जो तालजंघ गण के नाम से :विख्यात हुए । महान् पराक्रमशाली उन हैहयवंश में उत्पन्न होनेवालों के पाँच ग़ण विख्यात हैं, उनके नाम हैं, वीर होत्रगण, जिनकी गणना नहीं की जा सकती, भोजगण, आवर्तिगण, तुण्डिकिरगण, जो परम बलशाली थे, तथा तालजंघ बीरहोतन्र का पुत्र राजा अनन्त हुआ, उसका पुत्र दुर्जय हुआ, दुर्जय से अमिन्रदरशंत का जन्म हुआ ।४७-४३। जेसा कि पहले भी कह चुके हैं उस महाराज कार्तवीये अजु न के राज्य में लोगों का द्रव्य नष्ट नहीं होता था, वह अपने व्यक्तित्व के प्रभाव से समस्त

English

O Puru, I am pleased with you. Welfare unto you. Delightedly I grant this unto you. All the subjects in your kingdom shall flourish and enjoy all pleasures (or your progeny will realise their desires, be affluent and rule over a kingdom).

अध्याय १७२

श्लोक 65

तत्र तीर्थे ऽश्विने मासि चतुर्दश्यां विशेषतः ।वायुमार्गे स्थितः शक्रस्तिष्ठते दैवतैः सह

tatra tīrthe 'śvine māsi caturdaśyāṃ viśeṣataḥ / vāyumārge sthitaḥ śakrastiṣṭhate daivataiḥ saha

हिन्दी अर्थ

न तस्य वित्तनाशश्व नष्ट प्रतिलभेत सः । कार्तवीयेस्थ यो जन्म कथयेदिह धोमतः ३५५ वित्तवान्मवतेउत्रेव धर्मभ्वास्य विवर्धते । यथा त्वष्ठा यथा दाता तथा स्वगें महीयते

English

By means of the youthful age, Yayati, the son of Nahusa, became highly delighted and enjoyed all worldly plea-

अध्याय १७२

श्लोक 66

पृथिव्यां यानि तीर्थानि सरितः सागरास्तथा ।विंशति तानि सर्वाणि देवखाते दिनद्वयम्

pṛthivyāṃ yāni tīrthāni saritaḥ sāgarāstathā / viṃśati tāni sarvāṇi devakhāte dinadvayam

हिन्दी अर्थ

इति महापुराणे वायुप्रोक्ते कातंवीर्यार्जुनोत्पत्तिविवरणं नाम चतुर्न॑वतितमोः्ध्याय: ॥र्ै४॥ किमथें भुवनं दग्धमापवस्य सहात्मनः । कार्तंवीयेण विक्रम्य तन्नः प्रत्नहि पृच्छताम् ३१

English

In the parks with (the celestial dam

अध्याय १७२

श्लोक 67

गयाशिरे च यत्पुण्यं प्रयागे मकरकण्टके ।प्रयागे सोमतीर्थे च तत्पुण्यं माण्डवेश्वरे

gayāśire ca yatpuṇyaṃ prayāge makarakaṇṭake / prayāge somatīrthe ca tatpuṇyaṃ māṇḍaveśvare

हिन्दी अर्थ

प्रजाओं का पालस करता था उस परम बुद्धिमान् महाराज कातंवीर्याजु न का जन्म वृत्तास्त इस लोक में जो कहता है, उसकी सम्पत्ति नष्ट नहीं होती, यदि नष्ट हो गई हो तो पुनः प्राप्त होती है, इस लोक में वह परम धनद्ाली होता है, धर्म की वद्धि होती है, जिस प्रकार शुभ कम परायण एवं दानशील लोग स्व में पूजित होते हैं, उसी प्रकार वह भी स्वर्ग में पृजित होता है

English

Counting (even the small units of time such as) Kolas and Kdffhds, he considered that the time limit was complete and so he spoke to his son Puru:

अध्याय १७२

श्लोक 68

पट्टबन्धेन यत्पुण्यं मात्रायां लकुलेश्वरे ।आश्विन्यामश्विनीयोगे तत्पुण्यं माण्डवेश्वरे

paṭṭabandhena yatpuṇyaṃ mātrāyāṃ lakuleśvare / āśvinyāmaśvinīyoge tatpuṇyaṃ māṇḍaveśvare

हिन्दी अर्थ

ज्यामघ का चृत्तान्त विवरण ऋषि च॒न्द् बोले--सूत णी ! कातंवीयें ने अपना पराक्रम दिखाते हुए भहात्मा आपव के आश्रम को क्यों जला दिया ? ऐसा सुना जाता है कि वह राजधि कातंवीर्धा्जन अपनी प्रजाओं का पालक था, सो रक्षक होकर उसने तपोबन को भला क्यों जलाग्रा, इसे हम लोग आपसे पृ रहे हैं, कृपया

English

"O son, O suppressor of enemies, with your youthful age, all worldly pleasures have been enjoyed by me in accor¬ dance with my zeal befitting the time and in a way conducive to happiness.

अध्याय १७२

श्लोक 69

उज्जयिन्यां महाकाले वाराणस्यां त्रिपुष्करे ।संनिहत्यां रविग्रस्ते माण्डव्याख्ये सनातनम्

ujjayinyāṃ mahākāle vārāṇasyāṃ tripuṣkare / saṃnihatyāṃ ravigraste māṇḍavyākhye sanātanam

हिन्दी अर्थ

आदित्यो विप्ररूपेण कार्तंवीयमुपस्थित: । तृप्तिकामः प्रयच्छान्नमादित्यो5हूं न संशयः

English

O Puru, I am delighted. Welfare uptu you, you take back your own youthful age. Accept the realm too. You alone have been my beloved son who carried out what is pleasing to

अध्याय १७२

श्लोक 70

इति ज्ञात्वा महाराज सर्वतीर्थेषु चोत्तमम् ।पित्ःन्देवान् समभ्यर्च्य स्नानदानादिपूजनैः

iti jñātvā mahārāja sarvatīrtheṣu cottamam / pitḥndevān samabhyarcya snānadānādipūjanaiḥ

हिन्दी अर्थ

भगवन्केन ते तुष्टिभवेदश्ूहि दिवाकर । कोदु् भोजन दक्षि श्रुत्वा च विदधाम्यहम् ४ न शकयं स्थावरं सर्व तेजसा मानुषेण तु। निर्दंग्धु तपतां श्रेष्ठ त्वासेव प्रणसास्यहम् ६

English

King Yayati, the son of Nahusa, took back his old age and Puru regained his own youthful age.

अध्याय १७२

श्लोक 71

चतुर्दश्यां निराहारः स्थितो भूत्वा शुचिव्रतः ।पूजयेत् परया भक्त्या रात्रौ जागरणे शिवम्

caturdaśyāṃ nirāhāraḥ sthito bhūtvā śucivrataḥ / pūjayet parayā bhaktyā rātrau jāgaraṇe śivam

हिन्दी अर्थ

आदिष्टं तेजसा मेघसागरं शोषयिष्यति । शुष्क॑ भस्स करिष्यामि तेस प्रीतो नराधिप 'द

English

When the king evinced his desire to crown his youngest son Puru, people of all castes with Brahmanas as the chief of them, spoke these words. 1 2

अध्याय १७२

श्लोक 72

स्नानैश्च विविधैर्देवं पुष्पागरुविलेपनैः ।प्रभाते पौर्णमास्यां तु स्नानादिविधितर्पणैः

snānaiśca vividhairdevaṃ puṣpāgaruvilepanaiḥ / prabhāte paurṇamāsyāṃ tu snānādividhitarpaṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

खूत बोले--ऋषिबन्द ! आदित्य ब्राह्मणवेश धारण कर महाराज कार्तवीयं के पास आये और बोले राजन् ! मैं भूखा हूं, समतोष प्राप्ति के लिए आपके पास आया हैं, मुझे अन्नादि दीजिये, मैं आदित्य हूँ इसमें सल्देह न करिये ।३ राजा बोले--भगवन् दिवाकर ) आपको किस से सस्तोष-प्राप्ति होगी, मैं किस प्रकार का भोजन आपको दूँ ? आपका उत्तर सुनकर ही मैं कुछ प्रबन्ध कर सकूंगा

English

"O lord, why do you set aside (the claim of) your eldest son, the excellent Yadu, the grandson of Sukra, the son of De.vayani, and bestow the kingdom on Puru?

अध्याय १७२

श्लोक 73

श्राद्धेन हव्यकव्येन शिवपूजार्चनेन च ।अग्निष्टोमादियज्ञैश्च विधिवच्चाप्तदक्षिणैः

śrāddhena havyakavyena śivapūjārcanena ca / agniṣṭomādiyajñaiśca vidhivaccāptadakṣiṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

सूर्य धोले--दानिशिरोमणि राजन् ! मुझे समस्त स्थावर जगत प्रदान कीजिये, मैं उसी का भोजन कर सन्‍्तोष प्राप्त करूँगा, अध्य भोजन द्वारा मेरी तृप्ति नहीं होगी ।५॥ क्‍

English

Yadu is your eldest son. Turvasu was born next to him. Sarmistha's eldest son is Druhyu, then comes Anu and then only Puru.

अध्याय १७२

श्लोक 74

धौतपापो विशुद्धात्मा फलते फलमुत्तमम् ।गोसहस्रप्रदानेन दत्तं भवति भारत

dhautapāpo viśuddhātmā phalate phalamuttamam / gosahasrapradānena dattaṃ bhavati bhārata

हिन्दी अर्थ

राजा बोले--हे तेजस्वियों में श्रेष्ठ ! मैं मानवतेज द्वारा समस्त स्थावर जगत को जलाने में स्वेधा . अममथ् हूं, अतः आपही को प्रमाण करता हूँ आदित्य बोले-- राजन् ! मैं तुम्हारे ऊपर सन्तुष्ट हूं, मैं तुम्हें ऐसे बाण दे रहा हूँ, जिनका कभी नाश नही होगा जो तुम्हें सब प्रकार के सुख देनेवाले होंगे। मेरे तेज से समब्वित होकर ये बाण, फंके जाने पर प्रज्वलित हो उठेंगे। है नराधिप ! मेरे तेज से सम्व लित होने पर वे आदेश दे देने पर मेघ और समुद्र को भी

English

How can the younger son deserve the kingdom super¬ seding (the claims of) the elder ones? Hence we urge you to abide by the (traditional) Dharma. 5>

अध्याय १७२

श्लोक 75

स्नानाद्यैर् विधिवत् तत्र तद्दिने शिवसन्निधौ ।हिरण्यं वृषभं धेनुं भूमिं गोमिथुनं हयम्

snānādyair vidhivat tatra taddine śivasannidhau / hiraṇyaṃ vṛṣabhaṃ dhenuṃ bhūmiṃ gomithunaṃ hayam

हिन्दी अर्थ

एतस्मिश्नेव काले तु आपवो नियमस्थितः । दशवर्षसह्लाणि जलवासा महानषिः

English

Bd. P.v. 69 reads: alad-dofa-nidarfanal 'because he failed to notice the defects (of passionate indulgence)'. This is a better reading as it states why he went with Visvaci.

अध्याय १७२

श्लोक 76

शिवमुद्दिश्य वै वस्त्रयुग्मे दद्यात् सुरूपिणे ।पादुकोपानहौ छत्रं भाजनं रक्तवाससी

śivamuddiśya vai vastrayugme dadyāt surūpiṇe / pādukopānahau chatraṃ bhājanaṃ raktavāsasī

हिन्दी अर्थ

क्रोधाच्छुशाप राजषिं कीतितं वो यथा मया ३१३ क्ोष्टोरेकोीइभवत्पुत्रो वुजिनोवान्महायशा: । वाजिनीवतमिच्छन्ति स्वाहि स्वाहबतां वरमू

English

Verses 75-86 show that subjects did notallow injustice even if commit¬ ted by the king. Some sort of public sanction seems to be necessary for appointing a new king.

अध्याय १७२

श्लोक 77

होमं जाप्यं तथा दानमक्षयं सर्वमेव तत् ।ऋचमेकां तु ऋग्वेदे यजुर्वेदे यजुस्तथा

homaṃ jāpyaṃ tathā dānamakṣayaṃ sarvameva tat / ṛcamekāṃ tu ṛgvede yajurvede yajustathā

हिन्दी अर्थ

स्वाहेः पुत्रोउभवद्राजा रशादुर्ददतां बरः । सुतं प्रसुतमिच्छन्ति रशादोरप्रयमात्मजम्

English

O people of all castes with Brahmanas as leaders! Let all of you listen to my speech why I do not intend to give the kingdom to the elder ones.

अध्याय १७२

श्लोक 78

सामैकं सामवेदे तु जपेद् देवाग्रसंस्थितः ।सम्यग्वेदफलं तस्य भवेद्वै नात्र संशयः

sāmaikaṃ sāmavede tu japed devāgrasaṃsthitaḥ / samyagvedaphalaṃ tasya bhavedvai nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

सुखा डालेंगे । और इस प्रकार पदार्थों के सूल जाने पर तो मैं उस्हें भस्म कर ही डालगा, तभी हमारी वास्तविक तृष्ति होगी ।” ऐसी बातें करने के उपरास्त आदित्य ने राजा कातंवीये को वे बाण प्रदान किये। उन बाणों को प्राप्त कर अजु न ने समस्त स्थावर पदार्थों को, जो विश्वाल भूमण्डल भर में व्याप्त थे, तथा आश्रम, ग्राम, गौओं के ठहरने के स्थान, नगर, तपोवन, सुरम्य वन, उपवन संब को भस्म कर दिया और तदनस्तर सूर्य की प्रदक्षिणा की । सूर्य के तेज से भस्म पृथ्वी, ब॒क्षों और तृणों से विहीन हो गई। इसी अवसर भहषि आंपव ने एक नियम किया था, जिसके अनुक्वार दस सहस्र वर्षों तक जल में निवास कर रहे ये । महान् तेजस्वी तपोधन आपव जब अपने नियम समाप्त कर जल से उठे और बाहर आये तो उन्होंने अपने आश्रम को अजु न द्वारा जलाया हुआ देखा । उस समय उन्होंने राजधि कातंवीयं को शाप दिया, उसे हम आप लोगों से

English

Only that son who carries out the words (orders) of his father and mother is considered praiseworthy. My behest was not obeyed by the eldest son Yadu.

अध्याय १७२

श्लोक 79

गायत्रीजाप्यमात्रस् तु वेदत्रयफलं लभेत् ।कुलकोटिशतं साग्रं लभते तु शिवार्चनात्

gāyatrījāpyamātras tu vedatrayaphalaṃ labhet / kulakoṭiśataṃ sāgraṃ labhate tu śivārcanāt

हिन्दी अर्थ

खूत बोले--ऋषिवृद ! अब इसके बाद पुरुषरत्न राजधि कोष्टु के वंश का विवरण सुनिये, जिनके वंश में वृष्णिबंश के प्रवंतक बृष्णि का प्रार्देभाव हुआ था। कोष्टु के एक मात्र पुत्र महा- पशस्बी वृजिनीवान् हुए बजितीवान् के पुत्र स्वाहि को, जो स्वाहा करनेवालों (यज्ञकर्ताओं) में श्रेष्ठ थे, लोग बहुत चाहते हैं। स्वाहि के पुत्र राजा रशादु द्वानियों में अग्रगण्य थे। रहादु के ज्येष्ठ पुत्र प्रसृत को

English

That son who is antagonistic to his father is not honoured or approved by good men. He is the real son who does his duties to his parents. I have been slighted by Yadu and also by Turvasu. Much discourtesy was shown by Druhyu and Anu too.

अध्याय १७२

श्लोक 80

स्नाने दाने तथा श्राद्धे जागरे गीतवादिते ।अनिवर्तिका गतिस्तस्य शिवलोकात्कदाचन

snāne dāne tathā śrāddhe jāgare gītavādite / anivartikā gatistasya śivalokātkadācana

हिन्दी अर्थ

प्रजाएं बहुत चाहती थीं, उसने ऐसे महान् यज्ञों का अनुष्ठान किया था, जिनमें प्रचुर दक्षिणाएँ दी गई थीं । विचित्र ढंग के पुत्र-प्राप्ति के कर्मों द्वारा उसे जो पुत्र उत्पन्न हुआ, चित्ररथ नाम से विश्यात हुआ। वीर एवं चित्ररथों वीरो यज्ञान्विपुलदक्षिणान् । शशबिन्दुः पर॑ वृत्तो राजर्षोणामनुष्ठितः १८ चक़वर्तोी महासत्त्वों महावीर्यों बहुप्रज: । तत्रानुवंशश्ोको5यं यस्मिन्गीतः पुराविद: १६ शशबिन्दोउस्तु पुत्राणां शतानामभवच्छतम् । धीमतामनुरूपाणां भूरिद्रविणतेजसाम्

English

I have been specially honoured by Puru who had carried out my behest. Though he is the youngest, he shall be my successor. It was he who accepted my old age. It was he who fulfilled all my desires. Everything has been done by Puru who carried out his duties as a son.

अध्याय १७२

श्लोक 81

कालेन महताविष्टो मर्त्यलोके समाविशेत् ।राजा भवति मेधावी सर्वव्याधिविवर्जितः

kālena mahatāviṣṭo martyaloke samāviśet / rājā bhavati medhāvī sarvavyādhivivarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

तेषां घट च प्रधानास्तु प्रथुसाह्मा महाबला: प्रथुश्षवाः पृथुयशाः पृथुधर्मा पृथुंजयः

English

This boon has been granted by Sukra, Kavya, Usanas, himself—'O highly intelligent one, that son who is favourable to you shall be the king to succeed you.' Permitted by you all, may Puru be crowned as the ruler of the kingdom. The son who is endowed with all qualities and who is always loyal to his parents deserves all welfare. He is to be the lord (the king), though he may be the youngest.

अध्याय १७२

श्लोक 82

जीवेद्वर्षशतं साग्रं पुत्रपौत्रधनान्वितः ।तच्च तीर्थं पुनः स्मृत्वा लीयमानो महेश्वरे

jīvedvarṣaśataṃ sāgraṃ putrapautradhanānvitaḥ / tacca tīrthaṃ punaḥ smṛtvā līyamāno maheśvare

हिन्दी अर्थ

पृथुकीति: पथुदाता राजानः शाशबिन्दवः । शंसन्ति चर पुराणानि पार्थश्रवसमन्तरम् ॥ अन्तर: स पुरा यस्तु यज्ञस्थ तनयोइभवत्

English

Thus addressed by the delighted citizens and the

अध्याय १७२

श्लोक 83

उपास्ते यस्तु वै सन्ध्यां तस्मिंस्तीर्थे च पर्वणि ।साङ्गोपाङ्गैश् चतुर्वेदैर् लभते फलमुत्तमम्

upāste yastu vai sandhyāṃ tasmiṃstīrthe ca parvaṇi / sāṅgopāṅgaiś caturvedair labhate phalamuttamam

हिन्दी अर्थ

उशना सेतु धर्मात्मा अवाप्य पृथिवीमिमाम् । आजहाराश्वमेधानां शतसमुत्तमधासिकः २३

English

The whole of this earth consisting of the seven "Never can lust subside by enjoyment of pleasures. Just as the fire gets ablaze all the more by ghee-oblations, so also desires get increased by indulgence.

अध्याय १७२

श्लोक 84

तत्र सर्वं शिवक्षेत्राच्छरपातं समन्ततः ।न संचरेद् भयोद्विग्ना ब्रह्महत्या नराधिप

tatra sarvaṃ śivakṣetrāccharapātaṃ samantataḥ / na saṃcared bhayodvignā brahmahatyā narādhipa

हिन्दी अर्थ

........ ३ ७... धअ४ पड टी आतभघपखणक्‍ न की चित्ररथ ने भी इसी प्रकार विपुलदक्षिणावाले बज्ञों का अनुष्ठान किया था। तदनन्तर राजर्षियों द्वारा सम्मानित शशविन्दु राज्याधिकारी हुआ ।१४-१८। वह महाबलवान्ू, महान् पराक्रमी, अनेक पुत्रोंवाला, तथा चन्रवर्ती शासक था । पुरानी कथाओं के जाननेवाले उसके विषय में श्लोक गाते हैं, जिसका आशय निम्न प्रकार है । राजा शशविन्दु के एक सौ विपुल अथेबल सम्पन्न बुद्धिमान एवं तेजस्वों पुत्र थे, जिनमें छः सबसे बड़े प्रमुख थे,

English

All the grains and barley seeds, all the gold, all the cattle and all the women in the world are not sufficient for even one (person). He who realises this, does not become deluded.

अध्याय १७२

श्लोक 85

यत्र तत्र स्थितो वृक्षान् पश्यते तीर्थतत्परः ।विविधैः पातकैर् मुक्तो मुच्यते नात्र संशयः

yatra tatra sthito vṛkṣān paśyate tīrthatatparaḥ / vividhaiḥ pātakair mukto mucyate nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

जो सब प्ृरथुगण के नाम से विख्यात थे, वे छः पुत्र महान् बलशाली थे । उनके नाम थे, पृथश्रवा, पृथुयश्ञा, पृथुधमा, पृथुञ्जय, पृथकीति और पृथुदाता । ये सब के सब राजा थे ओर शबविन्दु के पूत्रों के नाम से विख्यात थे । सभी पुराण पृश्नत्रवा के पृत्र अस्तर को बड़ी प्रसंसा करते हैं, यही अन्तर प्राचीन काल में यज्ञ का पुत्र था ।१६-२२। उसी धर्मात्मा ने उश्वना नाम से इस पृथ्वी को प्राप्त किया ।

English

When one maintains the purifying (auspicious) atti¬ tude to all living beings in thought, speech and action, one attains (realizes) Brahman. When one is not afraid of others, when others are not afraid of him, when one neither desires nor hates (anything),

अध्याय १७२

श्लोक 86

श्वभ्री तत्र महाराज जलमध्ये प्रदृश्यते ।कथानिका पुराणोक्ता वानरी तीर्थसेवनात्

śvabhrī tatra mahārāja jalamadhye pradṛśyate / kathānikā purāṇoktā vānarī tīrthasevanāt

हिन्दी अर्थ

परम धार्िक विचारों वाले उशना ने एक सो अश्वमेघ यज्ञों का अनुष्ठान किया। उसका पुत्र मरुत्त हुआ जिसे राजधिगण परम सम्मान देते हैं, मरुत्त का पुत्र वीरकम्बलवहि कहा जाता है, कम्बलर्वाह का पुत्र परम विद्वान राजा रवमकवच हुआ । प्राचीनकाल में इस राजा रुक्‍्मकवच ने बहुतेरे धनुष, बाण, कवच घारण करनेवाले योद्धाओं को युद्ध क्षेत्र में अपने तीक्ष्याणों से मारकर उत्तम लक्ष्मी को प्राप्ति की थी। और अदवमेघ यज्ञ में ब्राह्मणों को भूरि दक्षिणा दान कर महान् यघ्ञ प्राप्त किया था। उप्त राजा रुक्‍्मकबच से शत्रओं के वीरों को नष्ट करनेवाले महान् बलवान, महान् पराक्रमी पाँच वोर पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके

English

Happiness comes to one who eschews Trsna (cove¬ tousness), which cannot be got rid of by evil-minded ones, which does not subside even when one grows old and which is a foul disease full of fatal faults.

अध्याय १७२

श्लोक 87

तत्र कूपो महाराज तिष्ठते देवनिर्मितः ।शिवस्य पश्चिमे भागे शिवक्षेत्रमनुत्तमम्

tatra kūpo mahārāja tiṣṭhate devanirmitaḥ / śivasya paścime bhāge śivakṣetramanuttamam

हिन्दी अर्थ

नाम थे, उक्मेषु, पृथुरुकम, ज्यामघ, परिधि और हरि । पिता में प्रिघि और हरि नामक पुत्रों को विदेह देश

English

When one grows old, the hairs grow old; the teeth decay along with old age; but the hope for longevity and acquisition of wealth never grow old. The happiness arising from enjoyment of lust or by attaining the great pleasure in heaven does not deserve even a sixteenth part of the happiness resulting from-the destruction of covetousness".

अध्याय १७२

श्लोक 88

वृषोत्सर्गं तु यः कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप ।क्रीडन्ति पितरस्तस्य स्वर्गलोके यदृच्छया

vṛṣotsargaṃ tu yaḥ kuryāttasmiṃstīrthe narādhipa / krīḍanti pitarastasya svargaloke yadṛcchayā

हिन्दी अर्थ

८४६ वॉयूपुराणंमू रुकमेषुरभवद्राजा पृथुरुक्मस्तदाश्रयः । तेभ्यः प्रब्रजितो राज्याज्ज्यामेघो5भवदाश्रमे

English

Verses 94-100 are the immortal verses quoted in various works and they constitute the moral of this episode.

अध्याय १७२

श्लोक 89

अगम्यागमने पापम् अयाज्ययाजने कृते ।स्तेयाच्च ब्रह्मगोहत्यागुरुघाताच्च पातकम् ।तत्सर्वं नश्यते पापं वृषोत्सर्गे कृते तु वै

agamyāgamane pāpam ayājyayājane kṛte / steyācca brahmagohatyāgurughātācca pātakam / tatsarvaṃ naśyate pāpaṃ vṛṣotsarge kṛte tu vai

हिन्दी अर्थ

नर्मदानूप एकाकी मेकलावृत्तिका अपि । ऋश्षवन्त॑ गिरि गत्वा शुक्तिमत्यामथाविशत्

English

After saying this, the saintly king went to the forest along with his wife. He performed a great penance on Bhrgu- tunga 1 and performed hundreds of holy rites. Earning great fame, he attained,Svarga. His races are five thus. They are holy and rever¬ ed by Devas and sages. The whole earth is pervaded by them as if with the rays of the sun.

अध्याय १७२

श्लोक 90

माण्डव्यतीर्थमाहात्म्यं यः शृणोति समाधिना ।मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा

māṇḍavyatīrthamāhātmyaṃ yaḥ śṛṇoti samādhinā / mucyate sarvapāpebhyo nātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

ज्यामघस्या भवद्भार्या शेव्या बलवती भृशम् । अयुन्नोइषि स वे राजा भायमिन्यां न विन्दति तस्था55सी द्विजयो युद्धे ततः कन्याम॒वाप सः । भार्यासुवाच राजा स स्नुषेति तु नरेश्वरः

English

An excellent Brahmana who reads this entire narra¬ tive of Yayati or listens to it, shall become wealthy, long-lived and renowned. He will be blessed with children.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 172
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.